| audio_file,text,length |
| Atharvaveda_Kanda_3_0301.wav,येन वेहद्बभूविथ नाशयामसि तत्त्वत्,4.276 |
| RigVeda_47_0167.wav,नयन्तो गर्भं वनां धियं धुर्हिरिश्मश्रुं नार्वाणं धनर्चम्,7.509 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0332.wav,तत्त्वं यमस्य राज्ये वसानस्तार्प्यं चर,4.795 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0388.wav,तेषामिष्टानि विहितानि धामश स्थात्रे रेजन्ते विकृतानि रूपशः,7.805 |
| Rigvedha_014_0028.wav,आ रोदसी अपृणा जायमान उत प्र रिक्था अध नु प्रयज्यो,6.5380625 |
| RigVeda_51_0349.wav,हरित्वता वर्चसा सूर्यस्य श्रेष्ठै रूपैस्तन्वं स्पर्शयस्व,7.392 |
| Rigveda_40_0348.wav,त्वं राजेव सुव्रतो गिरः सोमा विवेशिथ,5.071 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0010.wav,उद्यानं ते पुरुष नावयानं जीवातुं ते दक्षतातिं कृणोमि,7.002 |
| Rigvedha_002_0242.wav,त्वमग्ने प्रयतदक्षिणं नरं वर्मेव स्यूतं परि पासि विश्वतः,7.197 |
| Rigvedha_006_0226.wav,याभिर्वर्तिकां ग्रसिताममुञ्चतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्,7.359 |
| Rigvedha_002_0109.wav,मिथः सन्तु प्रशस्तयः,2.941 |
| Rigvedha_002_0398.wav,क्रीळं वः शर्धो मारुतमनर्वाणं रथेशुभम्,5.214 |
| RigVeda_48_0143.wav,दीर्घायुत्वमङ्गिरसो वो अस्तु प्रति गृभ्णीत मानवं सुमेधसः,7.491 |
| Rigvedha_006_0004.wav,यो व्यंसं जाहृषाणेन मन्युना यः शम्बरं यो अहन्पिप्रुमव्रतम्,7.737 |
| RigVeda_Part_021_0138.wav,महि महे तवसे दीध्ये नॄनिन्द्रायेत्था तवसे अतव्यान्,8.475 |
| RigVeda_Part_022_0301.wav,नृम्णा शीर्षस्वायुधा रथेषु वो विश्वा वः श्रीरधि तनूषु पिपिशे,7.977 |
| RigVeda_Part_017_0144.wav,अधा ते अग्ने किमिहा वदन्त्यनायुधास आसता सचन्ताम्,6.913 |
| Rigveda_36_0102.wav,क्तानि हर्य नः अग्निं दूतं पुरो दधे हव्यवाहमुप ब्रुवे,7.605 |
| Rigvedha_011_0210.wav,घृतं मिमिक्षे घृतमस्य योनिर्घृते श्रितो घृतम्वस्य धाम,5.4760625 |
| Rigveda_40_0173.wav,बभ्रवे नु स्वतवसेऽरुणाय दिविस्पृशे,4.893 |
| Rigveda_33_0484.wav,यदा ते मारुतीर्विशस्तुभ्यमिन्द्र नियेमिरे,5.634 |
| Atharvaveda_Part_017_0124.wav,पञ्चभिः पराङ्तपस्येकयार्वाङशस्तिमेषि सुदिने बाधमानस्तवेद्विष्णो बहुधा वीर्याणि त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्,17.468 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0109.wav,दूष्या दूषिरसि हेत्या हेतिरसि मेन्या मेनिरसि,6.131 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0309.wav,ततः किशोरा म्रियन्ते वत्सांश्च घातुको वृकः,5.403 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0328.wav,युज्यमानो वैश्वदेवो युक्तः प्रजापतिर्विमुक्तः सर्वम्,6.403 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0406.wav,उतो सन्मन्यन्तेऽवरे ये ते शाखामुपासते,5.575 |
| Rigveda_33_0282.wav,आ यातं नहुषस्पर्यान्तरिक्षात्सुवृक्तिभिः,5.598 |
| Rigvedha_002_0384.wav,ऊर्ध्वो नः पाह्यंहसो नि केतुना विश्वं समत्रिणं दह,6.506 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0260.wav,शिक्षा णो अस्मिन् पुरुहूत यामनि जीवा ज्योतिरशीमहि,6.088 |
| Atharvaveda_Part_020_40139.wav,अयमिन्द्र वृषाकपिः परस्वन्तं हतं विदत्,4.251 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0526.wav,वनस्पतीन् वानस्पत्यान् ओषधीरुत वीरुधः,4.816 |
| Atharvaveda_Part_015_0175.wav,योऽस्य प्रथमः प्राण ऊर्ध्वो नामायं सो अग्निः,5.278 |
| RigVeda_Part_023_0304.wav,यत्ते अभ्रस्य विद्युतो दिवो वर्षन्ति वृष्टयः,6.144 |
| Atharvaveda_Part_020_20258.wav,क ईं वेद सुते सचा पिबन्तं कद्वयो दधे,4.966 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0217.wav,यदि शोको यदि वाभिशोको यदि वा राज्ञो वरुणस्यासि पुत्रः,6.347 |
| Atharvaveda_Part_020_40348.wav,कुमारिका पिङ्गलिका कार्द भस्मा कु धावति,5.057 |
| Rigveda_40_0559.wav,असर्जि रथ्यो यथा पवित्रे चम्वोः सुतः,5.088 |
| Rigveda_34_0067.wav,आ याहि सुषुमा हि त इन्द्र सोमं पिबा इमम्,5.112 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0263.wav,सुखो रथ इव वर्ततां कृत्या कृत्याकृतं पुनः,4.719 |
| Atharvaveda_Part_020_30387.wav,आशुं जेतारं हेतारं रथीतममतूर्तं तुग्र्यावृधम्,6.546 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0166.wav,ईडे अग्निं स्वावसुं नमोभिरिह प्रसक्तो वि चयत्कृतं नः,6.372 |
| Rigveda_38_0234.wav,इन्द्रेण सोमपीतये,3.587 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0115.wav,वरेण्यक्रतुरहमपो देवीरुप ह्वये,4.109 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0439.wav,तिस्रो ह प्रजा अत्यायमायन् न्यन्या अर्कमभितोऽविशन्त,7.225 |
| RigVeda_Part_024_0382.wav,महाँ इन्द्रो नृवदा चर्षणिप्रा उत द्विबर्हा अमिनः सहोभिः,7.437 |
| Rigvedha_003_0277.wav,अत्यं न वाजं हवनस्यदं रथमेन्द्रं ववृत्यामवसे सुवृक्तिभिः,6.887 |
| RigVeda_Part_021_0115.wav,त्यस्य चिन्महतो निर्मृगस्य वधर्जघान तविषीभिरिन्द्रः,6.038 |
| RigVeda_Part_017_0013.wav,होता यजिष्ठो मह्ना शुचध्यै हव्यैरग्निर्मनुष ईरयध्यै,7.056 |
| Rigveda_33_0382.wav,यद्वा वाणीरनूषत,2.663 |
| RigVeda_Part_027_0308.wav,इन्द्राविष्णू तत्पनयाय्यं वां सोमस्य मद उरु चक्रमाथे,8.022 |
| Rigvedha_005_0066.wav,अस्मभ्यं तानि मरुतो वि यन्त रयिं नो धत्त वृषणः सुवीरम्,6.896 |
| Rigveda_34_0298.wav,इषा मंहिष्ठा पुरुभूतमा नरा याभिः क्रिविं वावृधुस्ताभिरा गतम्,7.763 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0155.wav,तस्योर्यत्सत्यं यतरदृजीयस्तदित्सोमोऽवति हन्त्यासत्,6.352 |
| Rigvedha_013_0325.wav,रथं न चित्रं वपुषाय दर्शतं मनुर्हितं सदमिद्राय ईमहे,6.371 |
| RigVeda_Part_027_0359.wav,आरे बाधेथां निरृतिं पराचैरस्मे भद्रा सौश्रवसानि सन्तु,8.405 |
| Rigveda_41_0004.wav,विप्रस्य धारया कविः,2.624 |
| RigVeda_47_0134.wav,समुद्रे त्वा नृमणा अप्स्वन्तर्नृचक्षा ईधे दिवो अग्न ऊधन्,8.53 |
| Rigvedha_004_0251.wav,जुषस्व सप्रथस्तमं वचो देवप्सरस्तमम्,4.976 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0322.wav,सविता मा दक्षिणत उत्तरान् मा शचीपतिः,4.926 |
| Rigveda_41_0212.wav,धिया जूता असृक्षत,2.934 |
| RigVeda_Part_025_0242.wav,पीपिहीषः सुदुघामिन्द्र धेनुं भरद्वाजेषु सुरुचो रुरुच्याः,6.964 |
| RigVeda_Part_019_0062.wav,उत स्मैनं वस्त्रमथिं न तायुमनु क्रोशन्ति क्षितयो भरेषु,6.767 |
| RigVeda_46_0023.wav,क्तिभिर्निकामासो व्यृण्विरे,3.905 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0227.wav,योऽजं पञ्चौदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति,5.87 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0005.wav,इह तेऽसुरिह प्राण इहायुरिह ते मनः,4.57 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0175.wav,यत्कृषते यद्वनुते यच्च वस्नेन विन्दते सर्वं मर्त्यस्य तन् नास्ति क्रव्याच्चेदनिराहितः,10.341 |
| Rigvedha_001_0179.wav,होम गन्तारमूतये,3.797 |
| Rigveda_38_0067.wav,कर्णगृह्या मघवा शौरदेव्यो वत्सं नस्त्रिभ्य आनयत्,7.111 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0326.wav,संमातर इव दुह्रामस्मा अरिष्टतातये,4.856 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0707.wav,तस्मै ते नक्षत्रराज शकधूम सदा नमः,4.439 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0187.wav,लोककृतः पथिकृतो यजामहे ये देवानां हुतभागा इह स्थ,6.087 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0372.wav,एवा दुष्वप्न्यं सर्वमप्रिये सं नयामसि,4.287 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0288.wav,शं च नो मयश्च नो मा च नः किं चनाममत्,4.222 |
| Atharvaveda_Part_020_30069.wav,अश्मानं चिद्ये बिभिदुर्वचोभिर्व्रजं गोमन्तमुशिजो वि वव्रुः,6.47 |
| RigVeda_Part_020_0352.wav,त्वं हि सत्यो अद्भुतो दाता वाजस्य गोमतः,5.141 |
| RigVeda_52_0118.wav,वदन्ब्रह्मावदतो वनीयान्पृणन्नापिरपृणन्तमभि ष्यात्,7.391 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0243.wav,सुपर्णस्त्वान्वविन्दत्सूकरस्त्वाखनन् नसा,5.085 |
| Rigveda_36_0307.wav,आ न स्तोममुप द्रवद्धियानो अश्वो न सोतृभिः यं ते स्वधावन्स्वदयन्ति धेनव इन्द्र कण्वेषु रातयः,13.321 |
| Rigveda_29_0231.wav,त्रयो घर्मास उषसं सचन्ते सर्वाँ इ,4.962 |
| Rigveda_40_0293.wav,पवित्रे अर्षति,2.109 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0064.wav,अवधीत्कामो मम ये सपत्ना उरुं लोकमकरन् मह्यमेधतुम्,6.416 |
| Rigvedha_010_0048.wav,यत्त्वेषयामा नदयन्त पर्वतान्दिवो वा पृष्ठं नर्या अचुच्यवुः,7.724 |
| RigVeda_Part_027_0322.wav,घृतेन द्यावापृथिवी अभीवृते घृतश्रिया घृतपृचा घृतावृधा,8.326 |
| RigVeda_49_0334.wav,इमां त्वमिन्द्र मीढ्वः सुपुत्रां सुभगां कृणु,5.133 |
| Rigveda_38_0122.wav,इन्द्रे अग्ना नमः स्वः,3.505 |
| Rigvedha_009_0334.wav,जीवो मृतस्य चरति स्वधाभिरमर्त्यो मर्त्येना सयोनिः,5.986 |
| RigVeda_Part_017_0346.wav,त्वं वृत्रं शवसा जघन्वान्त्सृजः सिन्धूँरहिना जग्रसानान्,7.409 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0198.wav,ते वा अन्येषां कुम्भीं पर्यादधति सर्वदा,5.344 |
| RigVeda_47_0340.wav,स्तन्वः स्वायाः,2.958 |
| RigVeda_44_0384.wav,इनो राजन्नरतिः समिद्धो रौद्रो दक्षाय सुषुमाँ अदर्शि,7.229 |
| RigVeda_Part_018_0203.wav,त्वा युजा तव तत्सोम सख्य इन्द्रो अपो मनवे सस्रुतस्कः,6.718 |
| RigVeda_Part_017_0365.wav,समिन्द्रो गा अजयत्सं हिरण्या समश्विया मघवा यो ह पूर्वीः,7.616 |
| RigVeda_Part_019_0200.wav,या वां सन्ति पुरुस्पृहो नियुतो दाशुषे नरा,6.269 |
| RigVeda_Part_015_0177.wav,ग्रसेतामश्वा वि मुचेह शोणा दिवेदिवे सदृशीरद्धि धानाः,7.764 |
| RigVeda_44_0114.wav,तं वः सखायो मदाय पुनानमभि गायत,4.79 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0376.wav,तमर्चत विश्वमित्रा हविर्भिः स नो यमः प्रतरं जीवसे धात्,6.105 |
| RigVeda_Part_026_0309.wav,पर्जन्यो न ओषधीभिर्मयोभुरग्निः सुशंसः सुहवः पितेव,7.384 |
| Rigveda_29_0277.wav,सजूर्देवेभिरपां नपातं सखायं कृध्वं शिवो नो अस्तु,7.373 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0001.wav,अग्निर्नः शत्रून् प्रत्येतु विद्वान् प्रतिदहन्न् अभिशस्तिमरातिम्,7.038 |
| Rigvedha_003_0089.wav,अग्ने विवस्वदुषसश्चित्रं राधो अमर्त्य आ दाशुषे जातवेदो वहा त्वमद्या देवाँ उषर्बुधः,11.769 |
| RigVeda_48_0151.wav,प्रति गृभ्णीत मानवं सुमेधसः,3.432 |
| RigVeda_48_0145.wav,प्रथयन्पृथिवीं मातरं वि,3.147 |
| Atharvaveda_Part_020_10184.wav,विषूवृदिन्द्रो अमुतेरुत क्षुधः स इद्रायो मघवा वस्व ईशते,6.167 |
| Rigvedha_003_0243.wav,अथो हारिद्रवेषु मे हरिमाणं नि दध्मसि,4.497 |
| Rigvedha_010_0267.wav,आ वां दानाय ववृतीय दस्रा गोरोहेण तौग्र्यो न जिव्रिः,6.798 |
| Rigvedha_009_0118.wav,आस्य जानन्तो नाम चिद्विवक्तन महस्ते विष्णो सुमतिं भजामहे,7.767 |
| Rigvedha_010_0171.wav,विश्वा ते अनु जोष्या भूद्गौः सूरीँश्चिद्यदि धिषा वेषि जनान्,7.691 |
| Rig_veda_54_0235.wav,अयमग्निरुरुष्यत्यमृतादिव जन्मनः,4.559 |
| Rigvedha_009_0100.wav,ता वां वास्तून्युश्मसि गमध्यै यत्र गावो भूरिशृङ्गा अयासः,7.698 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0532.wav,देव त्वष्टा रायस्पोषं वि ष्य नाभिमस्य,4.236 |
| Rigveda_37_0151.wav,त्वाय प्र तिरतं न आयुः,3.167 |
| Rigveda_37_0306.wav,एहीमिन्द्र द्रवा पिब,3.695 |
| RigVeda_49_0330.wav,प्रजापतिराजरसाय समनक्त्वर्यमा,3.972 |
| Rigvedha_003_0267.wav,उग्रो ययिं निरपः स्रोतसासृजद्वि शुष्णस्य दृंहिता ऐरयत्पुरः,6.622 |
| RigVeda_44_0158.wav,सुते चित्त्वाप्सु मदामो अन्धसा श्रीणन्तो गोभिरुत्तरम्,6.587 |
| RigVeda_Part_025_0195.wav,अभूरेको रयिपते रयीणामा हस्तयोरधिथा इन्द्र कृष्टीः,6.663 |
| Rigveda_41_0189.wav,वाजं गोमन्तमा भर परि वाजे न वाजयुमव्यो वारेषु सिञ्चत,8.824 |
| RigVeda_Part_024_0410.wav,दिवो न तुभ्यमन्विन्द्र सत्रासुर्यं देवेभिर्धायि विश्वम्,6.483 |
| Rigvedha_012_0309.wav,यो वृत्राय सिनमत्राभरिष्यत्प्र तं जनित्री विदुष उवाच,5.976 |
| RigVeda_Part_024_0237.wav,त्वामग्ने स्वाध्यो मर्तासो देववीतये,8.856 |
| Rigvedha_005_0108.wav,एषा स्या वो मरुतोऽनुभर्त्री प्रति ष्टोभति वाघतो न वाणी,7.254 |
| Rigveda_35_0061.wav,आ मे अस्य प्रतीव्यमिन्द्रनासत्या गतम्,6.282 |
| RigVeda_53_0078.wav,त्र्यजीजनत्,2.295 |
| Rigvedha_010_0146.wav,अस्मादहं तविषादीषमाण इन्द्राद्भिया मरुतो रेजमानः,6.735 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0264.wav,आथर्वणानां चतुर्ऋचेभ्यः स्वाहा,4.486 |
| RigVeda_Part_027_0252.wav,त्विषीमन्तो अध्वरस्येव दिद्युत्तृषुच्यवसो जुह्वो नाग्नेः,10.415 |
| RigVeda_51_0181.wav,मिमिक्षुर्यमद्रय इन्द्र तुभ्यं तेभिर्वर्धस्व मदमुक्थवाहः,6.205 |
| Rigvedha_012_0181.wav,स ऋणचिदृणया ब्रह्मणस्पतिर्द्रुहो हन्ता मह ऋतस्य धर्तरि,6.6730625 |
| Rigvedha_002_0060.wav,तदित्समानमाशाते वेनन्ता न प्र युच्छतः,5.76 |
| Rigveda_38_0062.wav,धानानां न सं गृभायास्मयुर्द्विः सं गृभायास्मयुः,6.779 |
| Atharvaveda_Part_020_20242.wav,गोदा इद्रेवतो मदः अथा ते अन्तमानां विद्याम सुमतीनाम्,7.788 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0192.wav,तेन गेष्म सुकृतस्य लोकं स्वरारोहन्तो अभि नाकमुत्तमम्,6.777 |
| RigVeda_Part_027_0173.wav,ता नव्यसो जरमाणस्य मन्मोप भूषतो युयुजानसप्ती,6.398 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0401.wav,गायत्रीं त्रिष्टुभं जगतीमनुष्टुभं बृहदर्कीं यजमानाय स्वराभरन्तीम्,8.417 |
| Rigveda_32_0261.wav,मा न इन्द्र पीयत्नवे मा शर्धते परा दाः,5.623 |
| Rigvedha_013_0316.wav,स जिन्वते जठरेषु प्रजज्ञिवान्वृषा चित्रेषु नानदन्न सिंहः,7.506 |
| RigVeda_Part_020_0336.wav,स्रुचस्त्वा यन्त्यानुषक्सुजात सर्पिरासुते,5.08 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0050.wav,मा ते मनो मासोर्माङ्गानां मा रसस्य ते,5.424 |
| RigVeda_Part_019_0304.wav,देवेषु च सवितर्मानुषेषु च त्वं नो अत्र सुवतादनागसः,7.352 |
| Rigveda_30_0359.wav,एष स्य वां पूर्वगत्वेव सख्ये निधिर्हितो माध्वी रातो अस्मे,8.157 |
| RigVeda_52_0088.wav,थ ममत्तु येन निरिणासि शत्रून्,3.778 |
| RigVeda_47_0363.wav,ऐभिर्ददे,1.662 |
| Rigvedha_009_0264.wav,अस्य वामस्य पलितस्य होतुस्तस्य भ्राता मध्यमो अस्त्यश्नः,6.504 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0570.wav,अश्वः समुद्रो भूत्वाध्यस्कन्दद्वशे त्वा,5.126 |
| RigVeda_47_0336.wav,यदचरस्तन्वा वावृधानो बलानीन्द्र प्रब्रुवाणो जनेषु,7.184 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0457.wav,इन्द्र गीर्भिर्न आ विश यजमानाय सुन्वते,4.841 |
| RigVeda_Part_028_0197.wav,मन्द्रं होतारमुशिजो यविष्ठमग्निं विश ईळते अध्वरेषु,6.553 |
| RigVeda_49_0061.wav,अत्रा समुद्र आ गूळ्हमा सूर्यमजभर्तन,4.681 |
| Rigvedha_004_0288.wav,अवोचाम रहूगणा अग्नये मधुमद्वचः,5.613 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0490.wav,अमित्राणां सेना अभि धत्तमर्बुदे,4.47 |
| RigVeda_Part_022_0246.wav,युष्मादत्तस्य मरुतो विचेतसो रायः स्याम रथ्यो वयस्वतः,9.196 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0130.wav,अश्वत्थो देवसदनस्तृतीयस्यामितो दिवि,4.583 |
| Atharvaveda_Part_020_20219.wav,विश्वाः पृतना अभिभूतरं नरं सजूस्ततक्षुरिन्द्रं जजनुश्च राजसे,8.001 |
| Rigveda_38_0409.wav,अग्ने सुवीर एधते,3.505 |
| Rig_veda_45_0190.wav,आ त्वा मन्त्राः कविशस्ता वहन्त्वेना राजन्हविषा मादयस्व,7.465 |
| Rigveda_33_0511.wav,अया धिया य उच्यते पतिर्दिवः,3.62 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0088.wav,उपमितां प्रतिमितामथो परिमितामुत शालाया विश्ववाराया नद्धानि वि चृतामसि,9.858 |
| RigVeda_Part_022_0092.wav,अपो अपाचीरपरा अपेजते प्र पूर्वाभिस्तिरते देवयुर्जनः,8.086 |
| RigVeda_Part_027_0281.wav,मघोनां मंहिष्ठा तुविशुष्म ऋतेन वृत्रतुरा सर्वसेना,6.693 |
| RigVeda_Part_021_0354.wav,बृहद्वयो बृहते तुभ्यमग्ने धियाजुरो मिथुनासः सचन्त,6.621 |
| Atharvaveda_Part_020_10103.wav,ससानात्यामुत सूर्यं ससानेन्द्रः ससान पुरुभोजसं गाम्,7.127 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0404.wav,सामानि यस्य लोमान्यथर्वाङ्गिरसो मुखं स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः,8.162 |
| Rigveda_40_0538.wav,सोमो अर्षति विष्णवे,3.09 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0257.wav,तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति,5.527 |
| Atharvaveda_Part_020_20311.wav,वयमु त्वामपूर्व्य स्थूरं न कच्चिद्भरन्तोऽवस्यवः,5.716 |
| RigVeda_Part_025_0096.wav,न यं जरन्ति शरदो न मासा न द्याव इन्द्रमवकर्शयन्ति,6.427 |
| Rig_veda_54_0275.wav,इह प्रजामिह रयिं रराणः प्र जायस्व,4.422 |
| Rigvedha_010_0002.wav,तस्मिन्साकं त्रिशता न शङ्कवोऽर्पिताः षष्टिर्न चलाचलासः यस्ते स्तनः शशयो यो मयोभूर्येन विश्वा पुष्यसि वार्याणि,15.1 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0017.wav,पशोरन्नस्य भूमानं गवां स्फातिं नि यच्छतु,4.882 |
| Rigveda_32_0119.wav,इळां नः संयतं करत्,3.579 |
| Rigveda_29_0176.wav,भवा वरूथं मघवन्मघोनां यत्समजासि शर्धतः,5.707 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0298.wav,राजानः सत्यं गृह्णाना ब्रह्मजायां पुनर्ददुः,5.623 |
| Rigvedha_006_0077.wav,आण्डा मा नो मघवञ्छक्र निर्भेन्मा नः पात्रा भेत्सहजानुषाणि,8.606 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0074.wav,युज्यन्ते यस्यामृत्विजः सोममिन्द्राय पातवे यस्यां पूर्वे भूतकृत ऋषयो गा उदानृचुः,10.791 |
| Rigveda_37_0003.wav,स्तुवते काम्यं वसु सहस्रेणेव मंहते,5.365 |
| Rigvedha_013_0332.wav,पिता यज्ञानामसुरो विपश्चितां विमानमग्निर्वयुनं च वाघताम्,7.5190625 |
| Rigveda_32_0363.wav,अश्वी रथी सुरूप इद्गोमाँ इदिन्द्र ते सखा,5.88 |
| RigVeda_Part_019_0102.wav,इन्द्रा युवं वरुणा दिद्युमस्मिन्नोजिष्ठमुग्रा नि वधिष्टं वज्रम्,7.546 |
| Rigveda_35_0180.wav,वीतिहोत्रा कृतद्वसू दशस्यन्तामृताय कम्,5.889 |
| Rigveda_34_0063.wav,स नः पप्रिः पारयाति स्वस्ति नावा पुरुहूतः,5.109 |
| Rigvedha_013_0090.wav,यमिन्धते युवतयः समित्था हिरण्यवर्णं घृतमन्नमस्य,6.215 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0443.wav,अपो वामदेव्येन यज्ञं यज्ञायज्ञियेन,5.234 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0388.wav,वर्चसो द्यावापृथिवी संग्रहणी बभूवथुर्वर्चो गृहीत्वा पृथिवीमनु सं चरेम,8.596 |
| RigVeda_52_0267.wav,अहं जनाय समदं कृणोम्यहं द्यावापृथिवी आ विवेश,7.013 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0185.wav,स देवान्त्सर्वान् उरस्युपदद्य संपश्यन् याति भुवनानि विश्वा,6.839 |
| Atharvaveda_Part_020_10162.wav,आप्रुषायन् मधुना ऋतस्य योनिमवक्षिपन्न्,3.895 |
| Rigvedha_004_0289.wav,द्युम्नैरभि प्र णोनुमः,2.969 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0304.wav,इयं तं प्सात्वाहुतिः समिद्देवी सहीयसी राज्ञो वरुणस्य बन्धोऽसि,9.014 |
| RigVeda_Part_017_0255.wav,अग्निरीशे बृहतः क्षत्रियस्याग्निर्वाजस्य परमस्य रायः,6.931 |
| RigVeda_48_0140.wav,ये यज्ञेन दक्षिणया समक्ता इन्द्रस्य सख्यममृतत्वमानश,7.257 |
| RigVeda_47_0169.wav,अतः संगृभ्या विशां दमूना विधर्मणायन्त्रैरीयते नॄन्,8.033 |
| Rigvedha_007_0049.wav,अश्वं न गूळ्हमश्विना दुरेवैरृषिं नरा वृषणा रेभमप्सु,6.127 |
| Rig_veda_54_0169.wav,याः सरूपा विरूपा एकरूपा यासामग्निरिष्ट्या नामानि वेद,8.632 |
| RigVeda_48_0049.wav,आ जनं त्वेषसंदृशं माहीनानामुपस्तुतम्,5.587 |
| Rigveda_37_0131.wav,एकैवोषाः सर्वमिदं वि भात्येकं वा इदं वि बभूव सर्वम्,8.201 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0138.wav,देवाः कपोत इषितो यदिच्छन् दूतो निर्ऋत्या इदमाजगाम,6.21 |
| Rigveda_33_0008.wav,परा गावो यवसं कच्चिदाघृणे नित्यं रेक्णो अमर्त्य,6.609 |
| Atharvaveda_Part_020_10289.wav,न स्तोतारं निदे करः,2.547 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0201.wav,यमैछामाविदाम तं प्रतिस्पाशनमन्तितम्,5.382 |
| Rigvedha_001_0017.wav,वर्धमानं स्वे दमे,4.014 |
| RigVeda_Part_026_0064.wav,यस्य वायोरिव द्रवद्भद्रा रातिः सहस्रिणी,6.541 |
| Atharvaveda_Part_017_0117.wav,त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्,7.452 |
| Rigvedha_010_0295.wav,धियंजिन्वा धिष्ण्या विश्पलावसू दिवो नपाता सुकृते शुचिव्रता,7.051 |
| RigVeda_Part_025_0131.wav,अव गिरेर्दासं शम्बरं हन्प्रावो दिवोदासं चित्राभिरूती,7.517 |
| Rigvedha_014_0122.wav,स केतुरध्वराणामग्निर्देवेभिरा गमत्,4.644 |
| RigVeda_42_0144.wav,इन्द्रस्य वज्रो वृषभो विभूवसुः सोमो हृदे पवते चारु मत्सरः,7.537 |
| RigVeda_Part_024_0394.wav,यस्ते मदः पृतनाषाळमृध्र इन्द्र तं न आ भर शूशुवांसम्,6.594 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0189.wav,अजस्तमांस्यप हन्ति दूरमस्मिंल्लोके श्रद्दधानेन दत्तः,6.172 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0112.wav,तद्वा अथर्वणः शिरो देवकोशः समुब्जितः,4.781 |
| RigVeda_50_0293.wav,संरभ्या धीराः स्वसृभिरनर्तिषुराघोषयन्तः पृथिवीमुपब्दिभिः,6.638 |
| Rigveda_38_0509.wav,अपालामिन्द्र त्रिष्पूत्व्यकृणोः सूर्यत्वचम्,7.176 |
| RigVeda_51_0317.wav,प्रचोदयन्ता विदथेषु कारू प्राचीनं ज्योतिः,5.274 |
| RigVeda_Part_019_0257.wav,यूयं हि देवीरृतयुग्भिरश्वैः परिप्रयाथ भुवनानि सद्यः,7.104 |
| Atharvaveda_Part_020_10024.wav,स्वादुष्टे अस्तु संसुदे मधुमान् तन्वे तव,6.08 |
| Rigvedha_003_0131.wav,प्रातर्याव्णः सहस्कृत सोमपेयाय सन्त्य इहाद्य दैव्यं जनं बर्हिरा सादया वसो,10.054 |
| Rigvedha_001_0157.wav,पक्वा शाखा न दाशुषे,3.805 |
| Rigvedha_002_0276.wav,अहेर्यातारं कमपश्य इन्द्र हृदि यत्ते जघ्नुषो भीरगच्छत्,6.638 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0321.wav,मृगा या विदुरोषधीस्ता अस्मा अवसे हुवे यावतीनामोषधीनां गावः प्राश्नन्त्यघ्न्या यवतीनामजावयः,12.896 |
| RigVeda_Part_023_0031.wav,रथं युञ्जते मरुतः शुभे सुखं शूरो न मित्रावरुणा गविष्टिषु,6.558 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0104.wav,अवैतु पृश्नि शेवलं शुने जराय्वत्तवेऽव जरायु पद्यताम्,7.09 |
| Rig_veda_45_0447.wav,पिबापिबेदिन्द्र शूर सोमं मा रिषण्यो वसवान वसुः सन्,6.754 |
| Rigvedha_010_0230.wav,आ तिष्ठ रथं वृषणं वृषा ते सुतः सोमः परिषिक्ता मधूनि,6.624 |
| RigVeda_Part_023_0058.wav,मित्रस्य हि प्रतूर्वतः सुमतिरस्ति विधतः,4.654 |
| RigVeda_47_0320.wav,अनुल्बणं वयत जोगुवामपो मनुर्भव जनया दैव्यं जनम्,6.428 |
| Rigveda_34_0241.wav,यत्पर्वतेषु भेषजम्,3.037 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0307.wav,लोककृतः पथिकृतो यजामहे ये देवानां हुतभागा इह स्थ,6.194 |
| Rigveda_29_0052.wav,स न स्तुतो वीरवद्धातु गोमद्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः,6.414 |
| RigVeda_47_0192.wav,चित्रं वृषणं रयिं दाः,2.511 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0514.wav,यममृत्वा ते पराञ्चो व्यथन्तां प्र,3.509 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0243.wav,एतस्माद्वा ओदनात्त्रयस्त्रिंशतं लोकान् निरमिमीत प्रजापतिः,6.737 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0200.wav,हिरण्ययीभिरभ्रिभिर्गिरीनामुप सानुषु,4.481 |
| Rigvedha_012_0299.wav,मा वो रथो मध्यमवाळृते भून्मा युष्मावत्स्वापिषु श्रमिष्म,6.5150625 |
| Rig_veda_45_0032.wav,रास्वा च नः सुमहो हव्यदातिं त्रास्वोत,5.247 |
| RigVeda_Part_028_0184.wav,सुसंदृशा भानुना यो विभाति प्रति गावः समिधानं बुधन्त,6.428 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0458.wav,भिनद्मि मुष्कावपि यामि शेपः,3.498 |
| RigVeda_50_0372.wav,आ रोदसी हर्यमाणो महित्वा नव्यंनव्यं हर्यसि मन्म नु प्रियम्,7.106 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0198.wav,सर्वं संपश्यन्त्सुविदत्रो यजत्र इदं शृणोतु यदहं ब्रवीमि,6.552 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0200.wav,अजो ह्यग्नेरजनिष्ट शोकाद्विप्रो विप्रस्य सहसो विपश्चित्,7.562 |
| Rigvedha_008_0223.wav,अचेति दस्रा व्यु नाकमृण्वथो युञ्जते वां रथयुजो दिविष्टिष्वध्वस्मानो दिविष्टिषु,10.586 |
| RigVeda_Part_026_0141.wav,दश रथान्प्रष्टिमतः शतं गा अथर्वभ्यः,5.119 |
| RigVeda_Part_024_0319.wav,अग्निं देवासो अग्रियमिन्धते वृत्रहन्तमम्,5.488 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0521.wav,ऊर्ध्वा अस्य समिधो भवन्त्यूर्ध्वा शुक्रा शोचीष्यग्नेः,6.088 |
| Rigvedha_003_0226.wav,तरणिर्विश्वदर्शतो ज्योतिष्कृदसि सूर्य,4.686 |
| RigVeda_53_0054.wav,अस्मिन्स्वेतच्छकपूत एनो हिते मित्रे निगतान्हन्ति वीरान्,11.641 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0154.wav,तामस्मे रासतामिषम्,2.974 |
| Rigvedha_011_0301.wav,युक्तग्राव्णो योऽविता सुशिप्रः सुतसोमस्य स जनास इन्द्रः,6.62 |
| Rigveda_41_0022.wav,आत्सोम इन्द्रियो रसो वज्रः सहस्रसा भुवत्,5.187 |
| RigVeda_Part_022_0129.wav,प्रिय इन्द्राय वायवे,3.297 |
| RigVeda_49_0020.wav,वनस्पते रशनया नियूया देवानां पाथ उप वक्षि विद्वान्,7.163 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0233.wav,प्रजापतेर्वो धाम्नास्मै लोकाय सादये,5.252 |
| Atharvaveda_Part_014_0408.wav,अव दीक्षामसृक्षत स्वाहा,3.852 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0009.wav,तुभ्यं वातः पवतां मातरिश्वा तुभ्यं वर्षन्त्वमृतान्यापः सूर्यस्ते तन्वे शं तपाति त्वां मृत्युर्दयतां मा प्र मेष्ठाः,16.478 |
| RigVeda_44_0383.wav,पन्थामनु प्रविद्वान्पितृयाणं द्युमदग्ने समिधानो वि भाहि,6.943 |
| Atharvaveda_Part_020_10368.wav,घृतं न यो हरिभिश्चारु सेचत आ त्वा विशन्तु हरिवर्पसं गिरः,6.65 |
| RigVeda_Part_017_0023.wav,भुवस्तस्य स्वतवाँः पायुरग्ने विश्वस्मात्सीमघायत उरुष्य,7.377 |
| Rigveda_38_0322.wav,पुरस्तादेनं मे कृधि,3.102 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0145.wav,अनड्वान् दुहे सुकृतस्य लोक ऐनं प्याययति पवमानः पुरस्तात्,6.722 |
| RigVeda_Part_017_0290.wav,द्युमाँ अमित्रदम्भनः,3.619 |
| RigVeda_Part_017_0224.wav,ऋध्यामा त ओहैः,3.202 |
| Rigvedha_008_0271.wav,यदीमुप ह्वरते साधते मतिरृतस्य धेना अनयन्त सस्रुतः,7.364 |
| Rigveda_33_0324.wav,त्व्ये धने,1.521 |
| Rigveda_37_0270.wav,अस्तृणाद्बर्हणा विपोऽर्यो मानस्य स क्षयः,8.71 |
| Rigvedha_014_0317.wav,बृहस्पतिं मनुषो देवतातये विप्रं श्रोतारमतिथिं रघुष्यदम्,7.844 |
| RigVeda_Part_025_0248.wav,स्यूमगृभे दुधयेऽर्वते च क्रतुं वृञ्जन्त्यपि वृत्रहत्ये,6.528 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0297.wav,इदं जघन्यामासामा छिनद्मि स्तुकामिव,5.091 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0287.wav,यामाहुस्तारकैषा विकेशीति दुच्छुनां ग्राममवपद्यमानाम्,6.925 |
| Rigvedha_012_0248.wav,युष्माकं मित्रावरुणा प्रणीतौ परि श्वभ्रेव दुरितानि वृज्याम्,7.433 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0493.wav,तस्या रूपेणेमे वृक्षा हरिता हरितस्रजः,5.155 |
| Atharvaveda_Part_020_10277.wav,आ तू न इन्द्र मद्र्यग्घुवानः सोमपीतये,4.815 |
| Rigveda_31_0196.wav,क्षेमेण मित्रो वरुणं दुवस्यति मरुद्भिरुग्रः शुभमन्य ईयते,7.871 |
| Atharvaveda_Part_020_20351.wav,अभि हि सत्य सोमपा उभे बभूथ रोदसी,4.599 |
| RigVeda_48_0090.wav,स्वाध्योऽजनयन्ब्रह्म देवा वास्तोष्पतिं व्रतपां निरतक्षन्,8.124 |
| Rigvedha_006_0290.wav,व्यञ्जिभिर्दिव आतास्वद्यौदप कृष्णां निर्णिजं देव्यावः,9.035 |
| Rigvedha_013_0180.wav,वायो ये ते सहस्रिणो रथासस्तेभिरा गहि,5.1890625 |
| Rigvedha_012_0334.wav,उत स्य देवो भुवनस्य सक्षणिस्त्वष्टा ग्नाभिः सजोषा जूजुवद्रथम्,7.4220625 |
| Rigvedha_005_0336.wav,अप नः शोशुचदघम्,2.62 |
| Rigvedha_004_0007.wav,मंहिष्ठमच्छोक्तिभिर्मतीनां सुवृक्तिभिः सूरिं वावृधध्यै,6.984 |
| RigVeda_53_0196.wav,अथा हि वां दिवो नरा पुन स्तोमो न विशसे,5.972 |
| Atharvaveda_Part_020_10305.wav,जठरे वाजिनीवसो,2.761 |
| Atharvaveda_Part_014_0249.wav,अपां नपान् मधुमतीरपो दा याभिरिन्द्रो वावृधे वीर्यावान्,7.153 |
| Rigveda_41_0006.wav,सोमो याति विचर्षणिः,2.563 |
| Rigvedha_005_0065.wav,या वः शर्म शशमानाय सन्ति त्रिधातूनि दाशुषे यच्छताधि,6.923 |
| Rigvedha_004_0319.wav,इन्द्र नृम्णं हि ते शवो हनो वृत्रं जया अपोऽर्चन्ननु स्वराज्यम्,8.019 |
| Rigvedha_005_0352.wav,स नः पर्षदति दुर्गाणि विश्वा नावेव सिन्धुं दुरितात्यग्निः,6.792 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0152.wav,कृण्वेऽहमधरान् तथा अमूञ्छश्वतीभ्यः समाभ्यः,7.065 |
| Rigveda_41_0221.wav,पुनान इन्दवेषां पुरुहूत जनानाम्,5.215 |
| RigVeda_43_0112.wav,पुरुश्चन्द्रस्य रायः सुवीर्यस्य पतयः स्याम,5.027 |
| RigVeda_47_0183.wav,त्रं वृषणं रयिं दाः,2.645 |
| Atharvaveda_Part_020_20283.wav,उदिन् न्वस्य रिच्यतेऽंशो धनं न जिग्युसः,4.193 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0179.wav,इन्द्राय भागं परि त्वा नयाम्यस्मिन् यज्ञे यजमानाय सूरिम्,6.519 |
| RigVeda_44_0288.wav,इन्द्रमभि जायमानं समस्वरन्,3.891 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0268.wav,यदर्वाचीनं त्रैहायणादनृतं किं चोदिम,5.587 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0025.wav,ते त्वा रक्षन्तु ते त्वा गोपायन्तु तेभ्यो नमस्तेभ्यः स्वाहा,7.877 |
| Rig_veda_54_0300.wav,ज्योतिर्यच्छन्त्यजस्रम्,2.576 |
| RigVeda_48_0124.wav,अध त्वमिन्द्र विद्ध्यस्मान्महो राये नृपते वज्रबाहुः,7.292 |
| Atharvaveda_Part_015_0104.wav,प्रजापतेश्च वै स परमेष्ठिनश्च पितुश्च पितामहस्य च प्रियं धाम भवति य एवं वेद,8.445 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0766.wav,ते ते भिनद्मि शम्ययामुष्या अधि मुष्कयोः,4.663 |
| Atharvaveda_Part_020_10327.wav,इन्द्र धेनाभिरिह मादयस्व धीभिर्विश्वाभिः शच्या गृणानः,6.567 |
| Rig_veda_45_0193.wav,अङ्गिरसो नः,1.583 |
| Rigveda_31_0177.wav,उदुस्रियाः सृजते सूर्यः सचाँ उद्यन्नक्षत्रमर्चिवत्,6.317 |
| RigVeda_Part_027_0357.wav,दमेदमे सप्त रत्ना दधाना शं नो भूतं द्विपदे शं चतुष्पदे,8.108 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0373.wav,आभूत्या सहजा वज्र सायक सहो बिभर्षि सहभूत उत्तरम्,5.851 |
| Rigveda_31_0007.wav,अयं ह यद्वां देवया उ अद्रिरूर्ध्वो विवक्ति,7.543 |
| RigVeda_49_0088.wav,हव एषामसुरो नक्षत द्यां श्रवस्यता मनसा निंसत क्षाम्,7.08 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0395.wav,अवस्थस्य क्नदीवतः शाङ्कुरस्य नितोदिनः,4.785 |
| Atharvaveda_Part_020_40242.wav,अथो इयन्निति,2.086 |
| Atharvaveda_Part_020_30344.wav,समीचीनास ऋभवः समस्वरन्,2.918 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0305.wav,ब्रह्मचारी समिधा मेखलया श्रमेण लोकांस्तपसा पिपर्ति,6.088 |
| Rigvedha_009_0025.wav,नि यं दधुर्मनुष्यासु विक्षु स्वर्ण चित्रं वपुषे विभावम्,7.232 |
| RigVeda_51_0300.wav,पुनर्दाय ब्रह्मजायां कृत्वी देवैर्निकिल्बिषम्,6.277 |
| Rigvedha_006_0219.wav,याभी रेभं निवृतं सितमद्भ्य उद्वन्दनमैरयतं स्वर्दृशे,7.269 |
| Rigveda_38_0036.wav,पूर्वामनु प्रयतिं वृक्तबर्हिषो हित,3.996 |
| Rigvedha_013_0330.wav,केतुं यज्ञानां विदथस्य साधनं विप्रासो अग्निं महयन्त चित्तिभिः,7.4920625 |
| Rigvedha_013_0230.wav,उभे वाचौ वदति सामगा इव गायत्रं च त्रैष्टुभं चानु राजति,7.477 |
| Rigveda_37_0032.wav,यो नो दाता वसूनामिन्द्रं तं हूमहे वयम्,6.394 |
| Rigveda_38_0211.wav,मा नः समस्य दूढ्यः परिद्वेषसो अंहतिः,5.936 |
| Rigveda_33_0150.wav,यदिन्द्र मृळयासि नः,2.817 |
| Rigvedha_004_0351.wav,असि दभ्रस्य चिद्वृधो यजमानाय शिक्षसि सुन्वते भूरि ते वसु,7.071 |
| RigVeda_Part_025_0325.wav,येन वृद्धो न शवसा तुरो न स्वाभिरूतिभिः,4.967 |
| RigVeda_42_0173.wav,सेमे मही रोदसी यक्षदावृता समीचीने दाधार समिषः कविः,7.389 |
| Rigveda_38_0463.wav,प्र हि रिरिक्ष ओजसा दिवो अन्तेभ्यस्परि,5.497 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0191.wav,एमां परिस्रुतः कुम्भ आ दध्नः कलशैरगुः,4.679 |
| Rigvedha_012_0161.wav,बृहस्पते अप तं वर्तया पथः सुगं नो अस्यै देववीतये कृधि,6.7590625 |
| Rigveda_38_0125.wav,सोमस्य मित्रावरुणोदिता सूर आ ददे,5.043 |
| Rigveda_39_0008.wav,विश्वाभि भुवना भुवत्,2.953 |
| RigVeda_Part_025_0273.wav,एवा जज्ञानं सहसे असामि वावृधानं राधसे च श्रुताय,6.706 |
| Rigveda_35_0326.wav,आ नः सहस्रशो भरायुतानि शतानि च,5.023 |
| Rigveda_30_0190.wav,आ रोदसी विश्वपिशः पिशानाः समानमञ्ज्यञ्जते शुभे कम्,6.836 |
| Atharvaveda_Part_020_20100.wav,इत्था चन्द्रमसो गृहे,2.51 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0354.wav,आयुश्च तस्य भूतिं च देवा वृश्चन्ति हीडिताः,5.341 |
| RigVeda_48_0014.wav,यत्ते मरीचीः प्रवतो मनो जगाम दूरकम्,5.778 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0308.wav,अहं विवेच पृथिवीमुत द्यामहमृतूंरजनयं सप्त साकम्,5.264 |
| Atharvaveda_Part_020_40377.wav,स वृषा वृषभो भुवत्,2.602 |
| RigVeda_49_0081.wav,पृथिव्यामतिषितं यदूधः पयो गोष्वदधा ओषधीषु,5.804 |
| RigVeda_50_0099.wav,स एषां यज्ञो अभवत्तनूपास्तं द्यौर्वेद तं पृथिवी तमापः,7.688 |
| Rigvedha_006_0075.wav,मा नो अकृते पुरुहूत योनाविन्द्र क्षुध्यद्भ्यो वय आसुतिं दाः,6.928 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0210.wav,अमर्त्या मर्त्यामभि नः सचध्वमायुर्धत्त प्रतरं जीवसे नः,6.375 |
| Rigvedha_009_0261.wav,अजः पुरो नीयते नाभिरस्यानु पश्चात्कवयो यन्ति रेभाः,7.433 |
| Rigveda_33_0354.wav,स्य बोधतम्,1.567 |
| Rigvedha_004_0125.wav,दुरोकशोचिः क्रतुर्न नित्यो जायेव योनावरं विश्वस्मै,6.454 |
| Rig_veda_54_0199.wav,विशस्त्वा सर्वा वाञ्छन्तु मा त्वद्राष्ट्रमधि भ्रशत्,5.779 |
| RigVeda_Part_021_0017.wav,अग्ने शर्ध महते सौभगाय तव द्युम्नान्युत्तमानि सन्तु,6.809 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0263.wav,ब्रह्मज्येष्ठा सम्भृता विर्याणि ब्रह्माग्रे ज्येष्ठं दिवमा ततान भूतानां ब्रह्मा प्रथमोत जज्ञे तेनार्हति ब्रह्मणा स्पर्धितुं कः,16.086 |
| Rigveda_40_0108.wav,वर्धन्तो अस्य वीर्यम्,3.593 |
| RigVeda_Part_023_0226.wav,मघैर्मघोनि सुश्रियो दामन्वन्तः सुरातयः सुजाते अश्वसूनृते,7.949 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0438.wav,उक्षाणं पृश्निमपचन्त वीरास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्,7.063 |
| Rigvedha_002_0064.wav,वेद मासो धृतव्रतो द्वादश प्रजावतः,5.454 |
| RigVeda_47_0049.wav,कृतं तीर्थं सुप्रपाणं शुभस्पती स्थाणुं पथेष्ठामप दुर्मतिं हतम्,7.967 |
| RigVeda_50_0097.wav,तस्मिन्नग्नौ सूक्तवाकेन देवा हविर्विश्व आजुहवुस्तनूपाः,7.547 |
| Rigveda_30_0169.wav,आरे गोहा नृहा वधो वो अस्तु सुम्नेभिरस्मे वसवो नमध्वम्,6.875 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0280.wav,यासां राजा वरुणो याति मध्ये सत्यानृते अवपश्यन् जनानाम्,7.448 |
| RigVeda_Part_025_0104.wav,या त ऊतिरवमा या परमा या मध्यमेन्द्र शुष्मिन्नस्ति,6.433 |
| RigVeda_50_0157.wav,विद्याम वस्तोरवसा गृणन्तो विश्वामित्रा उत त इन्द्र नूनम्,6.47 |
| RigVeda_47_0037.wav,युवं ह कृशं युवमश्विना शयुं युवं विधन्तं विधवामुरुष्यथः,6.497 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0148.wav,यथा वातो वनस्पतीन् वृक्षान् भनक्त्योजसा,5.201 |
| Rigveda_35_0297.wav,एवेद्धूर्वृष्ण उत्तरा,3.824 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0058.wav,उद्यंस्त्वं देव सूर्य सपत्नान् अव मे जहि,4.342 |
| Rigvedha_007_0303.wav,यस्त्वायन्तं वसुना प्रातरित्वो मुक्षीजयेव पदिमुत्सिनाति,6.784 |
| Rigvedha_002_0115.wav,मीढ्वाँ अस्माकं बभूयात्,4.817 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0141.wav,उत्तिष्ठ प्रेहि प्र द्रवौकः कृणुष्व सलिले सधस्थे,5.006 |
| Rigvedha_007_0088.wav,आथर्वणायाश्विना दधीचेऽश्व्यं शिरः प्रत्यैरयतम्,6.181 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0222.wav,यद्यद्कृष्णः शकुन एह गत्वा त्सरन् विषक्तं बिल आससाद यद्वा दास्यार्द्रहस्ता समङ्क्त उलूखलं मुसलं शुम्भतापः अयं ग्रावा पृथुबुध्नो वयोधाः पूतः पवित्रैरप हन्तु रक्षः आ रोह चर्म महि शर्म यच्छ मा दंपती पौत्रमघं नि गाताम्,27.408 |
| Rigvedha_008_0349.wav,धनोरधि प्रवत आ स ऋण्वत्यभिव्रजद्भिर्वयुना नवाधित,6.629 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0085.wav,सहस्राक्षमतिपश्यं पुरस्ताद्रुद्रमस्यन्तं बहुधा विपश्चितम्,6.87 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0258.wav,पदा प्र विध्य पार्ष्ण्या स्थालीं गौरिव स्पन्दना,6.352 |
| Atharvaveda_Part_020_30106.wav,मा चिदन्यद्वि शंसत सखायो मा रिषण्यत,5.037 |
| Rigvedha_014_0019.wav,उदु ष्टुतः समिधा यह्वो अद्यौद्वर्ष्मन्दिवो अधि नाभा पृथिव्याः,7.4650625 |
| Atharvaveda_Part_014_0295.wav,भगस्ततक्ष चतुरः पादान् भगस्ततक्ष चत्वार्युष्पलानि,5.499 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0052.wav,आ प्र द्रव परमस्याः परावतः शिवे ते द्यावापृथिवी उभे स्ताम्,7.745 |
| Rigvedha_007_0318.wav,शतं कक्षीवाँ असुरस्य गोनां दिवि श्रवोऽजरमा ततान,6.465 |
| RigVeda_Part_024_0056.wav,हुवे वः सूनुं सहसो युवानमद्रोघवाचं मतिभिर्यविष्ठम्,6.743 |
| RigVeda_Part_027_0111.wav,युवं राधोभिरकवेभिरिन्द्राग्ने अस्मे भवतमुत्तमेभिः,7.439 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0504.wav,चर्कृत्य ईड्यो वन्द्यश्चोपसद्यो नमस्य्श्भवेह,5.343 |
| RigVeda_Part_022_0181.wav,तमृषे मारुतं गणं नमस्या रमया गिरा,5.448 |
| Rigvedha_002_0090.wav,उदुत्तमं मुमुग्धि नो वि पाशं मध्यमं चृत,5.14 |
| RigVeda_Part_026_0155.wav,समश्वपर्णाश्चरन्ति नो नरोऽस्माकमिन्द्र रथिनो जयन्तु,8.458 |
| RigVeda_Part_020_0103.wav,नि होतारं विश्वविदं दधिध्वे स देवेषु वनते वार्याणि,7.469 |
| Rigvedha_012_0266.wav,उर्वश्यामभयं ज्योतिरिन्द्र मा नो दीर्घा अभि नशन्तमिस्राः,7.4080625 |
| Rigveda_36_0070.wav,उक्षान्नाय वशान्नाय सोमपृष्ठाय वेधसे,7.064 |
| Rigvedha_013_0298.wav,स रोचयज्जनुषा रोदसी उभे स मात्रोरभवत्पुत्र ईड्यः,6.803 |
| Rigvedha_011_0119.wav,सर्वासामग्रभं नामारे अस्य योजनं हरिष्ठा मधु त्वा मधुला चकार,7.5430625 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0078.wav,रुद्रस्येषुश्चरति देवहेतिस्तस्यै नमो यतमस्यां दिशीतः योऽभियातो निलयते त्वां रुद्र निचिकीर्षति,13.409 |
| RigVeda_Part_018_0228.wav,यदहा नक्तमातिरः,2.806 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0524.wav,यथाङ्गं वर्धतां शेपस्तेन योषितमिज्जहि,4.721 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0043.wav,तेनाहं शश्वतो जनामसनं सनवानि च,4.549 |
| Rigvedha_007_0035.wav,अवस्यते स्तुवते कृष्णियाय ऋजूयते नासत्या शचीभिः,6.632 |
| Rigvedha_001_0487.wav,आ पूषञ्चित्रबर्हिषमाघृणे धरुणं दिवः,5.93 |
| Atharvaveda_Part_020_20298.wav,इन्द्राय सोमपीतये,3.226 |
| RigVeda_43_0229.wav,साम कृण्वन्सामन्यो विपश्चित्क्रन्द,4.035 |
| RigVeda_Part_015_0106.wav,अद्रोघ सत्यं तव तन्महित्वं सद्यो यज्जातो अपिबो ह सोमम्,7.349 |
| RigVeda_49_0218.wav,कं स्विद्गर्भं प्रथमं दध्र आपो यत्र देवाः समपश्यन्त विश्वे,7.689 |
| RigVeda_Part_018_0393.wav,ते अग्रेपा ऋभवो मन्दसाना अस्मे धत्त ये च रातिं गृणन्ति,7.147 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0583.wav,वशेदं सर्वमभवद्देवा मनुष्या असुराः पितर ऋषयः,7.688 |
| Rigvedha_007_0070.wav,युवं तुग्राय पूर्व्येभिरेवैः पुनर्मन्यावभवतं युवाना,6.565 |
| RigVeda_Part_023_0010.wav,अनु श्रुताममतिं वर्धदुर्वीं बर्हिरिव यजुषा रक्षमाणा,6.722 |
| Rigvedha_007_0103.wav,किमङ्ग वां प्रत्यवर्तिं गमि,2.791 |
| Rigveda_41_0096.wav,ये ते पवित्रमूर्मयोऽभिक्षरन्ति धारया,6.675 |
| RigVeda_Part_017_0230.wav,प्र ते दिवो न स्तनयन्ति शुष्माः,4.281 |
| Rigvedha_005_0054.wav,सीदता बर्हिरुरु वः सदस्कृतं मादयध्वं मरुतो मध्वो अन्धसः,6.729 |
| Atharvaveda_Part_020_30360.wav,ईलेन्यो नमस्यस्तिरस्तमांसि दर्शतः,4.674 |
| Rigveda_40_0620.wav,जरितुर्वर्धया गिरः,2.373 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0083.wav,योगं प्र पद्ये क्षेमं च क्षेमं प्र पद्ये योगं च नमोऽहोरात्राभ्यामस्तु,8.951 |
| RigVeda_49_0221.wav,न तं विदाथ य इमा जजानान्यद्युष्माकमन्तरं बभूव,5.929 |
| Rigvedha_006_0088.wav,अमी ये देवा स्थन त्रिष्वा रोचने दिवः,5.183 |
| Rigveda_29_0059.wav,आ नो दिव आ पृथिव्या ऋजीषिन्निदं बर्हिः सोमपेयाय याहि,7.729 |
| Rig_veda_54_0114.wav,यदाशसा निःशसाभिशसोपारिम जाग्रतो यत्स्वपन्तः,7.35 |
| RigVeda_49_0059.wav,अत्रा वो नृत्यतामिव तीव्रो रेणुरपायत,5.39 |
| Rigveda_37_0336.wav,यः शक्रो मृक्षो अश्व्यो यो वा कीजो हिरण्ययः,5.498 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0075.wav,अलसालासि पूर्व सिलाञ्जालास्युत्तरा नीलागलसाल,9.958 |
| Rigvedha_004_0270.wav,कथा दाशेमाग्नये कास्मै देवजुष्टोच्यते भामिने गीः,7.672 |
| RigVeda_Part_027_0058.wav,उतादः परुषे गवि सूरश्चक्रं हिरण्ययम्,5.401 |
| Rigveda_40_0115.wav,अनु विप्रा अमादिषुः,2.698 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0778.wav,तौ दन्तं ब्रह्मणस्पते शिवौ कृणु जातवेदः,4.334 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0414.wav,एकं तदङ्गं स्कम्भस्य पुराणमनुसंविदुः,4.547 |
| Rigvedha_005_0271.wav,अथा यज्ञाय गृणते सुगं कृध्यग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव,7.684 |
| Rigveda_33_0051.wav,त्वश्विना,1.253 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0282.wav,श्रियं वा एष संविदं च गृहाणामश्नाति यः पूर्वोऽतिथेरश्नाति,7.542 |
| RigVeda_Part_023_0101.wav,या धर्तारा रजसो रोचनस्योतादित्या दिव्या पार्थिवस्य,6.776 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0373.wav,अनाधृष्यो जातवेदा अमर्त्यो विराडग्ने क्षत्रभृद्दीदिहीह,6.792 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0177.wav,जरा त्वा भद्रा नेष्ट व्यन्ये यन्तु मृत्यवो यान् आहुरितरान् छतम्,9.162 |
| RigVeda_Part_026_0329.wav,इळामन्यो जनयद्गर्भमन्यः प्रजावतीरिष आ धत्तमस्मे,7.856 |
| Atharvaveda_Part_020_20053.wav,दासं यच्शुष्णं कुयवं न्यस्मा अरन्धय आर्जुनेयाय शिक्षन्,6.803 |
| RigVeda_53_0131.wav,दृळ्हानि पिप्रोरसुरस्य मायिन इन्द्रो व्यास्यच्चकृवाँ ऋजिश्वना,9.269 |
| RigVeda_Part_022_0332.wav,ते अज्येष्ठा अकनिष्ठास उद्भिदोऽमध्यमासो महसा वि वावृधुः,7.028 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0426.wav,सर्वं तदस्तु मे शिवं नहि तद् दृश्यते दिवा नमस्कृत्य द्यावापृथिवीभ्यामन्तरिक्षाय मृत्यवे मेक्षाम्यूर्ध्वस्तिष्ठन् मा मा हिंसिषुरीश्वराः,16.482 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0262.wav,स्त्रीभागान् पिङ्गो गन्धर्वान् वातो अभ्रमिवाजतु,6.195 |
| RigVeda_49_0285.wav,विश्वान्यन्यो भुवनाभिचष्ट ऋतूँरन्यो विदधज्जायते पुनः,6.689 |
| Atharvaveda_Part_020_30153.wav,आराच्छत्रुमप बाधस्व दूरमुग्रो यः शम्बः पुरुहूत तेन,6.237 |
| RigVeda_50_0036.wav,यज्ञैरिषूः संनममानो अग्ने वाचा शल्याँ अशनिभिर्दिहानः,7.125 |
| Rigveda_41_0190.wav,इन्द्राय मधुमत्तमम् कविं मृजन्ति मर्ज्यं धीभिर्विप्रा अवस्यवः वृषा कनिक्रदर्षति वृषणं धीभिरप्तुरं सोममृतस्य धारया मती विप्राः समस्वरन् पवस्व देवायुषगिन्द्रं गच्छतु ते मदः,25.866 |
| RigVeda_Part_026_0280.wav,विश्वस्य हि क्षयथ विश्वदेवाः स्वयं रिपुस्तन्वं रीरिषीष्ट,7.533 |
| RigVeda_Part_027_0005.wav,वामं गृहपतिं नय,2.929 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0267.wav,दिवमन्तरिक्षमाद्भूमिं सर्वं तद्देवि पश्यति,5.001 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0255.wav,पुनः कृत्यां कृत्याकृते प्रतिहरणेन हरामसि,4.789 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0330.wav,यथा हनाम सेना अमित्राणां सहस्रशः,5.148 |
| RigVeda_Part_016_0241.wav,रास्व रत्नानि दाशुषे शुचिमर्कैर्बृहस्पतिमध्वरेषु नमस्यत,8.298 |
| Atharvaveda_Part_020_40308.wav,तां ह जरितर्नः प्रत्यगृभ्णंस्तामु ह जरितर्नः प्रत्यगृभ्णः,6.381 |
| Rigveda_29_0102.wav,गोमदश्वावद्रथवद्व्यन्तो यूयं पात स्व,5.434 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0101.wav,तस्माद्ध जज्ञ इदं सर्वं यत्किं चेदं विरोचते रोहितेन ऋषिणाभृतम्,7.206 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0333.wav,धाना धेनुरभवद्वत्सो अस्यास्तिलोऽभवत्,4.494 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0001.wav,अन्तकाय मृत्यवे नमः प्राणा अपाना इह ते रमन्ताम्,7.095 |
| Atharvaveda_Part_020_20419.wav,त्वं सुतस्य पीतये सद्यो वृद्धो अजायथाः इन्द्र ज्यैष्ठ्याय सुक्रतो,8.65 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0174.wav,इन्द्रस्य प्रथमो रथो देवानामपरो रथो वरुणस्य तृतीय इत्,6.268 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0348.wav,परःसहस्रा हन्यन्तां तृणेढ्वेनान् मत्यं भवस्य,6.222 |
| RigVeda_Part_027_0060.wav,यदद्य त्वा पुरुष्टुत ब्रवाम दस्र मन्तुमः,5.225 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0081.wav,यन् न इन्द्रो अखनद्यदग्निर्विश्वे देवा मरुतो यत्स्वर्काः तदस्मभ्यं सविता सत्यधर्मा प्रजापतिरनुमतिर्नि यच्छात्,12.008 |
| Atharvaveda_Part_020_10402.wav,यो अन्तरिक्षं विममे वरीयो यो द्यामस्तभ्नात्स जनास इन्द्रः,7.008 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0214.wav,य उभाभ्यां प्रहरसि पुच्छेन चास्येन च,5.048 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0204.wav,आपो भद्रा घृतमिदाप आसन्न् अग्नीषोमौ बिभ्रत्याप इत्ताः,6.673 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0259.wav,यो व आपोऽपां हिरण्यगर्भोऽप्स्वन्तर्यजुष्यो देवयजनः,8.856 |
| RigVeda_Part_019_0071.wav,उतैनमाहुः समिथे वियन्तः परा दधिक्रा असरत्सहस्रैः,7.033 |
| Rigveda_32_0004.wav,रायश्चेतन्ती भुवनस्य भूरेर्घृतं पयो दुदुहे नाहुषाय,7.583 |
| RigVeda_Part_023_0169.wav,सुष्टुभो वां वृषण्वसू रथे वाणीच्याहिता,5.805 |
| Rigvedha_002_0021.wav,को नो मह्या अदितये पुनर्दात्पितरं च दृशेयं मातरं च,8.129 |
| Rigveda_32_0069.wav,स्य वित्से,1.608 |
| Rigvedha_003_0181.wav,उक्थेभिरर्वागवसे पुरूवसू अर्कैश्च नि ह्वयामहे,5.783 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0136.wav,ठो अजायत,1.795 |
| RigVeda_Part_028_0012.wav,उप यमेति युवतिः सुदक्षं दोषा वस्तोर्हविष्मती घृताची,7.389 |
| Rigveda_30_0117.wav,प्र पूर्वजे पितरा नव्यसीभिर्गीर्भिः कृणुध्वं सदने ऋतस्य,7.036 |
| RigVeda_Part_027_0389.wav,अश्वाजनि प्रचेतसोऽश्वान्समत्सु चोदय,5.828 |
| RigVeda_Part_017_0156.wav,द्रवन्त्यस्य वाजिनो न शोका भयन्ते विश्वा भुवना यदभ्राट्,7.331 |
| Rigvedha_014_0284.wav,निर्मथितः सुधित आ सधस्थे युवा कविरध्वरस्य प्रणेता,6.442 |
| RigVeda_Part_022_0226.wav,विद्युन्महसो नरो अश्मदिद्यवो वातत्विषो मरुतः पर्वतच्युतः,7.009 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0187.wav,तिरश्चीन् अघ्न्या रक्षतु जातवेदा भूतकृतो मे सर्वतः सन्तु वर्म,7.093 |
| Atharvaveda_Part_020_40119.wav,भसन् मे अम्ब सक्थि मे शिरो मे वीव हृष्यति विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः,6.98 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0310.wav,अहं जजान पृथिवीमुत द्यामहमृतूंरजनयं सप्त सिन्धून्,5.679 |
| Rigveda_38_0454.wav,तं वो दस्ममृतीषहं वसोर्मन्दानमन्धसः,6.539 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0529.wav,ईशां वो मरुतो देव आदित्यो ब्रह्मणस्पतिः,5.831 |
| Rigveda_40_0434.wav,विप्रासो अण्व्या धिया,3.769 |
| Rigvedha_002_0042.wav,तदिन्नक्तं तद्दिवा मह्यमाहुस्तदयं केतो हृद आ वि चष्टे,6.729 |
| Rigvedha_001_0126.wav,इन्द्रो दीर्घाय चक्षस आ सूर्यं रोहयद्दिवि,7.214 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0217.wav,उत्तरं राष्ट्रं प्रजयोत्तरावद्दिशामुदीची कृणवन् नो अग्रम्,6.509 |
| Atharvaveda_Part_020_40258.wav,अरदुपरम शयो हत इव व्याप पूरुषः,6.377 |
| RigVeda_Part_024_0260.wav,अथा दुवो वनवसे,2.74 |
| Atharvaveda_Part_020_10128.wav,आ वो वहन्तु सप्तयो रघुष्यदो रघुपत्वानः प्र जिगात बाहुभिः,7.089 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0258.wav,रात्रि मातरुषसे नः परि देहि,3.948 |
| Rigvedha_014_0254.wav,अग्निमुषसमश्विना दधिक्रां व्युष्टिषु हवते वह्निरुक्थैः,6.412 |
| Rigvedha_008_0278.wav,आदिन्मातॄराविशद्यास्वा शुचिरहिंस्यमान उर्विया वि वावृधे,8.327 |
| Rigvedha_004_0078.wav,यया शूर प्रत्यस्मभ्यं यंसि त्मनमूर्जं न विश्वध क्षरध्यै,6.964 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0250.wav,प्रतीचीनफलो हि त्वमपामार्ग रुरोहिथ,4.508 |
| RigVeda_49_0235.wav,मन्यो वज्रिन्नभि मामा ववृत्स्व हनाव दस्यूँरुत बोध्यापेः,7.503 |
| Rigvedha_005_0311.wav,स प्रत्नथा सहसा जायमानः सद्यः काव्यानि बळधत्त विश्वा,7.898 |
| RigVeda_Part_015_0154.wav,इन्द्रो वृत्रमवृणोच्छर्धनीतिः प्र मायिनाममिनाद्वर्पणीतिः,7.762 |
| RigVeda_46_0045.wav,मंसीमहि त्वा वयमस्माकं देव पूषन्,3.657 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0169.wav,यो नः स्वो यो अरणः सजात उत निष्ट्यो यो अस्मामभिदासति,6.747 |
| Atharvaveda_Part_017_0122.wav,त्वमिमा विश्वा भुवनानु तिष्ठस ऋतस्य पन्थामन्वेषि विद्वांस्तवेद्विष्णो बहुधा वीर्याणि,9.387 |
| Atharvaveda_Part_020_20037.wav,तं पृच्छन्ती वज्रहस्तं रथेष्ठामिन्द्रं वेपी वक्वरी यस्य नू गीः,7.325 |
| Rigveda_38_0025.wav,यो व्यतीँरफाणयत्सुयुक्ताँ उप दाशुषे,6.266 |
| Atharvaveda_Part_020_30169.wav,तुरीयं स्विज्जनयद्विश्वजन्योऽयास्य उक्थमिन्द्राय शंसन्,6.979 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0329.wav,इन्द्रो मन्थतु मन्थिता शक्रः शूरः पुरंदरः,5.057 |
| RigVeda_52_0290.wav,ओर्वप्रा अमर्त्या निवतो देव्युद्वतः,6.399 |
| RigVeda_Part_022_0142.wav,स्वस्ति नो मिमीतामश्विना भगः स्वस्ति देव्यदितिरनर्वणः,6.571 |
| Atharvaveda_Part_020_20348.wav,पन्थामृतस्य यातवे तमीमहे,4.359 |
| RigVeda_46_0070.wav,अभूर्वौक्षीर्व्यु आयुरानड्दर्षन्नु पूर्वो अपरो नु दर्षत्,7.925 |
| Rigveda_32_0188.wav,विद्वेषणं संवननोभयंकरं मंहिष्ठमुभयाविनम्,6.141 |
| Rigveda_40_0210.wav,सुष्वाणं देववीतये,3.392 |
| Rigvedha_014_0081.wav,युवा सुवासाः परिवीत आगात्स उ श्रेयान्भवति जायमानः,6.9760625 |
| Rigveda_41_0161.wav,उत नो गोमतीरिषो विश्वा अर्ष परिष्टुभः,5.703 |
| Rigveda_40_0611.wav,पुनानो अक्रमीदभि विश्वा मृधो विचर्षणिः,3.359 |
| RigVeda_43_0337.wav,त्यशुष्मः कामो न यो देवयतामसर्जि,4.24 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0549.wav,क्रोडौ ते स्तां पुरोडाशावाज्येनाभिघारितौ,5.822 |
| Rigvedha_004_0344.wav,यामथर्वा मनुष्पिता दध्यङ्धियमत्नत,4.723 |
| Rigveda_41_0034.wav,अयक्ष्मा बृहतीरिषः तया पवस्व धारया यया गाव इहागमन्,8.315 |
| RigVeda_Part_015_0163.wav,विवस्वतः सदने अस्य तानि विप्रा उक्थेभिः कवयो गृणन्ति,6.798 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0350.wav,योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तस्य त्वं प्राणेना प्यायस्व,7.75 |
| Rigveda_32_0185.wav,मा चिदन्यद्वि शंसत सखायो मा रिषण्यत,5.888 |
| Rigveda_35_0316.wav,आ याह्यर्य आ परि स्वाहा सोमस्य पीतये,5.653 |
| Rigvedha_007_0043.wav,बर्हिष्मती रातिर्विश्रिता गीरिषा यातं ना,5.317 |
| Rigveda_37_0353.wav,तिरश्चिदर्यः सवना वसो गहि शविष्ठ श्रुधि मे हवम्,6.243 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0249.wav,सहस्रधामन् विशिखान् विग्रीवां छायया त्वम्,5.064 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0084.wav,अमम्रिर्भवामृतोऽतिजीवो मा ते हासिषुरसवः शरीरम्,6.199 |
| RigVeda_53_0175.wav,भद्रं हि शर्म त्रिवरूथमस्ति त आरे हिंसानामप दिद्युमा कृधि,8.203 |
| Rigveda_38_0027.wav,अतीदु शक्र ओहत इन्द्रो विश्वा अति द्विषः,5.028 |
| Rigvedha_008_0116.wav,सर्वं रक्षो नि बर्हय,2.507 |
| RigVeda_51_0047.wav,आर्ष्टिषेणो होत्रमृषिर्निषीदन्देवापिर्देवसुमतिं चिकित्वान्,6.914 |
| RigVeda_Part_016_0275.wav,अव यक्ष्व नो वरुणं रराणो वीहि मृळीकं सुहवो न एधि अस्य श्रेष्ठा सुभगस्य संदृग्देवस्य चित्रतमा मर्त्येषु,14.344 |
| RigVeda_52_0037.wav,तिस्रो देष्ट्राय निरृतीरुपासते दीर्घश्रुतो वि हि जानन्ति वह्नयः,7.92 |
| Rigveda_29_0461.wav,विदे हि रुद्रो रुद्रियं महित्वं या,3.994 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0437.wav,स्कम्भेनेमे विष्टभिते द्यौश्च भूमिश्च तिष्ठतः,5.172 |
| RigVeda_49_0039.wav,इमे ये नार्वाङ्न परश्चरन्ति न ब्राह्मणासो न सुतेकरासः,7.265 |
| Atharvaveda_Part_016_0197.wav,इदं तमति सृजामि तं माभ्यवनिक्षि,3.875 |
| Rigvedha_005_0388.wav,सनत्क्षेत्रं सखिभिः श्वित्न्येभिः सनत्सूर्यं सनदपः सुवज्रः,7.391 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0175.wav,चन्द्रो मा तत्र नयतु मनश्चन्द्रो दधातु मे,4.437 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0409.wav,आण्डीकं कुमुदं सं तनोति बिसं शालूकं शफको मुलाली,6.434 |
| Atharvaveda_Part_020_10007.wav,उक्षान्नाय वशान्नाय सोमपृष्ठाय वेधसे,6.117 |
| Rigvedha_003_0239.wav,देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम्,5.39 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0323.wav,अग्नौ सूर्ये चन्द्रमसि मातरिश्वन् ब्रह्मचार्यप्सु समिधमा दधाति,8.007 |
| RigVeda_Part_017_0259.wav,महश्चिदग्न एनसो अभीक ऊर्वाद्देवानामुत मर्त्यानाम्,8.27 |
| RigVeda_Part_020_0066.wav,वि ज्योतिषा बृहता भात्यग्निराविर्विश्वानि कृणुते महित्वा,7.339 |
| RigVeda_51_0027.wav,मुञ्चन्तु मा शपथ्यादथो वरुण्यादुत अथो यमस्य पड्बीशात्सर्वस्माद्देवकिल्बिषात्,14.069 |
| Rigvedha_009_0336.wav,स सध्रीचीः स विषूचीर्वसान आ वरीवर्ति भुवनेष्वन्तः,7.565 |
| RigVeda_47_0204.wav,मां हवन्ते पितरं न जन्तवोऽहं दाशुषे वि भजामि भोजनम्,6.62 |
| RigVeda_Part_020_0388.wav,देवैरा सत्सि बर्हिषि,2.942 |
| RigVeda_Part_028_0216.wav,भरे हविर्न बर्हिषि प्रीणानो वैश्वानराय यतये मतीनाम्,7.413 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0217.wav,मध्ये ह्रदस्य प्लवस्व विगृह्य चतुरः पदः खण्वखा खैमखा मध्ये तदुरि,11.405 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0103.wav,ब्रह्मेममग्निं पूरुषो ब्रह्म संवत्सरं ममे,5.305 |
| Rigveda_41_0113.wav,ज्योतिर्विश्वं स्वर्दृशे,3.239 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0111.wav,ऊर्जं च तत्र सुमतिं च पिन्वत यत्रा नरो मरुतः सिञ्चथा मधु,6.759 |
| RigVeda_42_0222.wav,इन्द्राय सोम परि षिच्यसे नृभिर्नृचक्षा ऊर्मिः कविरज्यसे वने,8.044 |
| RigVeda_Part_020_0016.wav,अभि प्रवन्त समनेव योषाः कल्याण्यः स्मयमानासो अग्निम्,8.644 |
| Atharvaveda_Part_020_30314.wav,प्रजां यस्ते जिघांसति तमितो नाशयामसि,4.783 |
| Rigvedha_006_0242.wav,याभिः शारीराजतं स्यूमरश्मये ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्,7.533 |
| Rigveda_35_0230.wav,नकिर्वक्ता न दादिति,2.601 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0470.wav,यो वै ते विद्यादरणी याभ्यां निर्मथ्यते वसु,5.23 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0139.wav,शिवास्त एका अशिवास्त एकाः सर्वा बिभर्षि सुमनस्यमानः,6.546 |
| Atharvaveda_Part_020_10316.wav,आपो न देवीरुप यन्ति होत्रियमवः पश्यन्ति विततं यथा रजः,6.477 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0147.wav,ये ग्राम्याः पशवो विश्वरूपास्तेषां सप्तानां मयि रन्तिरस्तु,8.11 |
| RigVeda_Part_028_0299.wav,श्रुष्टिं चक्रुर्भृगवो द्रुह्यवश्च सखा सखायमतरद्विषूचोः,7.594 |
| RigVeda_50_0002.wav,इन्द्राणीमासु नारिषु सुभगामहमश्रवम्,4.72 |
| Rigvedha_008_0238.wav,तेषां देवेष्वायतिरस्माकं तेषु नाभयः,5.424 |
| Rigveda_38_0246.wav,सोममिन्द्र चमू सुतम्,2.662 |
| Rigveda_40_0384.wav,त्वं सोम पणिभ्य आ वसु गव्यानि धारयः,4.921 |
| RigVeda_42_0236.wav,दिवि ते नाभा परमो य आददे पृथिव्यास्ते रुरुहुः सानवि क्षिपः,8.126 |
| RigVeda_Part_015_0347.wav,यस्य मदे च्यावयसि प्र कृष्टीर्यस्य मदे अप गोत्रा ववर्थ,7.09 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0581.wav,सनादग्ने मृणसि यातुधानान् न त्वा रक्षांसि पृतनासु जिग्युः,5.826 |
| RigVeda_42_0079.wav,तन्तुं ततं परि सर्गास आशवो नेन्द्रादृते पवते धाम किं चन,8.0 |
| RigVeda_Part_022_0231.wav,एता न यामे अगृभीतशोचिषोऽनश्वदां यन्न्ययातना गिरिम्,6.888 |
| RigVeda_53_0277.wav,अग्निं महो धनसातावहं हुवे मृळीकं धनसातये,6.636 |
| RigVeda_49_0265.wav,स्तोमा आसन्प्रतिधयः कुरीरं छन्द ओपशः,4.746 |
| Rig_veda_45_0087.wav,नि ते मनो मनसि धाय्यस्मे जन्युः पतिस्तन्वमा विविश्याः,7.163 |
| Rigveda_32_0299.wav,ये अस्मिन्काममश्रियन्,3.471 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0109.wav,तस्यौदनस्य बृहस्पतिः शिरो ब्रह्म मुखम्,4.575 |
| Rigvedha_008_0101.wav,सं यज्जनान्क्रतुभिः शूर ईक्षयद्धने हिते तरुषन्त श्रवस्यवः प्र यक्षन्त श्रवस्यवः,9.784 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0329.wav,आचार्यो ब्रह्मचारी ब्रह्मचारी प्रजापतिः,5.176 |
| Rigveda_37_0370.wav,तेना नो अधि वोचत,2.864 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0553.wav,बृहस्पतिराङ्गिरस ऋषयो ब्रह्मसंशिताः,4.903 |
| Atharvaveda_Part_018_1_0208.wav,मित्रो नो अत्रादितिरनागान्त्सविता देवो वरुणाय वोचत्सखाय आ शिषामहे ब्रह्मेन्द्राय वज्रिणे स्तुष ऊ षु नृतमाय धृष्णवे शवसा ह्यसि श्रुतो वृत्रहत्येन वृत्रहा,20.451 |
| Rigvedha_003_0223.wav,अप त्ये तायवो यथा नक्षत्रा यन्त्यक्तुभिः,4.883 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0261.wav,नमस्ते प्राण प्राणते नमो अस्त्वपानते,4.783 |
| RigVeda_Part_028_0258.wav,प्रियं चेतिष्ठमरतिं स्वध्वरं विश्वस्य दूतममृतम्,5.868 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0300.wav,यदद्य रात्रि सुभगे विभजन्त्ययो वसु,4.147 |
| Rigvedha_005_0075.wav,अस्य श्रोषन्त्वा भुवो विश्वा यश्चर्षणीरभि,5.321 |
| Rigveda_33_0091.wav,ता मे अश्विना सनीनां विद्यातं नवानाम्,5.942 |
| RigVeda_Part_020_0374.wav,महिषीव त्वद्रयिस्त्वद्वाजा उदीरते,5.108 |
| Rigvedha_004_0009.wav,गिरश्च गिर्वाहसे सुवृक्तीन्द्राय विश्वमिन्वं मेधिराय,6.458 |
| Rigvedha_001_0206.wav,इन्द्रं विश्वा अवीवृधन्समुद्रव्यचसं गिरः,6.552 |
| Atharvaveda_Part_020_40212.wav,परि त्रयः,1.368 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0208.wav,मणिं सहस्रवीर्यं वर्म देवा अकृण्वत,4.56 |
| Rigveda_36_0064.wav,पुनर्यन्तरुणीरपि,2.743 |
| RigVeda_46_0013.wav,ता नो देवा देवतया युवं मधुमतस्कृतम्,5.058 |
| RigVeda_44_0360.wav,आसा यदस्य पयो अक्रत स्वं सचेतसो अभ्यर्चन्त्यत्र,6.393 |
| Atharvaveda_Part_014_0351.wav,आ रोह चर्मोप सीदाग्निमेष देवो हन्ति रक्षांसि सर्वा,6.331 |
| RigVeda_48_0178.wav,सम्राजो ये सुवृधो यज्ञमाययुरपरिह्वृता दधिरे दिवि क्षयम्,7.618 |
| Rigveda_30_0300.wav,ययोरसुर्यमक्षितं ज्येष्ठं विश्वस्य यामन्नाचिता जिगत्नु,8.519 |
| RigVeda_Part_024_0209.wav,त्वमग्ने वनुष्यतो नि पाहि त्वमु नः सहसावन्नवद्यात्,6.291 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0124.wav,सिन्धुपत्नीः सिन्धुराज्ञीः सर्वा या नद्य स्थन,7.367 |
| RigVeda_50_0347.wav,यद्विरूपाचरं मर्त्येष्ववसं रात्रीः शरदश्चतस्रः,6.211 |
| Rigveda_32_0225.wav,शितिपृष्ठा वहतां मध्वो अन्धसो विवक्षणस्य पीतये,6.996 |
| RigVeda_Part_023_0139.wav,सत्यमिद्वा उ अश्विना युवामाहुर्मयोभुवा,5.395 |
| RigVeda_48_0048.wav,पृथिवि क्षमा रपो मो षु ते किं चनाममत्,4.371 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0037.wav,तेना नोऽवसा गहि,2.344 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0125.wav,सप्त सूर्यो हरितो यातवे रथे हिरण्यत्वचसो बृहतीरयुक्त,6.787 |
| Rigveda_41_0003.wav,मती जुष्टो धिया हितः सोमो हिन्वे परावति,4.858 |
| RigVeda_Part_027_0299.wav,इदं वामन्धः परिषिक्तमस्मे आसद्यास्मिन्बर्हिषि मादयेथाम्,7.765 |
| Rigvedha_005_0386.wav,ऋज्राश्वः प्रष्टिभिरम्बरीषः सहदेवो भयमानः सुराधाः,7.409 |
| Rigveda_37_0233.wav,उक्थैरिन्द्रस्य माहिनं वयो वर्धन्ति सोमिनो भद्रा इन्द्रस्य रातयः,8.106 |
| RigVeda_51_0191.wav,क्ता याभिः सिन्धुमतर इन्द्र पूर्भित्,3.593 |
| RigVeda_47_0092.wav,न तत्ते अन्यो अनु वीर्यं शकन्न पुराणो मघवन्नोत नूतनः,7.906 |
| Atharvaveda_Part_018_1_0222.wav,ये पार्थिवे रजस्या निषक्ता ये वा नूनं सुवृजनासु दिक्षु,6.367 |
| Rigveda_41_0319.wav,पुनन्तु मां देवजनाः पुनन्तु वसवो धिया विश्वे देवाः पुनीत मा जातवेदः पुनीहि मा प्र प्यायस्व प्र स्यन्दस्व सोम विश्वेभिरंशुभिः,18.193 |
| RigVeda_Part_027_0161.wav,रथ इव बृहती विभ्वने कृतोपस्तुत्या चिकितुषा सरस्वती,6.981 |
| RigVeda_42_0276.wav,मायाविनो ममिरे अस्य मायया नृचक्षसः पितरो गर्भमा दधुः,7.2 |
| Rigvedha_008_0106.wav,अस्माकं शत्रून्परि शूर विश्वतो दर्मा दर्षीष्ट विश्वतः,7.131 |
| Rigvedha_014_0297.wav,जुषस्व सू नो अध्वरम्,3.0060625 |
| RigVeda_50_0239.wav,भीमस्य वृष्णो जठरादभिश्वसो दिवेदिवे सहुरि स्तन्नबाधितः,7.436 |
| Rigveda_29_0462.wav,सिष्टं वर्तिरश्विनाविरावत्,2.122 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0098.wav,अपरिपरेण पथा यमराज्ञः पितॄन् गच्छ,4.512 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0403.wav,पञ्च दिशः पञ्चदशेन कॢप्तास्ता एकमूर्ध्नीरभि लोकमेकम्,6.608 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0277.wav,माध्यन्दिनस्य सवनस्य दध्नः पिबेन्द्र वज्रिन् पुरुकृज्जुषाणः समिद्धो अग्निर्वृषणा रथी दिवस्तप्तो घर्मो दुह्यते वामिषे मधु,12.489 |
| Rigvedha_008_0257.wav,पुनर्वर्धन्ते अपि यन्ति देव्यमन्यद्वर्पः पित्रोः कृण्वते सचा,7.898 |
| Rigvedha_006_0209.wav,ऋभुर्भराय सं शिशातु सातिं समर्यजिद्वाजो अस्माँ अविष्टु,7.932 |
| Rigvedha_008_0269.wav,गव्यं यव्यं यन्तो दीर्घाहेषं वरमरुण्यो वरन्त,6.989 |
| Rig_veda_45_0056.wav,त्रीणि शीर्षा परा वर्क्,2.773 |
| Atharvaveda_Part_020_30307.wav,जातं यस्ते जिघांसति तमितो नाशयामसि,4.605 |
| Rigveda_33_0228.wav,अधीव यद्गिरीणां यामं शुभ्रा अचिध्वम्,5.494 |
| RigVeda_Part_027_0274.wav,वि यद्वाचं कीस्तासो भरन्ते शंसन्ति के चिन्निविदो मनानाः,8.634 |
| Rigvedha_006_0298.wav,या गोमतीरुषसः सर्ववीरा व्युच्छन्ति दाशुषे मर्त्याय,7.164 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0257.wav,उपेषन्तमुदुम्बलं तुण्डेलमुत शालुडम्,4.551 |
| Rigvedha_003_0079.wav,यः शुक्र इव सूर्यो हिरण्यमिव रोचते,4.858 |
| Rigvedha_014_0368.wav,माध्यंदिने सवने जातवेदः पुरोळाशमिह कवे जुषस्व,6.51 |
| Rigvedha_007_0031.wav,एकस्या वस्तोरावतं रणाय वशमश्विना सनये सहस्रा,7.69 |
| Rigveda_38_0253.wav,के ह शृण्विरे,2.092 |
| Rigvedha_007_0335.wav,परिज्मानमिव द्यां होतारं चर्षणीनाम्,5.224 |
| Rigvedha_004_0077.wav,त्वं त्यां न इन्द्र देव चित्रामिषमापो न पीपयः परिज्मन्,6.697 |
| RigVeda_Part_015_0214.wav,शुनं हुवेम मघवानमिन्द्रमस्मिन्भरे नृतमं वाजसातौ,6.475 |
| RigVeda_Part_017_0020.wav,गोमाँ अग्नेऽविमाँ अश्वी यज्ञो नृवत्सखा सदमिदप्रमृष्यः,7.515 |
| Rigveda_34_0106.wav,उत स्या नो दिवा मतिरदितिरूत्या गमत् सा शंताति मयस्करदप स्रिधः,9.79 |
| Atharvaveda_Part_020_30285.wav,इन्द्रेदमद्य सवनं जुषाणो विश्वस्य विद्वामिह पाहि सोमम्,6.632 |
| RigVeda_48_0096.wav,द्विबर्हसो य उप गोपमागुरदक्षिणासो अच्युता दुदुक्षन्,6.891 |
| RigVeda_Part_027_0191.wav,अरं मे गन्तं हवनायास्मै गृणाना यथा पिबाथो अन्धः,7.492 |
| RigVeda_Part_028_0369.wav,उभे चिदिन्द्र रोदसी महित्वा पप्राथ तविषीभिस्तुविष्मः,6.066 |
| Rigveda_38_0280.wav,त्वं हि शृण्विषे वसो,3.0 |
| Rigvedha_005_0006.wav,आ तिष्ठ वृत्रहन्रथं यु,2.797 |
| RigVeda_Part_018_0086.wav,आ दुरोषाः पास्त्यस्य होता यो नो महान्संवरणेषु वह्निः,7.706 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0411.wav,आयुः प्राणं प्रजां पशून् कीर्तिं यजमानं च वर्धय,5.439 |
| RigVeda_Part_028_0302.wav,दुराध्यो अदितिं स्रेवयन्तोऽचेतसो वि जगृभ्रे परुष्णीम्,10.376 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0541.wav,अपाना ये चैषां प्राणा असुनासून्त्समछिदन्,5.282 |
| Rigveda_37_0296.wav,कस्य स्वित्सवनं वृषा जुजुष्वाँ अव गच्छति,5.832 |
| Rigvedha_001_0003.wav,होतारं रत्नधातमम्,4.306 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0482.wav,इयं कल्याण्यजरा मर्त्यस्यामृता गृहे,6.1 |
| RigVeda_Part_023_0118.wav,नि बर्हिषि सदतं सोमपीतये,3.675 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0520.wav,सोममृत्वा ते पराञ्चो व्यथन्तां प्रत्यगेनान् प्रतिसरेण हन्मि,6.793 |
| Rigveda_38_0050.wav,त्राभिरूतिभिः,2.032 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0295.wav,गम्भीरमप्लवा इव न तरेयुररातयः,4.267 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0092.wav,सहस्रमन्यान् प्र सुवामि साकं शतं जीवाति शरदस्तवायम्,6.803 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0551.wav,एवा त्वं कासे प्र पत समुद्रस्यानु विक्षरम्,4.898 |
| Rigveda_34_0393.wav,एदु मध्वो मदिन्तरं सिञ्च वाध्वर्यो अन्धसः,6.157 |
| RigVeda_Part_021_0327.wav,महो राये बृहतीः सप्त विप्रो मयोभुवो जरिता जोहवीति,7.329 |
| Rigveda_30_0159.wav,वि विद्युतो न वृष्टिभी रुचाना अनु स्वधामायुधैर्यच्छमानाः,7.261 |
| RigVeda_51_0212.wav,शतं वा यदसुर्य प्रति त्वा सुमित्र इत्थास्तौद्दुर्मित्र इत्थास्तौत्,8.105 |
| RigVeda_Part_027_0104.wav,इन्द्राग्नी उक्थवाहसा स्तोमेभिर्हवनश्रुता,6.27 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0078.wav,शं तप माति तपो अग्ने मा तन्वं तपः,4.551 |
| RigVeda_Part_025_0161.wav,उरुगायमभयं तस्य ता अनु गावो मर्तस्य वि चरन्ति यज्वनः,6.332 |
| Rigvedha_010_0053.wav,अर्चन्त्यर्कं मदिरस्य पीतये विदुर्वीरस्य प्रथमानि पौंस्या,7.865 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0190.wav,अग्निष्टदाहार्निर्ऋतेरुपस्थात्तदात्मनि पुनरा वेशयामि ते,6.576 |
| RigVeda_Part_026_0109.wav,उरुं नो लोकमनु नेषि विद्वान्स्वर्वज्ज्योतिरभयं स्वस्ति,7.814 |
| Rigvedha_007_0245.wav,यदद्य भागं विभजासि नृभ्य उषो देवि मर्त्यत्रा सुजाते,6.611 |
| Rigveda_33_0527.wav,इन्द्रं वर्धन्तु नो गिर इन्द्रं सुतास इन्दवः,5.871 |
| Rigveda_30_0029.wav,आ नक्ता बर्हिः सदतामुषासोशन्ता मित्रावरुणा यजेह,7.201 |
| RigVeda_Part_017_0039.wav,रथं न क्रन्तो अपसा भुरिजोरृतं येमुः सुध्य आशुषाणाः,7.333 |
| RigVeda_50_0087.wav,देवेभिर्न्विषितो यज्ञियेभिरग्निं स्तोषाण्यजरं बृहन्तम्,7.392 |
| Rigvedha_004_0178.wav,मथीद्यदीं विभृतो मातरिश्वा गृहेगृहे श्येतो जेन्यो भूत्,7.887 |
| Rigvedha_012_0218.wav,वीरेषु वीराँ उप पृङ्धि नस्त्वं यदीशानो ब्रह्मणा वेषि मे हवम्,8.4010625 |
| RigVeda_Part_028_0204.wav,मनुष्वदग्न इह यक्षि देवान्भवा नो दूतो अभिशस्तिपावा,7.085 |
| Atharvaveda_Part_020_20301.wav,येन ज्योतीम्ष्यायवे मनवे च विवेदिथ,4.623 |
| Rigvedha_011_0113.wav,सो चिन्नु न मराति नो वयं मरामारे अस्य योजनं हरिष्ठा मधु त्वा मधुला चकार,8.08 |
| RigVeda_Part_019_0010.wav,शच्याकर्त पितरा युवाना शच्याकर्त चमसं देवपानम्,8.098 |
| RigVeda_Part_024_0017.wav,परिज्मेव स्वधा गयोऽत्यो न ह्वार्यः शिशुः,5.179 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0392.wav,यज्ञस्य चक्षुः प्रभृतिर्मुखं च वाचा श्रोत्रेण मनसा जुहोमि,6.737 |
| RigVeda_50_0253.wav,येभिर्विहाया अभवद्विचक्षणः पाथः सुमेकं स्वधितिर्वनन्वति,6.849 |
| Rigvedha_013_0285.wav,घृतप्रतीक उर्विया व्यद्यौदग्निर्विश्वानि काव्यानि विद्वान्,7.681 |
| RigVeda_53_0128.wav,यत्रा दशस्यन्नुषसो रिणन्नपः कुत्साय मन्मन्नह्यश्च दंसयः अवासृजः प्रस्वः श्वञ्चयो गिरीनुदाज उस्रा अपिबो मधु प्रियम्,17.217 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0172.wav,अन्तरिक्षेण व्यचसा,2.671 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0352.wav,यौ कक्षीवन्तमवथो प्रोत कण्वं तौ नो मुञ्चतमंहसः यौ मेधातिथिमवथो यौ त्रिशोकं मित्रावरुणावुशनां काव्यं यौ,12.518 |
| RigVeda_Part_028_0096.wav,विश्वा स्तोतृभ्यो गृणते च सन्तु यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः,7.484 |
| RigVeda_Part_024_0415.wav,वधैः शुष्णस्याशुषस्य मायाः पित्वो नारिरेचीत्किं चन प्र,6.99 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0149.wav,तेनैनं प्राशिषं तेनैनमजीगमम्,4.225 |
| Rig_veda_54_0210.wav,अथो त इन्द्रः केवलीर्विशो बलिहृतस्करत्,5.399 |
| RigVeda_44_0428.wav,अग्निर्ह नः प्रथमजा ऋतस्य पूर्व आयुनि वृषभश्च धेनुः,6.951 |
| RigVeda_43_0347.wav,अभि चन्द्रा भर्तवे नो हिरण्याभ्यश्वान्रथिनो देव सोम,6.692 |
| RigVeda_Part_017_0310.wav,अन्धा तमांसि दुधिता विचक्षे नृभ्यश्चकार नृतमो अभिष्टौ,7.187 |
| Rigvedha_007_0268.wav,ऋतस्य रश्मिमनुयच्छमाना भद्रम्भद्रं क्रतुमस्मासु धेहि,6.415 |
| Rigveda_29_0212.wav,न दुष्टुती मर्त्यो विन्दते वसु न स्रेधन्तं रयिर्नशत्,6.079 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0108.wav,जाया पतिमिव वाससाभ्येनं भूम ऊर्णुहि,5.105 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0174.wav,मा नो विददभिभा मो अशस्तिर्मा नो विदद्वृजिना द्वेष्या या,6.834 |
| Rigveda_33_0012.wav,धीभिः सातानि काण्वस्य वाजिनः प्रियमेधैरभिद्युभिः,6.38 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0451.wav,ध्रुवोऽच्युतः प्र मृणीहि शत्रून् छत्रूयतोऽधरान् पादयस्व,5.706 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0273.wav,उद्वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्,6.167 |
| Rigveda_40_0139.wav,क्रिविर्देवीरतर्पयत्,2.854 |
| RigVeda_50_0204.wav,तमोषधीर्दधिरे गर्भमृत्वियं तमापो अग्निं जनयन्त मातरः,7.509 |
| Rigveda_38_0082.wav,अग्ने माकिष्टे देवस्य रातिमदेवो युयोत,5.887 |
| Rigveda_33_0045.wav,पुरुत्रा चिद्धि वां नरा विह्वयन्ते मनीषिणः,5.3 |
| Atharvaveda_Part_020_40397.wav,तेन माविष्टमश्विना,2.968 |
| Rigvedha_010_0091.wav,एष व स्तोमो मरुत इयं गीर्मान्दार्यस्य मान्यस्य कारोः,8.193 |
| RigVeda_Part_020_0061.wav,ब्रह्माण्यत्रेरव तं सृजन्तु निन्दितारो निन्द्यासो भवन्तु,7.127 |
| Rigveda_30_0048.wav,ब्रध्नं माँश्चतोर्वरुणस्य बभ्रुं ते विश्वास्मद्दुरिता यावयन्तु,7.606 |
| Rigveda_35_0161.wav,ते नस्त्राध्वं तेऽवत त उ नो अधि वोचत,5.615 |
| Atharvaveda_Part_020_40256.wav,ते वृक्षाः सह तिष्ठति,2.683 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0236.wav,एवा दुष्वप्न्यं सर्वं द्विषते सं नयामसि अग्निः प्रातःसवने पात्वस्मान् वैश्वानरो विश्वकृद्विश्वशंभूः,11.84 |
| RigVeda_51_0076.wav,सो अभ्रियो न यवस उदन्यन्क्षयाय गातुं विदन्नो अस्मे,6.861 |
| Atharvaveda_Part_020_20007.wav,गिरश्च गिर्वाहसे सुवृक्तीन्द्राय विश्वमिन्वं मेधिराय अस्मा इदु सप्तिमिव श्रवस्येन्द्रायार्कं जु,11.428 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0060.wav,तस्मादश्वा अजायन्त ये च के चोभयादतः,5.255 |
| Rigveda_41_0111.wav,पवमानस्य ते रसो मदो राजन्नदुच्छुनः,4.906 |
| Rigvedha_010_0201.wav,त्वं धुनिरिन्द्र धुनिमतीरृणोरपः सीरा न स्रवन्तीः,6.086 |
| Rigveda_32_0168.wav,यो मायातुं यातुधानेत्याह यो वा रक्षाः शुचिरस्मीत्याह,8.554 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0029.wav,स नः सनिं मधुमतीं कृणोतु रयिं च नः सर्ववीरं नि यछात्,6.205 |
| RigVeda_44_0246.wav,परि प्र धन्वेन्द्राय सोम स्वादुर्मित्राय पूष्णे भगाय,7.124 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0221.wav,उद्वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्,6.288 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0348.wav,समिन्धते अमर्त्यं हव्यवाहं घृतप्रियम्,4.384 |
| Rigvedha_009_0321.wav,त्रैष्टुभेन वाकम्,2.223 |
| RigVeda_52_0278.wav,यूयं विश्वं परि पाथ वरुणो मित्रो अर्यमा,5.457 |
| Rigveda_30_0241.wav,इमे दिवो अनिमिषा पृथिव्याश्चिकित्वांसो अचेतसं नयन्ति,7.343 |
| RigVeda_Part_017_0200.wav,य ईं पुष्यन्त इन्धते,3.513 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0094.wav,यस्य तक्मा कासिका हेतिरेकमश्वस्येव वृषणः क्रन्द एति,6.303 |
| Rigveda_36_0125.wav,अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम् अपां रेतांसि जिन्वति,8.822 |
| Atharvaveda_Part_020_40179.wav,यद्भद्रस्य पुरुषस्य पुत्रो भवति दाधृषिः,4.416 |
| Rigveda_37_0293.wav,अस्माकं काममा पृण,2.924 |
| RigVeda_44_0177.wav,प्र सोम देववीतये सिन्धुर्न पिप्ये अर्णसा,5.621 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0516.wav,यः शतौदनां पचति कामप्रेण स कल्पते प्रीता ह्यस्य ऋत्विजः सर्वे यन्ति यथायथम् स स्वर्गमा रोहति यत्रादस्त्रिदिवं दिवः,14.115 |
| RigVeda_Part_026_0098.wav,अयं स्वादुरिह मदिष्ठ आस यस्येन्द्रो वृत्रहत्ये ममाद,7.825 |
| Rigveda_31_0357.wav,एता अग्न आशुषाणास इष्टीर्युवोः सचाभ्यश्याम वाजान्,7.573 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0175.wav,आयुरस्यायुर्मे दाः स्वाह,4.33 |
| Rigvedha_010_0154.wav,आरे अश्मा यमस्यथ,3.355 |
| RigVeda_42_0194.wav,अभीमृतस्य दोहना अनूषताधि त्रिपृष्ठ उषसो वि राजति,6.678 |
| Rigveda_35_0270.wav,यः सुषव्यः सुदक्षिण इनो यः सुक्रतुर्गृणे,5.242 |
| RigVeda_49_0053.wav,तदाशा अन्वजायन्त तदुत्तानपदस्परि,4.728 |
| Rigvedha_005_0157.wav,त्वं च सोम नो वशो जीवातुं न मरामहे,5.11 |
| Rigveda_29_0300.wav,शं नो भगः शमु नः शंसो अस्तु शं नः,4.049 |
| Rig_veda_45_0214.wav,पथिकृद्भ्यः,1.323 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0103.wav,आप इद्वा उ भेषजीरापो अमीवचातनीः,5.154 |
| Rigvedha_004_0316.wav,स त्वामदद्वृषा मदः सोमः श्येनाभृतः सुतः,5.25 |
| RigVeda_Part_026_0165.wav,महो देवान्यजसि यक्ष्यानुषक्तव क्रत्वोत दंसना,7.539 |
| RigVeda_49_0151.wav,प्रज्ञातारो न ज्येष्ठाः सुनीतयः सुशर्माणो न सोमा ऋतं यते,7.774 |
| RigVeda_Part_021_0328.wav,आ सुष्टुती नमसा वर्तयध्यै द्यावा वाजाय पृथिवी अमृध्रे,7.372 |
| RigVeda_Part_017_0132.wav,यदुस्रियाणामप वारिव व्रन्पाति प्रियं रुपो अग्रं पदं वेः,7.764 |
| Atharvaveda_Part_015_0051.wav,तस्य देवजनाः परिष्कन्दा आसन्त्संकल्पाः प्रहाय्या विश्वानि भूतान्युपसदः,10.962 |
| RigVeda_48_0031.wav,ता नो विश्वानि जरिता ममत्तु परातरं सु निरृतिर्जिहीताम्,6.893 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0304.wav,अयुतोऽहमयुतो म आत्मायुतं मे चक्षुरयुतं मे श्रोत्रम् अयुतो मे प्राणोऽयुतो मेऽपानोऽयुतो मे व्यानोऽयुतोऽहं सर्वः,12.633 |
| Rigvedha_002_0077.wav,न देवमभिमातयः,2.762 |
| RigVeda_42_0247.wav,तं त्वा देवेभ्यो मधुमत्तमं नरः सहस्रधारं दुहते दश क्षिपः,7.343 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0455.wav,तद्दाधार पृथिवीं विश्वरूपं तत्संभूय भवत्येकमेव,6.552 |
| Atharvaveda_Part_020_10143.wav,आ तु नः स वयति गव्यमश्व्यं स्तोतृभ्यो मघवा शतम्,5.967 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0447.wav,पृष्टीर्बर्जह्ये पार्श्वे कस्तत्समदधादृषिः,5.311 |
| RigVeda_Part_018_0218.wav,उद्वावृषाणो राधसे तुविष्मान्करन्न इन्द्रः सुतीर्थाभयं च,7.42 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0091.wav,आ ययाम सं बबर्ह ग्रन्थींश्चकार ते दृढान्,5.63 |
| RigVeda_52_0286.wav,यथा ह त्यद्वसवो गौर्यं चित्पदि षिताममुञ्चता यजत्राः,7.808 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0390.wav,व्रजं कृणुध्वं स हि वो नृपाणो वर्मा सीव्यध्वं बहुला पृथूनि,6.408 |
| Rigvedha_002_0450.wav,सुसंस्कृता अभीशवः,2.895 |
| RigVeda_50_0292.wav,बृहद्वदन्ति मदिरेण मन्दिनेन्द्रं क्रोशन्तोऽविदन्नना मधु,6.202 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0436.wav,इन्द्रादिन्द्रः सोमात्सोमो अग्नेरग्निरजायत,5.326 |
| Rigvedha_011_0125.wav,वृश्चिकस्यारसं विषमरसं वृश्चिक ते विषम्,4.7580625 |
| Rigveda_34_0396.wav,तं वो वाजानां पतिमहूमहि श्रवस्यवः अप्रायुभिर्यज्ञेभिर्वावृधेन्यम्,10.807 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0394.wav,इन्द्रश्च या चक्रथुः सोम तानि धुरा न युक्ता रजसो वहन्ति,5.907 |
| Rigvedha_005_0124.wav,भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः,7.713 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0485.wav,अस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् कर्मण्यस्यां पुरोधायामस्यां प्रतिष्ठायामस्याम् चित्त्यामस्यामाकूत्यामस्यामाशिष्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा तता अवरे ते मावन्तु,17.264 |
| RigVeda_Part_017_0308.wav,दिव इत्था जीजनत्सप्त कारूनह्ना चिच्चक्रुर्वयुना गृणन्तः,7.707 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0398.wav,त्वष्टा सहस्रमायुंषि दीर्घमायुः कृणोतु वाम्,4.937 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0183.wav,स नः सूर्य प्र तिर दीर्घमायुर्मा रिषाम सुमतौ ते स्याम,6.287 |
| Rigveda_30_0349.wav,अशोच्यग्निः समिधानो अस्मे उपो अदृश्रन्तमसश्चिदन्ताः,7.657 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0071.wav,उद्यन्न् आदित्यो द्रविणेन तेजसा नीचैः सपत्नान् नुदतां मे सहस्वान् यत्ते काम शर्म त्रिवरूथमुद्भु ब्रह्म वर्म विततमनतिव्याध्यं कृतम्,16.167 |
| RigVeda_42_0069.wav,पवमानः संतनिः प्रघ्नतामिव मधुमान्द्रप्सः परि वारमर्षति,7.083 |
| RigVeda_Part_016_0007.wav,शुनं हुवेम मघवानमिन्द्रमस्मिन्भरे नृतमं वाजसातौ,6.356 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0336.wav,सर्वं शीर्षन्यं ते रोगं बहिर्निर्मन्त्रयामहे अङ्गभेदमङ्गज्वरं विश्वाङ्ग्यं विसल्पकम्,11.67 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0395.wav,द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परि षस्वजाते,6.444 |
| RigVeda_51_0147.wav,एषैष्या चिद्रथ्या जयेम सुमङ्गलं सिनवदस्तु सातम्,6.737 |
| Atharvaveda_Part_020_30180.wav,स ईं सत्येभिः सखिभिः शुचद्भिर्गोधायसं वि धनसैरदर्दः,6.419 |
| Atharvaveda_Part_017_0141.wav,मा मा प्रापत्पाप्मा मोत मृत्युरन्तर्दधेऽहं सलिलेन वाचः,6.658 |
| Atharvaveda_Part_018_1_0175.wav,अन्यमू षु यम्यन्य उ त्वां परि ष्वजातौ लिबुजेव वृक्षम्,5.507 |
| RigVeda_Part_020_0218.wav,ये स्तोमेभिः प्र सूरयो नरो मघान्यानशुः,6.378 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0238.wav,याः काश्चेमाः खनित्रिमास्तासामरसतमं विषम्,5.831 |
| Rigveda_36_0271.wav,नेह भद्रं रक्षस्विने नावयै नोपया उत गवे च भद्रं धेनवे वीराय च श्रवस्यतेऽनेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः यदाविर्यदपीच्यं देवासो अस्ति दुष्कृतम्,23.51 |
| Rigveda_40_0366.wav,ऋभुर्न रथ्यं नवं दधाता केतमादिशे,5.494 |
| Rigvedha_012_0221.wav,इन्धानो अग्निं वनवद्वनुष्यतः कृतब्रह्मा शूशुवद्रातहव्य इत्,7.367 |
| Atharvaveda_Part_017_0090.wav,विषासहिं सहमानं सासहानं सहीयांसम्,5.029 |
| Rigveda_32_0218.wav,विश्वेषां तरुतारं मदच्युतं मदे हि ष्मा ददाति नः,7.33 |
| Rigvedha_014_0406.wav,द्युम्नवद्ब्रह्म कुशिकास एरिर एकएको दमे अग्निं समीधिरे,7.4180625 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0429.wav,यन्त्यस्य देवा देवहूतिं प्रियो देवानां भवति य एवं वेद,6.572 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0123.wav,यातूंश्च सर्वाञ्जम्भयत्सर्वाश्च यातुधान्यः,5.632 |
| RigVeda_43_0082.wav,इन्द्रो न यो महा कर्माणि चक्रिर्हन्ता वृत्राणामसि सोम पूर्भित्,7.424 |
| Rigveda_31_0335.wav,प्र यद्वां मध्वो अग्रियं भरन्त्यध्वर्यवो देवयन्तः शचीभिः,7.791 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0026.wav,मधु जनिषीय मधु वंसिषीय,3.479 |
| RigVeda_Part_018_0040.wav,अतर्पयो विसृत उब्ज ऊर्मीन्त्वं वृताँ अरिणा इन्द्र सिन्धून्,8.11 |
| Atharvaveda_Part_020_40093.wav,अपोदीचो अप शूराधराच उरौ यथा तव शर्मन् मदेम,6.2 |
| Atharvaveda_Part_020_10130.wav,इमं स्तोममर्हते जातवेदसे रथमिव सं महेमा मनीषया,6.916 |
| Rigvedha_001_0431.wav,अपां नपातमवसे सवितारमुप स्तुहि,5.254 |
| Rigveda_38_0060.wav,अव स्वः सखा दुधुवीत पर्वतः सुघ्नाय दस्युं पर्वतः,6.571 |
| Rigveda_35_0409.wav,क्षेमस्य च प्रयुजश्च त्वमीशिषे शचीपत इन्द्र विश्वाभिरूतिभिः,7.719 |
| Rigveda_29_0469.wav,अर्कं यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः,5.04 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0110.wav,द्यावापृथिवी श्रोत्रे सूर्याचन्द्रमसावक्षिणी सप्तऋषयः प्राणापानाः चक्षुर्मुसलं काम उलूखलम्,12.095 |
| Rigveda_30_0139.wav,य आस्ते यश्च चरति यश्च पश्यति नो जनः,4.734 |
| RigVeda_44_0334.wav,यत्रानन्दाश्च मोदाश्च मुदः प्रमुद आसते,5.695 |
| RigVeda_49_0357.wav,नो अह प्र विन्दस्यन्यत्र सोमपीतये विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः,6.584 |
| Rigveda_32_0239.wav,अन्वस्य स्थूरं ददृशे पुरस्तादनस्थ ऊरुरवरम्बमाणः,7.288 |
| Rigvedha_003_0152.wav,व्यख्यज्जिह्वयासितः,2.816 |
| Rigveda_30_0362.wav,न वायन्ति सुभ्वो देवयुक्ता ये वां धूर्षु तरणयो वहन्ति,7.538 |
| Rigvedha_011_0272.wav,जोहूत्रो अग्निः प्रथमः पितेवेळस्पदे मनुषा यत्समिद्धः श्रियं वसानो अमृतो विचेता मर्मृजेन्यः श्रवस्यः स वाजी,14.032 |
| Rigveda_41_0140.wav,सो अर्षेन्द्राय पीतये तिरो रोमाण्यव्यया,7.046 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0184.wav,सविता मा दक्षिणत उत्तरान् मा शचीपतिः,5.241 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0176.wav,स रक्षिता चरमतः स मध्यतः स पश्चात्स पुरस्तान् नो अस्तु,6.458 |
| Rigveda_35_0245.wav,सूर्यो रश्मिं यथा सृजा त्वा यच्छन्तु मे गिरः,7.28 |
| RigVeda_Part_025_0144.wav,एतत्त्यत्त इन्द्रियमचेति येनावधीर्वरशिखस्य शेषः,6.472 |
| Rigvedha_004_0202.wav,रिरिक्वांसस्तन्वः कृण्वत स्वाः सखा सख्युर्निमिषि रक्षमाणाः,7.039 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0753.wav,यां जमदग्निरखनद्दुहित्रे केशवर्धनीम्,4.838 |
| Atharvaveda_Part_020_20235.wav,मदेमदे हि नो ददिर्यूथा गवामृजुक्रतुः,5.05 |
| RigVeda_47_0143.wav,उशिक्पावको अरतिः सुमेधा,3.616 |
| Rigvedha_005_0026.wav,व्रतान्यस्य सश्चिरे पुरूणि पूर्वचित्तये वस्वीरनु स्वराज्यम्,7.545 |
| Atharvaveda_Part_015_0158.wav,अस्यै देवताया उदकं याचामीमां देवतां वासय इमामिमां देवतां परि वेवेष्मी परि वेविष्यात्,12.421 |
| RigVeda_51_0333.wav,पुरूणि चिन्नि तताना रजांसि दाधार यो धरुणं सत्यताता इन्द्रो दिवः प्रतिमानं पृथिव्या विश्वा वेद सवना हन्ति शुष्णम्,15.696 |
| Rigveda_31_0155.wav,अचेति दिवो दुहिता मघोनी विश्वे पश्यन्त्युषसं,7.406 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0044.wav,सर्वास्त्वा राजन् प्रदिशो ह्वयन्तूपसद्यो नमस्यो भवेह,6.603 |
| RigVeda_Part_015_0150.wav,इन्द्रः पूर्भिदातिरद्दासमर्कैर्विदद्वसुर्दयमानो वि शत्रून्,7.84 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0416.wav,यो लोकानां विधृतिर्नाभिरेषात्तेनौदनेनाति तराणि मृत्युम्,6.318 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0120.wav,नमो वीर्त्साया असमृद्धये नमो अस्त्वरातये यमराते पुरोधत्से पुरुषं परिरापिणम्,10.069 |
| Atharvaveda_Part_018_1_0161.wav,जायेव पत्ये तन्वं रिरिच्यां वि चिद्वृहेव रथ्येव चक्रा न तिष्ठन्ति न नि मिषन्त्येते देवानां स्पश इह ये चरन्ति,13.078 |
| Atharvaveda_Part_020_10152.wav,भूरि त इन्द्र वीर्यं तव स्मस्यस्य स्तोतुर्मघवन् काममा पृण,7.793 |
| Rigveda_35_0066.wav,नेदीयसः कूळयातः पणीँरुत,4.486 |
| Rigveda_34_0287.wav,उप नो वाजिनीवसू यातमृतस्य पथिभिः,4.959 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0170.wav,अयं पिपान इन्द्र इद्रयिं दधातु चेतनीम्,4.964 |
| RigVeda_Part_019_0017.wav,ते रत्नं धात शवसो नपातः सौधन्वना अभवतामृतासः,7.426 |
| RigVeda_44_0340.wav,सप्त दिशो नानासूर्याः सप्त होतार ऋत्विजः,5.965 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0365.wav,यथा पसस्तायादरं वातेन स्थूलभं कृतम्,4.146 |
| RigVeda_42_0064.wav,एवा नः सोम परिषिच्यमानो वयो दधच्चित्रतमं पवस्व,6.192 |
| RigVeda_46_0047.wav,प्रत्यर्धिर्यज्ञानामश्वहयो रथानाम्,4.925 |
| Rigvedha_003_0368.wav,तं गूर्तयो नेमन्निषः परीणसः समुद्रं न संचरणे सनिष्यवः,7.025 |
| Rig_veda_45_0338.wav,रसं वृणाना अनुपूर्वं यतमाना यति ष्ठ,5.097 |
| Rigvedha_001_0158.wav,एवा हि ते विभूतय ऊतय इन्द्र मावते,5.986 |
| Rigvedha_002_0305.wav,यावत्तरो मघवन्यावदोजो वज्रेण शत्रुमवधीः पृतन्युम्,6.805 |
| Rigveda_29_0435.wav,आग्ने गिरो दिव आ पृथिव्या मि,1.593 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0197.wav,नक्तंजातासि ओषधे रामे कृष्णे असिक्नि च,5.332 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0429.wav,प्रैतानि तक्मने ब्रूमो अन्यक्षेत्राणि वा इमा,5.502 |
| RigVeda_Part_020_0172.wav,यं मर्त्यः पुरुस्पृहं विदद्विश्वस्य धायसे,5.171 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0086.wav,क्रिमिर्जिन्वत्पृथिवि यद्यदेजति प्रावृषि तन् नः सर्पन् मोप सृपद्यच्छिवं तेन नो मृड ये ते पन्थानो बहवो जनायना रथस्य वर्त्मानसश्च यातवे,15.066 |
| RigVeda_53_0139.wav,सूर्यरश्मिर्हरिकेशः,3.123 |
| Atharvaveda_Part_017_0101.wav,त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्,7.632 |
| RigVeda_Part_026_0250.wav,यूयं हि ष्ठा भिषजो मातृतमा विश्वस्य स्थातुर्जगतो जनित्रीः,8.087 |
| Rig_veda_45_0167.wav,शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा आ ये धामानि दिव्यानि तस्थुः,6.878 |
| Rigvedha_007_0068.wav,युवं च्यवानमश्विना जरन्तं पुनर्युवानं चक्रथुः शचीभिः,7.007 |
| RigVeda_Part_017_0092.wav,ऊर्ध्वो भव प्रति विध्याध्यस्मदाविष्कृणुष्व दैव्यान्यग्ने,7.587 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0512.wav,इन्द्रेण दत्ता प्रथमा शतौदना भ्रातृव्यघ्नी यजमानस्य गातुः,6.933 |
| RigVeda_Part_027_0148.wav,उत स्या नः सरस्वती घोरा हिरण्यवर्तनिः,5.094 |
| Rigvedha_010_0166.wav,प्र यदित्था महिना नृभ्यो अस्त्यरं रोदसी कक्ष्ये नास्मै,9.373 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0071.wav,शक्राय दध्रे वृषभाय वृष्णे,3.887 |
| Rig_veda_45_0351.wav,उच्छ्वञ्चमाना पृथिवी सु तिष्ठतु सहस्रं मित उप हि श्रयन्ताम्,6.567 |
| Atharvaveda_Part_020_20371.wav,सुविद्वांसं चर्कृत्यं चरणीनाम्,4.117 |
| Atharvaveda_Part_020_40369.wav,अध द्रप्सो अंशुमत्या उपस्थेऽधारयत्तन्वं तित्विषाणः,6.431 |
| RigVeda_Part_021_0288.wav,अभि न इळा यूथस्य माता स्मन्नदीभिरुर्वशी वा गृणातु,6.838 |
| RigVeda_Part_018_0235.wav,किमादुतासि वृत्रहन्मघवन्मन्युमत्तमः,4.995 |
| Rigvedha_001_0063.wav,जुहूमसि द्यविद्यवि,2.782 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0125.wav,शं नो द्यावापृथिवी पूर्वहूतौ शमन्तरिक्षं दृशये नो अस्तु,7.148 |
| Rigvedha_010_0122.wav,ते षु णो मरुतो मृळयन्तु ये स्मा पुरा गातूयन्तीव देवाः,7.839 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0160.wav,तत्रोप ब्रह्म यो वेद तद्वा अनडुहो व्रतम्,4.333 |
| Rigvedha_009_0226.wav,संदानमर्वन्तं पड्बीशं प्रिया देवेष्वा यामयन्ति,6.572 |
| Rigvedha_001_0042.wav,दस्रा युवाकवः सुता नासत्या वृक्तबर्हिषः,6.369 |
| Rigveda_36_0085.wav,तं त्वा वयं हवामहे शृण्वन्तं जातवेदसम्,6.377 |
| RigVeda_Part_023_0271.wav,अनागसो अदितये देवस्य सवितुः सवे,5.048 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0110.wav,पयस्वतीः कृणुथाप ओषधीः शिवा यदेजथा मरुतो रुक्मवक्षसः,6.362 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0441.wav,तान् अहं मन्ये दुर्हितान् जने अल्पशयून् इव,4.626 |
| Rigvedha_014_0301.wav,यज्ञेषु य उ चायवः,3.0080625 |
| Rigveda_36_0062.wav,अग्निर्यद्रोधति क्षमि,3.002 |
| RigVeda_52_0257.wav,अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः,7.847 |
| RigVeda_Part_021_0117.wav,त्यं चिदेषां स्वधया मदन्तं मिहो नपातं सुवृधं तमोगाम्,7.783 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0049.wav,अहन्न् अहिमनु अपस्ततर्द प्र वक्षणा अभिनत्पर्वतानाम्,6.072 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0169.wav,यो नो अग्निः पितरो हृत्स्वन्तराविवेशामृतो मर्त्येषु,6.935 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0181.wav,पिशाचक्षयणमसि पिशाचचातनं मे दाः स्वाहा,5.384 |
| RigVeda_48_0253.wav,र्तनिं पर्येति निष्कृतं पयो दुहाना व्रतनीरवारतः,6.481 |
| Rigvedha_010_0180.wav,मो षू ण इन्द्रात्र पृत्सु देवैरस्ति हि ष्मा ते शुष्मिन्नवयाः,5.327 |
| RigVeda_Part_020_0296.wav,अग्निं कृते स्वध्वरे पूरुरीळीतावसे,5.519 |
| Rig_veda_54_0115.wav,अग्निर्विश्वान्यप दुष्कृतान्यजुष्टान्यारे अस्मद्दधातु,7.368 |
| Rigvedha_013_0115.wav,मन्दस्व होत्रादनु जोषमन्धसोऽध्वर्यवः स पूर्णां वष्ट्यासिचम्,7.784 |
| Rigvedha_009_0120.wav,दाधार दक्षमुत्तममहर्विदं व्रजं च विष्णुः सखिवाँ अपोर्णुते,8.349 |
| RigVeda_Part_015_0036.wav,स्वस्तये वाजिभिश्च प्रणेतः सं यन्महीरिष आसत्सि पूर्वीः,7.326 |
| Rigvedha_003_0099.wav,प्रस्कण्वस्य प्रतिरन्नायुर्जीवसे नमस्या दैव्यं जनम्,6.368 |
| Rigveda_31_0084.wav,अश्नीतं मध्वो अश्विना उपाक आ वां वोचे विदथेषु,7.791 |
| Rigvedha_001_0333.wav,वृत्रहा सोमपीतये,2.833 |
| RigVeda_47_0215.wav,अहमेताञ्छाश्वसतो द्वाद्वेन्द्रं ये वज्रं युधयेऽकृण्वत,8.201 |
| RigVeda_Part_025_0316.wav,अयं स सोम इन्द्र ते सुतः पिब,3.322 |
| Rigveda_40_0597.wav,य इन्दुर्वारमाविशत्,2.673 |
| Rigvedha_008_0352.wav,एनी त एते बृहती अभिश्रिया हिरण्ययी वक्वरी बर्हिराशाते,8.728 |
| RigVeda_50_0005.wav,यस्येदमप्यं हविः,2.155 |
| Rigvedha_013_0313.wav,तासामेकामदधुर्मर्त्ये भुजमु लोकमु द्वे उप जामिमीयतुः,6.583 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0252.wav,तस्मिन् देवाः सह दैवीर्विशन्त्विमं प्राश्नन्त्वृतुभिर्निषद्य,6.471 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0237.wav,जनित्रीव प्रति हर्यासि सूनुं सं त्वा दधामि पृथिवीं पृथिव्या उखा कुम्भी वेद्यां मा व्यथिष्ठा यज्ञायुधैराज्येनातिषक्ता अग्निः पचन् रक्षतु त्वा पुरस्तादिन्द्रो रक्षतु दक्षिणतो मरुत्वान्,20.147 |
| Atharvaveda_Part_020_10281.wav,अयुज्रन् प्रातरद्रयः,2.57 |
| Rigveda_29_0322.wav,पर्वता ध्रुवयो भवन्तु शं नः सिन्धवः शमु सन्त्वापः,6.108 |
| RigVeda_Part_017_0260.wav,मा ते सखायः सदमिद्रिषाम यच्छा तोकाय तनयाय शं योः,7.67 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0232.wav,यः कृष्णः केश्यसुर स्तम्बज उत तुण्डिकः,4.795 |
| Rigvedha_009_0134.wav,अथो ह क्षत्रमधि धत्थ उग्रा यो वां हविष्मान्मनसा ददाश,7.55 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0239.wav,समुद्रो नदीभिरुदक्रामत्तां पुरं प्र णयामि वः,4.75 |
| Rigveda_34_0148.wav,सो अद्धा दाश्वध्वरोऽग्ने मर्तः सुभग स प्रशंस्यः,6.611 |
| Rigvedha_007_0392.wav,देवासो रण्वमवसे वसूयवो गीर्भी रण्वं वसूयवः,8.279 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0521.wav,असुराणां दुहितासि सा देवानामसि स्वसा,4.918 |
| Rigveda_33_0349.wav,आ नूनं रघुवर्तनिं रथं तिष्ठाथो अश्विना,5.312 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0419.wav,इन्द्रं त्वा वेद प्रत्यक्षं स्कम्भे सर्वं प्रतिष्ठितम्,5.366 |
| RigVeda_Part_016_0060.wav,पितुर्न पुत्रः सिचमा रभे त इन्द्र स्वादिष्ठया गिरा शचीवः शंसावाध्वर्यो प्रति मे गृणीहीन्द्राय वाहः कृणवाव जुष्टम्,14.836 |
| RigVeda_Part_023_0076.wav,वरुण मित्रार्यमन्वर्षिष्ठं क्षत्रमाशाथे,5.629 |
| Rigveda_40_0218.wav,वि वारमव्यमाशवः,2.724 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0155.wav,शृणोतु यज्ञमुशती नो अद्य रायस्पोषं चिकितुषी दधातु,5.93 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0552.wav,भूम्या अयस्मयं पातु प्रागाद्देवपुरा अयम्,5.275 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0387.wav,अग्नेर्यः क्षत्रियो विद्वान् नाम गृह्नाति आयुषे,5.608 |
| Rigvedha_009_0214.wav,यत्ते गात्रादग्निना पच्यमानादभि शूलं निहतस्यावधावति,7.411 |
| Rigveda_37_0367.wav,जीवान्नो अभि धेतनादित्यासः पुरा हथात्,6.14 |
| Rigvedha_001_0279.wav,हविष्मन्तो अरंकृतः,3.699 |
| Rigvedha_010_0023.wav,वधीं वृत्रं मरुत इन्द्रियेण स्वेन भामेन तविषो बभूवान्,6.941 |
| RigVeda_Part_018_0037.wav,अक्षोदयच्छवसा क्षाम बुध्नं वार्ण वातस्तविषीभिरिन्द्रः,7.449 |
| Rigvedha_012_0129.wav,अश्वजिते गोजिते अब्जिते भरेन्द्राय सोमं यजताय हर्यतम्,7.4390625 |
| Rigvedha_006_0145.wav,ताविन्द्राग्नी सध्र्यञ्चा निषद्या वृष्णः सोमस्य वृषणा वृषेथाम्,7.952 |
| RigVeda_Part_018_0082.wav,यो वायुना जयति गोमतीषु प्र धृष्णुया नयति वस्यो अच्छ,6.447 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0115.wav,यः पौरुषेयेण क्रविषा समङ्क्ते यो अश्व्येन पशुना यातुधानः,7.112 |
| RigVeda_49_0146.wav,ते हि यज्ञेषु यज्ञियास ऊमा आदित्येन नाम्ना शम्भविष्ठाः,7.474 |
| RigVeda_Part_025_0227.wav,पुरुहूतो यः पुरुगूर्त ऋभ्वाँ एकः पुरुप्रशस्तो अस्ति यज्ञैः,7.384 |
| Rigveda_33_0088.wav,धीजवना नासत्या,2.645 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0275.wav,आर्द्रं तदद्य सर्वदा समुद्रस्येव श्रोत्याः,6.006 |
| Rig_veda_45_0019.wav,अग्नेरनीकं बृहतः सपर्यं दिवि,3.787 |
| Rigvedha_005_0091.wav,ते क्रीळयो धुनयो भ्राजदृष्टयः स्वयं महित्वं पनयन्त धूतयः,7.924 |
| Rigvedha_004_0110.wav,सहस्रिणं शतिनं शूशुवांसं प्रातर्मक्षू धियावसुर्जगम्यात्,8.193 |
| RigVeda_Part_022_0345.wav,श्रिये श्रेयांसस्तवसो रथेषु सत्रा महांसि चक्रिरे तनूषु,6.947 |
| RigVeda_Part_028_0148.wav,आ समुद्रादवरादा परस्मादाग्निर्ददे दिव आ पृथिव्याः,7.461 |
| Rigvedha_001_0231.wav,अग्ने त्वं रक्षस्विनः,3.747 |
| RigVeda_46_0009.wav,विमदेन यदीळिता नासत्या निरमन्थतम्,4.995 |
| Rigveda_41_0159.wav,मदिन्तमस्य धारया,2.737 |
| Rigveda_35_0054.wav,उप स्तोमान्तुरस्य दर्शथः श्रिये,4.038 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0065.wav,मह्यं नमन्तां प्रदिशश्चतस्रो मह्यं षडुर्वीर्घृतमा वहन्तु,6.342 |
| Rigveda_30_0310.wav,नमस्वान्तुविजातयोः,3.304 |
| Rigveda_35_0101.wav,विश्वे हि ष्मा मनवे विश्ववेदसो भुवन्वृधे रिशादसः अरिष्टेभिः पायुभिर्विश्ववेदसो यन्ता नोऽवृकं छर्दिः,13.659 |
| Rigveda_40_0336.wav,उप शिक्षापतस्थुषो भियसमा धेहि शत्रुषु,5.897 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0383.wav,द्वादशारं नहि तज्जराय वर्वर्ति चक्रं परि द्यामृतस्य,6.083 |
| Rigveda_40_0058.wav,नक्तोषासा न दर्शते,2.881 |
| Atharvaveda_Part_020_10386.wav,मही चिद्धि धिषणाहर्यदोजसा बृहद्वयो दधिषे हर्यतस्चिदा,6.71 |
| Rigvedha_004_0308.wav,प्र पूतास्तिग्मशोचिषे वाचो गोतमाग्नये,6.313 |
| RigVeda_47_0278.wav,तं त्वा यमो अचिकेच्चित्रभानो दशान्तरुष्यादतिरोचमानम्,7.265 |
| Rig_veda_45_0317.wav,पवित्रात्तं ते जुहोमि मनसा वषट्कृतम्,3.703 |
| RigVeda_Part_017_0314.wav,अश्मानं चिद्ये बिभिदुर्वचोभिर्व्रजं गोमन्तमुशिजो वि वव्रुः,7.806 |
| Rigvedha_011_0008.wav,उत न ईं मरुतो वृद्धसेनाः स्मद्रोदसी समनसः सदन्तु,7.0050625 |
| Rigvedha_004_0096.wav,क्षपो जिन्वन्तः पृषतीभिरृष्टिभिः समित्सबाधः शवसाहिमन्यवः,6.904 |
| RigVeda_Part_025_0300.wav,एतं पिब हरिव स्थातरुग्र यस्येशिषे प्रदिवि यस्ते अन्नम्,6.654 |
| RigVeda_Part_017_0077.wav,मा भ्रातुरग्ने अनृजोरृणं वेर्मा सख्युर्दक्षं रिपोर्भुजेम,8.344 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0156.wav,दिवे स्वाहा पृथिव्यै स्वाहा अन्तरिक्षाय स्वाहा,7.95 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0104.wav,केन देवामनु क्षियति केन दैवजनीर्विशः केनेदमन्यन् नक्षत्रं केन सत्क्षत्रमुच्यते ब्रह्म देवामनु क्षियति ब्रह्म दैवजनीर्विशः,16.188 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0559.wav,बृहस्पतिराङ्गिरसो वज्रं यमसिञ्चतासुरक्षयणं वधम्,5.678 |
| Rigvedha_001_0309.wav,देवेषु ता वनामहे,3.156 |
| RigVeda_44_0180.wav,त्के अव्यत प्रियः सूनुर्न मर्ज्यः,3.683 |
| RigVeda_Part_020_0345.wav,चिकित्विन्मनसं त्वा देवं मर्तास ऊतये,5.524 |
| Atharvaveda_Part_020_20049.wav,न या अदेवो वरते न देव आभिर्याहि तूयमा मद्र्यद्रिक्,6.081 |
| RigVeda_Part_020_0362.wav,रासत्पुत्र ऋषूणामृतावा पर्षति द्विषः,5.189 |
| RigVeda_Part_021_0008.wav,यो म इति प्रवोचत्यश्वमेधाय सूरये,5.117 |
| RigVeda_Part_018_0254.wav,उक्थेष्विन्द्र आभजत्,3.094 |
| Atharvaveda_Part_020_10381.wav,हरिश्मशारुर्हरिकेश आयसस्तुरस्पेये यो हरिपा अवर्धत,6.265 |
| Rig_veda_54_0045.wav,उदसौ सूर्यो अगादुदयं मामको भगः,5.469 |
| RigVeda_50_0319.wav,किमेता वाचा कृणवा तवाहं प्राक्रमिषमुषसामग्रियेव,6.314 |
| Rigvedha_003_0113.wav,आ सीदन्तु बर्हिषि मित्रो अर्यमा प्रातर्यावाणो अध्वरम्,6.934 |
| Rigvedha_010_0299.wav,अति क्रमिष्टं जुरतं पणेरसुं ज्योतिर्विप्राय कृणुतं वचस्यवे,6.877 |
| Rigveda_40_0196.wav,तमिन्दुः परि षस्वजे,2.699 |
| Atharvaveda_Part_018_1_0234.wav,त्वष्टा दुहित्रे वहतुं कृणोति तेनेदं विश्वं भुवनं समेति,6.605 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0203.wav,अथो सपत्नकर्शनो यो बिभर्तीमं मणिम्,4.22 |
| RigVeda_46_0109.wav,जक्षीयाद्धाना उत सोमं पपीयात्स्वाशितः पुनरस्तं,6.174 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0080.wav,तान् अश्वत्थ निः शृणीहि शत्रून् वैबाधदोधतः,4.877 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0404.wav,ऊर्वोरोजो जङ्घयोर्जवः पादयोः,4.237 |
| Rigvedha_003_0383.wav,यस्य धाम श्रवसे नामेन्द्रियं ज्योतिरकारि हरितो नायसे,6.528 |
| RigVeda_Part_026_0202.wav,पृश्न्या दुग्धं सकृत्पयस्तदन्यो नानु जायते,6.343 |
| Atharvaveda_Part_020_40380.wav,गिरा वज्रो न संभृतः सबलो अनपच्युतः,4.439 |
| Rigveda_35_0190.wav,अग्निं वः पूर्व्यं गिरा देवमीळे वसूनाम्,5.767 |
| Rigveda_35_0097.wav,तमोषधीः,1.969 |
| RigVeda_Part_022_0187.wav,अधा पितरमिष्मिणं रुद्रं वोचन्त शिक्वसः,5.704 |
| RigVeda_Part_021_0217.wav,पप्रथे दीर्घश्रुत्तमं हिरण्यवर्ण दुष्टरम्,5.782 |
| Rigvedha_011_0261.wav,अति गाहेमहि द्विषः शुचिः पावक वन्द्योऽग्ने बृहद्वि रोचसे त्वं घृतेभिराहुतः त्वं नो असि भारताग्ने वशाभिरुक्षभिः अष्टापदीभिराहुतः द्र्वन्नः सर्पिरासुतिः प्रत्नो होता वरेण्यः,22.8340625 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0282.wav,बृहस्पतिः प्रायच्छद्वास एतत्सोमाय राज्ञे परिधातवा उ,6.83 |
| Atharvaveda_Part_018_1_0182.wav,सो चित्नु भद्रा क्षुमती यशस्वत्युषा उवास मनवे स्वर्वती,6.542 |
| RigVeda_Part_021_0181.wav,वृषजूतिर्हि जज्ञिष आभूभिरिन्द्र तुर्वणिः,4.758 |
| Rigveda_34_0251.wav,या ते धामानि वृषभ तेभिरा गहि विश्वेभिः सोमपीतये,7.474 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0326.wav,तेभिर्ब्रह्मा विध्यति देवपीयून् हृद्बलैर्धनुर्भिर्देवजूतैः,6.193 |
| Rigvedha_007_0199.wav,यं ते काव्य उशना मन्दिनं दाद्वृत्रहणं पार्यं ततक्ष वज्रम्,8.157 |
| Atharvaveda_Part_020_10081.wav,सद्यः सो अस्य महिमा न संनशे यं क्षोणीरनुचक्रदे,5.726 |
| Rigvedha_012_0022.wav,अस्मभ्यं तद्वसो दानाय राधः समर्थयस्व बहु ते वसव्यम्,6.464 |
| Rigvedha_007_0259.wav,ऋतस्य योषा न मिनाति धामाहरहर्नि,3.942 |
| Rigveda_38_0347.wav,उप क्रमस्वा भर धृषता धृष्णो जनानाम्,5.451 |
| Rigvedha_009_0064.wav,रेवद्वयो दधाथे रेवदाशाथे नरा मायाभिरितऊति माहिनम्,8.052 |
| Atharvaveda_Part_020_20246.wav,इन्द्रियाणि शतक्रतो या ते जनेषु पञ्चसु,4.389 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0007.wav,त्रेधा भागो निहितो यः पुरा वो देवानां पितॄणां मर्त्यानाम्,7.473 |
| RigVeda_Part_024_0203.wav,विभूषन्नग्न उभयाँ अनु व्रता दूतो देवानां रजसी समीयसे,8.162 |
| Rigvedha_014_0037.wav,अथा वह देवान्देव विश्वान्स्वध्वरा कृणुहि जातवेदः,6.531 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0208.wav,अर्भस्य तृप्रदंशिनो मशकस्यारसं विषम्,4.337 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0290.wav,यो अस्य विश्वजन्मन ईशे विश्वस्य चेष्टतः,4.918 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0139.wav,परीदं वासो अधिथाः स्वस्तयेऽभूर्गृष्टीनामभिशस्तिपा उ,6.766 |
| Rigveda_35_0012.wav,ऋतावाना सम्राजा नमसे हिता ऋतावाना नि षेदतुः साम्राज्याय सुक्रतू,11.797 |
| RigVeda_53_0062.wav,अभीके चिदु लोककृत्संगे समत्सु वृत्रहास्माकं बोधि चोदिता नभन्तामन्यकेषां ज्याका अधि धन्वसु,13.524 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0156.wav,यथा सूर्यो अतिभाति यथास्मिन् तेज आहितम्,5.102 |
| RigVeda_53_0250.wav,ऋष्वस्त्वमिन्द्र शूर जातो दासीर्विशः सूर्येण सह्याः,8.276 |
| RigVeda_52_0249.wav,इदं स्वरिदमिदास वाममयं प्रकाश उर्वन्तरिक्षम्,7.183 |
| Rigveda_32_0023.wav,त्रीयन्तः सुदानवः,2.417 |
| RigVeda_Part_023_0017.wav,आ रोहथो वरुण मित्र गर्तमतश्चक्षाथे अदितिं दितिं च,6.32 |
| Atharvaveda_Part_015_0062.wav,शारदौ मासौ गोप्तारावकुर्वं छ्यैतं च नौधसं चानुष्ठातारौ,7.704 |
| Rigvedha_012_0098.wav,सो अप्रतीनि मनवे पुरूणीन्द्रो दाशद्दाशुषे हन्ति वृत्रम्,6.4280625 |
| Rigvedha_006_0063.wav,विमुच्या वयोऽवसायाश्वान्दोषा वस्तोर्वहीयसः प्रपित्वे,7.398 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0395.wav,यस्य चतस्रः प्रदिशो नाड्यस्तिष्ठन्ति प्रथमाः,7.011 |
| Rigveda_30_0037.wav,आ विश्वाची विदथ्यामनक्त्वग्ने मा नो देवताता मृधस्कः,7.48 |
| Rigvedha_007_0227.wav,स्वयं स यक्ष्मं हृदये नि धत्त आप यदीं होत्राभिरृतावा,7.136 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0035.wav,यो अद्य स्तेन आयति स संपिष्टो अपायति,4.16 |
| Rigveda_31_0229.wav,युवो राष्ट्रं बृहदिन्वति द्यौर्यौ सेतृभिररज्जुभिः सिनीथः,7.075 |
| Rigvedha_003_0338.wav,त्वमाविथ नर्यं तुर्वशं यदुं त्वं तुर्वीतिं वय्यं शतक्रतो,7.095 |
| Rigveda_33_0093.wav,यो मे हिरण्यसंदृशो दश राज्ञो अमंहत,5.324 |
| Rigvedha_001_0202.wav,आ तू न इन्द्र कौशिक मन्दसानः सुतं पिब,5.444 |
| RigVeda_42_0092.wav,तेजिष्ठा अपो मंहना परि व्यत यदी देवस्य श्रवसा सदो विदुः,7.579 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0245.wav,इदं तमति सृजामि तं माभ्यवनिक्षि,3.718 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0468.wav,युञ्जन्तु त्वा मरुतो विश्ववेदस आ ते त्वस्ता पत्सु जवं दधातु,7.014 |
| Atharvaveda_Part_020_10400.wav,यस्य शुष्माद्रोदसी अभ्यसेतां नृम्णस्य मह्ना स जनास इन्द्रः,7.359 |
| RigVeda_51_0323.wav,उपावसृज त्मन्या समञ्जन्देवानां पाथ ऋतुथा हवींषि,7.585 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0346.wav,अनपत्यमल्पपशुं वशा कृणोति पूरुषम्,4.334 |
| RigVeda_47_0182.wav,चर्कृत्यं शंस्यं भूरिवारमस्मभ्यं चि,3.805 |
| Rigveda_29_0225.wav,वसिष्ठस्य स्तुवत इन्द्रो अश्रोदुरुं तृत्सुभ्यो अकृणोदु लोकम्,6.281 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0390.wav,तस्या नाश्नीयादब्राह्मणो य आशंसेत भू,5.205 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0080.wav,अथो एनं वनस्पते जीवानां लोकमुन् नय,5.401 |
| Rigveda_40_0063.wav,त्वष्टारमग्रजां गोपां पुरोयावानमा हुवे,7.003 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0278.wav,ओषधयः प्र जायन्ते यदा त्वं प्राण जिन्वसि,5.255 |
| Rigvedha_005_0302.wav,उच्छुक्रमत्कमजते सिमस्मान्नवा मातृभ्यो वसना जहाति,6.93 |
| Rigveda_38_0037.wav,प्रयस आशत,1.87 |
| Rig_veda_54_0028.wav,त्यैरिन्द्रः सह चीकॢपाति,3.003 |
| Rigveda_37_0114.wav,अचेत्यग्निश्चिकितुर्हव्यवाट् स सुमद्रथः,5.273 |
| Rigvedha_011_0042.wav,आजुह्वानो न ईड्यो देवाँ आ वक्षि यज्ञियान्,7.0850625 |
| Rigveda_37_0438.wav,स्वभीशुः कशावती,2.816 |
| Rigveda_35_0235.wav,पन्य आ दर्दिरच्छता सहस्रा वाज्यवृतः,5.492 |
| RigVeda_52_0005.wav,ह्वयन्ते,2.085 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0289.wav,ममेदह क्रतावसो मम चित्तमुपायसि,4.361 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0221.wav,अस्थाद्द्यौरस्थात्पृथिव्यस्थाद्विश्वमिदं जगत्,5.082 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0285.wav,येनेषुमेकतेजनां शतशल्यामपब्रवत्,4.533 |
| Rigvedha_012_0144.wav,साकं जातः क्रतुना साकमोजसा ववक्षिथ साकं वृद्धो वीर्यैः सासहिर्मृधो विचर्षणिः,9.713 |
| RigVeda_Part_015_0059.wav,ससान मर्यो युवभिर्मखस्यन्नथाभवदङ्गिराः सद्यो अर्चन्,7.415 |
| RigVeda_Part_015_0317.wav,हरिभ्यां यस्ते अस्मयुः,3.473 |
| RigVeda_Part_023_0108.wav,तुर्याम दस्यून्तनूभिः,3.131 |
| Rigveda_30_0192.wav,मा वस्तस्यामपि भूमा यजत्रा अस्मे वो अस्तु सुमतिश्चनिष्ठा,7.051 |
| RigVeda_53_0205.wav,अयं बिभर्त्यूर्ध्वकृशनं मदमृभुर्न कृत्व्यं मदम्,6.553 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0422.wav,यक्षं पृथिव्यामेकवृदेकर्तुः कतमो नु सः,5.381 |
| RigVeda_50_0078.wav,अग्ने तिग्मेन शोचिषा तपुरग्राभिरृष्टिभिः,5.53 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0036.wav,श्रिया समानान् अति सर्वान्त्स्यामाधस्पदं द्विषतस्पादयामि,6.033 |
| RigVeda_Part_018_0306.wav,सखिभिर्ये त्वे सचा,3.349 |
| Rigveda_37_0375.wav,मा नो मृचा रिपूणां वृजिनानामविष्यवः,5.64 |
| Rigvedha_008_0306.wav,वि श्रयन्तामृतावृधः प्रयै देवेभ्यो महीः,5.697 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0481.wav,अन्तरिक्षेण सह वाजिनीवन् कर्कीं वत्सामिह रक्ष वाजिन्,6.071 |
| Rigveda_40_0011.wav,आविष्कृणोति वग्वनुम्,2.862 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0248.wav,शुक्रं वहन्ति हरयो रघुष्यदो देवं दिवि वर्चसा भ्राजमानम्,6.446 |
| Rigvedha_014_0336.wav,अग्ने शकेम ते वयं यमं देवस्य वाजिनः,5.594 |
| Rigveda_35_0351.wav,श्येनाविव पतथो हव्यदातये सोमं सुतं महिषेवाव गच्छथः,8.236 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0135.wav,हिरण्यवर्णा सुभगा हिरण्यकशिपुर्मही तस्यै हिरण्यद्रापयेऽरात्या अकरं नमः,9.073 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0014.wav,सा नो मधु प्रियं दुहामथो उक्षतु वर्चसा यार्णवेऽधि सलिलमग्र आसीत्यां मायाभिरन्वचरन् मनीषिणः यस्या हृदयं परमे व्योमन्त्सत्येनावृतममृतं पृथिव्याः,18.771 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0424.wav,पर्यावर्ते दुष्वप्न्यात्पापात्स्वप्न्यादभूत्याः,5.888 |
| RigVeda_Part_022_0243.wav,अग्निभ्राजसो विद्युतो गभस्त्योः शिप्राः शीर्षसु वितता हिरण्ययीः,8.315 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0055.wav,यत्ते अङ्गमतिहितं पराचैरपानः प्राणो य उ वा ते परेतः,6.662 |
| Atharvaveda_Part_020_30208.wav,यो व्यतींरफाणयत्सुयुक्तामुप दाशुषे,4.975 |
| Rigveda_32_0085.wav,प्र यः सत्राचा मनसा यजात एतावन्तं नर्यमाविवासात्,8.658 |
| Rigveda_38_0432.wav,णाप्वे ददथुर्वस्यइष्टये,4.393 |
| Rigveda_30_0092.wav,मधुश्चुतः शुचयो याः पावकास्ता आपो देवीरिह मामवन्तु,7.608 |
| Atharvaveda_Part_014_0258.wav,आशासाना सौमनसं प्रजां सौभाग्यं रयिम्,5.375 |
| Atharvaveda_Part_014_0178.wav,सोमेनादित्या बलिनः सोमेन पृथिवी मही,5.175 |
| Rigvedha_003_0389.wav,अवासृजो निवृताः सर्तवा अपः सत्रा विश्वं दधिषे केवलं सहः,7.383 |
| RigVeda_Part_025_0116.wav,अध स्मा ते चर्षणयो यदेजानिन्द्र त्रातोत भवा वरूता,6.759 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0037.wav,ये ते के च सभासदस्ते मे सन्तु सवाचसः,4.922 |
| RigVeda_Part_023_0412.wav,वृतेव यन्तं बहुभिर्वसव्यैस्त्वे रयिं जागृवांसो अनु ग्मन्,9.76 |
| RigVeda_Part_025_0069.wav,कर्ता वीराय सुष्वय उ लोकं दाता वसु स्तुवते कीरये चित्,7.217 |
| Rigveda_37_0374.wav,इन्द्र इद्धि श्रुतो वशी,2.77 |
| Rigveda_38_0249.wav,वाचमष्टापदीमहं नवस्रक्तिमृतस्पृशम्,4.707 |
| RigVeda_50_0145.wav,प्र वातस्य प्रथसः प्र ज्मो अन्तात्प्र सिन्धुभ्यो रिरिचे प्र क्षितिभ्यः,6.772 |
| Rigvedha_004_0050.wav,भगो न मेने परमे व्योमन्नधारयद्रोदसी सुदंसाः,7.451 |
| Rigvedha_003_0390.wav,नू चित्सहोजा अमृतो नि तुन्दते होता यद्दूतो अभवद्विवस्वतः,6.771 |
| Rigvedha_010_0051.wav,यत्रा वो दिद्युद्रदति क्रिविर्दती रिणाति पश्वः सुधितेव बर्हणा,6.921 |
| RigVeda_Part_021_0081.wav,औच्छत्सा रात्री परितक्म्या याँ ऋणंचये राजनि रुशमानाम्,8.25 |
| Rigvedha_009_0033.wav,अन्धा अपश्या न दभन्नभिख्या नित्यास ईं प्रेतारो अरक्षन्,7.59 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0074.wav,हन्वोर्हि जिह्वामदधात्पुरूचीमधा महीमधि शिश्राय वाचम्,7.018 |
| RigVeda_Part_027_0367.wav,धनुः शत्रोरपकामं कृणोति धन्वना सर्वाः प्रदिशो जयेम,7.507 |
| Rigveda_32_0351.wav,कण्वासस्त्वा ब्रह्मभि स्तोमवाहस इन्द्रा यच्छन्त्या गहि,7.279 |
| Atharvaveda_Part_014_0247.wav,येनाक्षा अभ्यषिच्यन्त तेनेमां वर्चसावतम्,5.274 |
| Atharvaveda_Part_020_30258.wav,गमन्न् अस्मे वसून्या हि शंसिषं स्वाशिषं भरमा याहि सोमिनः,6.592 |
| Rig_veda_45_0034.wav,प्र केतुना बृहता यात्यग्निरा रोदसी वृषभो रोरवीति,6.413 |
| Rigveda_33_0038.wav,छर्दिर्यन्तमदाभ्यम्,3.118 |
| RigVeda_49_0289.wav,उदीर्ष्वातः पतिवती ह्येषा विश्वावसुं नमसा गीर्भिरीळे अन्यामिच्छ पितृषदं व्यक्तां स ते भागो जनुषा तस्य विद्धि,16.454 |
| Atharvaveda_Part_015_0174.wav,तस्य व्रात्यस्य,2.401 |
| Rigveda_39_0055.wav,त्वं च मघवन्वशः यस्य ते नू चिदादिशं न मिनन्ति स्वराज्यम्,8.852 |
| Rigveda_33_0166.wav,भ्यं प्रवृद्ध वज्रिवः,2.373 |
| Rigvedha_007_0348.wav,भक्तमभ,1.34 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0163.wav,बृहस्पते परि दीया रथेन रक्षोहामित्रामपबाधमानः,6.984 |
| Rigveda_29_0233.wav,सूर्यस्येव वक्षथो ज्योतिरेषां समुद्रस्येव महिमा गभीरः,7.356 |
| RigVeda_52_0207.wav,स रासते शुरुधो विश्वधायसोऽग्निर्होता गृहपतिः सुवीर्यम्,8.434 |
| RigVeda_50_0328.wav,ता अञ्जयोऽरुणयो न सस्रुः श्रिये गावो न धेनवोऽनवन्त,6.074 |
| Rigveda_41_0077.wav,पुनान इन्दवा भर तरत्स मन्दी धावति धारा सुतस्यान्धसः तरत्स मन्दी धावति,11.804 |
| Rigvedha_002_0160.wav,नि ष्वापया मिथूदृशा सस्तामबुध्यमाने,5.256 |
| Rigvedha_003_0329.wav,अक्रन्दयो नद्यो रोरुवद्वना कथा न क्षोणीर्भियसा समारत,10.406 |
| RigVeda_44_0083.wav,स्पार्हा भवन्ति रन्तयो जुषन्त यत्,4.333 |
| Rig_veda_54_0052.wav,इदं तदक्रि देवा असपत्ना किलाभुवम्,4.861 |
| Atharvaveda_Part_020_40133.wav,उताहमद्मि पीव इदुभा कुक्षी पृणन्ति मे विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः,6.638 |
| Rigveda_37_0425.wav,उरु णस्तन्वे तन उरु क्षयाय नस्कृधि,7.064 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0190.wav,तदाञ्जन त्वं शंताते शमापो अभयं कृतम्,4.769 |
| Rigvedha_009_0138.wav,वसू रुद्रा पुरुमन्तू वृधन्ता दशस्यतं नो वृषणावभिष्टौ,8.132 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0305.wav,तस्यामू सर्वा नक्षत्रा वशे चन्द्रमसा सह,5.166 |
| Rigvedha_010_0084.wav,सचा यदीं वृषमणा अहंयु स्थिरा चिज्जनीर्वहते सुभागाः,6.782 |
| RigVeda_46_0274.wav,अबुध्रमु त्य इन्द्रवन्तो अग्नयो ज्योतिर्भरन्त उषसो व्युष्टिषु,7.075 |
| Rigvedha_013_0123.wav,तुरीयं पात्रममृक्तममर्त्यं द्रविणोदाः पिबतु द्राविणोदसः,6.67 |
| Rigveda_38_0245.wav,उत्तिष्ठन्नोजसा सह पीत्वी शिप्रे अवेपयः,5.977 |
| Atharvaveda_Part_020_20323.wav,विभ्राजं ज्योतिषा स्वरगछो रोचनं दिवः,5.591 |
| RigVeda_Part_024_0416.wav,महो द्रुहो अप विश्वायु धायि वज्रस्य यत्पतने पादि शुष्णः,6.545 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0113.wav,अन्तरा द्यां च पृथिवीं च यद्व्यचस्तेन शालां प्रति गृह्णामि त इमाम्,7.322 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0212.wav,अजो वा इदमग्ने व्यक्रमत तस्योर इयमभवद्द्यौः पृष्टिहम्,6.322 |
| Rigveda_40_0197.wav,प्र वाचमिन्दुरिष्यति समुद्र,2.635 |
| RigVeda_Part_016_0200.wav,अनमीवास इळया मदन्तो मितज्ञवो वरिमन्ना पृथिव्याः,6.935 |
| Atharvaveda_Part_014_0399.wav,अपास्मत्तम उच्छतु नीलं पिशङ्गमुत लोहितं यत्,4.951 |
| Rigveda_33_0259.wav,यान्ति शुभ्रा रिणन्नपः,3.251 |
| Rigvedha_012_0344.wav,मा नो वि यौः सख्या विद्धि तस्य नः सुम्नायता मनसा तत्त्वेमहे,7.073 |
| RigVeda_Part_020_0393.wav,प्र यज्ञ एत्वानुषगद्या देवव्यचस्तमः,5.056 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0190.wav,वायुर्मान्तरिक्षेणैतस्या दिशः पातु तस्मिन् क्रमे तस्मिं छ्रये तां पुरं प्रैमि,8.488 |
| RigVeda_47_0378.wav,प्रासारयन्त पुरुध प्रजा अनु,3.648 |
| Atharvaveda_Part_020_30167.wav,अपः सिषासन्त्स्वरप्रतीतो बृहस्पतिर्हन्त्यमित्रमर्कैः,8.022 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0167.wav,तमा हरामि निर्ऋतेरुपस्थादस्पार्शमेनं शतशारदाय,6.381 |
| RigVeda_Part_020_0332.wav,राय ऋताय सुक्रतो गोभिः ष्याम सधमादो वीरैः स्याम सधमादः,8.11 |
| RigVeda_44_0287.wav,क्थ्यं महो गाहाद्दिव आ निरधुक्षत,4.134 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0043.wav,भवाशर्वावस्यतां पापकृते कृत्याकृते,5.295 |
| Atharvaveda_Part_020_40076.wav,ऋणोरक्षं न शचीभिः,2.592 |
| RigVeda_48_0215.wav,अतूर्तपन्थाः पुरुरथो अर्यमा सप्तहोता विषुरूपेषु जन्मसु,7.564 |
| RigVeda_Part_017_0017.wav,अन्तरीयसे अरुषा युजानो युष्माँश्च देवान्विश आ च मर्तान्,8.111 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0295.wav,देवासो विश्वधायसस्ते माञ्जन्तु वर्चसा येन हस्ती वर्चसा संबभूव येन राजा मनुष्येस्वप्स्वन्तः येन देवा देवतामग्र आयन् तेन मामद्य वर्चसाग्ने वर्चस्विनं कृणु,20.513 |
| Rigveda_35_0145.wav,अरावा चन मर्त्यः,2.893 |
| Rigvedha_007_0266.wav,अश्वावतीर्गोमतीर्विश्ववारा यतमाना रश्मिभिः सूर्यस्य,8.059 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0452.wav,येवाषासः कष्कषास एजत्काः शिपवित्नुकाः,5.401 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0576.wav,शितिपदी सं पतत्व,2.105 |
| Rigvedha_001_0267.wav,प्र दातुरस्तु चेतनम्,2.77 |
| Rigvedha_010_0252.wav,नदस्य मा रुधतः काम आगन्नित आजातो अमुतः कुतश्चित्,6.398 |
| RigVeda_Part_023_0112.wav,उपेमं चारुमध्वरम्,2.796 |
| Rigveda_37_0340.wav,यद्वावन्थ पुरुष्टुत पुरा चिच्छूर नृणाम्,4.953 |
| RigVeda_52_0243.wav,पश्यन्नन्यस्या अतिथिं वयाया ऋतस्य धाम वि मिमे पुरूणि,7.059 |
| Rigvedha_010_0139.wav,इन्द्र त्वं मरुद्भिः सं वदस्वाध प्राशान ऋतुथा हवींषि,6.482 |
| Rigvedha_010_0111.wav,एष व स्तोमो मरुत इयं गीर्मान्दार्यस्य मान्यस्य कारोः,6.775 |
| Rigvedha_007_0016.wav,श्रुतं तच्छासुरिव वध्रिमत्या हिरण्यहस्तमश्विनावदत्तम्,8.777 |
| RigVeda_53_0094.wav,कः कुमारमजनयद्रथं को निरवर्तयत्,5.407 |
| RigVeda_Part_018_0278.wav,नियुद्भिश्चर्षणीनाम्,2.948 |
| Rigvedha_008_0233.wav,वि तां दुह्रे अर्यमा कर्तरी सचाँ एष तां वेद मे सचा,8.018 |
| RigVeda_51_0208.wav,नाब्रह्मा यज्ञ ऋधग्जोषति त्वे,3.82 |
| Rigveda_40_0376.wav,विपा व्यानशुर्धियः,3.011 |
| Rigvedha_010_0123.wav,प्रति प्र याहीन्द्र मीळ्हुषो नॄन्महः,3.799 |
| RigVeda_46_0231.wav,मूषो न शिश्ना व्यदन्ति माध्य स्तोतारं ते शतक्रतो,6.462 |
| Rigvedha_007_0257.wav,अनवद्यास्त्रिंशतं योजनान्येकैका क्रतुं परि यन्ति सद्यः,7.379 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0119.wav,शं नो भगः शमु नः शंसो अस्तु शं नः पुरंधिः शमु सन्तु रायः,6.753 |
| RigVeda_51_0033.wav,बृहस्पति,1.274 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0492.wav,अविर्वै नाम देवतर्तेनास्ते परीवृता,5.086 |
| RigVeda_Part_018_0011.wav,अथोदस्थात्स्वयमत्कं वसान आ रोदसी अपृणाज्जायमानः,7.377 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0531.wav,यौ त ओष्ठौ ये नासिके ये शृङ्गे ये च तेऽक्षिणी,5.842 |
| Atharvaveda_Part_018_1_0205.wav,दुर्मन्त्वत्रामृतस्य नाम सलक्ष्मा यद्विषुरूपा भवाति,6.062 |
| RigVeda_Part_024_0189.wav,मित्रं न यं सुधितं भृगवो दधुर्वनस्पतावीड्यमूर्ध्वशोचिषम्,6.873 |
| RigVeda_Part_025_0241.wav,स गोमघा जरित्रे अश्वश्चन्द्रा वाजश्रवसो अधि धेहि पृक्षः,6.485 |
| Rigveda_38_0002.wav,धिया वो मेधसातये पुरंध्या विवासति,5.266 |
| Rigveda_34_0301.wav,ताविद्दोषा ता उषसि शुभस्पती ता यामन्रुद्रवर्तनी,7.012 |
| RigVeda_Part_020_0355.wav,स हि ष्मा विश्वचर्षणिरभिमाति सहो दधे,5.498 |
| Rigveda_41_0102.wav,उच्चा ते जातमन्धसो दिवि षद्भूम्या ददे उग्रं शर्म महि श्रवः,8.762 |
| Rigvedha_007_0282.wav,एवेदेषा पुरुतमा दृशे कं नाजामिं न परि वृणक्ति जामिम्,6.745 |
| Rigvedha_007_0320.wav,षष्टिः सहस्रमनु गव्यमागात्सनत्कक्षीवाँ अभिपित्वे अह्नाम्,7.438 |
| Rigvedha_014_0033.wav,आस्क्रे सपत्नी अजरे अमृक्ते सबर्दुघे उरुगायस्य धेनू,7.1660625 |
| RigVeda_Part_017_0241.wav,वि षाह्यग्ने गृणते मनीषां खं वेपसा तुविजात स्तवानः,7.33 |
| Atharvaveda_Part_020_20089.wav,अपामूर्मिर्मदन्न् इव स्तोम इन्द्राजिरायते,5.056 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0375.wav,महदेषाव तपति चरन्ती गोषु गौरपि,4.008 |
| Rigveda_29_0263.wav,त्मना समत्सु हिनोत यज्ञं दधात केतुं जनाय वीरम्,6.167 |
| Rigveda_41_0162.wav,गृणानो जमदग्निना,2.64 |
| Rig_veda_54_0342.wav,समानं मन्त्रमभि मन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि,6.633 |
| Rigveda_41_0243.wav,अन्तरिक्षेण यातवे,3.219 |
| RigVeda_48_0284.wav,वृषणा द्यावापृथिवी ऋतावरी वृषा पर्जन्यो वृषणो वृषस्तुभः,7.79 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0626.wav,मातुर्यदेन इषितं न आगन् यद्वा पिताऽपराद्धो जिहीदे,6.149 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0188.wav,इन्द्रं या देवी सुभगा जजान सा न ऐतु वर्चसा संविदाना,6.251 |
| Rigvedha_014_0374.wav,अस्तीदमधिमन्थनमस्ति,2.656 |
| Rigvedha_013_0074.wav,तमस्मेरा युवतयो युवानं मर्मृज्यमानाः परि यन्त्यापः,7.144 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0179.wav,उदप्लुतमिव दार्वहीनामरसं विषं वारुग्रम्,4.846 |
| Rigveda_34_0228.wav,युवानस्तथेदसत् ये चार्हन्ति मरुतः सुदानवः स्मन्मीळ्हुषश्चरन्ति ये अतश्चिदा न उप वस्यसा हृदा युवान आ ववृध्वम्,16.803 |
| Rigvedha_004_0090.wav,दुहन्त्यूधर्दिव्यानि धूतयो भूमिं पिन्वन्ति पयसा परिज्रयः,6.832 |
| Rigvedha_012_0061.wav,शूरो यो युत्सु तन्वं परिव्यत शीर्षणि द्यां महिना प्रत्यमुञ्चत,7.313 |
| Rigveda_36_0068.wav,उदग्ने तव तद्घृतादर्ची रोचत आहुतम्,5.496 |
| Rig_veda_45_0363.wav,इन्द्र एणा नि यच्छत्वग्निरेना उपाजतु,4.591 |
| Rigveda_33_0136.wav,इमास्त इन्द्र पृश्नयो घृतं दुहत आशिरम्,4.583 |
| RigVeda_Part_028_0300.wav,आ पक्थासो भलानसो भनन्तालिनासो विषाणिनः शिवासः,7.552 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0362.wav,न ब्राह्मणस्य गां जग्ध्वा रास्त्रे जागार कश्चन,5.558 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0368.wav,संवत्सरो रथः परिवत्सरो रथोपस्थो विराडीषाग्नी रथमुखम्,6.387 |
| RigVeda_Part_017_0093.wav,अव स्थिरा तनुहि यातुजूनां जामिमजामिं प्र मृणीहि शत्रून्,7.224 |
| RigVeda_47_0357.wav,असुरत्वमेकम्,2.538 |
| RigVeda_Part_022_0128.wav,अयं सोमश्चमू सुतोऽमत्रे परि षिच्यते,4.484 |
| RigVeda_44_0134.wav,इन्द्राय वृषणं मदं पवस्व विश्वदर्शतः,4.654 |
| RigVeda_Part_024_0090.wav,त्वां विश्वे अमृत जायमानं शिशुं न देवा अभि सं नवन्ते,6.746 |
| Atharvaveda_Part_014_0274.wav,गृह्णामि ते सौभगत्वाय हस्तं मया पत्या जरदष्टिर्यथासः,6.746 |
| Atharvaveda_Part_014_0179.wav,अथो नक्षत्राणामेषामुपस्थे सोम आहितः,4.852 |
| Rigveda_37_0028.wav,च्छा वद नव्यस्या म,2.453 |
| Rigvedha_001_0142.wav,एन्द्र सानसिं रयिं सजित्वानं सदासहम्,6.21 |
| Rigveda_40_0004.wav,पवमानो अदाभ्यः,2.679 |
| Rigveda_31_0205.wav,यद्वां हवन्त उभये अध स्पृधि नरस्तोकस्य तनयस्य सातिषु,6.659 |
| RigVeda_44_0273.wav,द्विषस्तरध्या ऋणया न ईयसे,3.849 |
| Rigvedha_001_0015.wav,नमो भरन्त एमसि,3.462 |
| RigVeda_50_0265.wav,महः स राय एषतेऽति धन्वेव दुरिता,4.293 |
| Rigveda_38_0088.wav,द्विता यो भूदमृतो मर्त्येष्वा होता मन्द्रतमो विशि,6.428 |
| RigVeda_Part_020_0014.wav,सिन्धोरिव प्राध्वने शूघनासो वातप्रमियः पतयन्ति यह्वाः,7.916 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0038.wav,सहस्रबाहुः पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्,5.363 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0208.wav,व्यचस्वतीरुर्विया वि श्रयन्तां पतिभ्यो न जनयः शुम्भमानाः,6.295 |
| Rigvedha_013_0092.wav,सं सानु मार्ज्मि दिधिषामि बिल्मैर्दधाम्यन्नैः परि वन्द ऋग्भिः,6.983 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0016.wav,त्रीन् घर्मान् अभि वावशाना मिमाति मायुं पयते पयोभिः,6.274 |
| RigVeda_42_0167.wav,आ जिह्वाया अग्रे वरुणस्य मायया,4.484 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0467.wav,सोदक्रामत्सा देवान् आगच्छत्तां देवा उपाह्वयन्तोर्ज एहीति,7.596 |
| Atharvaveda_Part_020_20001.wav,अस्मा इदु प्र तवसे तुराय प्रयो न हर्मि स्तोमं माहिनाय,6.508 |
| Rigvedha_001_0265.wav,अस्माकमस्तु केवलः,3.379 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0162.wav,दोहा ये अस्य संयन्ति तान् विद्मानुपदस्वतः,4.501 |
| Rigveda_35_0184.wav,ऐतु पूषा रयिर्भगः स्वस्ति सर्वधातमः,4.625 |
| RigVeda_Part_020_0155.wav,ये पत्वभिः शफानां व्रजा भुरन्त गोनामिषं स्तोतृभ्य आ भर,7.266 |
| Rigvedha_014_0148.wav,परि विश्वानि सुधिताग्नेरश्याम मन्मभिः,4.73 |
| RigVeda_44_0191.wav,पुनानश्चमू जनयन्मतिं कविः सोमो देवेषु रण्यति,5.992 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0111.wav,यत्त ऊनं तत्त आ पूरयाति प्रजापतिः प्रथमजा ऋतस्य उपस्थास्ते अनमीवा अयक्ष्मा अस्मभ्यं सन्तु पृथिवि प्रसूताः दीर्घं न आयुः प्रतिबुध्यमाना वयं तुभ्यं बलिहृतः स्याम,18.75 |
| Atharvaveda_Part_020_20304.wav,वृषपत्नीरपो जया दिवेदिवे,3.802 |
| RigVeda_Part_018_0141.wav,का सुष्टुतिः शवसः सूनुमिन्द्रमर्वाचीनं राधस आ ववर्तत्,7.081 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0054.wav,प्राणायान्तरिक्षाय वयोभ्यो वायवेऽधिपतये स्वाहा दिवे चक्षुषे नक्षत्रेभ्यः सूर्यायाधिपतये स्वाहा शमीमश्वत्थ आरूढस्तत्र पुंसुवनं कृतम्,17.774 |
| RigVeda_44_0271.wav,इन्दुरिन्द्राय तोशते नि तोशते श्रीणन्नुग्रो रिणन्नपः,6.71 |
| Atharvaveda_Part_014_0325.wav,मा विदन् परिपन्थिनो य आसीदन्ति दंपती,4.603 |
| Rigveda_39_0264.wav,यदग्ने कानि कानि चिदा ते दारूणि दध्मसि,5.566 |
| Atharvaveda_Part_014_0204.wav,क्वैकं चक्रं वामासीत्क्व देष्ट्राय तस्थथुः,5.316 |
| RigVeda_42_0076.wav,दिवस्पृष्ठं बर्हणा निर्णिजे कृतोपस्तरणं चम्वोर्नभस्मयम्,7.666 |
| RigVeda_Part_017_0360.wav,हन्ता यो वृत्रं सनितोत वाजं दाता मघानि मघवा सुराधाः,7.761 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0189.wav,स मा रक्षतु स मा गोपायतु तस्मा आत्मानं परि ददे स्वाहा,7.477 |
| RigVeda_44_0036.wav,प्रति द्रापिममुञ्चथाः पवमान महित्,3.663 |
| Rigveda_32_0305.wav,आपिर्नो बोधि सधमाद्यो वृधेऽस्माँ अवन्तु ते धियः भूयाम ते सुमतौ वाजिनो वयं मा न स्तरभिमातये,17.808 |
| Rigveda_38_0405.wav,गोषाता यस्य ते गिरः,3.611 |
| RigVeda_Part_025_0014.wav,त्वं धुनिरिन्द्र धुनिमतीरृणोरपः सीरा न स्रवन्तीः,6.206 |
| RigVeda_Part_028_0067.wav,विप्रा यज्ञेषु मानुषेषु कारू मन्ये वां जातवेदसा यजध्यै,7.954 |
| Rigvedha_007_0053.wav,तद्वां नरा शंस्यं पज्रियेण कक्षीवता नासत्या परिज्मन्,7.451 |
| Rigvedha_003_0372.wav,देवी यदि तविषी त्वावृधोतय इन्द्रं सिषक्त्युषसं न सूर्यः,6.322 |
| Rigveda_29_0261.wav,आ धूर्ष्वस्मै दधाताश्वानिन्द्रो न वज्री हिरण्यबाहुः,6.257 |
| Rigveda_29_0350.wav,आ वातस्य ध्रजतो रन्त,2.897 |
| RigVeda_Part_024_0032.wav,स इदस्तेव प्रति धादसिष्यञ्छिशीत तेजोऽयसो न धाराम्,7.345 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0336.wav,ये अद्भिरीशाना मरुतश्चरन्ति ते नो मुञ्चन्त्वंहसः ये कीलालेन तर्पयन्ति ये घृतेन ये वा वयो मेदसा संसृजन्ति ये अद्भिरीशाना मरुतो वर्षयन्ति ते नो मुञ्चन्त्वंहसः यदीदिदं मरुतो मारुतेन यदि देवा दैव्येनेदृगार यूयमीशिध्वे वसवस्तस्य निष्कृतेस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः तिग्ममनीकं विदितं सहस्वन् मारुतं शर्धः पृतनासूग्रम्,36.193 |
| RigVeda_Part_015_0199.wav,यथापिबः पूर्व्याँ इन्द्र सोमाँ एवा पाहि पन्यो अद्या नवीयान्,9.77 |
| RigVeda_Part_026_0060.wav,अस्माकमिन्द्र भूतु ते स्तोमो वाहिष्ठो अन्तमः,6.287 |
| RigVeda_Part_016_0108.wav,मित्रः सम्राजो वरुणो युवान आदित्यासः कवयः पप्रथानाः,7.167 |
| Atharvaveda_Part_020_40091.wav,अया वाजं देवहितं सनेम मदेम शतहिमाः सुवीराः,6.295 |
| RigVeda_50_0368.wav,अर्वद्भिर्यो हरिभिर्वाजिनीवसुरति विश्वा दुरिता पारिषद्धरी,7.235 |
| RigVeda_47_0148.wav,यस्ते अद्य कृणवद्भद्रशोचेऽपूपं देव घृतवन्तमग्ने,6.967 |
| Rigveda_38_0224.wav,यत्राहमस्मि ताँ अव,3.552 |
| RigVeda_42_0174.wav,महि प्सरः सुकृतं सोम्यं मधूर्वी गव्यूतिरदितेरृतं यते,7.376 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0178.wav,ऐषु द्युम्नं स्वर्यमत् ऋतावानं वैश्वानरमृतस्य ज्योतिषस्पतिम्,7.813 |
| Rigvedha_007_0290.wav,प्र बोधयोषः पृणतो मघोन्यबुध्यमानाः पणयः ससन्तु,6.191 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0506.wav,पुमांसं पुत्रमा धेहि दशमे मासि सूतवे,5.085 |
| Rigveda_30_0003.wav,प्रातर्भगं पूषणं ब्रह्मणस्पतिं प्रातः सोममुत रुद्रं हुवेम,7.819 |
| Atharvaveda_Part_020_10372.wav,द्युम्नी सुशिप्रो हरिमन्युसायक इन्द्रे नि रूपा हरिता मिमिक्षिरे,6.485 |
| RigVeda_49_0008.wav,वि प्रथतां देवजुष्टं तिरश्चा दीर्घं द्राघ्मा सुरभि भूत्वस्मे,8.086 |
| Rigvedha_009_0148.wav,अपामर्थं यतीनां ब्रह्मा भवति सारथिः,5.137 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0006.wav,तेभ्यो हविः श्रपयं जातवेद उत्तमं नाकमधि रोहयेमम्,6.58 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0002.wav,यमं ह यज्ञो गच्छत्,1.925 |
| Atharvaveda_Part_018_1_0153.wav,गन्धर्वो अप्स्वप्या च योषा सा नौ नाभिः परमं जामि तन् नौ,6.924 |
| Rigvedha_005_0365.wav,तमूतयो रणयञ्छूरसातौ तं क्षेमस्य क्षितयः कृण्वत त्राम्,7.663 |
| Rig_veda_45_0050.wav,स पित्र्याण्यायुधानि विद्वानिन्द्रेषित आप्त्यो अभ्ययुध्यत्,6.667 |
| Rigveda_35_0183.wav,आ विष्णोः सचाभुवः,2.971 |
| Rigvedha_014_0126.wav,अग्निं वर्धन्तु नो गिरो यतो जायत उक्थ्यः,3.618 |
| RigVeda_Part_018_0383.wav,आ वः पीतयोऽभिपित्वे अह्नामिमा अस्तं नवस्व इव ग्मन्,7.608 |
| RigVeda_Part_027_0317.wav,द्यावापृथिवी वरुणस्य धर्मणा विष्कभिते अजरे भूरिरेतसा,7.66 |
| Rig_veda_45_0137.wav,विवक्ति वह्निः स्वपस्यते मख,2.979 |
| Rigvedha_003_0054.wav,यो नः पूषन्नघो वृको दुःशेव आदिदेशति,5.18 |
| Rigvedha_013_0305.wav,यतस्रुचः सुरुचं विश्वदेव्यं रुद्रं यज्ञानां साधदिष्टिमपसाम्,7.9360625 |
| Rigvedha_001_0363.wav,दक्षिणा पात्वंहसः,3.543 |
| Rigveda_38_0420.wav,गच्छतं दाशुषो गृहमित्था स्तुवतो अश्विना मध्वः सोमस्य पीतये,9.475 |
| RigVeda_43_0144.wav,सीदन्होतेव सदने चमूषूपेमग्मन्नृषयः सप्त विप्राः,8.034 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0325.wav,पुष्पवतीः प्रसूमतीः फलिनीरफला उत,4.652 |
| Atharvaveda_Part_020_10156.wav,उदप्रुतो न वयो रक्षमाणा वावदतो अभ्रियस्येव घोषाः,6.332 |
| Rigveda_40_0421.wav,मरुद्भ्यो वायवे मदः,3.139 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0178.wav,अव श्वेत पदा जहि पूर्वेण चापरेण च,4.646 |
| Rigveda_38_0447.wav,ता वावृधाना उप सुष्टुतिं दिवो गन्तं गौराविवेरिणम्,6.988 |
| Rigvedha_013_0168.wav,सोमापूषणा जनना रयीणां जनना दिवो जनना पृथिव्याः,6.8380625 |
| Atharvaveda_Part_020_20287.wav,एवा ह्यसि वीरयुरेवा शूर उत स्थिरः,4.589 |
| Rigvedha_005_0353.wav,स यो वृषा वृष्ण्येभिः समोका महो दिवः पृथिव्याश्च सम्राट्,7.514 |
| Atharvaveda_Part_014_0398.wav,संधाता संधिं मघवा पुरूवसुर्निष्कर्ता विह्रुतं पुनः,6.011 |
| Rigvedha_009_0289.wav,पञ्चपादं पितरं द्वादशाकृतिं दिव आहुः,4.567 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0144.wav,वानस्पत्या ग्रावाणो घोषमक्रत हविष्कृण्वन्तः परिवत्सरीणम्,6.099 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0095.wav,अभिपूर्वं निर्णयते नमो अस्त्वस्मै,4.276 |
| Atharvaveda_Part_020_10336.wav,समुषद्भिरजायथाः,2.848 |
| RigVeda_Part_016_0059.wav,तिष्ठा सु कं मघवन्मा परा गाः सोमस्य नु त्वा सुषुतस्य यक्षि,7.332 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0034.wav,एवा ते मूत्रं मुच्यतां बहिर्बालिति सर्वकम्,5.393 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0007.wav,प्रसूत इन्द्र प्रवता हरिभ्यां प्र ते वज्रः प्रमृणन्न् एतु शत्रून्,6.571 |
| Atharvaveda_Part_020_20108.wav,वसु स्पार्हं तदा भर यद्वीलाविन्द्र यत्स्थिरे यत्पर्शाने पराभृतम्,8.079 |
| Rigveda_39_0094.wav,उतो न्वस्य जोषमाँ इन्द्रः सुतस्य गोमतः प्रातर्होतेव मत्सति,9.197 |
| Rigvedha_003_0398.wav,तपुर्जम्भो वन आ वातचोदितो यूथे न साह्वाँ अव वाति वंसगः,7.681 |
| Atharvaveda_Part_020_40204.wav,पूर्वा नमस्य देवानां बिभ्रदिन्द्र महीयते,5.168 |
| RigVeda_44_0415.wav,एकः समुद्रो धरुणो रयीणामस्मद्धृदो भूरिजन्मा वि चष्टे,6.707 |
| Rigveda_37_0026.wav,य उक्थेभिर्न विन्धते चिकिद्य ऋषिचोदनः,5.022 |
| Rigvedha_011_0053.wav,ता नश्चोदयत श्रिये,2.533 |
| Rigveda_40_0440.wav,पतिं वाचो अदाभ्यम्,3.101 |
| Rigvedha_009_0162.wav,सुधृष्टमे वपुष्ये न रोदसी पिता यत्सीमभि रूपैरवासयत्,9.902 |
| Rig_veda_45_0262.wav,अव सृज पुनरग्ने पितृभ्यो यस्त आहुतश्चरति स्वधाभिः,5.796 |
| Rigvedha_004_0216.wav,पुरुप्रशस्तो अमतिर्न सत्य आत्मेव शेवो दिधिषाय्यो भूत्,7.553 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0100.wav,देवा गर्भं समैरयन् तं व्यूर्णुवन्तु सूतवे,5.439 |
| Rigveda_41_0166.wav,तुभ्यमर्षन्ति सिन्धवः प्र ते दिवो न वृष्टयो धारा यन्त्यसश्चतः,8.849 |
| Rigvedha_006_0335.wav,अनन्तमन्यद्रुशदस्य पाजः कृष्णमन्यद्धरितः सं भरन्ति,6.251 |
| Rigveda_40_0226.wav,कारं बिभ्रत्,1.439 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0175.wav,एतत्स ऋच्छात्,2.235 |
| Rigveda_34_0239.wav,मयो नो भूतोतिभिर्मयोभुवः शिवाभिरसचद्विषः,6.134 |
| Rigvedha_014_0177.wav,यतो नः प्रुष्णवद्वसु दिवि क्षितिभ्यो अप्स्वा,5.1330625 |
| Rigveda_37_0322.wav,जुषाण इन्द्र तत्पिब,3.111 |
| RigVeda_Part_020_0119.wav,अश्विनं स पुत्रिणं वीरवन्तं गोमन्तं रयिं नशते स्वस्ति,7.626 |
| Rigveda_39_0306.wav,आत्मा यज्ञस्य पूर्व्यः,3.851 |
| RigVeda_Part_024_0103.wav,वि चर्मणीव धिषणे अवर्तयद्वैश्वानरो विश्वमधत्त वृष्ण्यम्,7.157 |
| Rigvedha_012_0185.wav,विश्वं तद्भद्रं यदवन्ति देवा बृहद्वदेम विदथे सुवीराः,7.6260625 |
| Rigveda_37_0027.wav,इन्द्रं तम,1.271 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0158.wav,यथाहश्च रात्री च न बिभीतो न रिष्यतः,5.133 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0384.wav,यस्मिन्त्स्तब्ध्वा प्रजापतिर्लोकान्त्सर्वामधारयत्,6.251 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0189.wav,सर्वान् अग्ने सहमानः सपत्नान् ऐषामूर्जं रयिमस्मासु धेहि,6.942 |
| Rigveda_40_0291.wav,इन्द्रं सोमासो अक्षरन्,3.771 |
| RigVeda_52_0218.wav,त्वामिदस्या उषसो व्युष्टिषु दूतं कृण्वाना अयजन्त मानुषाः,7.863 |
| RigVeda_Part_023_0280.wav,कनिक्रदद्वृषभो जीरदानू रेतो दधात्योषधीषु गर्भम्,7.429 |
| RigVeda_Part_023_0205.wav,अश्विना वाजिनीवसू जुषेथां यज्ञमिष्टये,5.597 |
| Rigveda_33_0528.wav,इन्द्रे हविष्मतीर्विशो अराणिषुः,5.022 |
| RigVeda_52_0246.wav,अग्निः सोमो वरुणस्ते च्यवन्ते पर्यावर्द्राष्ट्रं तदवाम्यायन्,8.002 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0642.wav,वैश्वानराय प्रति वेदयामि यदि ऋणं संगरो देवतासु,5.786 |
| Atharvaveda_Part_020_40080.wav,अनन्तमन्यद्रुशदस्य प्राजः कृष्णमन्यद्धरितः सं भरन्ति,5.794 |
| Rigvedha_003_0332.wav,अर्चा दिवे बृहते शूष्यं वचः स्वक्षत्रं यस्य धृषतो धृषन्मनः,8.131 |
| Rigvedha_003_0288.wav,ह्रदं न हि त्वा न्यृषन्त्यूर्मयो ब्रह्माणीन्द्र तव यानि वर्धना,6.935 |
| Rigvedha_014_0359.wav,तं हविष्मन्त ईळते,2.741 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0097.wav,अन्यमस्मदिच्छतु कं चिदव्रतस्तपुर्वधाय नमो अस्तु तक्मने,6.539 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0157.wav,सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद,5.891 |
| RigVeda_46_0313.wav,प्राचीनरश्मिमाहुतं घृतेन तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे,7.218 |
| Atharvaveda_Part_020_20214.wav,अयं यः पुरो विभिनत्त्योजसा मन्दानः शिप्र्यन्धसः,5.367 |
| Rig_veda_45_0225.wav,त आ गतावसा शंतमेनाथा नः शं योररपो दधात,6.242 |
| Rigveda_33_0407.wav,अदेवीरग्ने अरातीः,3.801 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0392.wav,ओजो दासस्य दम्भय,3.247 |
| Rigvedha_014_0292.wav,इळामग्ने पुरुदंसं सनिं गोः शश्वत्तमं हवमानाय साध,6.7950625 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0049.wav,मध्यं तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत,5.989 |
| Rigveda_33_0021.wav,युवाभ्यां वाजिनीवसू प्रति स्तोमा अदृक्षत,5.875 |
| Rigveda_32_0229.wav,त्वं पुरं चरिष्ण्वं वधैः शुष्णस्य सं पिणक्,5.325 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0028.wav,अरुस्राणमिदं महत्पृथिव्या अध्युद्भृतम्,4.492 |
| Rigveda_39_0240.wav,चिकिद्विभानवा वह,3.03 |
| Rigvedha_009_0332.wav,सा चित्तिभिर्नि हि चकार मर्त्यं विद्युद्भवन्ती प्रति वव्रिमौहत,6.956 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0336.wav,आतन्वाना आयच्छन्तोऽस्यन्तो ये च धावथ,4.995 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0576.wav,आस्नस्ते गाथा अभवन्न् उष्णिहाभ्यो बलं वशे,5.554 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0008.wav,एकया च दशभिश्च सुहुते द्वाभ्यामिष्टये विंशत्या च,6.261 |
| RigVeda_Part_023_0345.wav,अपारो वो महिमा वृद्धशवसस्त्वेषं शवोऽवत्वेवयामरुत्,6.842 |
| RigVeda_47_0360.wav,शाक्मना शाको अरुणः सुपर्ण आ यो महः शूरः सनादनीळः,7.247 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0564.wav,कल्याणि द्विपाच्च सर्वं नो रक्ष चतुष्पाद् यच्च नः स्वम्,5.799 |
| RigVeda_Part_017_0294.wav,मर्मृज्यन्ते दिवेदिवे,3.567 |
| Rigvedha_011_0118.wav,नवानां नवतीनां विषस्य रोपुषीणाम्,5.47 |
| RigVeda_Part_018_0297.wav,अस्माकं धृष्णुया रथो द्युमाँ इन्द्रानपच्युतः,6.462 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0177.wav,यत्र ब्रह्मविदो यान्ति दीक्षया तपसा सह,4.594 |
| Rigveda_40_0242.wav,अभि क्षिपः समग्मत मर्जयन्तीरिषस्पतिम्,5.343 |
| RigVeda_44_0090.wav,प्र पुनानाय वेधसे सोमाय वच उद्यतम्,5.256 |
| Rigvedha_013_0144.wav,विश्वो मार्ताण्डो व्रजमा पशुर्गात्स्थशो जन्मानि सविता व्याकः,7.957 |
| Rigvedha_004_0139.wav,वि यो वीरुत्सु रोधन्महित्वोत प्रजा उत प्रसूष्वन्तः,6.342 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0049.wav,जायाः पुत्राः सुमनसो भवन्तु बहुं बलिं प्रति पश्यासा उग्रः,6.16 |
| Rigvedha_013_0314.wav,विशां कविं विश्पतिं मानुषीरिषः सं सीमकृण्वन्स्वधितिं न तेजसे,7.793 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0589.wav,व्याघ्रेऽह्न्यजनिष्ट वीरो नक्षत्रजा जायमानः सुवीरः,6.025 |
| Rigvedha_010_0237.wav,मा नः कामं महयन्तमा धग्विश्वा ते अश्यां पर्याप आयोः,7.956 |
| RigVeda_Part_024_0352.wav,तमु ष्टुहि यो अभिभूत्योजा वन्वन्नवातः पुरुहूत इन्द्रः,6.417 |
| Rigvedha_001_0134.wav,तुञ्जेतुञ्जे य उत्तरे स्तोमा इन्द्रस्य वज्रिणः,7.094 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0504.wav,ता मे चन्द्रेण वत्सेनेषमूर्जं कामं दुहा,5.504 |
| RigVeda_Part_020_0320.wav,निष्कग्रीवो बृहदुक्थ एना मध्वा न वाजयुः,5.682 |
| Rigvedha_007_0104.wav,ष्ठाहुर्विप्रासो अश्विना पुराजाः,4.109 |
| Rigveda_40_0627.wav,शृण्वे वृष्टेरिव स्वनः पवमानस्य शुष्मिणः,5.329 |
| RigVeda_Part_024_0372.wav,आ सहस्रं पथिभिरिन्द्र राया तुविद्युम्न तुविवाजेभिरर्वाक्,6.999 |
| Rigvedha_014_0120.wav,स घा यस्ते ददाशति समिधा जातवेदसे,5.064 |
| RigVeda_Part_022_0254.wav,स्वयं दधिध्वे तविषीं यथा विद बृहन्महान्त उर्विया वि राजथ,7.398 |
| RigVeda_Part_025_0050.wav,तं पृच्छन्ती वज्रहस्तं रथेष्ठामिन्द्रं वेपी वक्वरी यस्य नू गीः,7.964 |
| Rigveda_40_0208.wav,पवमानमवस्यवो वि,2.668 |
| RigVeda_43_0336.wav,स्वर्चक्षा रथिरः स,2.095 |
| RigVeda_Part_020_0019.wav,यत्र सोमः सूयते यत्र यज्ञो घृतस्य धारा अभि तत्पवन्ते,7.352 |
| Atharvaveda_Part_014_0401.wav,यावतीः कृत्या उपवासने यावन्तो राज्ञो वरुणस्य पाशाः,7.054 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0215.wav,यद्यर्चिर्यदि वासि शोचिः शकल्येषि यदि वा ते जनित्रम्,5.996 |
| Rigvedha_001_0039.wav,पुरुभुजा चनस्यतम्,3.08 |
| Atharvaveda_Part_020_20345.wav,येना दशग्वमध्रिगुं वेपयन्तं स्वर्णरम्,4.698 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0202.wav,स इद्व्याघ्रो भवत्यथो सिंहो अथो वृषा,5.164 |
| Rigveda_41_0048.wav,पवमानस्य मरुतः,2.669 |
| Rigveda_32_0162.wav,सुविज्ञानं चिकितुषे जनाय सच्चासच्च वचसी पस्पृधाते,6.912 |
| Rigveda_37_0386.wav,स्तेनं बद्धमिवादिते,3.012 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0033.wav,व्याघ्रं दत्वतां वयं प्रथमं जम्भयामसि,4.512 |
| Rigvedha_013_0273.wav,अपां गर्भं दर्शतमोषधीनां वना जजान सुभगा विरूपम्,7.3280625 |
| Atharvaveda_Part_020_30323.wav,भ्यां प्लाशेर्नाभ्या वि वृहामि ते,4.066 |
| RigVeda_50_0225.wav,शोचञ्छुष्कासु हरिणीषु जर्भुरद्वृषा केतुर्यजतो द्यामशायत,7.571 |
| Atharvaveda_Part_020_40014.wav,अर्कमर्चन्तु कारवः,2.768 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0081.wav,यावतीर्भृङ्गा जत्वः कुरूरवो यावतीर्वघा वृक्षसर्प्यो बभूवुः,7.597 |
| Rigvedha_009_0190.wav,अगोह्यस्य यदसस्तना गृहे तदद्येदमृभवो नानु गच्छथ,6.626 |
| RigVeda_51_0256.wav,दक्षिणान्नं वनुते यो न आत्,3.741 |
| Atharvaveda_Part_014_0232.wav,सूर्यायाः पश्य रूपाणि तानि ब्रह्मोत शुम्भति,5.517 |
| RigVeda_Part_017_0353.wav,य एक इच्च्यावयति प्र भूमा राजा कृष्टीनां पुरुहूत इन्द्रः,7.459 |
| Rigveda_40_0283.wav,वृथा पवित्रे अर्षति,3.083 |
| RigVeda_52_0376.wav,स नः प्रजायै हर्यश्व मृळयेन्द्र मा नो रीरिषो मा परा दाः,8.016 |
| Rigveda_40_0037.wav,अथा नो वस्यसस्कृधि,2.83 |
| RigVeda_Part_022_0259.wav,उतो अस्माँ अमृतत्वे दधातन शुभं यातामनु रथा अवृत्सत,7.654 |
| RigVeda_Part_022_0068.wav,देवानां पत्नीरुशतीरवन्तु नः प्रावन्तु नस्तुजये वाजसातये,8.188 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0157.wav,अत्रा जहीत ये असन् दुरेवा अनमीवान् उत्तरेमाभि वाजान्,6.67 |
| RigVeda_43_0062.wav,सहस्रसाः शतसा भूरिदावा शश्व,4.366 |
| Atharvaveda_Part_020_20075.wav,सुतावन्तो हवामहे,2.866 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0326.wav,जीमूता आसन्त्सत्वानस्तैरिदं स्वराभृतम्,6.534 |
| Rigveda_40_0167.wav,उपास्मै गायता नरः पवमानायेन्दवे,5.774 |
| RigVeda_44_0276.wav,अजीजनो हि पवमान सूर्यं विधारे शक्मना पयः,6.403 |
| Rigvedha_014_0250.wav,भूरीणि हि त्वे दधिरे अनीकाग्ने देवस्य यज्यवो जनासः,7.042 |
| RigVeda_Part_024_0051.wav,चित्रो नयत्परि तमांस्यक्तः शोचिषा पत्मन्नौशिजो न दीयन्,7.193 |
| Atharvaveda_Part_014_0421.wav,यदीमे केशिनो जना गृहे ते समनर्तिषू रोदेन कृण्वन्तोऽघम्,6.552 |
| Rigveda_38_0450.wav,र्तनी शुभस्पती पातं सोममृतावृधा,4.651 |
| Rigvedha_002_0199.wav,ऋणोरक्षं न शचीभिः,2.879 |
| Rigvedha_010_0066.wav,येन दीर्घं मरुतः शूशवाम युष्माकेन परीणसा तुरासः,7.61 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0443.wav,विशस्त्वा सर्वा वाञ्छन्तु मा त्वद्राष्ट्रमधि भ्रशत्,5.197 |
| Rigveda_40_0639.wav,सोमाः सहस्रपाजसः,3.084 |
| RigVeda_52_0198.wav,आपो ह यद्बृहतीर्विश्वमायन्गर्भं दधाना जनयन्तीरग्निम्,8.117 |
| Rigvedha_011_0178.wav,होत्राभिरग्निर्मनुषः स्वध्वरो राजा विशामतिथिश्चारुरायवे,7.6 |
| Rigvedha_007_0086.wav,यवं वृकेणाश्विना वपन्तेषं दुहन्ता मनुषाय दस्रा,6.521 |
| Atharvaveda_Part_020_30178.wav,इन्द्रो वलं रक्षितारं दुघानां करेणेव वि चकर्ता रवेण,7.136 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0181.wav,इहैव ध्रुवां नि मिनोमि शालां क्षेमे तिष्ठाति घृतमुक्षमाणा तां त्वा शाले सर्ववीराः सुवीरा अरिष्टवीरा उप सं चरेम इहैव ध्रुवा प्रति तिष्ठ शालेऽश्वावती गोमती सूनृतावती,21.526 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0078.wav,वर्षाणि तुभ्यं स्योनानि येषु वर्धन्त ओषधीः,5.505 |
| RigVeda_43_0367.wav,परि ष्य सुवानो अक्षा इन्दुरव्ये मदच्युतः,4.678 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0450.wav,तिर्यग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नस्तस्मिन् यशो निहितं विश्वरूपम्,6.179 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0669.wav,अन्वागन्ता यजमानः स्व,2.334 |
| RigVeda_50_0256.wav,यज्ञेयज्ञे स मर्त्यो देवान्सपर्यति,4.603 |
| Atharvaveda_Part_020_30353.wav,इन्द्रवाहा वचोयुजा,3.221 |
| Rigveda_35_0091.wav,त्वां हि सुप्सरस्तमं नृषदनेषु हूमहे,5.123 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0069.wav,आ मारुक्षत्पर्णमणिर्मह्या अरिष्टतातये,5.262 |
| RigVeda_Part_020_0069.wav,मदे चिदस्य प्र रुजन्ति भामा न वरन्ते परिबाधो अदेवीः,7.726 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0059.wav,मध्वा पृञ्चे नद्यः पर्वता गिरयो मधु,6.062 |
| RigVeda_Part_015_0046.wav,शासद्वह्निर्दुहितुर्नप्त्यं गाद्विद्वाँ ऋतस्य दीधितिं सपर्यन्,8.133 |
| Rigvedha_013_0088.wav,हिरण्ययात्परि योनेर्निषद्या हिरण्यदा ददत्यन्नमस्मै,7.0960625 |
| Rigvedha_001_0248.wav,मधुमन्तं तनूनपाद्यज्ञं देवेषु नः कवे,6.033 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0781.wav,उपहूतौ सयुजौ स्योनौ दन्तौ सुमङ्गलौ,4.378 |
| RigVeda_53_0191.wav,आयने ते परायणे दूर्वा रोहन्तु पुष्पिणीः,7.129 |
| Rigvedha_004_0336.wav,न वेपसा न तन्यतेन्द्रं वृत्रो वि बीभयत्,5.904 |
| Rigvedha_004_0070.wav,यद्ध शूर वृषमणः पराचैर्वि दस्यूँर्योनावकृतो वृथाषाट्,7.304 |
| RigVeda_Part_019_0150.wav,इहेह यद्वां समना पपृक्षे सेयमस्मे सुमतिर्वाजरत्ना,7.409 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0233.wav,प्राशं प्रतिप्राशो जह्यरसान् कृण्वोषधे,4.857 |
| Rigvedha_011_0050.wav,प्रथमा हि सुवाचसा होतारा दैव्या कवी,5.244 |
| Rigveda_40_0477.wav,विश्वा वसूनि संजयन्पवस्व सोम धारया,5.177 |
| RigVeda_43_0332.wav,स्वदस्वेन्द्राय पवमान इन्दो रयिं च न आ पवस्वा समुद्रात्,7.645 |
| Atharvaveda_Part_014_0270.wav,येनाग्निरस्या भूम्या हस्तं जग्राह दक्षिणम्,5.356 |
| RigVeda_Part_016_0001.wav,सद्यो ह जातो वृषभः कनीनः प्रभर्तुमावदन्धसः सुतस्य,10.999 |
| Rigveda_34_0365.wav,अग्ने त्वं यशा अस्या मित्रावरुणा वह,5.18 |
| RigVeda_Part_017_0149.wav,अमूरो होता न्यसादि विक्ष्वग्निर्मन्द्रो विदथेषु प्रचेताः,9.038 |
| Rigvedha_014_0025.wav,स्यान्नः सूनुस्तनयो विजावाग्ने सा ते सुमतिर्भूत्वस्मे,7.4570625 |
| Rigveda_38_0140.wav,अवन्तमत्रये गृहं कृणुतं युवमश्विना,5.304 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0436.wav,श्वानः सिंहमिव दृष्ट्वा ते न विन्दन्ते न्यञ्चनम्,4.67 |
| Rigveda_41_0184.wav,एते धामान्यार्या शुक्रा ऋतस्य धारया,6.012 |
| Rigveda_32_0357.wav,सहस्रेणेव सचते यवीयुधा यस्त आनळुपस्तुतिम्,5.745 |
| Atharvaveda_Part_020_40158.wav,प्र रेभ धीं भरस्व गोविदं वसुविदम्,4.792 |
| RigVeda_48_0157.wav,सहस्रं मे ददतो अष्टकर्ण्यः श्रवो देवेष्वक्रत,7.256 |
| Atharvaveda_Part_014_0198.wav,शुची ते चक्रे यात्या व्यानो अक्ष आहतः,4.962 |
| RigVeda_Part_026_0178.wav,अग्ने हेळांसि दैव्या युयोधि नोऽदेवानि ह्वरांसि च,7.917 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0006.wav,औदुम्बरस्य तेजसा धाता पुष्टिं दधातु मे,5.561 |
| Rigveda_38_0316.wav,त्वं न इन्द्र मृळय,2.573 |
| Rigvedha_003_0055.wav,अप स्म तं पथो जहि,2.443 |
| Rigveda_41_0108.wav,य इन्द्रस्य हृदंसनिः,2.539 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0444.wav,तत्रेदं सर्वमार्पितमेजत्प्राणत्प्रतिष्ठितम्,5.203 |
| RigVeda_Part_027_0347.wav,जगृभथुरनपिनद्धमासु रुशच्चित्रासु जगतीष्वन्तः,6.128 |
| RigVeda_Part_027_0236.wav,ये अग्नयो न शोशुचन्निधाना द्विर्यत्त्रिर्मरुतो वावृधन्त,7.157 |
| Rigvedha_006_0030.wav,वयं जयेम त्वया युजा वृतमस्माकमंशमुदवा भरेभरे,6.737 |
| Atharvaveda_Part_020_40338.wav,इत्थं फलस्य वृक्षस्य शूर्पे शूर्पं भजेमहि,5.322 |
| RigVeda_49_0200.wav,मनीषिणो मनसा पृच्छतेदु तद्यदध्यतिष्ठद्भुवनानि धारयन्,7.032 |
| Rigveda_38_0003.wav,नदं व ओदतीनां नदं योयुवतीनाम्,5.007 |
| Atharvaveda_Part_020_20269.wav,कण्वेभिर्धृष्णवा धृषद्वाजं दर्षि सहस्रिणम्,5.104 |
| Rigveda_35_0069.wav,अहरहर्वृषण मह्यं शिक्षतम्,4.237 |
| Rigvedha_014_0233.wav,तस्यानु धर्म प्र यजा चिकित्वोऽथ नो धा अध्वरं देववीतौ,6.9270625 |
| Atharvaveda_Part_017_0089.wav,ईड्यं नाम ह्व इन्द्रं प्रियो देवानां भूयासम्,6.065 |
| RigVeda_Part_024_0407.wav,घ्नन्तो वृत्राण्युभयानि शूर राया मदेम बृहता त्वोताः,7.426 |
| Rigveda_36_0171.wav,दूरादिह हवामहे,3.268 |
| Rigvedha_001_0286.wav,आकीं सूर्यस्य रोचनाद्विश्वान्देवाँ उषर्बुधः,8.135 |
| Rigvedha_002_0370.wav,तं घेमित्था नमस्विन उप स्वराजमासते,5.084 |
| Rig_veda_45_0134.wav,विप्रस्य वा यच्छशमान,2.44 |
| Rigveda_38_0329.wav,मा सीमवद्य आ भागुर्वी काष्ठा हितं धनम्,6.735 |
| Atharvaveda_Part_020_40403.wav,आ वां स्तोमा इमे मम नभो न चुच्यवीरत,4.934 |
| Rigveda_30_0038.wav,ते सीषपन्त जोषमा यजत्रा ऋतस्य धाराः सुदुघा दुहानाः,7.438 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0026.wav,पूषेमा आशा अनु वेद सर्वाः सो अस्माँ अभयतमेन नेषत्,6.521 |
| RigVeda_Part_021_0183.wav,स्वक्षत्रं ते धृषन्मनः सत्राहमिन्द्र पौंस्यम्,5.581 |
| Rigvedha_010_0222.wav,आवो यस्य द्विबर्हसोऽर्केषु सानुषगसत्,4.718 |
| Rigvedha_013_0037.wav,द्यावो न स्तृभिश्चितयन्त खादिनो व्यभ्रिया न द्युतयन्त वृष्टयः,7.8120625 |
| Rigvedha_010_0176.wav,यज्ञो हि ष्मेन्द्रं कश्चिदृ,2.197 |
| Atharvaveda_Part_014_0189.wav,सूर्याया भद्रमिद्वासो गाथयैति परिष्कृता,5.436 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0302.wav,इदं तदन्यत्र त्वदप दूरे नि दध्मसि,3.817 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0265.wav,पृथग्घोषा उलुलयः केतुमन्त उदीरताम्,4.807 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0362.wav,उद्यन्न् आदित्य रश्मिभिः शीर्ष्णो रोगमनीनशोऽङ्गभेदमशीशमः,7.209 |
| Rigvedha_002_0123.wav,सद्यो दाशुषे क्षरसि,2.726 |
| Rigvedha_001_0138.wav,य एकश्चर्षणीनां वसूनामिरज्यति,5.306 |
| RigVeda_Part_025_0251.wav,स रायस्खामुप सृजा गृणानः पुरुश्चन्द्रस्य त्वमिन्द्र वस्वः,6.366 |
| Rigveda_29_0394.wav,ष्टिमेत्यस्ववेशं यं कृणवन्त मर्ताः,4.647 |
| Atharvaveda_Part_020_40243.wav,अथो श्वा अस्थिरो भवन्,3.116 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0378.wav,कस्मादङ्गाद्दीप्यते अग्निरस्य कस्मादङ्गात्पवते मातरिश्व,7.397 |
| Rigvedha_010_0034.wav,मन्मानि चित्रा अपिवातयन्त एषां भूत नवेदा म ऋतानाम्,7.909 |
| RigVeda_Part_019_0073.wav,सहस्रसाः शतसा वाज्यर्वा पृणक्तु मध्वा समिमा वचांसि,7.223 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0305.wav,नास्य क्षत्ता निष्कग्रीवः सूनानामेत्यग्रतः,5.602 |
| Rigvedha_001_0016.wav,राजन्तमध्वराणां गोपामृतस्य दीदिविम्,6.407 |
| RigVeda_46_0322.wav,महदद्य महतामा वृणीमहेऽवो देवानां बृहतामनर्वणाम्,7.811 |
| Atharvaveda_Part_017_0133.wav,त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्,7.4 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0331.wav,एतत्ते देवः सविता वासो ददाति भर्तवे,5.256 |
| Atharvaveda_Part_014_0186.wav,चित्तिरा उपबर्हणं चक्षुरा अभ्यञ्जनम्,4.128 |
| Rig_veda_45_0401.wav,त्वे धर्माण आसते जुहूभिः सिञ्चतीरिव,4.594 |
| Atharvaveda_Part_020_10181.wav,परि ष्वजन्ते जनयो यथा पतिं मर्यं न शुन्ध्युं मघवानमूतये,6.549 |
| Rigveda_40_0493.wav,अप्सु त्वा मधुमत्तमं हरिं हिन्वन्त्यद्रिभिः,5.144 |
| Atharvaveda_Part_020_10315.wav,तमित्पृणक्षि वसुना भवीयसा सिन्धुमापो यथाभितो विचेतसः,6.351 |
| Rigveda_35_0109.wav,आ प्र यात मरुतो विष्णो अश्विना पूषन्माकीनया धिया,7.695 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0319.wav,येऽस्यां स्थ प्राच्यां दिशि हेतयो नाम देवास्तेषां वो अग्निरिषवः,9.611 |
| Rigvedha_008_0299.wav,यज्ञं विप्रस्य मावतः शशमानस्य दाशुषः,5.068 |
| RigVeda_53_0119.wav,त्वं हि विश्वभेषजो देवानां दूत ईयसे,6.48 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0324.wav,योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः दक्षिणा दिगिन्द्रोऽधिपतिस्तिरश्चिराजी रक्षिता पितर इषवः,11.857 |
| RigVeda_52_0209.wav,घृतनिर्णिग्ब्रह्मणे गातुमेरय तव देवा अजनयन्ननु व्रतम्,7.084 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0323.wav,भूयान् इन्द्रो नमुराद्भूयान् इन्द्रासि मृत्युभ्यः भूयान् अरात्याः शच्याः पतिस्त्वमिन्द्रासि विभूः प्रभूरिति त्वोपास्महे वयम्,13.832 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0217.wav,अपस्त ओषधीमतीर्ऋच्छन्तु,3.487 |
| Rigvedha_012_0329.wav,प्र यद्वयो न पप्तन्वस्मनस्परि श्रवस्यवो हृषीवन्तो वनर्षदः,6.844 |
| RigVeda_Part_020_0068.wav,उत स्वानासो दिवि षन्त्वग्नेस्तिग्मायुधा रक्षसे हन्तवा उ,7.994 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0337.wav,वृषभं वाजिनं वयं पौर्णमासं यजामहे,4.724 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0280.wav,स्वाहाकृतः शुचिर्देवेषु यज्ञो यो अश्विनोश्चमसो देवपानः,7.057 |
| Atharvaveda_Part_016_0242.wav,निर्द्विषन्तं दिवो निः पृथिव्या निरन्तरिक्षाद्भजाम,5.29 |
| Rigveda_38_0068.wav,अजां सूरिर्न धातवे,3.362 |
| RigVeda_43_0258.wav,इन्दुरिन्द्रस्य सख्यं जुषाणो देवो देवस्य मत्सरो मदाय,6.598 |
| Rigveda_34_0040.wav,सत्रा त्वं पुरुष्टुतँ एको वृत्राणि तोशसे,6.216 |
| Rigvedha_002_0341.wav,आ देवो याति सविता परावतोऽप विश्वा दुरिता बाधमानः,6.676 |
| Rigveda_33_0233.wav,उत्सं दुहन्तो अक्षितम्,3.156 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0442.wav,घृतेन कलिं शिक्षामि स नो मृडातीदृशे,4.752 |
| Rigvedha_002_0095.wav,अग्ने दिवित्मता वचः,3.479 |
| Rigveda_33_0108.wav,वि चिद्वृत्रस्य दोधतो,2.69 |
| Rigvedha_006_0106.wav,सत्तो होता मनुष्वदा देवाँ अच्छा विदुष्टरः,6.175 |
| Atharvaveda_Part_014_0352.wav,इह प्रजां जनय पत्ये अस्मै सुज्यैष्ठ्यो भवत्पुत्रस्त एषः,6.227 |
| Atharvaveda_Part_020_20245.wav,इन्द्र सोमं शतक्रतो,2.946 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0081.wav,ताभ्यां नमो यतमस्यां दिशीतः,5.437 |
| Rigvedha_007_0137.wav,युवं वन्दनं निरृतं जरण्यया रथं न दस्रा करणा समिन्वथः,6.422 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0211.wav,सोमं ते रुद्रवन्तमृच्छन्तु,3.287 |
| RigVeda_49_0241.wav,हत्वाय शत्रून्वि भजस्व वेद ओजो मिमानो वि मृधो नुदस्व,6.849 |
| Rigveda_39_0215.wav,ते हिन्विरे अरुणं जेन्यं वस्वेकं पुत्रं तिसॄणाम्,7.192 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0218.wav,ये तातृषुर्देवत्रा जेहमाना होत्राविदः,4.645 |
| RigVeda_Part_021_0071.wav,स्त्रियो हि दास आयुधानि चक्रे किं मा करन्नबला अस्य सेनाः,6.96 |
| Rigvedha_002_0023.wav,स नो मह्या अदितये पुनर्दात्पितरं च दृशेयं मातरं च,8.115 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0122.wav,ब्रह्मवादिनो वदन्ति पराञ्चमोदनं प्राशीः प्रत्यञ्चा इति,9.244 |
| RigVeda_47_0181.wav,स्वायुधं स्ववसं सुनीथं चतुःसमुद्रं धरुणं रयीणाम्,6.248 |
| Rigveda_33_0185.wav,शतं वहन्तु हरयः,2.436 |
| RigVeda_51_0213.wav,आवो यद्दस्युहत्ये कुत्सपुत्रं प्रावो यद्दस्युहत्ये कुत्सवत्सम्,12.985 |
| RigVeda_Part_023_0164.wav,स्तोता वामश्विनावृषि स्तोमेन प्रति भूषति माध्वी मम श्रुतं हवम्,7.975 |
| Rigvedha_003_0301.wav,विश्वमाप्रा अन्तरिक्षं महित्वा सत्यमद्धा नकिरन्यस्त्वावान्,6.886 |
| Rigveda_37_0222.wav,मघवञ्छग्धि तव तन्न ऊतिभिर्वि द्विषो वि मृधो जहि,6.01 |
| Rigveda_30_0055.wav,उदस्य बाहू शिथिरा बृहन्ता हिरण्यया दिवो अन्ताँ अनष्टाम्,7.226 |
| Rigvedha_007_0144.wav,युवं पेदवे पुरुवारमश्विना स्पृधां श्वेतं तरुतारं दुवस्यथः,7.71 |
| RigVeda_Part_022_0062.wav,उत नो विष्णुरुत वातो अस्रिधो द्रविणोदा उत सोमो मयस्करत्,7.193 |
| Rigvedha_012_0151.wav,देवाश्चित्ते असुर्य प्रचेतसो बृहस्पते यज्ञियं भागमानशुः,7.3980625 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0058.wav,यास्ते प्राचीः प्रदिशो या उदीचीर्यास्ते भूमे अधराद्याश्च पश्चात्,9.228 |
| Rigveda_33_0077.wav,उपेमां सुष्टुतिं मम,2.695 |
| Rigvedha_006_0007.wav,यस्येन्द्रस्य सिन्धवः सश्चति व्रतं मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे,7.563 |
| Rigvedha_008_0153.wav,वायवा चन्द्रेण राधसा गतमिन्द्रश्च राधसा गतम्,5.339 |
| RigVeda_Part_019_0032.wav,श्रेष्ठं वः पेशो अधि धायि दर्शतं स्तोमो वाजा ऋभवस्तं जुजुष्टन,8.843 |
| Rigveda_33_0052.wav,यो ह वां मधुनो दृतिराहितो रथचर्षणे,5.052 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0674.wav,नाके राजन् प्रति तिष्ठ तत्रैतत्प्रति तिष्ठतु,4.431 |
| Rig_veda_45_0433.wav,त्वं न इन्द्र शूर शूरैरुत,3.096 |
| Rigveda_31_0129.wav,गूळ्हं ज्योतिः पितरो अन्वविन्दन्सत्यमन्त्रा,7.443 |
| RigVeda_51_0272.wav,कीदृङ्ङिन्द्रः सरमे का दृशीका यस्येदं दूतीरसरः पराकात्,7.544 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0304.wav,आ वीरोऽत्र जायतां पुत्रस्ते दशमास्यः पुमांसं पुत्रं जनय तं पुमान् अनु जायताम् भवासि पुत्राणां माता जातानां जनयाश्च यान्,15.646 |
| Rigvedha_007_0161.wav,कुत्रा नो गृहेभ्यो धेनवो गुः,4.105 |
| RigVeda_52_0171.wav,अव्यनच्च व्यनच्च सस्नि सं ते नवन्त प्रभृता मदेषु,6.539 |
| RigVeda_44_0054.wav,समु प्रिया अनूषत गावो मदाय घृष्वयः,4.82 |
| Rigveda_32_0048.wav,अविष्टं धियो जिगृतं पुरंधीर्जजस्तमर्यो वनुषामरातीः,7.72 |
| Rigveda_38_0080.wav,उरुष्या णो मा परा दा अघायते जातवेदः,5.654 |
| Rigvedha_005_0096.wav,श्रियसे कं भानुभिः सं मिमिक्षिरे ते रश्मिभिस्त ऋक्वभिः सुखादयः,6.934 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0264.wav,सं तत्सृजेथां सह वां,2.842 |
| Rigveda_35_0417.wav,तोशासा रथयावाना वृत्रहणापराजिता,6.294 |
| Rig_veda_54_0311.wav,यो रक्षांसि निजूर्वति वृषा शुक्रेण शोचिषा,5.898 |
| Rigvedha_006_0165.wav,तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः,7.355 |
| Rigvedha_012_0042.wav,शिक्षा स्तोतृभ्यो माति धग्भगो नो बृहद्वदेम विदथे सुवीराः,7.737 |
| Rigvedha_013_0026.wav,कुमारश्चित्पितरं वन्दमानं प्रति नानाम रुद्रोपयन्तम्,5.2950625 |
| RigVeda_46_0100.wav,अयं यो वज्रः पुरुधा विवृत्तोऽवः सूर्यस्य बृहतः पुरीषात्,6.724 |
| Rigveda_35_0142.wav,त्था न्यक्,1.495 |
| Rigveda_41_0100.wav,समादित्येभिरख्यत समिन्द्रेणोत वायुना सुत एति पवित्र आ,9.641 |
| RigVeda_46_0311.wav,सुप्रकेतं जीवसे मन्म धीमहि तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे,7.526 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0356.wav,अर्यमा नाम यो देवस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः,4.935 |
| Rigvedha_007_0146.wav,का राधद्धोत्राश्विना वां को वां जोष उभयोः,6.939 |
| RigVeda_Part_027_0019.wav,तस्यास्ते सुम्नमीमहे,3.686 |
| RigVeda_44_0042.wav,अप श्वानं श्नथिष्टन सखायो दीर्घजिह्व्यम्,5.611 |
| Rigveda_40_0473.wav,ज्योतिर्जज्ञानमुक्थ्यम्,3.043 |
| RigVeda_46_0059.wav,अनाशीर्दामहमस्मि प्रहन्ता सत्यध्वृतं वृजिनायन्तमाभुम्,7.295 |
| Rigveda_37_0313.wav,आ त इन्द्र महिमानं हरयो देव ते महः,4.892 |
| RigVeda_Part_015_0047.wav,पिता यत्र दुहितुः सेकमृञ्जन्सं शग्म्येन मनसा दधन्वे,7.063 |
| Rigvedha_008_0267.wav,अस्माकं वीराँ उत नो मघोनो जनाँश्च या पारयाच्छर्म या च,8.297 |
| Rigvedha_002_0452.wav,अग्निं मित्रं न दर्शतम्,2.527 |
| Rigveda_36_0047.wav,आ वां ग्रावाणो अश्विना धीभिर्विप्रा अचुच्यवुः नासत्या सोमपीतये नभन्तामन्यके समे,13.355 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0549.wav,त्रेधामृतस्य चक्षणं त्रीण्यायूंषि तेऽकरम्,4.668 |
| Rigveda_30_0257.wav,स्पशो दधाथे ओषधीषु विक्ष्वृधग्यतो अनिमिषं रक्षमाणा,7.203 |
| Rigveda_39_0181.wav,स नो रास्व सुवीर्यम्,4.267 |
| RigVeda_Part_026_0323.wav,ये अग्निजिह्वा उत वा यजत्रा आसद्यास्मिन्बर्हिषि मादयध्वम्,7.474 |
| RigVeda_47_0392.wav,ज्योक्च सूर्यं दृशे,3.198 |
| RigVeda_Part_018_0131.wav,द्रुहं जिघांसन्ध्वरसमनिन्द्रां तेतिक्ते तिग्मा तुजसे अनीका,7.63 |
| RigVeda_Part_024_0195.wav,पावकया यश्चितयन्त्या कृपा क्षामन्रुरुच उषसो न भानुना,7.026 |
| Rigvedha_014_0299.wav,एदं बर्हिः सदो मम,2.703 |
| Atharvaveda_Part_015_0048.wav,वेद आस्तरणं ब्रह्मोपबर्हणम्,4.028 |
| Rigvedha_002_0401.wav,अजायन्त स्वभानवः,3.198 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0077.wav,अमीवाः सर्वाश्चातयं जहि रक्षांस्योषधे,5.505 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0378.wav,निरमुं नुद ओकसः सपत्नो यः पृतन्यति,3.961 |
| Atharvaveda_Part_020_20289.wav,एवा रातिस्तुवीमघ विश्वेभिर्धायि धातृभिः,5.139 |
| Rigveda_35_0268.wav,पाहि गायान्धसो मद इन्द्राय मेध्यातिथे,6.063 |
| Rig_veda_45_0157.wav,मित्रश्चिद्धि ष्मा जुहुराणो देवाञ्छ्लोको न यातामपि वाजो अस्ति,6.972 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0518.wav,तिस्रः सरस्वतिरदुः सचित्ता विषदूषणम्,3.961 |
| Rigvedha_012_0169.wav,असि सत्य ऋणया ब्रह्मणस्पत उग्रस्य चिद्दमिता वीळुहर्षिणः,7.2380625 |
| Rigvedha_011_0289.wav,शुष्मिन्तमं यं चाकनाम देवास्मे रयिं रासि वीरवन्तम्,7.11 |
| Rigveda_35_0056.wav,युवं हि रुद्रा पर्षथो अति द्विषः,4.034 |
| Rigveda_29_0050.wav,एको देवत्रा दयसे हि मर्तानस्मिञ्छूर सवने मादयस्व,7.586 |
| Atharvaveda_Part_020_40030.wav,सत्राच्या मघवा सोमपीतये धिया शविष्ठ आ गमत्,6.177 |
| Rigvedha_007_0073.wav,निष्टमूहथुः सुयुजा रथेन मनोजवसा वृषणा स्व,5.705 |
| RigVeda_47_0250.wav,क्रतुर्युधा विदं मनवे गातुमिष्टये,4.484 |
| Atharvaveda_Part_020_10078.wav,तत्त्वा यामि सुवीर्यं तद्ब्रह्म पूर्वचित्तये,4.925 |
| RigVeda_Part_022_0046.wav,अनूनोदत्र हस्तयतो अद्रिरार्चन्येन दश मासो नवग्वाः,7.437 |
| Rigveda_31_0254.wav,किमाग आस वरुण ज्येष्ठं यत्स्तोतारं जिघांससि सखायम्,7.16 |
| RigVeda_42_0336.wav,दिवो न सानु स्तनयन्नचिक्रदद्द्यौश्च यस्य पृथिवी च धर्मभिः,6.425 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0300.wav,ब्रह्मचारिणं पितरो देवजनाः पृथग्देवा अनुसंयन्ति सर्वे,7.001 |
| RigVeda_Part_021_0147.wav,आस्माञ्जगम्यादहिशुष्म सत्वा भगो न हव्यः प्रभृथेषु चारुः,7.141 |
| Rigvedha_004_0185.wav,यह्वीः,1.664 |
| RigVeda_Part_022_0387.wav,गिरो देवि रथीरिव,2.966 |
| RigVeda_Part_026_0058.wav,पुरूतमं पुरूणां स्तोतॄणां विवाचि,6.123 |
| Atharvaveda_Part_014_0294.wav,धाता विपश्चित्पतिमस्यै विवेद भगो राजा पुर एतु प्रजानन्,6.942 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0415.wav,अपश्यं गोपामनिपद्यमानमा च परा च पथिभिश्चरन्तम्,6.287 |
| Rig_veda_54_0192.wav,त्वं त्यमिन्द्र सूर्यं पश्चा सन्तं पुरस्कृधि,5.442 |
| Rigvedha_007_0231.wav,नभोजुवो यन्निरवस्य राधः प्रशस्तये महिना रथवते,5.791 |
| Rigvedha_010_0245.wav,त्वं त्राता त्वमु नो वृधे भूर्विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्,6.556 |
| Rigvedha_008_0154.wav,आ वां धियो ववृत्युरध्वराँ उपेममिन्दुं मर्मृजन्त वाजिनमाशुमत्यं न वाजिनम्,10.089 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0043.wav,भूम्यां मनुष्या जीवन्ति स्वधयान्नेन मर्त्याः सा नो भूमिः प्राणमायुर्दधातु जरदष्टिं मा पृथिवी कृणोतु,12.344 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0290.wav,यशसं मेन्द्रो मघवान् कृणोतु यशसं द्यावापृथिवी उभे इमे यशसं मा देवः सविता कृणोतु प्रियो दातुर्दक्षिणाया इह स्याम्,13.024 |
| RigVeda_42_0151.wav,सम्यक्सम्यञ्चो महिषा अहेषत सिन्धोरूर्मावधि वेना अवीविपन्,8.76 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0246.wav,एष वै पिन्वन् नामर्तुर्यदजः पञ्चौदनः निरेवाप्रियस्य भ्रातृव्यस्य श्रियं दहति भवत्यात्मना योऽजं पञ्चौदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति,16.39 |
| Rigveda_39_0262.wav,आ देवान्वक्षि यक्षि च तं त्वाजनन्त मातरः कविं देवासो अङ्गिरः हव्यवाहममर्त्यम् प्रचेतसं त्वा कवेऽग्ने दूतं वरेण्यम् हव्यवाहं नि षेदिरे,20.117 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0059.wav,भवाशर्वौ मृडतं माभि यातं भूतपती पशुपती नमो वाम्,7.025 |
| Rigveda_32_0279.wav,गीर्भिः श्रुतं गिर्वणसम्,3.178 |
| RigVeda_Part_027_0132.wav,आ नो गव्येभिरश्व्यैर्वसव्यैरुप गच्छतम्,8.049 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0447.wav,अजशृङ्ग्यज रक्षः सर्वान् गन्धेन नाशय,4.863 |
| Rigvedha_005_0278.wav,देवो देवानामसि मित्रो अद्भुतो वसुर्वसूनामसि चारुरध्वरे,7.969 |
| Rigvedha_014_0245.wav,स नो यक्षद्देवताता यजीयान्राये वाजाय वनते मघानि,7.6880625 |
| RigVeda_44_0176.wav,अनुमाद्यः पवमानो मनीषिभिः सोमो विप्रेभिरृक्वभिः,5.871 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0018.wav,ते वर्षन्ति ते वर्षयन्ति तद्विदे काममूर्जमापः,5.748 |
| Rigvedha_014_0006.wav,अधाय्यग्निर्मानुषीषु विक्ष्वपां गर्भो मित्र ऋतेन साधन्,8.732 |
| Rigveda_33_0286.wav,आ नो यातमुपश्रुत्यश्विना सोमपीतये,5.276 |
| Atharvaveda_Part_020_30072.wav,अपो यदद्रिं पुरुहूत दर्दराविर्भुवत्सरमा पूर्व्यं ते,7.089 |
| Rigveda_41_0031.wav,त्वमानशे,1.715 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0356.wav,व्यहं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा अग्निः प्राणान्त्सं दधाति चन्द्रः प्राणेन संहितः व्यहं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा प्राणेन विश्वतोवीर्यं देवाः सूर्यं समैरयन् व्यहं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा,28.347 |
| RigVeda_43_0187.wav,स नो देव देवताते पवस्व महे सोम,4.827 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0447.wav,सर्वास्याङ्गा पर्वा मूलानि वृश्चति,4.538 |
| RigVeda_50_0115.wav,द्वे समीची बिभृतश्चरन्तं शीर्षतो जातं मनसा विमृष्टम्,6.617 |
| Atharvaveda_Part_020_20372.wav,वेत्था हि निर्ऋतीनां वज्रहस्त परिवृजम्,4.807 |
| Rigveda_39_0294.wav,त्रिधातु वारणं मधु अभीममघ्न्या उत श्रीणन्ति धेनवः शिशुम्,11.533 |
| Rigvedha_004_0315.wav,शविष्ठ वज्रिन्नोजसा पृथिव्या निः शशा अहिमर्चन्ननु स्वराज्यम्,7.386 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0031.wav,यामाशामेमि केवली सा मे अस्तु विदेयमेनां मनसि प्रविष्टाम्,7.672 |
| Rigvedha_011_0031.wav,वातापे पीव इद्भव,3.0380625 |
| Rigveda_36_0131.wav,अग्नेः सख्यं वृणीमहे,3.583 |
| Rigveda_32_0255.wav,शुक्रा आशिरं याचन्ते ताँ आशिरं पुरोळाशमिन्द्रेमं सोमं श्रीणीहि,10.635 |
| RigVeda_Part_028_0088.wav,दिवो न ते तन्यतुरेति शुष्मश्चित्रो न सूरः प्रति चक्षि भानुम्,6.735 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0239.wav,एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः,5.169 |
| Rig_veda_54_0245.wav,इन्द्रस्येव रातिमाजोहुवानाः स्वस्तये नावमिवा रुहेम,6.758 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0270.wav,पञ्च च मे पञ्चाशच्च मेऽपवक्तार ओषधे ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला करः,8.745 |
| RigVeda_51_0003.wav,मनै नु बभ्रूणामहं शतं धामानि सप्त च,5.024 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0073.wav,ये राजानो राजकृतः सूता ग्रामण्यश्च ये,5.655 |
| RigVeda_Part_025_0179.wav,स सोम आमिश्लतमः सुतो भूद्यस्मिन्पक्तिः पच्यते सन्ति धानाः,7.405 |
| RigVeda_48_0371.wav,यत्सम्पृच्छं मानुषीर्विश आयन्त्वं नृभिरजयस्त्वावृधेभिः,6.504 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0168.wav,यथा यशो यजमाने यथास्मिन् यज्ञ आहितम्,4.561 |
| Rigveda_38_0077.wav,यं त्वं विप्र मेधसातावग्ने हिनोषि धनाय,9.396 |
| Atharvaveda_Part_020_30242.wav,त्वमिन्द्र बलादधि सहसो जात ओजसः,4.294 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0512.wav,छन्दांसि यज्ञे मरुतः स्वाहा मातेव पुत्रं पिपृतेह युक्ताः,6.699 |
| Rigveda_34_0261.wav,आ तु नः स वयति गव्यमश्व्यं स्तोतृभ्यो मघवा शतम् त्वया ह स्विद्युजा वयं प्रति श्वसन्तं वृषभ ब्रुवीमहि,13.449 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0376.wav,कृत्वा त्रिभुजं शयानः,2.678 |
| Atharvaveda_Part_015_0028.wav,वैरूपाय च वै स वैराजाय चाद्भ्यश्च वरुणाय च राज्ञ आ वृश्चते य एवं विद्वांसं व्रात्यमुपवदति,11.13 |
| Atharvaveda_Part_020_10005.wav,मरुतो यस्य हि क्षये पाथा दिवो विमहसः,4.867 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0076.wav,बृहस्पते वशे लब्ध्वाग्नीषोमा वि विध्यतम्,5.117 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0400.wav,गायत्रेण प्रति मिमीते अर्कमर्केण साम त्रैष्टुभेन वाकम्,6.801 |
| RigVeda_51_0188.wav,सहस्रवाजमभिमातिषाहं सुतेरणं मघवानं सुवृक्तिम्,7.003 |
| Rigvedha_002_0300.wav,न ये दिवः पृथिव्या अन्तमापुर्न मायाभिर्धनदां पर्यभूवन्,7.281 |
| Rigveda_34_0177.wav,सहसः सूनवाहुत,2.898 |
| Rig_veda_54_0333.wav,समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो अजायत,4.769 |
| Rigveda_40_0306.wav,परि सुवानो गिरिष्ठाः,2.188 |
| Rigvedha_011_0070.wav,वि घ त्वावाँ ऋतजात यंसद्गृणानो अग्ने तन्वे वरूथम्,9.2840625 |
| RigVeda_Part_015_0203.wav,इन्द्रो भगो वाजदा अस्य गावः प्र जायन्ते दक्षिणा अस्य पूर्वीः,8.04 |
| Rigveda_39_0302.wav,अचिक्रदद्वृषा हरिर्महान्मित्रो न दर्शतः सं सूर्येण रोचते,8.58 |
| RigVeda_52_0134.wav,अदाभ्येन शोचिषाग्ने रक्षस्त्वं दह,4.474 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0171.wav,पुरा यथा व्यथिः श्रव इन्द्रस्य नाधृषे शवः स नो ददातु तां रयिमुरुं पिशङ्गसंदृशम्,8.738 |
| Rigveda_37_0105.wav,श्यावीरतिध्वसन्पथश्चक्षुषा चन संनशे,5.792 |
| RigVeda_Part_022_0124.wav,ऋतधीतय आ गत सत्यधर्माणो अध्वरम्,4.934 |
| Rigvedha_008_0346.wav,यमीं द्वा सवयसा सपर्यतः समाने योना मिथुना समोकसा,7.774 |
| Rigveda_33_0130.wav,स्तभूयमान आशयत्,2.98 |
| RigVeda_48_0200.wav,स्वस्ति नः पथ्यासु धन्वसु स्वस्त्यप्सु वृजने स्वर्वति,6.462 |
| Rigveda_38_0349.wav,इन्द्र य उ नु ते अस्ति वाजो विप्रेभिः सनित्वः,5.528 |
| Rigveda_35_0211.wav,उक्थे वा दधसे चनः,2.507 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0130.wav,एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः,5.704 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0050.wav,मृगः स मृगयुस्त्वं न त्वा निकर्तुमर्हति,4.016 |
| Rigveda_29_0184.wav,गमद्वाजं वाजयन्निन्द्र मर्त्यो यस्य,4.312 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0276.wav,प्राणे ह भूतं भव्यं च प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम्,4.991 |
| Rig_veda_45_0355.wav,प्रतीचीने मामहनीष्वाः पर्णमिवा दधुः,4.987 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0298.wav,विद्योतमानः प्रति हरति वर्षन्न् उद्गायत्युद्गृह्णन् निधनम्,5.107 |
| RigVeda_Part_018_0265.wav,स घेदुतासि वृत्रहन्समान इन्द्र गोपतिः,5.299 |
| RigVeda_Part_016_0086.wav,अभि व्ययस्व खदिरस्य सारमोजो धेहि स्पन्दने शिंशपायाम् अक्ष वीळो वीळित वीळयस्व मा यामादस्मादव जीहिपो नः,14.269 |
| Rigvedha_005_0176.wav,सखा सुशेव एधि नः,3.025 |
| Rigvedha_014_0042.wav,ऐभिरग्ने सरथं याह्यर्वाङ्नानारथं वा विभवो ह्यश्वाः,8.1490625 |
| Rigvedha_002_0337.wav,ह्वयामि रात्रीं जगतो निवेशनीं ह्वयामि देवं सवितारमूतये,8.479 |
| RigVeda_Part_017_0059.wav,कदा त उक्था सधमाद्यानि कदा भवन्ति सख्या गृहे ते,7.173 |
| RigVeda_47_0067.wav,धनं न स्यन्द्रं बहुलं यो अस्मै तीव्रान्सोमाँ आसुनोति प्रयस्वान्,7.951 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0093.wav,उभोभयाविन्न् उप धेहि दंष्ट्रौ हिंस्रः शिशानोऽवरं परं च उतान्तरिक्षे परि याह्यग्ने जम्भैः सं धेह्यभि यातुधानान्,13.973 |
| RigVeda_Part_027_0269.wav,न मृष्यन्ते युवतयोऽवाता वि यत्पयो विश्वजिन्वा भरन्ते,7.316 |
| Rigvedha_005_0060.wav,धत्त इन्द्रो नर्यपांसि कर्तवेऽहन्वृत्रं निरपामौब्जदर्णवम्,7.402 |
| Rig_veda_45_0372.wav,जीवाभिर्भुनजामहै,2.342 |
| Rigveda_39_0132.wav,आवत्तमिन्द्रः शच्या धमन्तमप स्नेहितीर्नृमणा अधत्त,7.868 |
| RigVeda_Part_025_0354.wav,अभिषेणाँ अभ्यादेदिशानान्पराच इन्द्र प्र मृणा जही च,10.132 |
| Rigvedha_005_0093.wav,असि सत्य ऋणयावानेद्योऽस्या धियः प्राविताथा वृषा गणः,7.462 |
| Rigvedha_010_0017.wav,महोभिरेताँ उप युज्महे न्विन्द्र स्वधामनु हि नो बभूथ,7.273 |
| RigVeda_Part_017_0060.wav,कथा ह तद्वरुणाय त्वमग्ने कथा दिवे गर्हसे कन्न आगः,6.503 |
| RigVeda_44_0380.wav,रं केतुं जनिता त्वा जजान,3.396 |
| RigVeda_53_0240.wav,त्वं मायाभिरनवद्य मायिनं श्रवस्यता मनसा वृत्रमर्दयः,7.613 |
| Rigvedha_006_0154.wav,यदिन्द्राग्नी यदुषु तुर्वशेषु यद्द्रुह्युष्वनुषु पूरुषु स्थः,6.739 |
| Rigvedha_001_0049.wav,सुते दधिष्व नश्चनः,3.504 |
| Rigvedha_012_0106.wav,एवा ते गृत्समदाः शूर मन्मावस्यवो न वयुनानि तक्षुः,6.651 |
| RigVeda_44_0105.wav,देवाव्यं मदमभि द्विशवसम्,4.583 |
| Atharvaveda_Part_015_0098.wav,तमृतवश्चार्तवाश्च लोकाश्च लौक्याश्च मासाश्चार्धमासाश्चाहोरात्रे चानुव्यचलन्ऋतूनां च वै स आर्तवानां च लोकानां च लौक्यानां च मासानां चार्धमासानां चाहोरात्रयोश्च प्रियं धाम भवति य एवं वेदसोऽनावृत्तां दिशमनु व्यचलत्ततो नावर्त्स्यन्न् अमन्यत,30.919 |
| RigVeda_51_0103.wav,पूर्णमूधर्दिव्यं यस्य सिक्तय आ सर्वतातिमदितिं वृणीमहे,6.714 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0383.wav,वृषा मतीनां पवते विचक्षणः सूरो अह्नां प्रतरीतोषसां दिवः,6.867 |
| Rigvedha_001_0396.wav,शमीभिर्यज्ञमाशत,4.149 |
| RigVeda_43_0290.wav,पुनानः,1.479 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0544.wav,उत्तिष्ठ त्वं देवजनार्बुदे सेनया सह,4.625 |
| Rigvedha_003_0353.wav,इन्द्रः सोमस्य पीतये वृषायते सनात्स युध्म ओजसा पनस्यते,7.083 |
| RigVeda_Part_015_0175.wav,द्रवद्यथा सम्भृतं विश्वतश्चिदुपेमं यज्ञमा वहात इन्द्रम्,6.966 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0230.wav,वर्षवृद्धमुप यच्छ शूर्पं तुषं पलावान् अप तद्विनक्तु,6.04 |
| Atharvaveda_Part_020_40383.wav,स्तोमैर्वत्सस्य वावृधे,3.531 |
| Rigvedha_014_0152.wav,इन्द्राग्नी आ गतं सुतं गीर्भिर्नभो वरेण्यम्,5.2670625 |
| RigVeda_Part_022_0091.wav,ता अत्नत वयुनं वीरवक्षणं समान्या वृतया विश्वमा रजः,6.948 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0570.wav,तदग्ने विद्वान् पुनरा भर त्वं शरीरे मांसमसुमेरयामः,6.078 |
| RigVeda_Part_027_0119.wav,पिबतं शम्भुवा सुतम्,2.864 |
| Rigvedha_013_0200.wav,स हि स्थिरो विचर्षणिः,2.2750625 |
| Rigvedha_002_0431.wav,क्व वः सुम्ना नव्यांसि मरुतः क्व सुविता,4.703 |
| RigVeda_47_0041.wav,जीवं रुदन्ति वि मयन्ते अध्वरे दीर्घामनु प्रसितिं दीधियुर्नरः,7.13 |
| Rigveda_30_0060.wav,चित्रं वयो बृहदस्मे दधातु यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः,7.01 |
| Rigvedha_006_0091.wav,कदर्यम्णो महस्पथाति क्रामेम दूढ्यो वित्तं मे अस्य रोदसी,7.475 |
| Rigvedha_003_0354.wav,त्वं तमिन्द्र पर्वतं न भोजसे महो नृम्णस्य धर्मणामिरज्यसि,6.321 |
| Rigveda_33_0065.wav,त्कण्वमावतं प्रियमेधमुपस्तुतम्,4.021 |
| RigVeda_44_0427.wav,असच्च सच्च परमे व्योमन्दक्षस्य जन्मन्नदितेरुपस्थे,7.273 |
| Rigvedha_005_0057.wav,शूरा इवेद्युयुधयो न जग्मयः श्रवस्यवो न पृतनासु येतिरे,7.265 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0080.wav,यस्याः पुरो देवकृताः क्षेत्रे यस्या विकुर्वते,6.214 |
| Rigveda_38_0279.wav,ष्णवा भर,1.619 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0280.wav,प्रियं प्रियाणां कृणवाम तमस्ते यन्तु यतमे द्विषन्ति,5.32 |
| RigVeda_Part_015_0014.wav,यस्मै धायुरदधा मर्त्यायाभक्तं चिद्भजते गेह्यं सः,7.238 |
| Rigvedha_003_0011.wav,प्रो आरत मरुतो दुर्मदा इव देवासः सर्वया विशा,6.65 |
| Rigveda_32_0013.wav,वर्ध शुभ्रे स्तुवते रासि वाजान्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः,8.062 |
| Rigvedha_004_0255.wav,कस्ते जामिर्जनानामग्ने को दाश्वध्वरः,5.787 |
| RigVeda_50_0252.wav,रेभदत्र जनुषा पूर्वो अङ्गिरा ग्रावाण ऊर्ध्वा अभि चक्षुरध्वरम्,7.882 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0040.wav,ग्रीवास्ते कृत्ये पादौ चापि कर्त्स्यामि निर्द्रव,5.616 |
| RigVeda_50_0077.wav,विषेण भङ्गुरावतः प्रति ष्म रक्षसो दह,4.49 |
| Atharvaveda_Part_020_20206.wav,गिरिर्न भुज्मा मघत्सु पिन्वते यदीं सुता अमन्दिषुः,5.123 |
| Rigveda_37_0289.wav,ओभे पृणासि रोदसी,3.104 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0436.wav,आपः समुद्रिया धारास्तास्ते शल्यमसिस्रसन्,5.55 |
| Rigvedha_003_0160.wav,ऋता वनथो अक्तुभिः,2.646 |
| Rigveda_29_0084.wav,क्थं जनये यज्जुजोषन्नृवन्नवीयः शृणवद्यथा नः,5.917 |
| Rigveda_41_0115.wav,देवावीरघशंसहा,3.108 |
| RigVeda_Part_024_0300.wav,अग्ने हिरण्यसंदृशः,2.852 |
| Rigvedha_009_0106.wav,ता ईं वर्धन्ति मह्यस्य पौंस्यं नि मातरा नयति रेतसे भुजे,6.874 |
| Rigvedha_004_0123.wav,दाधार क्षेममोको न रण्वो यवो न पक्वो जेता जनानाम्,6.9 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0378.wav,एवा वपामि हर्म्यं यथा मे भूरयोऽसत,4.57 |
| RigVeda_Part_027_0310.wav,इन्द्राविष्णू हविषा वावृधानाग्राद्वाना नमसा रातहव्या,8.087 |
| RigVeda_Part_027_0114.wav,उग्रा विघनिना मृध इन्द्राग्नी हवामहे,5.223 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0120.wav,तं माषाज्यं कृत्वा प्र हिणोमि दूरं स गच्छत्वप्सुषदोऽप्यग्नीन्,6.608 |
| RigVeda_Part_023_0087.wav,सम्राजा या घृतयोनी मित्रश्चोभा वरुणश्च,5.494 |
| RigVeda_Part_019_0242.wav,इन्द्रश्च सोमं पिबतं बृहस्पतेऽस्मिन्यज्ञे मन्दसाना वृषण्वसू,7.997 |
| RigVeda_Part_026_0322.wav,विश्वे देवाः शृणुतेमं हवं मे ये अन्तरिक्षे य उप द्यवि ष्ठ,8.247 |
| Atharvaveda_Part_020_10173.wav,बृहस्पतिर्गोवपुषो वलस्य निर्मज्जानं न पर्वणो जभार,5.838 |
| Rigvedha_014_0400.wav,अग्ने स्वध्वरा कृणु देवान्देवयते यज,5.721 |
| RigVeda_Part_015_0281.wav,स पाहि मध्वो अन्धसः,3.204 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0252.wav,यां क्षेत्रे चक्रुर्यां गोषु यां वा ते पुरुषेषु,6.121 |
| RigVeda_42_0332.wav,यज्ञस्य केतुः पवते स्वध्वरः सोमो देवानामुप याति निष्कृतम्,7.938 |
| RigVeda_Part_024_0242.wav,अग्ने यक्षि दिवो विशः,2.949 |
| Rigvedha_011_0116.wav,त्रिः सप्त विष्पुलिङ्गका विषस्य पुष्यमक्षन्,4.5720625 |
| RigVeda_Part_020_0065.wav,इन्द्रो विद्वाँ अनु हि त्वा चचक्ष तेनाहमग्ने अनुशिष्ट आगाम्,8.666 |
| Rigveda_33_0540.wav,कदा नो गव्ये अश्व्ये वसौ दधः,4.181 |
| Rigveda_41_0235.wav,सखित्वमा वृणीमहे वृषा पवस्व धारया मरुत्वते च मत्सरः,8.437 |
| Rigveda_38_0470.wav,देवास्त इन्द्र सख्याय येमिरे बृहद्भानो मरुद्गण प्र व इन्द्राय बृहते मरुतो ब्रह्मार्चत,12.533 |
| RigVeda_Part_017_0003.wav,तज्जानतीरभ्यनूषत व्रा आविर्भुवदरुणीर्यशसा गोः,7.389 |
| Rigveda_32_0153.wav,प्रति स्मरेथां तुजयद्भिरेवैर्हतं द्रुहो रक्षसो भङ्गुरावतः,7.868 |
| RigVeda_Part_026_0188.wav,सं सहस्रा कारिषच्चर्षणिभ्य आँ आविर्गूळ्हा वसू करत्सुवेदा नो वसू करत्,11.496 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0066.wav,प्रजापतिर्जनयति प्रजा इमा धाता दधातु सुमनस्यमानः संजानानाः संमनसः सयोनयो मयि पुष्टं पुष्टपतिर्दधातु,11.864 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0082.wav,यत्ते सधस्थं परमे व्योमन्,4.326 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0038.wav,सहस्रणीथाः कवयो ये गोपायन्ति सूर्यम्,5.374 |
| RigVeda_Part_024_0077.wav,अध भ्रमस्त उर्विया वि भाति यातयमानो अधि सानु पृश्नेः,6.828 |
| Rigveda_41_0210.wav,पुनानो देववीतय इन्द्रस्य याहि निष्कृतम्,5.032 |
| Atharvaveda_Part_020_30128.wav,बृहस्पते युवमिन्द्रश्च वस्वो दिव्यस्येशाथे उत पार्थिवस्य,6.853 |
| RigVeda_50_0324.wav,अस्तं ननक्षे यस्मिञ्चाकन्दिवा नक्तं श्नथिता वैतसेन,6.508 |
| Rigvedha_007_0328.wav,सर्वाहमस्मि रोमशा गन्धारीणामिवाविका,5.606 |
| Rigveda_38_0434.wav,उत त्यं वीरं धनसामृजीषिणं दूरे चि,5.325 |
| Rigvedha_002_0307.wav,सं वज्रेणासृजद्वृत्रमिन्द्रः प्र स्वां मतिमतिरच्छाशदानः,6.809 |
| Rigveda_29_0392.wav,क्षन्त इन्द्रं शरदः सुपृक्षः,3.506 |
| Rigveda_39_0131.wav,अव द्रप्सो अंशुमतीमतिष्ठदियानः कृष्णो दशभिः सहस्रैः,7.773 |
| RigVeda_51_0140.wav,इन्द्र उदावत्पतिमघ्न्यानामरंहत पद्याभिः ककुद्मान्,7.125 |
| RigVeda_46_0258.wav,कुमारदेष्णा जयतः पुनर्हणो मध्वा सम्पृक्ताः कितवस्य बर्हणा,7.515 |
| RigVeda_Part_015_0329.wav,आगत्या वृषभिः सुतम्,2.954 |
| RigVeda_Part_023_0289.wav,दिवो नो वृष्टिं मरुतो ररीध्वं प्र पिन्वत वृष्णो अश्वस्य धाराः,7.699 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0414.wav,इध्मेन त्वा जातवेदः समिधा वर्धयामसि,4.454 |
| RigVeda_Part_027_0026.wav,पूष्णश्चक्रं न रिष्यति न कोशोऽव पद्यते,5.204 |
| RigVeda_Part_017_0081.wav,उत ब्रह्माण्यङ्गिरो जुषस्व सं ते शस्तिर्देववाता जरेत,7.083 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0168.wav,स्वधां पितृभ्यो अजरां कृणोमि दीर्घेणायुषा समिमान्त्सृजामि,6.903 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0010.wav,यत्सम्यञ्चावभियन्तावभि क्षामत्रा मही रोधचक्रे वावृधेते,7.875 |
| Rigveda_32_0095.wav,किमित्ते विष्णो,1.543 |
| Rigveda_34_0118.wav,स्वैः ष एवै रिरिषीष्ट युर्जनः समित्तमघमश्नवद्दुःशंसं मर्त्यं रिपुम्,9.848 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0050.wav,आहं तनोमि ते पसो अधि ज्यामिव धन्वनि,4.431 |
| Rigvedha_014_0113.wav,आशुं दूतमजिरं प्रत्नमीड्यं श्रुष्टी देवं सपर्यत,5.9790625 |
| Rigveda_37_0318.wav,इदं नो बर्हिरासदे,3.191 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0054.wav,त्स उपेदमेहि,1.826 |
| Atharvaveda_Part_020_40238.wav,मा त्वाभि सखा नो विदन्,3.645 |
| Rigvedha_001_0197.wav,जेषः स्वर्वतीरपः सं गा अस्मभ्यं धूनुहि,5.581 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0123.wav,आपस्तत्सर्वं निष्करन् भिषजां सुभिषक्तमाः,4.944 |
| RigVeda_51_0154.wav,स इषुहस्तैः स निषङ्गिभिर्वशी संस्रष्टा स युध इन्द्रो गणेन,7.053 |
| Atharvaveda_Part_020_10209.wav,यन्ति प्रमादमतन्द्राः,3.222 |
| Rigveda_30_0285.wav,यत्रा चक्रुरमृता गातुमस्मै श्येनो न दीयन्नन्वेति पाथः,8.292 |
| Rigveda_30_0311.wav,या धारयन्त देवाः सुदक्षा दक्षपितरा,5.273 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0431.wav,भूयसीः शरदः शतम्,3.084 |
| RigVeda_48_0214.wav,दक्षस्य वादिते जन्मनि व्रते राजाना मित्रावरुणा विवाससि,7.194 |
| RigVeda_50_0025.wav,य एष स्वप्ननंशनोऽस्तमेषि पथा पुनर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः,5.64 |
| RigVeda_Part_016_0097.wav,ययोर्ह स्तोमे विदथेषु देवाः सपर्यवो मादयन्ते सचायोः,8.628 |
| RigVeda_53_0036.wav,गव्यन्त इन्द्रं सख्याय वि,3.527 |
| RigVeda_Part_016_0012.wav,इनतमः सत्वभिर्यो ह शूषैः पृथुज्रया अमिनादायुर्दस्योः,7.917 |
| Rigveda_29_0162.wav,तस्य व्रतानि न मिनन्ति धीराः,3.454 |
| RigVeda_Part_023_0128.wav,पर्यन्या नाहुषा युगा मह्ना रजांसि दीयथः,5.173 |
| Rigvedha_006_0345.wav,समुद्रस्य धन्वन्नार्द्रस्य पारे त्रिभी रथैः शतपद्भिः षळश्वैः,7.933 |
| Rigveda_31_0369.wav,ता वां गीर्भिर्विपन्यवः प्रयस्वन्तो हवामहे,5.598 |
| Rigveda_33_0014.wav,वृक्षाश्चिन्मे अभिपि,2.708 |
| Atharvaveda_Part_020_20224.wav,मंहिष्ठो गीर्भिरा च यज्ञियो ववर्तद्राये नो विश्वा सुपथा कृणोतु वज्री,8.081 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0251.wav,यथाहं शत्रुहोऽसान्यसपत्नः सपत्नहा,4.929 |
| RigVeda_Part_017_0276.wav,आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षं वि सूर्यो रश्मिभिश्चेकितानः,8.129 |
| RigVeda_44_0222.wav,क्रीळन्नूर्मिरपामिव,3.376 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0139.wav,इम ऐन्द्रा अतिसरा आकूतिं सं नमन्तु मे,4.982 |
| Rigvedha_001_0066.wav,अथा ते अन्तमानां विद्याम सुमतीनाम्,6.687 |
| Rigvedha_014_0085.wav,यान्वो नरो देवयन्तो निमिम्युर्वनस्पते स्वधितिर्वा ततक्ष,7.0580625 |
| Atharvaveda_Part_015_0078.wav,उग्र एनं देव इष्वास उदीच्या दिशो अन्तर्देशादनुष्ठातानु तिष्ठति नैनं शर्वो न भवो नेशानः नास्य पशून् न समानान् हिनस्ति य एवं वेद,15.559 |
| Rigvedha_014_0217.wav,तुविद्युम्न वर्षिष्ठस्य प्रजावतोऽनमीवस्य शुष्मिणः,5.354 |
| Rigveda_39_0067.wav,कया त्वं न ऊत्याभि प्र मन्दसे वृषन्,5.9 |
| RigVeda_Part_021_0100.wav,उग्रमयातमवहो ह कुत्सं सं ह यद्वामुशनारन्त देवाः,7.298 |
| Rigvedha_007_0172.wav,प्र यदानड्विश आ हर्म्यस्यो,2.986 |
| Rigveda_29_0296.wav,शर्मन्स्याम मरुतामुपस्थे यूयं पात स्व,5.372 |
| RigVeda_52_0173.wav,स्वादोः स्वादीयः स्वादुना सृजा समदः सु मधु मधुनाभि योधीः,8.413 |
| Rigvedha_011_0032.wav,यत्ते सोम गवाशिरो यवाशिरो भजामहे,5.216 |
| Rigveda_29_0192.wav,कस्तमिन्द्र त्वावसुमा मर्त्यो दधर्षति,4.611 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0142.wav,दृशे विश्वाय सूर्यम्,3.029 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0110.wav,जीवेषु भद्रं तन् मयि स्वधा पितृषु सा त्वयि,4.448 |
| RigVeda_Part_026_0223.wav,होता यक्षद्यजतं पस्त्यानामग्निस्त्वष्टारं सुहवं विभावा,9.356 |
| RigVeda_51_0079.wav,अयं दशस्यन्नर्येभिरस्य दस्मो देवेभिर्वरुणो न मायी,6.829 |
| Rigvedha_004_0353.wav,युक्ष्वा मदच्युता हरी कं हनः कं वसौ दधोऽस्माँ इन्द्र वसौ दधः,9.215 |
| RigVeda_46_0244.wav,तथा युजा वि वावृते,3.195 |
| Rigvedha_005_0325.wav,द्रविणोदा द्रविणसस्तुरस्य द्रविणोदाः सनरस्य प्र यंसत्,7.017 |
| Rigvedha_014_0355.wav,अग्निमीळे कविक्रतुम्,2.823 |
| RigVeda_42_0237.wav,अद्रयस्त्वा बप्सति गोरधि त्वच्यप्सु त्वा हस्तैर्दुदुहुर्मनीषिणः,8.292 |
| Rigvedha_014_0127.wav,महे वाजाय द्रविणाय दर्शतः,3.92 |
| Rigvedha_009_0315.wav,प्पलं स्वाद्वग्रे तन्नोन्नशद्यः पितरं न वेद,5.425 |
| Rigvedha_002_0353.wav,अपामीवां बाधते वेति सूर्यमभि कृष्णेन रजसा द्यामृणोति,7.679 |
| RigVeda_42_0249.wav,तं त्वा हस्तिनो मधुमन्तमद्रिभिर्दुहन्त्यप्सु वृषभं दश क्षिपः,7.114 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0170.wav,एत उ त्ये पतयन्ति श्वयातव इन्द्रं दिप्सन्ति दिप्सवोऽदाभ्यम्,6.678 |
| Atharvaveda_Part_018_1_0203.wav,किं स्विन् नो राजा जगृहे कदस्याति व्रतं चकृमा को वि वेद,6.829 |
| Atharvaveda_Part_020_20052.wav,त्वं ह त्यदिन्द्र कुत्समावः शुश्रूषमाणस्तन्वा समर्ये,6.451 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0268.wav,उद्वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्,6.1 |
| RigVeda_Part_028_0236.wav,अग्रे यज्ञस्य शोचतः,3.338 |
| Atharvaveda_Part_020_30271.wav,बृहस्पतिर्नः परि पातु पश्चादुतोत्तरस्मादधरादघयोः,6.374 |
| RigVeda_Part_018_0369.wav,वाजो देवानामभवत्सुकर्मेन्द्रस्य ऋभुक्षा वरुणस्य विभ्वा,8.179 |
| RigVeda_43_0315.wav,सपन्ति यं मिथुनासो निकामा अध्वर्यवो रथिरासः सुहस्ताः,7.945 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0320.wav,विश्वव्यचाश्चर्मौषधयो लोमानि नक्षत्राणि रूपम्,6.431 |
| Rigveda_32_0355.wav,प्र चक्रे सहसा सहो बभञ्ज मन्युमोजसा,5.484 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0370.wav,अथाहुर्नारकं लोकं निरुन्धानस्य याचिताम्,5.433 |
| Rigveda_32_0073.wav,व्यस्तभ्ना रोदसी वि,2.949 |
| Rigvedha_003_0012.wav,उपो रथेषु पृषतीरयुग्ध्वं प्रष्टिर्वहति रोहितः,5.418 |
| Rigveda_32_0337.wav,निरग्नयो रुरुचुर्निरु सूर्यो निः सोम इन्द्रियो रसः,6.166 |
| Rigveda_37_0042.wav,तुरण्यवो मधुमन्तं घृतश्चुतं विप्रासो अर्कमानृचुः,6.511 |
| RigVeda_42_0063.wav,अद्भिर्गोभिर्मृज्यते अद्रिभिः सुतः पुनान इन्दुर्वरिवो विदत्प्रियम्,7.057 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0114.wav,नडमा रोह न ते अत्र लोक इदं सीसं भागधेयं त एहि यो गोषु यक्ष्मः पुरुषेषु यक्ष्मस्तेन त्वं साकमधराङ्परेहि,12.28 |
| Rigvedha_006_0229.wav,याभिर्विश्पलां धनसामथर्व्यं सहस्रमीळ्ह आजावजिन्वतम्,7.188 |
| Rigvedha_007_0009.wav,जुजुरुषो नासत्योत वव्रिं प्रामुञ्चतं द्रापिमिव च्यवानात्,7.641 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0113.wav,तैर्मे कृतं स्वस्त्ययनमिन्द्रो मे शर्म यच्छतु ब्रह्मा मे शर्म यच्छतु,7.764 |
| Rigvedha_005_0282.wav,यस्मै त्वं सुद्रविणो ददाशोऽनागास्त्वमदिते सर्वताता,7.534 |
| Atharvaveda_Part_020_30214.wav,आ तू सुशिप्र दंपते रथं तिष्ठा हिरण्ययम्,4.835 |
| Atharvaveda_Part_020_40277.wav,नीलशिखण्डवाहनः विततौ किरणौ द्वौ तावा पिनष्टि पूरुषः,7.863 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0351.wav,मयि वर्चो अथो यशोऽथो यज्ञस्य यत्पयः तन् मयि प्रजापतिर्दिवि द्यामिव दृंहतु,8.119 |
| RigVeda_46_0004.wav,शचीपते शचीनां वि वो मदे श्रेष्ठं नो धेहि वार्यं विवक्षसे,7.753 |
| Rigveda_29_0333.wav,शं न ऋभवः सुकृतः सुहस्,2.399 |
| RigVeda_Part_020_0029.wav,समिद्धस्य रुशददर्शि पाजो महान्देवस्तमसो निरमोचि,7.035 |
| Rigvedha_010_0095.wav,वव्रासो न ये स्वजाः स्वतवस इषं स्वरभिजायन्त धूतयः,6.724 |
| RigVeda_47_0268.wav,एता विश्वा सवना तूतुमा कृषे स्वयं सूनो सहसो यानि दधिषे,7.805 |
| RigVeda_42_0238.wav,एवा त इन्दो सुभ्वं सुपेशसं रसं तुञ्जन्ति प्रथमा अभिश्रियः,7.729 |
| RigVeda_Part_019_0110.wav,ता वां धियोऽवसे वाजयन्तीराजिं न जग्मुर्युवयूः सुदानू,7.313 |
| RigVeda_44_0064.wav,एते पूता विपश्चितः सोमासो दध्याशिरः सूर्यासो न दर्शतासो जिगत्नवो ध्रुवा घृते,11.884 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0055.wav,स्त्रियश्च सर्वाः स्वापय शुनश्चेन्द्रसखा चरन्,4.861 |
| RigVeda_52_0114.wav,ओ हि वर्तन्ते रथ्येव चक्रान्यमन्यमुप तिष्ठन्त रायः,7.122 |
| Rigveda_33_0278.wav,आ नो विश्वाभिरूतिभिरश्विना गच्छतं युवम्,5.62 |
| Rigveda_40_0618.wav,विदाः सहस्रिणीरिषः,2.881 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0131.wav,सप्त प्राणान् अष्टौ मन्यस्तांस्ते वृश्चामि ब्रह्मणा,6.489 |
| RigVeda_51_0163.wav,दुश्च्यवनः पृतनाषाळयुध्योऽस्माकं सेना अवतु प्र युत्सु,10.104 |
| Rigveda_37_0411.wav,नाना हवन्त ऊतये,3.275 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0006.wav,इमं होमा यज्ञमवतेमं संस्रावणा उत,5.46 |
| Rigveda_31_0276.wav,यो मृळयाति चक्रुषे चिदागो वयं स्याम वरुणे अनागाः,8.274 |
| Rig_veda_54_0271.wav,क्षिपदशस्तिमप दुर्मतिं हन्नथा करद्यजमानाय शं योः,6.732 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0233.wav,या रसस्य हरणाय जातमारेभे तोकमत्तु सा,5.331 |
| RigVeda_47_0370.wav,तनूष्टे वाजिन्तन्वं नयन्ती वाममस्मभ्यं धातु शर्म तुभ्यम्,8.663 |
| Rigvedha_001_0446.wav,पिपृतां नो भरीमभिः,3.491 |
| RigVeda_46_0281.wav,आरे मन्युं दुर्विदत्रस्य धीमहि स्वस्त्यग्निं समिधानमीमहे,7.605 |
| Rigvedha_004_0010.wav,अस्मा इदु सप्तिमिव श्रवस्येन्द्रायार्कं जुह्वा समञ्जे,9.425 |
| RigVeda_42_0062.wav,अयं दिव इयर्ति विश्वमा रजः सोमः पुनानः कलशेषु सीदति,6.425 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0078.wav,त्थः खदिरादधि,1.793 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0380.wav,बृहतः परि सामानि षष्ठात्पञ्चाधि निर्मिता,5.253 |
| RigVeda_Part_017_0152.wav,उदु स्वरुर्नवजा नाक्रः पश्वो अनक्ति सुधितः सुमेकः,6.488 |
| Atharvaveda_Part_020_10014.wav,एदं बर्हिः सदो मम,2.853 |
| Rigveda_38_0173.wav,अमृतं जातवेदसं तिरस्तमांसि दर्शतम्,5.41 |
| Atharvaveda_Part_020_10298.wav,तमिन्द्र मदमा गहि बर्हिष्ठां ग्रावभिः सुतम्,4.915 |
| Rigveda_31_0081.wav,अतारिष्म तमसस्पारमस्य प्रति स्तोमं देवयन्तो,7.746 |
| Rigveda_40_0229.wav,पञ्च व्राता अपस्यवः,3.222 |
| Rigveda_38_0170.wav,पन्यांसं जातवेदसं यो देवतात्युद्यता,5.997 |
| Rigvedha_003_0292.wav,बृहत्स्वश्चन्द्रममवद्यदुक्थ्यमकृण्वत भियसा रोहणं दिवः,7.194 |
| Rigvedha_011_0144.wav,त्वमग्ने द्युभिस्त्वमाशुशुक्षणिस्त्वमद्भ्यस्त्वमश्मनस्परि,6.9540625 |
| RigVeda_42_0187.wav,स मृज्यमानः कविभिर्मदिन्तम स्वदस्वेन्द्राय पवमान पीतये,7.573 |
| Rigveda_31_0281.wav,स्वर्यदश्मन्नधिपा उ अन्धोऽभि मा वपुर्दृशये निनीयात्,7.342 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0157.wav,यास्ते राके सुमतयः सुपेशसो याभिर्ददासि दाशुषे वसूनि ताभिर्नो अद्य सुमना उपागहि सहस्रापोषं सुभगे रराणा,13.388 |
| Rigveda_36_0023.wav,पूर्वीष्ट इन्द्रोपमातयः पूर्वीरुत प्रशस्तयः सूनो हिन्वस्य हरिवः,9.637 |
| Rigveda_41_0225.wav,ऋधक्सोम स्वस्तये संजग्मानो दिवः कविः पवस्व सूर्यो दृशे,9.2680625 |
| RigVeda_51_0083.wav,स इयानः करति स्वस्तिमस्मा इषमूर्जं सुक्षितिं विश्वमाभाः,6.973 |
| Rigvedha_002_0298.wav,परि यदिन्द्र रोदसी उभे अबुभोजीर्महिना विश्वतः सीम्,6.438 |
| RigVeda_Part_028_0365.wav,हन्ता वृत्रमिन्द्रः शूशुवानः प्रावीन्नु वीरो जरितारमूती,7.413 |
| Atharvaveda_Part_014_0397.wav,य ऋते चिदभिश्रिषः पुरा जत्रुभ्य आतृदः,4.201 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0115.wav,नैनं विष्कन्धमश्नुते यस्त्वा बिभर्त्याञ्जन,4.773 |
| RigVeda_46_0304.wav,द्यौश्च नः पृथिवी च प्रचेतस ऋतावरी रक्षतामंहसो रिषः,7.11 |
| Rigvedha_001_0445.wav,मही द्यौः पृथिवी च न इमं यज्ञं मिमिक्षताम्,6.64 |
| RigVeda_43_0382.wav,नरे च दक्षिणावते देवाय सदनासदे,5.687 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0071.wav,यमे अध्वरो अधि मे निविष्टो भुवो विवस्वान् अन्वाततान,5.543 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0279.wav,परीममिन्द्रमायुषे महे श्रोत्राय धत्तन,5.269 |
| Atharvaveda_Part_020_30422.wav,स्वसारौ मातरिभ्वरी अरिप्रे हिन्वन्ति चैने शवसा वर्धयन्ति च,6.835 |
| RigVeda_Part_018_0384.wav,आ नपातः शवसो यातनोपेमं यज्ञं नमसा हूयमानाः,7.609 |
| RigVeda_Part_027_0381.wav,चित्रसेना इषुबला अमृध्राः सतोवीरा उरवो व्रातसाहाः,8.204 |
| Rigvedha_010_0229.wav,ताँ आ तिष्ठ तेभिरा याह्यर्वाङ्हवामहे त्वा सुत इन्द्र सोमे,8.854 |
| RigVeda_Part_023_0281.wav,वि वृक्षान्हन्त्युत हन्ति रक्षसो विश्वं बिभाय भुवनं महावधात्,7.958 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0179.wav,भ्रातृव्यक्षयणमसि भ्रातृव्यचातनं मे दाः स्वाहा सपत्नक्षयणमसि सपत्नचातनं मे दाः स्वाहा,11.392 |
| Rigveda_39_0040.wav,त्वा युजा वनेम तत्,2.875 |
| Rigveda_33_0415.wav,अग्निं गीर्भिर्हवामहे,3.554 |
| Rigveda_31_0127.wav,यतः परि जार इवाचरन्त्युषो ददृक्षे न,6.038 |
| Atharvaveda_Part_015_0141.wav,पर्यस्यास्मिंल्लोक आयतनं शिष्यते य एवं विदुषा व्रात्येनातिसृष्टो जुहोति,8.148 |
| Rigvedha_007_0139.wav,मत्र विधते दंसना भुवत्,2.752 |
| Rig_veda_45_0116.wav,युक्तं परि ष्वजाते लिबुजेव वृक्षम्,3.479 |
| Atharvaveda_Part_020_10227.wav,द्युम्नेषु पृतनाज्ये पृत्सुतूर्षु श्रवःसु च,5.053 |
| Rigvedha_004_0052.wav,कृष्णेभिरक्तोषा रुशद्भिर्वपुर्भिरा चरतो अन्यान्या,6.733 |
| Rigvedha_011_0277.wav,उतो अपो द्यां तस्तभ्वांसमहन्नहिं शूर वीर्येण,6.4680625 |
| RigVeda_Part_017_0223.wav,अग्ने तमद्याश्वं न स्तोमैः क्रतुं न भद्रं हृदिस्पृशम्,6.74 |
| RigVeda_Part_025_0051.wav,तुविग्राभं तुविकूर्मिं रभोदां गातुमिषे नक्षते तुम्रमच्छ,7.331 |
| RigVeda_Part_026_0027.wav,भरे वितन्तसाय्यः,3.697 |
| RigVeda_44_0293.wav,एष पुनानो मधुमाँ ऋतावेन्द्रायेन्दुः पवते स्वादुरूर्मिः,7.566 |
| Rigvedha_004_0054.wav,आमासु चिद्दधिषे पक्वमन्तः पयः कृष्णासु रुशद्रोहिणीषु,6.308 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0378.wav,त्यमू षु वाजिनं देवजूतं सहोवानं तरुतारं रथानाम्,6.556 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0115.wav,यत्प्राङ्प्रत्यङ्स्वधया यासि शीभं नानारूपे अहनी कर्षि मायया,7.647 |
| RigVeda_Part_025_0203.wav,स सत्यसत्वन्महते रणाय रथमा तिष्ठ तुविनृम्ण भीमम्,5.572 |
| RigVeda_Part_017_0159.wav,न यस्य सातुर्जनितोरवारि न मातरापितरा नू चिदिष्टौ,6.976 |
| Rigvedha_014_0180.wav,उत नो ब्रह्मन्नविष उक्थेषु देवहूतमः,4.8740625 |
| Rigveda_40_0135.wav,ता अभि सन्तमस्तृतं महे युवानमा दधुः,5.199 |
| RigVeda_Part_023_0166.wav,दस्रा हिरण्यवर्तनी सुषुम्ना सिन्धुवाहसा माध्वी मम श्रुतं हवम्,7.786 |
| Rigveda_30_0314.wav,मित्र साधयतं धियः,3.14 |
| RigVeda_Part_019_0140.wav,को मृळाति कतम आगमिष्ठो देवानामु कतमः शम्भविष्ठः,6.971 |
| Rigvedha_013_0166.wav,एतानि वामश्विना वर्धनानि ब्रह्म स्तोमं गृत्समदासो अक्रन्,7.7540625 |
| Rigvedha_002_0282.wav,एतायामोप गव्यन्त इन्द्रमस्माकं सु प्रमतिं वावृधाति,6.883 |
| Rigvedha_013_0177.wav,सोमापूषणाववतं धियं मे युवाभ्यां विश्वाः पृतना जयेम,7.522 |
| Rigveda_38_0186.wav,स पावक श्रुधी हवम्,3.434 |
| Rigvedha_013_0216.wav,या ते मन्म गृत्समदा ऋतावरि प्रिया देवेषु जुह्वति,5.5750625 |
| Rigvedha_007_0279.wav,अद्मसन्न ससतो बोधयन्ती शश्वत्तमागात्पुनरेयुषीणाम्,7.532 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0015.wav,सा नो भूमिस्त्विषिं बलं राष्ट्रे दधातूत्तमे,5.64 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0016.wav,देवो मणिः सपत्नहा धनसा धनसातये,4.789 |
| Rigveda_32_0084.wav,नू मर्तो दयते सनिष्यन्यो विष्णव उरुगायाय दाशत्,6.809 |
| Rigvedha_004_0160.wav,त्मना वहन्तो दुरो व्यृण्वन्नवन्त विश्वे स्वर्दृशीके,8.436 |
| Rigvedha_010_0158.wav,अर्चद्वृषा वृषभिः स्वेदुहव्यैर्मृगो नाश्नो अति यज्जुगुर्यात्,7.496 |
| Rigveda_36_0301.wav,यो जरितृभ्यो मघवा पुरूवसुः सहस्रेणेव शिक्षति,7.196 |
| Rigveda_30_0356.wav,विश्वा अविष्टं वाज आ पुरंधीस्ता नः शक्तं शचीपती शचीभिः,7.846 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0184.wav,क्रमध्वमग्निना नाकमुख्यान् हस्तेषु बिभ्रतः,4.643 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0091.wav,आरोहन् वर्चसा सह मणिर्दुर्णामचातनः,4.53 |
| Rigvedha_002_0347.wav,आणिं न रथ्यममृताधि तस्थुरिह ब्रवीतु य उ तच्चिकेतत्,5.989 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0252.wav,निरेवाप्रियस्य भ्रातृव्यस्य श्रियं दहति भवत्यात्मना योऽजं पञ्चौदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति अजं च पचत पञ्च चौदनान् सर्वा दिशः संमनसः सध्रीचीः सान्तर्देशाः प्रति गृह्णन्तु त एतम्,22.912 |
| Rigveda_32_0080.wav,वषट् ते विष्णवास आ कृणोमि तन्मे जुषस्व शिपिविष्ट हव्यम्,5.175 |
| Rig_veda_54_0157.wav,प्रसूतो भक्षमकरं चरावपि स्तोमं चेमं प्रथमः सूरिरुन्मृजे,7.924 |
| Rigveda_40_0076.wav,अनु द्रप्सास इन्दव आपो न प्रवतासरन्,5.736 |
| Rigveda_40_0531.wav,अभि ब्रह्मीरनूषत यह्वीरृतस्य मातरः,5.509 |
| Rigvedha_011_0121.wav,तास्ते विषं वि जभ्रिर उदकं कुम्भिनीरिव,4.861 |
| Rigveda_35_0416.wav,इन्द्राग्नी तस्य बोधतम्,3.437 |
| Rigvedha_007_0287.wav,व्युच्छन्ती रश्मिभिः सूर्यस्याञ्ज्यङ्क्ते समनगा इव व्राः,7.242 |
| Rigveda_40_0642.wav,अभि विश्वानि वार्याभि देवाँ ऋतावृधः,5.562 |
| RigVeda_Part_018_0078.wav,यस्य क्रतुर्विदथ्यो न सम्राट् साह्वान्तरुत्रो अभ्यस्ति कृष्टीः,10.288 |
| Rigvedha_009_0350.wav,अपाङ्प्राङेति स्वधया गृभीतो,4.039 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0211.wav,स्रामो भविष्यसीत्येनमाह तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम्,8.984 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0058.wav,दर्भेण त्वं कृणवद्वीर्याणि दर्भं बिभ्रदात्मना मा व्यथिष्ठाः,7.307 |
| Rigveda_38_0212.wav,ऊर्मिर्न नावमा वधीत्,3.689 |
| Rigvedha_003_0424.wav,अस्य शासुरुभयासः सचन्ते हविष्मन्त उशिजो ये च मर्ताः,6.417 |
| RigVeda_Part_017_0185.wav,कृष्णं त एम रुशतः पुरो भाश्चरिष्ण्वर्चिर्वपुषामिदेकम्,8.12 |
| RigVeda_44_0367.wav,आ हि द्यावापृथिवी अग्न उभे सदा पुत्रो न मातरा ततन्थ,7.004 |
| RigVeda_Part_020_0150.wav,आ ते अग्न ऋचा हविः शुक्रस्य शोचिषस्पते,5.418 |
| RigVeda_43_0161.wav,रथिरायतामुशती पुरंधिरस्मद्र्यगा दावने वसूनाम्,7.701 |
| Rig_veda_54_0226.wav,वृष्णे दधतो वृष्ण्यम्,2.934 |
| RigVeda_43_0158.wav,उत प्र पिप्य ऊधरघ्न्याया इन्दुर्धाराभिः सचते सुमेधाः,7.447 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0206.wav,उपब्दे पुनर्वो यन्तु यातवः पुनर्हेतिः किमीदिनः,5.647 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0109.wav,ब्रह्मेदमूर्ध्वं तिर्यक्चान्तरिक्षं व्यचो हितम्,4.986 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0198.wav,तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम्,5.214 |
| Rigveda_40_0186.wav,सोमा असृग्रमिन्दवः सुता ऋतस्य सादने,5.545 |
| Rigvedha_005_0284.wav,स त्वमग्ने सौभगत्वस्य विद्वानस्माकमायुः प्र तिरेह देव,7.158 |
| RigVeda_50_0026.wav,यदुदञ्चो वृषाकपे गृहमिन्द्राजगन्तन,4.634 |
| RigVeda_42_0269.wav,यथा पूर्वेभ्यः शतसा अमृध्रः सहस्रसाः पर्यया वाजमिन्दो,7.633 |
| RigVeda_49_0266.wav,सूर्याया अश्विना वराग्निरासीत्पुरोगवः,5.89 |
| RigVeda_Part_024_0163.wav,त्वद्विश्वा सुभग सौभगान्यग्ने वि यन्ति वनिनो न वयाः,6.746 |
| RigVeda_Part_027_0022.wav,सं पूषन्विदुषा नय यो अञ्जसानुशासति,5.738 |
| RigVeda_44_0326.wav,यत्र ज्योतिरजस्रं यस्मिँल्लोके स्वर्हितम्,5.109 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0038.wav,येन सोम साहन्त्यासुरान् रन्धयासि नः,4.491 |
| RigVeda_47_0364.wav,वृष्ण्या पौंस्यानि येभिरौक्षद्वृत्रहत्याय वज्री,5.768 |
| RigVeda_Part_020_0315.wav,अभ्यवस्थाः प्र जायन्ते प्र वव्रेर्वव्रिश्चिकेत,6.717 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0484.wav,त्वं स्त्री त्वं पुमान् असि त्वं कुमार उत वा कुमारी,5.876 |
| Rigvedha_006_0054.wav,तदस्येदं पश्यता भूरि पुष्टं श्रदिन्द्रस्य धत्तन वीर्याय,6.642 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0534.wav,त्मना देवेभ्यो अग्निर्हव्यं शमिता स्वदयतु,5.22 |
| Rigvedha_014_0157.wav,ता सोमस्येह तृम्पताम्,3.483 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0161.wav,पितरं च प्रयन्त्स्वः,2.837 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0009.wav,तिसृभिश्च वहसे त्रिंशता च वियुग्भिर्वाय इह ता वि मुञ्च,5.83 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0343.wav,निक्ष मे सर्वान् दुर्हार्दो निक्ष मे द्विषतो मणे,6.169 |
| Rigveda_37_0384.wav,व्रता रक्षन्ते अद्रुहः,3.418 |
| RigVeda_44_0144.wav,वृष्टिद्यावो रीत्यापः स्वर्विदः,3.881 |
| Rigveda_36_0133.wav,शुची रोचत आहुतः,3.559 |
| RigVeda_Part_015_0038.wav,आ नो भर भगमिन्द्र द्युमन्तं नि ते देष्णस्य धीमहि प्ररेके,7.414 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0243.wav,योऽजं पञ्चौदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति,5.666 |
| RigVeda_Part_020_0050.wav,कुमारं माता युवतिः समुब्धं गुहा बिभर्ति न ददाति पित्रे,6.766 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0315.wav,विद्म वै ते जायान्य जानं यतो जायान्य जायसे,5.919 |
| Rigveda_33_0306.wav,यन्नासत्या परावति यद्वा स्थो अध्यम्बरे,5.819 |
| RigVeda_53_0141.wav,तस्य पूषा प्रसवे याति विद्वान्सम्पश्यन्विश्वा भुवनानि गोपाः,8.853 |
| RigVeda_Part_017_0118.wav,अनूनेन बृहता वक्षथेनोप स्तभायदुपमिन्न रोधः,6.222 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0386.wav,उच्छिष्टे द्यावापृथिवी विश्वं भूतं समाहितम्,5.363 |
| RigVeda_Part_025_0137.wav,प्रातर्दनिः क्षत्रश्रीरस्तु श्रेष्ठो घने वृत्राणां सनये धनानाम्,8.154 |
| Atharvaveda_Part_020_40104.wav,स सुत्रामा स्ववामिन्द्रो अस्मदाराच्चिद्द्वेषः सनुतर्युयोतु,6.799 |
| RigVeda_Part_021_0225.wav,राधस्तन्नो विदद्वस उभयाहस्त्या भर,4.824 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0239.wav,न यस्याः पारं ददृशे न योयुवद्विश्वमस्यां नि विशते यदेजति,7.316 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0404.wav,विष्टारिणमोदनं ये पचन्ति नैनान् अवर्तिः सचते कदा चन,5.944 |
| RigVeda_Part_020_0159.wav,उतो न उत्पुपूर्या उक्थेषु शवसस्पत इषं स्तोतृभ्य आ भर,7.229 |
| Rigvedha_008_0152.wav,पिबतं मध्वो अन्धसः पूर्वपेयं हि वां हितम्,5.31 |
| Atharvaveda_Part_020_10111.wav,आ यो विश्वानि शवसा ततानोपश्रोता म ईवतो वचांसि,6.607 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0219.wav,इध्मेनाग्न इच्छमानो घृतेन जुहोमि हव्यं तरसे बलाय यावदीशे ब्रह्मणा वन्दमान इमां धियं शतसेयाय देवीम्,13.571 |
| RigVeda_47_0237.wav,अहं भुवं यजमानस्य,2.344 |
| Rigvedha_007_0333.wav,यजिष्ठं त्वा यजमाना हुवेम ज्येष्ठमङ्गिरसां विप्र मन्मभिर्वि,6.759 |
| Rigveda_38_0004.wav,पतिं वो अघ्न्यानां धेनूनामिषुध्यसि,5.182 |
| RigVeda_Part_021_0085.wav,इन्द्रो रथाय प्रवतं कृणोति यमध्यस्थान्मघवा वाजयन्तम्,7.642 |
| Rigveda_29_0346.wav,इमां वां मित्,1.784 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0309.wav,उदुत्सं शतधारं सहस्रधारमक्षितम्,4.469 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0347.wav,आपो अग्निं प्र हिणुत पितॄंरुपेमं यज्ञं पितरो मे जुषन्ताम् आसीनामूर्जमुप ये सचन्ते ते नो रयिं सर्ववीरं नि यछान्,14.145 |
| Rigveda_32_0043.wav,बृहस्पतिः स स्वावेश ऋष्वः पुरू सखिभ्य आसुतिं करिष्ठः,6.794 |
| RigVeda_47_0225.wav,प्र नेमस्मिन्ददृशे सोमो अन्तर्गोपा नेममाविरस्था कृणोति,7.113 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0348.wav,तेजो राष्ट्रस्य निर्हन्ति न वीरो जायते वृषा,5.609 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0340.wav,यमबध्नाद्बृहस्पतिर्वाताय मणिमाशवे,4.578 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0369.wav,येन मृतं स्नपयन्ति श्मश्रूणि येनोन्दते,5.292 |
| Atharvaveda_Part_020_10049.wav,दधिष्वा जठरे सुतं सोममिन्द्र वरेण्यम्,4.776 |
| Rigvedha_014_0099.wav,अपां नपातं सुभगं सुदीदितिं सुप्रतूर्तिमनेहसम्,6.6360625 |
| RigVeda_Part_028_0166.wav,वि भा अकः ससृजानः पृथिव्यां कृष्णपविरोषधीभिर्ववक्षे,7.148 |
| RigVeda_51_0067.wav,स सनीळेभिः प्रसहानो अस्य भ्रातुर्न ऋते सप्तथस्य मायाः स वाजं यातापदुष्पदा यन्स्वर्षाता परि षदत्सनिष्यन्,14.025 |
| Rigvedha_003_0065.wav,पूषन्निह क्रतुं विदः,3.049 |
| RigVeda_47_0100.wav,वि रोचतामरुषो भानुना शुचिः स्वर्ण शुक्रं शुशुचीत सत्पतिः,7.12 |
| RigVeda_50_0024.wav,पुनरेहि वृषाकपे सुविता कल्पयावहै,3.998 |
| Rigvedha_006_0200.wav,तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः,7.361 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0089.wav,मा नोऽभि स्रा मत्यं देवहेतिं मा नः क्रुधः पशुपते नमस्ते,6.439 |
| Rigveda_34_0340.wav,यो अग्नये ददाश हव्यदातिभिः,4.574 |
| RigVeda_Part_018_0236.wav,अत्राह दानुमातिरः,2.9 |
| Rigveda_40_0417.wav,शुचिः पावक उच्यते सोमः सुतस्य मध्वः,4.518 |
| Rigveda_40_0132.wav,महान्मही ऋतावृधा,3.626 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0560.wav,बृहस्पतिराङ्गिरसो वज्रं यमसिञ्चतासुरक्षयणं वधम्,5.491 |
| Rigvedha_002_0203.wav,गोमद्दस्रा हिरण्यवत्,3.099 |
| Atharvaveda_Part_017_0119.wav,त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्,7.411 |
| RigVeda_43_0069.wav,परि सोमः पवित्रे सर्गो न सृष्टो अदधावदर्वा,5.449 |
| RigVeda_Part_026_0138.wav,दिवोदासादतिथिग्वस्य राधः शाम्बरं वसु प्रत्यग्रभीष्म,7.535 |
| Atharvaveda_Part_020_10339.wav,शिक्षेयमस्मै दित्सेयं शचीपते मनीषिणे,5.28 |
| RigVeda_44_0363.wav,होतारं चित्ररथमध्वरस्य यज्ञस्ययज्ञस्य केतुं रुशन्तम्,7.146 |
| Rigvedha_007_0057.wav,युवं श्यावाय रुशतीमदत्तं महः क्षोणस्याश्विना कण्वाय,7.576 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0202.wav,सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद,5.775 |
| Rigveda_39_0197.wav,यदा मह्यं दीधरो भागमिन्द्रादिन्मया कृणवो वीर्याणि,7.361 |
| RigVeda_Part_020_0219.wav,ये अग्ने चन्द्र ते गिरः शुम्भन्त्यश्वराधसः,4.864 |
| Rigvedha_002_0444.wav,यत्पृथिवीं व्युन्दन्ति,2.634 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0220.wav,ये माघायव उदीच्या दिशोऽभिदासान्,4.974 |
| Rigveda_35_0376.wav,सर्गाँ इव सृजतं सुष्टुतीरुप श्यावाश्वस्य सुन्वतो मदच्युता,7.606 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0015.wav,अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः विश्वे देवा अदितिर्पञ्च जना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम्,10.97 |
| Rigveda_39_0002.wav,क्रतुं मंहिष्ठं चर्षणीनाम् पुरुहूतं पुरुष्टुतं गाथान्यं सनश्रुतम्,10.383 |
| Atharvaveda_Part_020_10328.wav,योगेयोगे तवस्तरं वाजेवाजे हवामहे,5.386 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0146.wav,मुखतस्ते प्रजा मरिष्यतीत्येनमाह,4.979 |
| RigVeda_48_0254.wav,सा प्रब्रुवाणा वरुणाय दाशुषे देवेभ्यो दाशद्धविषा विवस्वते,8.83 |
| Rigveda_29_0454.wav,उतेमग्निः सरस्वती जुनन्ति न तस्य रायः पर्येतास्ति,5.634 |
| Rigveda_38_0142.wav,वरेथे अग्निमातपो वदते वल्ग्वत्रये,5.676 |
| Rigvedha_008_0031.wav,पाहि नो दूरादारादभिष्टिभिः सदा पाह्यभिष्टिभिः,6.54 |
| Rigveda_32_0132.wav,ब्राह्मणासो अतिरात्रे न सोमे सरो न पूर्णमभितो वदन्तः,7.601 |
| Rig_veda_54_0130.wav,श्च पुरुषेभ्यश्चास्तु मा नो हिंसीदिह देवाः कपोतः,7.361 |
| Rigvedha_012_0200.wav,ते विद्वांसः प्रतिचक्ष्यानृता पुनर्यत उ आयन्तदुदीयुराविशम्,7.2890625 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0065.wav,दिवो मूलमवततं पृथिव्या अध्युत्ततम्,4.18 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0224.wav,इन्द्रस्यौज स्थेन्द्रस्य सह स्थेन्द्रस्य बलं स्थेन्द्रस्य वीर्यं स्थेन्द्रस्य नृम्णं स्थ जिष्णवे योगाय ब्रह्मयोगैर्वो युनज्मि,14.312 |
| RigVeda_Part_023_0138.wav,यत्समुद्राति पर्षथः पक्वाः पृक्षो भरन्त वाम्,6.0 |
| Rigvedha_007_0096.wav,एतानि वामश्विना वीर्याणि प्र पूर्व्याण्यायवोऽवोचन्,7.474 |
| RigVeda_Part_026_0025.wav,त्वया जेष्म हितं धनम्,3.994 |
| RigVeda_49_0076.wav,त्वं जघन्थ नमुचिं मखस्युं दासं कृण्वान ऋषये विमायम्,6.474 |
| RigVeda_Part_023_0202.wav,हंसाविव पततमा सुताँ उप,4.131 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0244.wav,अभिवृत्य सपत्नान् अभि या नो अरातयः,4.475 |
| Rigveda_37_0067.wav,आ नो विश्वेषां रसं मध्वः सिञ्चन्त्वद्रयः,5.523 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0022.wav,अजीतोऽहतो अक्षतोऽध्यष्ठां पृथिवीमहम्,4.572 |
| Rigvedha_008_0221.wav,युवोर्विश्वा अधि श्रियः पृक्षश्च विश्ववेदसा,5.231 |
| Rigvedha_003_0041.wav,अरिष्टः सर्व एधते,2.71 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0466.wav,प्रियो दृश इव भूत्वा गन्धर्वः सचते स्त्रियस् तमितो नाशयामसि ब्रह्मणा वीर्यावता,9.321 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0013.wav,दिवि स्पृष्टो यजतः सूर्यत्वगवयाता हरसो दैव्यस्य,6.034 |
| Atharvaveda_Part_020_20008.wav,ह्वा समञ्जे,3.703 |
| Rig_veda_45_0007.wav,सं यस्मिन्विश्वा वसूनि जग्मुर्वाजे नाश्वाः,5.167 |
| Rigveda_37_0043.wav,अस्मे रयिः पप्रथे वृष्ण्यं शवोऽ,3.579 |
| Rigveda_33_0250.wav,अन्विन्द्रं वृत्रतूर्ये,3.588 |
| RigVeda_53_0142.wav,नृचक्षा एष दिवो मध्य आस्त आपप्रिवान्रोदसी अन्तरिक्षम्,8.941 |
| RigVeda_Part_015_0365.wav,प्र सुगोपा यवसं धेनवो यथा ह्रदं कुल्या इवाशत,6.3 |
| RigVeda_49_0239.wav,तिग्मेषव आयुधा संशिशाना अभि प्र यन्तु नरो अग्निरूपाः,7.94 |
| Rigveda_40_0056.wav,सुष्टुताः,1.403 |
| Rigvedha_007_0256.wav,सदृशीरद्य सदृशीरिदु श्वो दीर्घं सचन्ते वरुणस्य धाम,6.814 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0176.wav,मा नो हासिष्ट जनुषा सुभागा रायश्च पोषैरभि नः सचध्वम्,7.507 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0125.wav,धनुर्हस्तादाददानो मृतस्य सह क्षत्रेण वर्चसा बलेन,6.658 |
| Atharvaveda_Part_020_40097.wav,गव्यन्त इन्द्रं सख्याय विप्रा अश्वायन्तो वृषणं वाजयन्तः,7.048 |
| Rigveda_29_0373.wav,अभि त्रिपृष्ठैः सवनेषु सोमैर्मदे सुशिप्रा महभिः पृणध्वम्,6.519 |
| Atharvaveda_Part_015_0162.wav,बलेनान्नादेनान्नमत्ति य एवं वेद स यत्प्रतीचीं दिशमनु व्यचलद्वरुणो राजा भूत्वानुव्यचलदपोऽन्नादीः कृत्वा,14.076 |
| RigVeda_46_0301.wav,यो वो गोपीथे न भयस्य वेद ते स्याम देववीतये तुरासः,7.548 |
| Rigvedha_001_0001.wav,ॐ,2.653 |
| Rigvedha_010_0327.wav,ता वामद्य तावपरं हुवेमोच्छन्त्यामुषसि वह्निरुक्थैः,7.905 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0527.wav,ऊर्ध्वाया दिशोऽभिदासन्त्यस्मान्,4.039 |
| RigVeda_47_0202.wav,अहं भुवं वसुनः,1.87 |
| Rigveda_36_0275.wav,निष्कं वा घा कृणवते स्रजं वा दुहितर्दिवः,5.828 |
| RigVeda_51_0277.wav,कस्त एना अव सृजादयुध्व्युतास्माकमायुधा सन्ति तिग्मा,7.243 |
| RigVeda_Part_026_0079.wav,विश्वा सु नो विथुरा पिब्दना वसोऽमित्रान्सुषहान्कृधि,7.21 |
| Rigveda_32_0266.wav,यन्ति प्रमादमतन्द्राः ओ षु प्र याहि वाजेभिर्मा हृणीथा अभ्यस्मान्,11.123 |
| Rigvedha_001_0358.wav,मा नः शंसो अररुषो धूर्तिः प्रणङ्मर्त्यस्य,5.644 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0040.wav,यां त्वा गन्धर्वो अखनद्वरुणाय मृतभ्रजे,5.083 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0542.wav,आमिक्षां दुह्रतां दात्रे क्षीरं सर्पिरथो मधु,5.306 |
| Rigveda_38_0087.wav,अच्छा यज्ञासो नमसा पुरूवसुं पुरुप्रशस्तमूतये अग्निं सूनुं सहसो जातवेदसं दानाय वार्याणाम्,14.88 |
| Rigvedha_007_0323.wav,पूर्वामनु प्रयतिमा ददे वस्त्रीन्युक्ताँ अष्टावरिधायसो गाः,8.719 |
| Rigvedha_013_0107.wav,एष स्य ते तन्वो नृम्णवर्धनः सह ओजः प्रदिवि बाह्वोर्हितः,7.566 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0787.wav,यथा चक्रुर्देवासुरा यथा मनुष्या उत,4.819 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0121.wav,शं नो धाता शमु धर्ता नो अस्तु शं न उरूची भवतु स्वधाभिः,6.926 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0207.wav,पूतौ पवित्रैरुप तद्ध्वयेथां यद्यद्रेतो अधि वां संबभूव,6.471 |
| Rigvedha_001_0429.wav,हिरण्यपाणिमूतये सवितारमुप ह्वये,5.464 |
| RigVeda_Part_021_0324.wav,समश्विनोरवसा नूतनेन मयोभुवा सुप्रणीती गमेम,6.514 |
| Atharvaveda_Part_020_30321.wav,आन्त्रेभ्यस्ते गुदाभ्यो वनिष्ठोरुदरादधि,4.881 |
| Rigvedha_008_0023.wav,वनेम तद्धोत्रया चितन्त्या वनेम रयिं रयिवः सुवीर्यं रण्वं सन्तं सुवीर्यम्,10.151 |
| RigVeda_53_0001.wav,नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत्,9.093 |
| Rigvedha_007_0367.wav,महि शविष्ठ नस्कृधि संचक्षे भुजे अस्यै,4.679 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0017.wav,इयं ते धीतिरिदमु ते जनित्रं गृह्णातु त्वामदितिः शूरपुत्रा,7.113 |
| Atharvaveda_Part_018_1_0156.wav,को अद्य युङ्क्ते धुरि गा ऋतस्य शिमीवतो भामिनो दुर्हृणायून्,6.952 |
| Atharvaveda_Part_018_1_0190.wav,श्रुधी नो अग्ने सदने सधस्थे युक्ष्वा रथममृतस्य द्रवित्नुम्,6.444 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0105.wav,नृचक्षा रक्षः परि पश्य विक्षु तस्य त्रीणि प्रति शृणीह्यग्रा,6.424 |
| RigVeda_43_0154.wav,हरिः पर्यद्रवज्जाः सूर्यस्य द्रोणं ननक्षे अत्यो न वाजी,7.227 |
| Rigveda_30_0242.wav,प्रव्राजे चिन्नद्यो गाधमस्ति पारं नो अस्य विष्पितस्य पर्षन्,7.755 |
| Atharvaveda_Part_020_30018.wav,सो चिन् नु वृष्टिर्यूथ्या स्वा सचामिन्द्रः श्मश्रूणि हरिताभि प्रुष्णुते,9.428 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0027.wav,पयस्वान् अग्न आगमं तं मा सं सृज वर्चसा सं माग्ने वर्चसा सृज सं प्रजया समायुषा,10.753 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0417.wav,येनातरन् भूतकृतोऽति मृत्युं यमन्वविन्दन् तपसा श्रमेण यं पपाच ब्रह्मणे ब्रह्म पूर्वं तेनौदनेनाति तराणि मृत्युम्,12.771 |
| Rigveda_40_0119.wav,परि गव्यान्यव्यत,2.562 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0333.wav,यमबध्नाद्बृहस्पतिर्वाताय मणिमाशवे सो अस्मै वाजिनमिद्दुहे भूयोभूयः श्वःश्वस्तेन त्वं द्विषतो जहि,11.279 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0076.wav,स नो मृड पशुपते नमस्ते परः क्रोष्टारो अभिभाः श्वानः परो यन्त्वघरुदो विकेश्यः,9.206 |
| Rigveda_37_0122.wav,सहस्रं शंसा उत ये गविष्,3.037 |
| Rigvedha_011_0185.wav,उभयासो जातवेदः स्याम ते स्तोतारो अग्ने सूरयश्च शर्मणि,7.503 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0179.wav,दक्षं त उग्रमाभारिषं परा यक्ष्मं सुवामि ते,5.21 |
| Rigveda_33_0164.wav,उत प्र वर्धया मतिम्,2.445 |
| RigVeda_43_0216.wav,स्वायुधः सोतृभिः पूयमानोऽभ्यर्ष गुह्यं चारु नाम,6.023 |
| RigVeda_Part_017_0197.wav,स होता सेदु दूत्यं चिकित्वाँ अन्तरीयते,6.76 |
| Rigveda_31_0008.wav,आ वल्गू विप्रो ववृतीत,4.283 |
| RigVeda_Part_017_0377.wav,सखा पिता पितृतमः पितॄणां कर्तेमु लोकमुशते वयोधाः,7.775 |
| Atharvaveda_Part_020_10385.wav,उत स्म सद्न हर्यतस्य पस्त्योरत्यो न वाजं हरिवामचिक्रदत्,8.187 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0213.wav,अदन्ति त्वा पिपीलिका वि वृश्चन्ति मयूर्यः सर्वे भल ब्रवाथ शार्कोटमरसं विषम्,9.004 |
| RigVeda_Part_021_0133.wav,एवा हि त्वामृतुथा यातयन्तं मघा विप्रेभ्यो ददतं शृणोमि,7.487 |
| Rigveda_32_0134.wav,अध्वर्यवो घर्मिणः सिष्विदाना आविर्भवन्ति गुह्या न के चित्,7.691 |
| Atharvaveda_Part_014_0374.wav,विश्वावसो ब्रह्मणा ते नमोऽभि जाया अप्सरसः परेहि,5.523 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0043.wav,ममान्तरिक्षमुरुलोकमस्तु मह्यं वातः पवतां कामायास्मै,7.261 |
| Rigvedha_001_0225.wav,हव्यवाहं पुरुप्रियम्,3.276 |
| RigVeda_Part_017_0301.wav,तं युवं देवावश्विना कुमारं साहदेव्यम्,5.851 |
| RigVeda_46_0146.wav,गिरश्च ये ते तुविजात पूर्वीर्नर इन्द्र प्रतिशिक्षन्त्यन्नैः,6.986 |
| RigVeda_Part_024_0299.wav,उप च्छायामिव घृणेरगन्म शर्म ते वयम्,4.742 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0235.wav,योऽजं पञ्चौदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति,5.801 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0011.wav,सप्त मर्यादाः कवयस्ततक्षुस्तासामिदेकामभ्यंहुरो गात्,6.876 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0301.wav,यदेतदस्मान् भोजय यथेदन्यान् उपायसि,4.551 |
| RigVeda_Part_023_0019.wav,तेन नो मित्रावरुणावविष्टं सिषासन्तो जिगीवांसः स्याम,7.027 |
| Rigvedha_004_0121.wav,रयिर्न चित्रा सूरो न संदृगायुर्न प्राणो नित्यो न सूनुः,6.123 |
| Rigvedha_007_0160.wav,मा कस्मै धातमभ्यमित्रिणे नो मा,4.549 |
| Rigvedha_007_0178.wav,तक्षद्वज्रं नियुतं तस्तम्भद्द्यां चतुष्पदे नर्याय द्विपादे,7.343 |
| Rigvedha_009_0235.wav,न वा उ एतन्म्रियसे न रिष्यसि देवाँ इदेषि पथिभिः सुगेभिः,7.139 |
| Rigveda_31_0203.wav,युवोर्हि सख्यमुत वा यदाप्यं मार्डीकमिन्द्रावरुणा नि यच्छतम्,7.75 |
| Rig_veda_45_0046.wav,दिवि मूर्धानं दधिषे स्वर्षां जिह्वामग्ने चकृषे हव्यवाहम्,7.43 |
| Rigvedha_013_0134.wav,क्यागात्,1.6470625 |
| RigVeda_Part_027_0107.wav,इरज्यन्ता वसव्यस्य भूरेः सहस्तमा सहसा वाजयन्ता,7.158 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0010.wav,गवामश्वानां वयसश्च विष्ठा भगं वर्चः पृथिवी नो दधातु,6.475 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0544.wav,आमिक्षां दुह्रतां दात्रे क्षीरं सर्पिरथो मधु,5.281 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0359.wav,शतं वर्मसु वर्म ते तेनेमं वर्मिणं कृत्वा सपत्नां जहि वीर्यैः,8.411 |
| Rigvedha_014_0059.wav,व्यङ्गेभिर्दिद्युतानः सधस्थ एकामिव रोदसी आ विवेश,6.7330625 |
| Rigvedha_003_0194.wav,एषायुक्त परावतः सूर्यस्योदयनादधि,4.824 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0185.wav,उक्षन्तूद्ना मरुतो घृतेन भगो नो राजा नि कृषिं तनोतु,6.23 |
| Rigvedha_004_0311.wav,अस्माकमिद्वृधे भव,2.963 |
| RigVeda_Part_017_0104.wav,महो रुजामि बन्धुता वचोभिस्तन्मा पितुर्गोतमादन्वियाय,7.419 |
| Rigveda_30_0129.wav,अमीवहा वास्तोष्पते विश्वा रूपाण्याविशन्,6.697 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0239.wav,यः कृणोति मृतवत्सामवतोकामिमां स्त्रियम्,4.758 |
| RigVeda_49_0194.wav,स आशिषा द्रविणमिच्छमानः प्रथमच्छदवराँ आ विवेश,6.829 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0043.wav,मधुमतो लोकान् जयति य एवं वेद यद्वीध्रे स्तनयति प्रजापतिरेव तत्प्रजाभ्यः प्रादुर्भवति,10.6 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0084.wav,सपत्ना अस्मदधरे भवन्तूत्तमं नाकमधि रोहयेमम्,6.068 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0307.wav,विन्दस्व त्वं पुत्रं नारि यस्तुभ्यं शमसच्छमु तस्मै त्वं भव यासां द्यौः पिता पृथिवी माता समुद्रो मूलं वीरुधां बभूव तास्त्वा पुत्रविद्याय दैवीः प्रावन्त्वोषधयः पयस्वतीरोषधयः पयस्वन् मामकं वचः अथो पयस्वतीनामा भरेऽहं सहस्रशः वेदाहं पयस्वन्तं चकार धान्यं बहु,31.706 |
| RigVeda_43_0096.wav,सहस्रधारो असदन्न्यस्मे मातुरुपस्थे वन आ च सोमः,7.309 |
| RigVeda_Part_020_0378.wav,स नो विश्वा अति द्विषः पर्षन्नावेव सुक्रतुः,5.715 |
| RigVeda_Part_027_0152.wav,सा नो विश्वा अति द्विषः स्वसॄरन्या ऋतावरी,5.562 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0699.wav,यो अङ्ग्यो यः कर्ण्यो यो अक्ष्योर्विसल्पकः,4.095 |
| Atharvaveda_Part_020_20463.wav,य एकश्चर्षणीनां वसूनामिरज्यति,4.145 |
| RigVeda_Part_025_0153.wav,अभ्यावर्ती चायमानो ददाति दूणाशेयं दक्षिणा पार्थवानाम्,7.825 |
| Atharvaveda_Part_015_0073.wav,तस्मै दक्षिणाया दिशो अन्तर्देशाच्छर्वमिष्वासमनुष्ठातारमकुर्वन् शर्व एनमिश्वासो दक्षिणाया दिशो अन्तर्देशादनुष्ठातानु तिष्ठति नैनं शर्वो न भवो नेशानः,17.864 |
| RigVeda_Part_021_0212.wav,पुष्यात्क्षेमे अभि योगे भवात्युभे वृतौ संयती सं जयाति,7.791 |
| RigVeda_48_0213.wav,अज एकपात्सुहवेभिरृक्वभिरहिः शृणोतु बुध्न्यो हवीमनि,9.826 |
| Rigveda_38_0139.wav,अन्ति षद्भूतु वामवः,3.447 |
| Atharvaveda_Part_020_10008.wav,स्तोमैर्विधेमाग्नये,3.522 |
| Rigvedha_006_0292.wav,आवहन्ती पोष्या वार्याणि चित्रं केतुं कृणुते चेकिताना,8.102 |
| Atharvaveda_Part_014_0312.wav,आ वामगन्त्सुमतिर्वाजिनीवसू न्यश्विना हृत्सु कामा अरंसत,6.806 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0407.wav,रथी ह भूत्वा रथयान ईयते पक्षी ह भूत्वाति दिवः समेति,6.921 |
| Rigvedha_014_0262.wav,दधिक्रामग्निमुषसं च देवीं बृहस्पतिं सवितारं च देवम्,6.9790625 |
| RigVeda_Part_028_0027.wav,त्वा युजा पृतनायूँरभि ष्याम्,4.177 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0331.wav,ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं वि रक्षति,4.921 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0620.wav,भूतं मा तस्माद्भव्यं च द्रुपदादिव मुञ्चताम्,5.263 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0497.wav,यथा दिव्यादित्याय समनमन्न् एवा मह्यं संनमः सं नमन्तु,7.051 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0086.wav,अनुहवं परिहवं परिवादं परिक्षवम्,4.474 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0337.wav,निर्हस्ताः शत्रवः स्थनेन्द्रो वोऽद्य पराशरीत्,5.362 |
| RigVeda_Part_027_0205.wav,उत म ऋज्रे पुरयस्य रघ्वी सुमीळ्हे शतं पेरुके च पक्वा,7.295 |
| Rigvedha_001_0161.wav,इन्द्राय सोमपीतये,3.687 |
| Rigveda_40_0268.wav,त्येतशः,1.31 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0110.wav,अग्ने जातान् प्र णुदा मे सपत्नान् प्रत्यजातान् जातवेदो नुदस्व अधस्पदं कृणुष्व ये पृतन्यवोऽनागसस्ते वयमदितये स्याम,13.694 |
| Atharvaveda_Part_015_0079.wav,तस्मै ध्रुवाया दिशो अन्तर्देशाद्रुद्रमिष्वासमनुष्ठातारमकुर्वन् रुद्र एनमिष्वासो ध्रुवाया दिशो अन्तर्देशादनुष्ठातानु तिष्ठति नैनं शर्वो न भवो नेशानः,18.222 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0033.wav,अथो भगस्य नो धेह्यथो नः सुहवो भव,4.77 |
| RigVeda_Part_019_0130.wav,विदुष्टे विश्वा भुवनानि तस्य ता प्र ब्रवीषि वरुणाय वेधः,6.819 |
| Rigvedha_006_0089.wav,कद्व ऋतं कदनृतं क्व प्रत्ना व आहुतिर्वित्तं मे अस्य रोदसी,7.315 |
| Rigveda_31_0253.wav,समानमिन्मे कवयश्चिदाहुरयं ह तुभ्यं वरुणो हृणीते,6.338 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0408.wav,समृद्धिरोज आकूतिः क्षत्रं राष्ट्रं षडुर्व्यः संवत्सरोऽध्युच्छिष्ट इडा प्रैषा ग्रहा हविः,10.156 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0078.wav,नमः सनिस्रसाक्षेभ्यो नमः संदेश्येभ्यः नमः क्षेत्रस्य पतये वीरुत्क्षेत्रियनाशन्यप क्षेत्रियमुच्छतु,11.662 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0109.wav,सं मायमग्निः सिञ्चतु प्रजया च धनेन च दीर्घमायुः कृणोतु मे,6.846 |
| RigVeda_Part_021_0165.wav,वेतीद्वस्य प्रयता यतंकरो न किल्बिषादीषते वस्व आकरः,7.252 |
| Rigveda_40_0110.wav,ते नो धान्तु सुवीर्यम्,3.481 |
| RigVeda_46_0147.wav,मात्रे नु ते सुमिते इन्द्र पूर्वी द्यौर्मज्मना पृथिवी काव्येन,8.081 |
| RigVeda_Part_017_0062.wav,कद्धिष्ण्यासु वृधसानो अग्ने कद्वाताय प्रतवसे शुभंये,7.372 |
| RigVeda_Part_025_0194.wav,राजाभवो जगतश्चर्षणीनां साकं सूर्यं जनयन्द्यामुषासम्,7.868 |
| RigVeda_Part_026_0241.wav,महस्करथो वरिवो यथा नोऽस्मे क्षयाय धिषणे अनेहः,7.924 |
| Rigveda_35_0100.wav,आदित्येषु प्र वरुणे धृतव्रते मरुत्सु विश्वभानुषु,6.664 |
| RigVeda_48_0132.wav,विश्वत्र यस्मिन्ना गिरः समीचीः पूर्वीव गातुर्दाशत्सूनृतायै,8.114 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0060.wav,जाङ्गिडोऽसि जङ्गिडो रक्षितासि जङ्गिडः,4.033 |
| RigVeda_53_0022.wav,यद्देवा देवमयजन्त विश्वे,4.602 |
| Rigvedha_003_0071.wav,कद्रुद्राय प्रचेतसे मीळ्हुष्टमाय तव्यसे,5.406 |
| Rigveda_30_0122.wav,स्तिभिः सदा नः,1.833 |
| RigVeda_50_0278.wav,वावर्त येषां राया युक्,2.644 |
| Atharvaveda_Part_015_0136.wav,तद्यस्यैवं विद्वान् व्रात्य उद्धृतेष्वग्निष्वधिश्रितेऽग्निहोत्रेऽतिथिर्गृहान् आगछेत्,9.022 |
| RigVeda_Part_022_0059.wav,उभा नासत्या रुद्रो अध ग्नाः पूषा भगः सरस्वती जुषन्त,6.465 |
| RigVeda_Part_021_0278.wav,आ दैव्यानि पार्थिवानि जन्मापश्चाच्छा सुमखाय वोचम्,7.079 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0324.wav,अक्षितिं भूयसीम्,2.656 |
| Rigveda_29_0174.wav,स वीरो अप्रतिष्कुत इन्द्रेण शूशुवे नृभिः,3.653 |
| RigVeda_Part_024_0141.wav,त्वं होता मन्द्रतमो नो अध्रुगन्तर्देवो विदथा मर्त्येषु,6.577 |
| RigVeda_Part_026_0319.wav,इमा हव्या जुषन्त नः,3.114 |
| Atharvaveda_Part_020_20066.wav,एते स्तोमा नरां नृतम तुभ्यमस्मद्र्यञ्चो ददतो मघानि,7.022 |
| RigVeda_47_0008.wav,युवं ह रेभं वृषणा गुहा हितमुदैरयतं ममृवांसमश्विना,6.997 |
| RigVeda_Part_027_0198.wav,प्र मायाभिर्मायिना भूतमत्र नरा नृतू जनिमन्यज्ञियानाम्,7.587 |
| Rigveda_37_0104.wav,आदित्साप्तस्य चर्किरन्नानूनस्य महि श्रवः,5.824 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0182.wav,दिवस्पृष्ठे धावमानं सुपर्णमदित्याः पुत्रं नाथकाम उप यामि भीतः,7.115 |
| RigVeda_53_0276.wav,अग्ने देवाँ आ वह नः प्रियव्रतान्मृळीकाय प्रियव्रतान् अग्निर्देवो देवानामभवत्पुरोहितोऽग्निं मनुष्या ऋषयः समीधिरे,21.797 |
| Rigvedha_012_0270.wav,माहं मघोनो वरुण प्रियस्य भूरिदाव्न आ विदं शूनमापेः,6.88 |
| Rigvedha_006_0270.wav,भास्वती नेत्री सूनृतानामचेति चित्रा वि दुरो न आवः,7.759 |
| Rigvedha_006_0193.wav,तरणित्वा ये पितुरस्य सश्चिर ऋभवो वाजमरुहन्दिवो रजः,6.309 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0122.wav,यदाञ्जनं त्रैककुदं जातं हिमवतस्परि,4.432 |
| Rigveda_40_0648.wav,इन्दुमिन्द्राय पीतये,3.095 |
| RigVeda_Part_024_0359.wav,उग्रमुग्रस्य तवसस्तवीयोऽरध्रस्य रध्रतुरो बभूव,6.03 |
| RigVeda_Part_026_0231.wav,तस्य ते शर्मन्नुपदद्यमाने राया मदेम तन्वा तना च,11.215 |
| Rigvedha_011_0096.wav,अदृष्टान्हन्त्यायत्यथो हन्ति परायती,4.516 |
| Atharvaveda_Part_020_20186.wav,विमदन् बर्हिरासरन्,2.751 |
| Rigveda_38_0131.wav,अन्ति षद्भूतु वामवः,3.156 |
| Atharvaveda_Part_020_40267.wav,उग्रं वनिषदाततम्,2.405 |
| Atharvaveda_Part_020_10029.wav,इन्द्रो वृत्राणि जिघ्नते,3.258 |
| Rigveda_33_0429.wav,पन्थामृतस्य यातवे तमीमहे,4.82 |
| Rigveda_29_0204.wav,स्तोतारमिद्दिधिषेय रदावसो न पाप,3.037 |
| RigVeda_Part_028_0366.wav,कर्ता सुदासे अह वा उ लोकं दाता वसु मुहुरा दाशुषे भूत्,7.645 |
| Rigvedha_007_0108.wav,परि वामश्वा वपुषः,2.221 |
| Atharvaveda_Part_020_20065.wav,ये ते हवेभिर्वि पणींरदाशन्न् अस्मान् वृणीष्व युज्याय तस्मै,8.232 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0318.wav,तौ रक्षति तपसा ब्रह्मचारी तत्केवलं कृणुते ब्रह्म विद्वान्,6.492 |
| Rigveda_29_0048.wav,याहि वायुर्न नियुतो नो अच्छा त्वं हि धीभिर्दयसे वि वाजान्,6.889 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0135.wav,तत्रामृतस्य चक्षणं ततः कुष्,2.705 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0316.wav,कथं ह तत्र त्वं हनो यस्य कृण्मो हविर्गृहे धृषत्पिब कलशे सोममिन्द्र वृत्रहा शूर समरे वसूनाम्,10.89 |
| Rigveda_34_0356.wav,विप्रा अग्निमवसे प्रत्नमीळते,5.084 |
| Rigvedha_009_0147.wav,शिरो यदस्य त्रैतनो वितक्षत्स्वयं दास उरो अंसावपि ग्ध दीर्घतमा मामतेयो जुजुर्वान्दशमे युगे,11.992 |
| Rig_veda_54_0070.wav,मुञ्चामि त्वा हविषा जीवनाय कमज्ञातयक्ष्मादुत राजयक्ष्मात्,7.806 |
| Rigveda_33_0438.wav,यत्सूर्यो न रोदसी अवर्धयत्,3.915 |
| Rigvedha_002_0161.wav,आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ,7.195 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0632.wav,अपमित्य धान्यं यज्जघसाहमिदं तदग्ने अनृणो भवामि,7.722 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0131.wav,इतस्ताः सर्वा नश्यन्तु वाका अपचितामिव,4.991 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0367.wav,अश्रूणि कृपमानस्य यानि जीतस्य वावृतुः,4.819 |
| Rigveda_33_0206.wav,वपन्ति मरुतो मिहं प्र वेपयन्ति पर्वतान्,5.278 |
| Rigveda_37_0030.wav,यस्मा अर्कं सप्तशीर्षाणमानृचुस्त्रिधातुमुत्तमे पदे,7.157 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0624.wav,यां ते चक्रुर्गार्हपत्ये पूर्वाग्नावुत दुश्चितः,6.186 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0487.wav,अस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् कर्मण्यस्यां पुरोधायामस्यां प्रतिष्ठायामस्याम् चित्त्यामस्यामाकूत्यामस्यामाशिष्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा,14.606 |
| RigVeda_47_0222.wav,प्र मे नमी साप्य इषे भुजे भूद्गवामेषे स,5.517 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0231.wav,न बहवः समशकन् नार्भका अभि दाधृषुः,4.588 |
| Rigveda_33_0547.wav,इन्द्र त्वमवितेदसीत्था स्तुवतो अद्रिवः,5.796 |
| Rigvedha_006_0168.wav,अश्रवं हि भूरिदावत्तरा वां विजामातुरुत वा घा स्यालात्,8.209 |
| Atharvaveda_Part_020_30294.wav,यदि क्षितायुर्यदि वा परेतो यदि मृत्योरन्तिकं नीत एव,6.418 |
| RigVeda_Part_024_0197.wav,अग्निमग्निं वः समिधा दुवस्यत प्रियम्प्रियं वो अतिथिं गृणीषणि,6.692 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0336.wav,एनीः श्येनीः सरूपा विरूपास्तिलवत्सा उप तिष्ठन्तु त्वात्र,7.075 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0494.wav,मुञ्चन्तु मा शपथ्यादथो वरुण्यादुत,5.811 |
| RigVeda_Part_018_0368.wav,अपो ह्येषामजुषन्त देवा अभि क्रत्वा मनसा दीध्यानाः,8.33 |
| Rigveda_40_0411.wav,सस्निर्यो अनुमाद्यः,3.027 |
| Atharvaveda_Part_020_10129.wav,सीदता बर्हिरुरु वः सदस्कृतं मादयध्वं मरुतो मध्वो अन्धसः,5.979 |
| RigVeda_Part_018_0191.wav,आदाय श्येनो अभरत्सोमं सहस्रं सवाँ अयुतं च साकम्,8.266 |
| Rigveda_33_0363.wav,क्रमणेषु तिष्ठथः,2.249 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0222.wav,आरे अश्मा यमस्यथ,2.849 |
| RigVeda_46_0165.wav,सं जानते मनसा सं चिकित्रेऽध्वर्यवो धिषणापश्च देवीः,7.574 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0076.wav,उग्र इत्ते वनस्पत इन्द्र ओज्मानमा दधौ,4.883 |
| RigVeda_Part_027_0075.wav,इन्द्रस्य चा रभामहे,3.093 |
| Rigvedha_001_0466.wav,अस्य सोमस्य पीतये,3.298 |
| RigVeda_48_0307.wav,विप्रं पदमङ्गिरसो दधाना यज्ञस्य धाम प्रथमं मनन्त,6.977 |
| Rigveda_29_0345.wav,वि सानुना पृथिवी सस्र उर्वी पृथु प्रतीकमध्येधे अग्निः,6.456 |
| Atharvaveda_Part_018_1_0149.wav,न ते सखा सख्यं वष्ट्येतत्सलक्ष्मा यद्विषुरूपा भवति,6.44 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0316.wav,पुष्टानि संसृजति द्वयानि,2.516 |
| Atharvaveda_Part_015_0169.wav,स्वधाकारेणान्नादेनान्नमत्ति य एवं वेद स यन् मनुष्यान् अनु व्यचलदग्निर्भूत्वानुव्यचलत्स्वाहाकारमन्नादं कृत्वास्वाहाकारेणान्नादेनान्नमत्ति य एवं वेद,20.364 |
| Atharvaveda_Part_020_40099.wav,विपिपाना शुभस्पती इन्द्रं कर्मस्वावतम्,4.329 |
| RigVeda_53_0218.wav,नह्यस्या नाम गृभ्णामि नो अस्मिन्रमते जने,6.8 |
| Rigvedha_001_0046.wav,इन्द्रा याहि धियेषितो विप्रजूतः सुतावतः,6.5 |
| Rigveda_33_0548.wav,ऋतादियर्मि ते धियं मनोयुजम्,4.607 |
| RigVeda_Part_023_0220.wav,यथा चिन्नो अबोधयः सत्यश्रवसि वाय्ये सुजाते अश्वसूनृते,7.893 |
| Rigveda_39_0210.wav,अयःशीर्षा मदेरघुः,3.343 |
| RigVeda_48_0368.wav,त्वं नृभिर्दक्षिणावद्भिरग्ने सुमित्रेभिरिध्यसे देवयद्भिः,6.5 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0115.wav,स त्वैतेभ्यः परि ददत्पितृभ्योऽग्निर्देवेभ्यः सुविदत्रियेभ्यः,6.712 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0177.wav,वैश्वानरोऽङ्गिरसां स्तोममुक्थं च चाकॢपत्,4.948 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0117.wav,दुर्हार्दश्चक्षुषो घोरात्तस्मान् नः पाह्याञ्जन,6.104 |
| Rigvedha_006_0094.wav,सं मा तपन्त्यभितः सपत्नीरिव पर्शवः,4.934 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0100.wav,अग्नाविष्णू महि धाम प्रियं वां वीथो घृतस्य गुह्या जुषाणौ,6.519 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0135.wav,भद्रं दात्रे यजमानाय शीक्षन् बार्हस्पत्य उस्रियस्तन्तुमातान्,7.267 |
| Atharvaveda_Part_014_0310.wav,सोमो ददद्गन्धर्वाय गन्धर्वो दददग्नये,5.124 |
| RigVeda_Part_020_0208.wav,यदीमह त्रितो दिव्युप ध्मातेव धमति शिशीते ध्मातरी यथा,7.868 |
| Rigvedha_001_0096.wav,त्वां स्तोमा अवीवृधन्त्वामुक्था शतक्रतो,6.612 |
| RigVeda_53_0006.wav,ताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत्,4.824 |
| RigVeda_47_0293.wav,तवाग्ने यज्ञोऽयमस्तु सर्वस्तुभ्यं नमन्तां प्रदिशश्चतस्रः,9.863 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0231.wav,उतोदितौ मघवन्त्सूर्यस्य वयं देवानां सुमतौ स्याम भग एव भगवाँ अस्तु देवस्तेना वयं भगवन्तः स्याम,12.83 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0057.wav,वयं देवस्य धीमहि सुमतिं विश्वराधसः,4.265 |
| Atharvaveda_Part_014_0404.wav,तस्याग्रे त्वं वनस्पते नीविं कृणुष्व मा वयं रिषाम,5.785 |
| RigVeda_44_0140.wav,आ कलशं मधुमान्सोम नः सदः,3.865 |
| Rigveda_29_0179.wav,पचता पक्तीरवसे कृणुध्वमित्पृणन्नित्पृणते मयः,4.472 |
| RigVeda_Part_022_0021.wav,अवत्सारस्य स्पृणवाम रण्वभिः शविष्ठं वाजं विदुषा चिदर्ध्यम्,7.577 |
| Rigvedha_005_0017.wav,कदा मर्तमराधसं पदा क्षुम्पमिव स्फुरत्,5.209 |
| Rigveda_33_0219.wav,त्रीणि सरांसि पृश्नयो दुदु,3.093 |
| Rigvedha_002_0226.wav,त्वं तमग्ने अमृतत्व उत्तमे मर्तं दधासि श्रवसे दिवेदिवे,6.854 |
| Rigvedha_001_0377.wav,मरुद्भिरग्न आ गहि,2.842 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0076.wav,उत्तमो नाम कुष्ठस्युत्तमो नाम ते पिता,4.608 |
| RigVeda_Part_020_0305.wav,प्रातरग्निः पुरुप्रियो विश स्तवेतातिथिः,4.909 |
| Rigveda_39_0182.wav,त्वामिदा ह्यो नरोऽपीप्यन्वज्रिन्भूर्णयः,5.224 |
| RigVeda_48_0111.wav,चक्रमर्वतो रघुद्रु,2.253 |
| RigVeda_48_0184.wav,त आदित्या अभयं शर्म यच्छत सुगा नः कर्त सुपथा स्वस्तये,7.88 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0281.wav,धेनुरनड्वान् वयोवय आयदेव पौरुषेयमप मृत्युं नुदन्तु,6.479 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0128.wav,मा नः पाशं प्रति मुचो गुरुर्भारो लघुर्भव,4.718 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0319.wav,अर्वागन्य इतो अन्यः पृथिव्या अग्नी समेतो नभसी अन्तरेमे,6.486 |
| Rigveda_29_0153.wav,महाँ उतासि यस्य तेऽनु स्वधावरी सहः,4.893 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0164.wav,मृत्योः पदं योपयन्त एत द्राघीय आयुः प्रतरं दधानाः,6.436 |
| Rigvedha_004_0345.wav,तस्मिन्ब्रह्माणि पूर्वथेन्द्र उक्था समग्मतार्चन्ननु स्वराज्यम्,8.252 |
| Rigvedha_008_0092.wav,अस्मिन्यज्ञे वि चयेमा भरे कृतं वाजयन्तो भरे कृतम्,7.048 |
| Rigvedha_002_0215.wav,तव व्रते कवयो विद्मनापसोऽजायन्त मरुतो भ्राजदृष्टयः,7.154 |
| Rigveda_36_0103.wav,देवाँ आ सादयादिह,4.347 |
| RigVeda_42_0210.wav,स इन्द्राय पवसे मत्सरिन्तमो यथा जेषाम समिथे त्वोतयः,7.563 |
| Rigvedha_010_0207.wav,सहावाँ इन्द्र सानसिः पृतनाषाळमर्त्यः त्वं हि शूरः सनिता चोदयो मनुषो रथम्,9.621 |
| Rigveda_38_0269.wav,हृदा वीड्वधारयः,2.85 |
| Atharvaveda_Part_015_0160.wav,स यत्प्राचीं दिशमनु व्यचलन् मारुतं शर्धो भूत्वानुव्यचलन् मनोऽन्नादं कृत्वा,8.97 |
| RigVeda_Part_028_0057.wav,नराशंसस्य महिमानमेषामुप स्तोषाम यजतस्य यज्ञैः,6.668 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0229.wav,एतां स्थूणां पितरो धारयन्ति ते तत्र यमः सादना ते कृणोतु,6.836 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0250.wav,समक्षमस्मा आ धेहि यथा कृत्याकृतं हनत्,4.761 |
| RigVeda_Part_018_0005.wav,बहूनि मे अकृता कर्त्वानि युध्यै त्वेन सं त्वेन पृच्छै,6.988 |
| Rigvedha_001_0079.wav,धनानामिन्द्र सातये,3.989 |
| Atharvaveda_Part_020_10262.wav,त्वमस्मै कुत्समतिथिग्वमायुं महे राज्ञे यूने अरन्धनायः,6.157 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0183.wav,अग्ने यत्ते तपस्तेन तं प्रति तप योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः,9.285 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0035.wav,अग्नौ वा त्वा गार्हपत्येऽभिचेरुः पाकं सन्तं धीरतरा अनागसम्,7.534 |
| RigVeda_Part_015_0300.wav,सत्तो होता न ऋत्वियस्तिस्तिरे बर्हिरानुषक्,5.474 |
| Rigvedha_002_0158.wav,शिप्रिन्वाजानां पते शचीवस्तव दंसना,5.815 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0063.wav,द्नो दिव्यस्य नो धातरीशानो वि ष्या दृतिम्,4.754 |
| Rigvedha_006_0163.wav,अतः परि वृषणावा हि यातमथा सोमस्य पिबतं सुतस्य,5.529 |
| Rigvedha_007_0197.wav,त्वं वृत्रमाशयानं सिरासु महो वज्रेण सिष्वपो वराहुम्,6.979 |
| Rigvedha_008_0335.wav,घृतप्रतीकं व ऋतस्य धूर्षदमग्निं मित्रं न समिधान ऋञ्जते,7.493 |
| Rig_veda_54_0148.wav,अधस्पदान्म उद्वदत मण्डूका इवोदकान्मण्डूका उदकादिव,8.154 |
| RigVeda_Part_022_0198.wav,युष्माकं स्मा रथाँ अनु मुदे दधे मरुतो जीरदानवः,6.766 |
| Rigvedha_001_0030.wav,वायविन्द्रश्च सुन्वत आ यातमुप निष्कृतम्,5.6 |
| RigVeda_Part_028_0297.wav,शर्धन्तं शिम्युमुचथस्य नव्यः शापं सिन्धूनामकृणोदशस्तीः,7.528 |
| Atharvaveda_Part_020_40123.wav,उताहमस्मि वीरिणीन्द्रपत्नी मरुत्सखा विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः,6.682 |
| Atharvaveda_Part_020_20236.wav,सं गृभाय पुरु शतोभयाहस्त्या वसु शिशीहि राय आ भर,6.041 |
| RigVeda_Part_023_0167.wav,आ नो रत्नानि बिभ्रतावश्विना गच्छतं युवम्,5.64 |
| Rigvedha_001_0385.wav,मरुद्भिरग्न आ गहि,3.1 |
| RigVeda_Part_025_0303.wav,ह्वयामसि त्वेन्द्र याह्यर्वाङरं ते सोमस्तन्वे भवाति,7.128 |
| Rigveda_38_0453.wav,ता वल्गू दस्रा पुरुदंससा धियाश्विना श्रुष्ट्या गतम्,7.037 |
| Rigvedha_013_0079.wav,पाहि सूरीन्,1.874 |
| Rigvedha_004_0136.wav,प्रिया पदानि पश्वो नि पाहि विश्वायुरग्ने गुहा गुहं गाः,6.841 |
| Rigveda_29_0058.wav,विसृष्टधेना भरते सुवृक्तिरियमिन्द्रं जोहुवती मनीषा,5.221 |
| Rigvedha_009_0002.wav,त्रिमूर्धानं सप्तरश्मिं गृणीषेऽनूनमग्निं पि,5.818 |
| Rigvedha_008_0212.wav,ओ षु त्वा ववृतीमहि स्तोमेभिर्दस्म साधुभिः,5.627 |
| Rigvedha_006_0225.wav,याभिः शचीभिर्वृषणा परावृजं प्रान्धं श्रोणं चक्षस एतवे कृथः,8.139 |
| Rigveda_36_0140.wav,अग्निं शुम्भामि मन्मभिः,3.532 |
| Rigveda_30_0312.wav,असुर्याय प्रमहसा,3.332 |
| RigVeda_51_0229.wav,उदन्यजेव जेमना मदेरू ता मे जराय्वजरं मरायु पज्रेव चर्चरं जारं मरायु क्षद्मेवार्थेषु तर्तरीथ उग्रा,15.097 |
| RigVeda_Part_027_0007.wav,पणेश्चिद्वि म्रदा मनः,3.509 |
| Atharvaveda_Part_020_40273.wav,पर्यागारं पुनःपुनः,2.922 |
| RigVeda_43_0273.wav,जुष्टो मदाय देवतात इन्दो परि ष्णुना धन्व सानो अव्ये,7.556 |
| Rigvedha_009_0291.wav,अथेमे अन्य उपरे विचक्षणं सप्त,3.837 |
| RigVeda_Part_021_0091.wav,अनवस्ते रथमश्वाय तक्षन्त्वष्टा वज्रं पुरुहूत द्युमन्तम्,7.339 |
| RigVeda_Part_026_0314.wav,उप नः सूनवो गिरः शृण्वन्त्वमृतस्य ये,5.126 |
| Rigveda_41_0027.wav,संवृक्तधृष्णुमुक्थ्यं महामहिव्रतं मदम्,5.25 |
| RigVeda_49_0193.wav,त्पिता नः,1.276 |
| Rigvedha_006_0018.wav,त्वायेन्द्र सोमं सुषुमा सुदक्ष त्वाया हविश्चकृमा ब्रह्मवाहः,7.082 |
| Atharvaveda_Part_020_20417.wav,सुतपाव्ने सुता इमे शुचयो यन्ति वीतये,5.352 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0150.wav,तौ योक्षे प्रथमो योग आगते याभ्यां जितमसुराणां स्वर्यत्,8.468 |
| Rigveda_31_0201.wav,र्तस्य नशते परिह्वृतिः,2.332 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0282.wav,सो अग्निः स उ सूर्यः स उ एव महायमः,4.547 |
| Rigvedha_008_0339.wav,अदब्धेभिरदृपितेभिरिष्टेऽनिमिषद्भिः परि पाहि नो जाः,6.106 |
| RigVeda_44_0111.wav,सखेव सख्ये गातुवित्तमो भव,3.987 |
| RigVeda_Part_028_0108.wav,मा त्वा वयं सहसावन्नवीरा माप्सवः परि षदाम मादुवः,7.549 |
| Rigveda_40_0405.wav,अभि गावो अधन्विषुरापो न प्रवता यतीः,5.672 |
| Rigveda_30_0332.wav,यदोहते वरुणो मित्रो अर्यमा यूयमृतस्य रथ्यः,5.91 |
| Rig_veda_54_0076.wav,सहस्राक्षेण शतशारदेन शतायुषा हविषाहार्षमेनम्,7.574 |
| RigVeda_46_0006.wav,इन्द्र स्तोतॄणामविता वि वो मदे द्विषो नः,4.386 |
| RigVeda_Part_023_0410.wav,अधा होता न्यसीदो यजीयानिळस्पद इषयन्नीड्यः सन्,7.198 |
| Rigveda_29_0432.wav,ते हि यज्ञेषु यज्ञियास ऊमाः सधस्थं विश्वे अभि सन्ति देवाः,7.536 |
| Rigvedha_002_0211.wav,अश्वे न चित्रे अरुषि,2.384 |
| RigVeda_46_0008.wav,युवं शक्रा मायाविना समीची निरमन्थतम्,5.014 |
| Rigvedha_010_0127.wav,त्वं मानेभ्य इन्द्र विश्वजन्या रदा मरुद्भिः शुरुधो गोअग्राः,6.841 |
| Rigvedha_009_0017.wav,पीयति त्वो अनु त्वो गृणाति वन्दारुस्ते तन्वं वन्दे अग्ने,6.624 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0168.wav,उभा समुद्रौ रुच्या व्यापिथ देवो देवासि महिषः स्वर्जित्,6.177 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0338.wav,स नो ददात्वक्षितां रयिमनुपदस्वतीम्,4.576 |
| RigVeda_42_0244.wav,मघोनामायुः प्रतिरन्महि श्रव इन्द्राय सोम पवसे वृषा मदः,6.576 |
| RigVeda_Part_022_0174.wav,आपथयो विपथयोऽन्तस्पथा अनुपथाः,5.202 |
| RigVeda_Part_018_0239.wav,दिवश्चिद्घा दुहितरं महान्महीयमानाम्,5.698 |
| Rigveda_29_0148.wav,क्तवेऽर्यो रन्धीरराव्णे,3.762 |
| RigVeda_Part_017_0268.wav,तं सूर्यं हरितः सप्त यह्वी स्पशं विश्वस्य जगतो वहन्ति,6.962 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0135.wav,तरन् विश्वान्यवरा रजांसीन्द्रेण सख्या शिव आ जगम्यात् श्येनो नृचक्षा दिव्यः सुपर्णः सहस्रपाच्छतयोनिर्वयोधाः स नो नि यच्छाद्वसु यत्पराभृतमस्माकमस्तु पितृषु स्वधावत्,19.318 |
| Rigvedha_011_0088.wav,सुप्रैतुः सूयवसो न पन्था दुर्नियन्तुः परिप्रीतो न मित्रः,5.991 |
| Rigvedha_001_0232.wav,अग्निनाग्निः समिध्यते कविर्गृहपतिर्युवा,5.936 |
| RigVeda_Part_019_0215.wav,चारुर्मदाय पीतये,3.567 |
| RigVeda_Part_021_0018.wav,सं जास्पत्यं सुयममा कृणुष्व शत्रूयतामभि तिष्ठा महांसि,7.094 |
| Rigveda_36_0197.wav,मा न एकस्मिन्नागसि मा द्वयोरुत त्रिषु,5.578 |
| Rigveda_29_0444.wav,ठैरृतावानो वरुणो मित्र,2.999 |
| Rigvedha_007_0277.wav,ऋतस्य पन्थामन्वेति साधु प्रजानतीव न दिशो मिनाति,6.097 |
| RigVeda_47_0241.wav,अहं वेशं नम्रमायवेऽकरमहं सव्याय पड्गृभिमरन्धयम्,6.822 |
| RigVeda_Part_020_0303.wav,नू न इद्धि वार्यमासा सचन्त सूरयः,5.103 |
| RigVeda_Part_021_0271.wav,गृणीते अग्निरेतरी न शूषैः शोचिष्केशो नि रिणाति वना,7.01 |
| Rigveda_38_0242.wav,हृदा हूयन्त उक्थिनः,3.161 |
| Rig_veda_45_0398.wav,यज्ञाय स्तीर्णबर्हिषे वि वो मदे शीरं पावकशोचिषं विवक्षसे,6.782 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0315.wav,ते कृत्वा समिधावुपास्ते तयोरार्पिता भुवनानि विश्वा,6.158 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0008.wav,रूपंरूपं वयोवयः संरभ्यैनं परि ष्वजे,5.867 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0471.wav,स विद्वान् ज्येष्ठं मन्येत स विद्याद्ब्राह्मणं महत्,5.786 |
| Atharvaveda_Part_020_10175.wav,अनानुकृत्यमपुनश्चकार यात्सूर्यामासा मिथ उच्चरातः,6.644 |
| RigVeda_51_0046.wav,नि षीद होत्रमृतुथा यजस्व देवान्देवापे हविषा सपर्य,7.506 |
| Rigvedha_011_0173.wav,ये स्तोतृभ्यो गोअग्रामश्वपेशसमग्ने रातिमुपसृजन्ति सूरयः,7.8270625 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0222.wav,अस्थुर्वृक्षा ऊर्ध्वस्वप्नास्तिष्ठाद्रोगो अयं तव शतं या भेषजानि ते सहस्रं संगतानि च,9.939 |
| Rigvedha_004_0320.wav,निरिन्द्र भूम्या अधि वृत्रं जघन्थ निर्दिवः,5.387 |
| RigVeda_Part_024_0204.wav,यत्ते धीतिं सुमतिमावृणीमहेऽध स्मा नस्त्रिवरूथः शिवो भव,7.831 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0346.wav,अङ्गेअङ्गे लोम्निलोम्नि यस्ते पर्वणिपर्वणि,5.197 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0151.wav,मा नो मेधां मा नो दीक्षां मा नो हिंसिष्टं यत्तपः,6.794 |
| Rigvedha_011_0305.wav,समानं चिद्रथमातस्थिवांसा नाना हवेते स जनास इन्द्रः,6.331 |
| RigVeda_51_0241.wav,काममप्राः,2.3 |
| Rigveda_41_0308.wav,असृग्रन्देववीतये वाजयन्तो रथा इव ते सुतासो मदिन्तमाः शुक्रा वायुमसृक्षत,10.954 |
| RigVeda_Part_015_0042.wav,आ नो गोत्रा दर्दृहि गोपते गाः समस्मभ्यं सनयो यन्तु वाजाः,8.233 |
| RigVeda_43_0188.wav,प्सरस इन्द्रपानः,2.282 |
| RigVeda_43_0191.wav,तदुशन्ति विश्व इमे सखायस्तदहं वश्मि पवमान सोम,6.318 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0168.wav,दैवीर्मनुष्येषवो ममामित्रान् वि विध्यत,4.843 |
| Atharvaveda_Part_020_40071.wav,रेवतीर्नः सधमाद इन्द्रे सन्तु तुविवाजाः,5.47 |
| Rigveda_39_0171.wav,अभि हि सत्य सोमपा उभे बभूथ रोदसी,4.654 |
| Rigvedha_004_0278.wav,एवाग्निर्गोतमेभिरृतावा विप्रेभिरस्तोष्ट जातवेदाः,8.311 |
| Rigvedha_011_0309.wav,यः शर्धते नानुददाति शृध्यां यो दस्योर्हन्ता स जनास इन्द्रः,7.0370625 |
| Rigveda_37_0427.wav,उरुं नृभ्य उरुं गव उरुं रथाय पन्थाम्,5.154 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0325.wav,काले ह भूतं भव्यं चेषितं ह वि तिष्ठते,4.653 |
| Rigveda_36_0016.wav,प्र ब्रह्माणि नभाकवदिन्द्राग्निभ्यामिरज्यत,6.685 |
| Rigvedha_005_0262.wav,विशां गोपा अस्य चरन्ति जन्तवो द्विपच्च यदुत चतुष्पदक्तुभिः,7.171 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0441.wav,ओते मे द्यावापृथिवी ओता देवी सरस्वती,5.975 |
| RigVeda_Part_017_0043.wav,शुचीदयन्दीधितिमुक्थशासः क्षामा भिन्दन्तो अरुणीरप व्रन्,8.198 |
| Rigveda_40_0066.wav,वनस्पतिं पवमान मध्वा समङ्ग्धि धारया,5.524 |
| Rigvedha_009_0018.wav,ये पायवो मामतेयं ते अग्ने पश्यन्तो अन्धं दुरितादरक्षन्,8.227 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0281.wav,ये अग्नयो अप्स्वन्तर्ये वृत्रे ये पुरुषे ये अश्मसु,6.609 |
| Rigvedha_012_0231.wav,ऋजुरिच्छंसो वनवद्वनुष्यतो देवयन्निददेवयन्तमभ्यसत्,7.193 |
| RigVeda_Part_023_0215.wav,यथा वातो यथा वनं यथा समुद्र एजति,4.985 |
| RigVeda_Part_027_0315.wav,इन्द्रश्च विष्णो यदपस्पृधेथां त्रेधा सहस्रं वि तदैरयेथाम्,7.494 |
| Rigvedha_003_0093.wav,धूमकेतुं भाऋजीकं व्युष्टिषु यज्ञानामध्वरश्रियम्,6.329 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0314.wav,जायमानाभि जायते देवान्त्सब्राह्मणान् वशा,5.846 |
| Rigvedha_006_0105.wav,स नः सत्तो मनुष्वदा देवान्यक्षि विदुष्टरो वित्तं मे अस्य रोदसी,7.942 |
| RigVeda_49_0263.wav,चित्तिरा उपबर्हणं चक्षुरा अभ्यञ्जनम्,4.515 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0188.wav,जीवानामायुः प्र तिर त्वमग्ने पितॄणां लोकमपि गच्छन्तु ये मृताः सुगार्हपत्यो वितपन्न् अरातिमुषामुषां श्रेयसीं धेह्यस्मै,14.001 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0096.wav,अभि प्रेहि माप वेन उग्रश्चेत्ता सपत्नहा,5.125 |
| Rigvedha_002_0212.wav,त्वं त्येभिरा गहि वाजेभिर्दुहितर्दिवः,4.467 |
| RigVeda_Part_018_0287.wav,नहि ष्मा ते शतं चन राधो वरन्त आमुरः,5.427 |
| RigVeda_Part_025_0148.wav,त्रिंशच्छतं वर्मिण इन्द्र साकं यव्यावत्यां पुरुहूत श्रवस्या,6.87 |
| Rigveda_41_0273.wav,रेभो यदज्यसे वने,3.296 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0083.wav,त्याय जाताः,2.423 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0333.wav,अमून् अश्वत्थ निः शृणीहि खादामून् खदिराजिरम्,4.85 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0158.wav,देवानां पत्नीरुशतीरवन्तु नः प्रावन्तु नस्तुजये वाजसातये,7.091 |
| Rigvedha_014_0237.wav,तपो वसो चिकितानो अचित्तान्वि ते तिष्ठन्तामजरा अयासः,7.262 |
| Atharvaveda_Part_020_20320.wav,धर्मकृते विपश्चिते पनस्यवे,4.103 |
| RigVeda_Part_028_0028.wav,सेदग्निरग्नीँरत्यस्त्वन्यान्यत्र वाजी तनयो वीळुपाणिः,7.297 |
| RigVeda_Part_023_0135.wav,उग्रो वां ककुहो ययिः शृण्वे यामेषु संतनिः,5.326 |
| Rigvedha_007_0210.wav,दिवो अस्तोष्यसुरस्य वीरैरिषुध्येव मरुतो रोदस्योः,5.605 |
| Rigveda_32_0016.wav,उभे यत्ते महिना शुभ्रे अन्धसी अधिक्षियन्ति पूरवः,6.746 |
| Rigvedha_010_0351.wav,दधाते ये सुभगे सुप्रतूर्ती द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्,8.097 |
| RigVeda_44_0016.wav,सुत इन्दो पवित्र आ नृभिर्यतो वि नीयसे,4.774 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0063.wav,ये देवा राष्ट्रभृतोऽभितो यन्ति सूर्यम्,4.524 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0098.wav,ययैव ससृजे घोरं तयैव शान्तिरस्तु नः,4.509 |
| Rigvedha_004_0276.wav,स नो नृणां नृतमो रिशादा अग्निर्गिरोऽवसा वेतु धीतिम्,6.888 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0544.wav,इममिन्द्र सं सृज वीर्येणास्मिन् त्रिवृच्छ्रयतां पोषयिष्णु,6.358 |
| Rigvedha_002_0338.wav,आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च,6.658 |
| Rigveda_33_0004.wav,सं नः शिशीहि भुरिजोरिव क्षुरं रास्व रायो विमोचन,6.222 |
| RigVeda_Part_015_0139.wav,उक्थेषु कारो प्रति नो जुषस्व मा नो नि कः पुरुषत्रा नमस्ते,6.659 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0492.wav,यथान्तरिक्षे वायवे समनमन्न् एवा मह्यं संनमः सं नमन्तु,6.714 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0211.wav,अयमिद्वै प्रतीवर्त ओजस्वान् संजयो मणिः,5.02 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0473.wav,चतुष्पाद्भूत्वा भोग्यः सर्वमादत्त भोजनम्,5.346 |
| RigVeda_49_0272.wav,शुची ते चक्रे यात्या व्यानो अक्ष आहतः,5.201 |
| RigVeda_Part_017_0265.wav,ऊर्ध्वं भानुं सविता देवो अश्रेद्द्रप्सं दविध्वद्गविषो न सत्वा,8.009 |
| Rigveda_36_0038.wav,यो धर्ता भुवनानां य उस्राणामपीच्या वेद नामानि गुह्या स कविः काव्या पुरु रूपं द्यौरिव पुष्यति नभन्तामन्यके समे यस्मिन्विश्वानि काव्या चक्रे नाभिरिव श्रिता,26.701 |
| Rigvedha_001_0040.wav,अश्विना पुरुदंससा नरा शवीरया धिया,6.056 |
| RigVeda_Part_026_0257.wav,ते नो रायो द्युमतो वाजवतो दातारो भूत नृवतः पुरुक्षोः,8.726 |
| Rigveda_32_0103.wav,यो वर्धन ओषधीनां यो अपां यो विश्वस्य जगतो देव ईशे,8.546 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0006.wav,अया विष्ठा जनयन् कर्वराणि स हि घृणिरुरुर्वराय गातुः,5.34 |
| Rigveda_37_0323.wav,विश्वाँ अर्यो विपश्चितोऽति ख्यस्तूयमा गहि,5.575 |
| Rigveda_38_0493.wav,तमु त्वा नूनमसुर प्रचेतसं राधो भागमिवेमहे,7.305 |
| Rigveda_30_0198.wav,ये नस्त्मना शतिनो वर्धयन्ति यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः,7.567 |
| RigVeda_Part_022_0016.wav,ज्यायांसमस्य यतुनस्य केतुन ऋषिस्वरं चरति यासु नाम ते,7.076 |
| RigVeda_51_0019.wav,ओषधीः प्राचुच्यवुर्यत्किं च तन्वो रपः यदिमा वाजयन्नहमोषधीर्हस्त आदधे,12.434 |
| Rigvedha_008_0309.wav,यह्वी ऋतस्य मातरा सीदतां बर्हिरा सुमत्,5.355 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0004.wav,अग्नेऽजनिष्ठा महते वीर्याय ब्रह्मौदनाय पक्तवे जातवेदः सप्तऋषयो भूतकृतस्ते त्वाजीजनन्न् अस्यै रयिं सर्ववीरं नि यच्छ,14.573 |
| Rigveda_35_0325.wav,दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो,5.274 |
| RigVeda_Part_015_0077.wav,मध्वः पुनानाः कविभिः पवित्रैर्द्युभिर्हिन्वन्त्यक्तुभिर्धनुत्रीः,6.94 |
| RigVeda_Part_025_0367.wav,अयं द्यावापृथिवी वि ष्कभायदयं रथमयुनक्सप्तरश्मिम्,6.186 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0360.wav,सरस्वति या सरथं ययाथोक्थैः स्वधाभिर्देवि पितृभिर्मदन्ती,6.374 |
| RigVeda_44_0093.wav,त्री षधस्था पुनानः कृणुते हरिः,4.054 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0126.wav,तदग्ने चक्षुः प्रति धेहि रेभे शफारुजो येन पश्यसि यातुधानान्,6.731 |
| RigVeda_Part_028_0273.wav,स मन्द्रया च जिह्वया वह्निरासा विदुष्टरः,5.134 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0261.wav,ये अम्नो जतान् मारयन्ति सूतिका अनुशेरते,5.752 |
| Rigveda_38_0499.wav,इमं जम्भसुतं पिब धानावन्तं करम्भिणमपूपवन्तमुक्थिनम्,8.07 |
| Atharvaveda_Part_020_20259.wav,अयं यः पुरो विभिनत्त्योजसा मन्दानः शि,3.896 |
| Rigveda_35_0219.wav,बृबदुक्थं हवामहे सृप्रकरस्नमूतये,5.308 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0664.wav,उपहूता अग्ने जरसः परस्तात्तृतीये नाके सधमादं मदेम,7.096 |
| RigVeda_52_0231.wav,चरत्प्रियस्य योनिषु प्रियः सन्सीदत्पक्षे हिरण्यये स वेनः,6.89 |
| Rigveda_38_0112.wav,सिञ्चन्ति नमसावतमुच्चाचक्रं परिज्मानम्,5.145 |
| RigVeda_53_0322.wav,अपि गच्छतात्,3.117 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0371.wav,प्रास्मत्पाशान् वरुण मुञ्च सर्वान् य उत्तमा अधमा वारुणा ये,7.006 |
| RigVeda_Part_019_0175.wav,यन्निक्तहस्तस्तरणिर्विचक्षणः सोमं सुषाव मधुमन्तमद्रिभिः,7.009 |
| RigVeda_Part_015_0383.wav,जहि शत्रूँरप मृधो नुदस्वाथाभयं कृणुहि विश्वतो नः,6.698 |
| Rigvedha_012_0028.wav,सद्मेव प्राचो वि मिमाय मानैर्वज्रेण खान्यतृणन्नदीनाम्,7.5550625 |
| Rigvedha_006_0133.wav,तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः,7.207 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0133.wav,स नो हिरण्यजाः शङ्ख आयुष्प्रतरणो मणिः समुद्राज्जातो मणिर्वृत्राज्जातो दिवाकरः,9.94 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0086.wav,सिनात्वेनान् निर्ऋतिर्मृ,2.961 |
| RigVeda_Part_028_0140.wav,प्रप्र तान्दस्यूँरग्निर्विवाय पूर्वश्चकारापराँ अयज्यून्,8.227 |
| Rigveda_31_0165.wav,तावदुषो राधो अस्मभ्यं रास्व यावत्स्तोतृभ्यो अरदो,7.917 |
| RigVeda_Part_018_0048.wav,व्यन्धो अख्यदहिमाददानो निर्भूदुखच्छित्समरन्त पर्व,7.559 |
| Rigveda_32_0155.wav,यो मा पाकेन मनसा चरन्तमभिचष्टे अनृतेभिर्वचोभिः,7.316 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0121.wav,स्वस्ति ते सूर्य चरसे रथाय येनोभावन्तौ परियासि सद्यः,6.409 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0495.wav,भञ्जन्न् अमित्राणां सेनां भोगेभिः परि वारय,5.208 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0786.wav,अकर्तामश्विना लक्ष्म तदस्तु प्रजया बहु,4.154 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0347.wav,विजङ्गहे,1.335 |
| RigVeda_Part_015_0029.wav,विश्वं स्वाद्म सम्भृतमुस्रियायां यत्सीमिन्द्रो अदधाद्भोजनाय,8.303 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0053.wav,पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकामकल्पयन्,6.982 |
| RigVeda_48_0265.wav,भुज्युमंहसः पिपृथो निरश्विना श्यावं पुत्रं वध्रिमत्या अजिन्वतम्,7.168 |
| RigVeda_51_0274.wav,नाहं तं वेद दभ्यं दभत्स यस्येदं दूतीरसरं पराकात्,7.021 |
| RigVeda_Part_025_0284.wav,अप ओषधीरविषा वनानि गा अर्वतो नॄनृचसे रिरीहि,6.421 |
| RigVeda_Part_025_0268.wav,एयमेनं देवहूतिर्ववृत्यान्मद्र्यगिन्द्रमियमृच्यमाना,7.941 |
| Rigvedha_012_0195.wav,अश्मास्यमवतं ब्रह्मणस्पतिर्मधुधारमभि यमोजसातृणत्,6.3690625 |
| Rigveda_33_0546.wav,धुक्षस्व पिप्युषीमिषमवा च नः,4.121 |
| Rigvedha_005_0259.wav,त्वमादित्याँ आ वह तान्ह्युश्मस्यग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव,9.805 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0129.wav,इतस्ताः सर्वा नश्यन्तु वाका अपचितामिव,4.862 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0358.wav,ब्रह्माणं यत्र हिंसन्ति तद्राष्ट्रं हन्ति दुछुना,5.207 |
| Atharvaveda_Part_014_0348.wav,तदा रोहतु सुप्रजा या कन्या विन्दते पतिम्,4.618 |
| Rigveda_41_0268.wav,तवेमे सप्त सिन्धवः प्रशिषं सोम सिस्रते,5.19 |
| Rigveda_35_0138.wav,ये त्रिंशति त्रयस्परो देवासो बर्हिरासदन्,6.172 |
| RigVeda_Part_022_0010.wav,संजर्भुराणस्तरुभिः सुतेगृभं वयाकिनं चित्तगर्भासु सुस्वरुः,7.598 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0357.wav,आयुष्मतामायुष्कृतां प्राणेन जीव मा मृथाः,5.282 |
| RigVeda_Part_025_0244.wav,मा निररं शुक्रदुघस्य धेनोराङ्गिरसान्ब्रह्मणा विप्र जिन्व,6.558 |
| RigVeda_43_0242.wav,प्र गायताभ्यर्चाम देवान्सोमं हिनोत महते धनाय,6.886 |
| Rigvedha_006_0031.wav,अस्मभ्यमिन्द्र वरिवः सुगं कृधि प्र शत्रूणां मघवन्वृष्ण्या रुज,7.257 |
| RigVeda_49_0278.wav,यदयातं शुभस्पती वरेयं सूर्यामुप,4.758 |
| Atharvaveda_Part_020_20044.wav,तपा वृषन् विश्वतः शोचिषा तान् ब्रह्मद्विषे शोचय क्षामपश्च भुवो जनस्य दिव्यस्य राजा पार्थिवस्य जगतस्त्वेषसंदृक्,12.923 |
| Rigveda_30_0168.wav,दशस्यन्तो नो मरुतो मृळन्तु वरिवस्यन्तो रोदसी सुमेके,7.108 |
| RigVeda_52_0067.wav,आ रण्वासो युयुधयो न सत्वनं त्रितं नशन्त प्र शिषन्त इष्टये,7.478 |
| Rigveda_35_0283.wav,वृषणस्ते अभीशवो वृषा कशा हिरण्ययी,5.585 |
| Rigveda_31_0267.wav,अन्तर्मही बृहती रोदसीमे विश्वा ते धाम वरुण प्रियाणि,6.971 |
| RigVeda_Part_024_0115.wav,कस्य स्वित्पुत्र इह वक्त्वानि परो वदात्यवरेण पित्रा,6.399 |
| RigVeda_Part_026_0039.wav,ब्रह्मवाहस्तमं हुवे,3.39 |
| RigVeda_Part_018_0025.wav,कस्ते देवो अधि मार्डीक आसीद्यत्प्राक्षिणाः पितरं पादगृह्य,9.184 |
| Atharvaveda_Part_020_20136.wav,इन्द्रमिद्गाथिनो बृहदिन्द्रमर्केभिरर्किणः,4.88 |
| RigVeda_Part_023_0078.wav,धर्तारा चर्षणीनां यन्तं सुम्नं रिशादसा,5.878 |
| RigVeda_Part_023_0417.wav,त्वं त्राता तरणे चेत्यो भूः पिता माता सदमिन्मानुषाणाम्,7.611 |
| Rigvedha_006_0042.wav,त्वं जिगेथ न धना रुरोधिथार्भेष्वाजा मघवन्महत्सु च,6.848 |
| Rigvedha_010_0257.wav,सत्या देवेष्वाशिषो जगाम,3.293 |
| RigVeda_Part_017_0121.wav,साम द्विबर्हा महि तिग्मभृष्टिः सहस्ररेता वृषभस्तुविष्मान्,6.812 |
| Atharvaveda_Part_020_20315.wav,यो न इदमिदं पुरा प्र वस्य आनिनाय तमु व स्तुषे,5.346 |
| RigVeda_Part_019_0309.wav,ये ते त्रिरहन्सवितः सवासो दिवेदिवे सौभगमासुवन्ति,7.454 |
| Rig_veda_45_0394.wav,हिरण्यरूपं जनिता जजान,3.28 |
| RigVeda_53_0063.wav,त्वं सिन्धूँरवासृजोऽधराचो अहन्नहिम्,6.233 |
| RigVeda_Part_028_0376.wav,अमृत इत्पर्यासीत दूरमा चित्र चित्र्यं भरा रयिं नः,6.283 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0195.wav,शुकेषु ते हरिमाणं रोपणाकासु दध्मसि,4.92 |
| Atharvaveda_Part_020_10092.wav,इन्द्रः स्वर्षा जनयन्न् अहानि जिगायोशिग्भिः पृतना अभिष्टिः,5.71 |
| Atharvaveda_Part_020_10089.wav,इन्द्र क्षितीनामसि मानुषीणां विशां दैवीनामुत पूर्वयावा,7.592 |
| Rigveda_37_0434.wav,आश्वमेधे सुपेशसः,3.018 |
| RigVeda_Part_020_0306.wav,विश्वानि यो अमर्त्यो हव्या मर्तेषु रण्यति,5.425 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0226.wav,समानलोको भवति पुनर्भुवापरः पतिः,4.589 |
| RigVeda_48_0267.wav,पावीरवी तन्यतुरेकपादजो दिवो धर्ता सिन्धुरापः समुद्रियः,7.211 |
| RigVeda_47_0080.wav,बृहस्पतिर्नः परि पातु पश्चादुतो,3.694 |
| RigVeda_Part_019_0249.wav,इदमु त्यत्पुरुतमं पुरस्ताज्ज्योतिस्तमसो वयुनावदस्थात्,7.865 |
| Rigveda_34_0016.wav,अपां फेनेन नमुचेः शिर इन्द्रोदवर्तयः,5.914 |
| Rigvedha_002_0016.wav,आपो अद्यान्वचारिषं रसेन समगस्महि,6.026 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0236.wav,इहैव स्त मानु गात विश्वा रूपाणि पुष्यत,4.715 |
| Rigveda_33_0409.wav,र्तस्य रिपोः,1.847 |
| RigVeda_Part_020_0272.wav,वेतु मे शृणवद्धवम्,3.071 |
| Rigveda_40_0480.wav,निदो यत्र मुमुच्महे,2.93 |
| Rigveda_38_0413.wav,मध्वः सोमस्य पीतये,3.31 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0092.wav,स्वस्ति नो अस्त्वभयं नो अस्तु नमोऽहोरत्राभ्यामस्तु,6.785 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0347.wav,तेन ब्रह्माणो वपतेदमस्य गोमान् अश्ववान् अयमस्तु प्रजावान्,6.229 |
| RigVeda_Part_028_0073.wav,वनस्पतेऽव सृजोप देवानग्निर्हविः शमिता सूदयाति,6.579 |
| RigVeda_53_0204.wav,अयमस्मासु काव्य ऋभुर्वज्रो दास्वते,5.819 |
| Atharvaveda_Part_020_20156.wav,सूराय विश्वचक्षसे,2.916 |
| RigVeda_Part_022_0063.wav,उत ऋभव उत राये नो अश्विनोत त्वष्टोत विभ्वानु मंसते,6.951 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0466.wav,तद्ब्रह्म च तपश्च सप्तऋषय उप जीवन्ति ब्रह्मवर्चस्युपजीवनीयो भवति य एवं वेद,8.541 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0106.wav,तस्याग्ने पृष्टीर्हरसा शृणीहि त्रेधा मूलं यातुधानस्य वृश्च,7.174 |
| Rigvedha_003_0388.wav,त्वं तमिन्द्र पर्वतं महामुरुं वज्रेण वज्रिन्पर्वशश्चकर्तिथ,6.569 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0322.wav,द्रुहः पाशान् प्रति मुञ्चतां सस्तपिष्ठेन तपसा हन्तना तम्,5.758 |
| RigVeda_Part_027_0040.wav,परि पूषा परस्ताद्धस्तं दधातु दक्षिणम्,5.279 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0074.wav,अरायेभ्यो जिघत्सुभ्य इमं मे परि रक्षत,4.75 |
| RigVeda_50_0268.wav,ऋभुरृभुक्षा ऋभुर्विधतो मद आ ते हरी जूजुवानस्य वाजिना,7.005 |
| RigVeda_47_0140.wav,वसुः सूनुः सहसो अप्सु राजा वि भात्यग्र उषसामिधानः,6.597 |
| RigVeda_51_0267.wav,किमिच्छन्ती सरमा प्रेदमानड्दूरे ह्यध्वा जगुरिः पराचैः,8.016 |
| RigVeda_Part_023_0070.wav,नि केतुना जनानां चिकेथे पूतदक्षसा,5.306 |
| Rigvedha_011_0109.wav,अदृष्टान्सर्वाञ्जम्भयन्सर्वाश्च यातुधान्यः,6.252 |
| Rigvedha_002_0301.wav,युजं वज्रं वृषभश्चक्र इन्द्रो निर्ज्योतिषा तमसो गा अदुक्षत्,6.657 |
| RigVeda_Part_024_0338.wav,अदेवो यदभ्यौहिष्ट देवान्स्वर्षाता वृणत इन्द्रमत्र,6.378 |
| Atharvaveda_Part_020_10429.wav,यः सोमकामो हर्यश्वः सूरिर्यस्माद्रेजन्ते भुवनानि विश्वा,7.264 |
| Rigvedha_002_0165.wav,आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ,7.172 |
| Rigveda_36_0112.wav,जुषाणो अङ्गिरस्तमेमा हव्यान्यानुषक् अग्ने यज्ञं नय ऋतुथा,9.217 |
| RigVeda_52_0149.wav,कुवित्सोमस्यापामिति,2.631 |
| Rig_veda_54_0325.wav,आयं गौः पृश्निरक्रमीदसदन्मातरं पुरः,5.433 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0294.wav,तस्मा उद्यन्त्सूर्यो हिङ्कृणोति संगवः प्र स्तौति,6.413 |
| Rigvedha_010_0169.wav,सजोषस इन्द्रं मदे क्षोणीः सूरिं चिद्ये अनुमदन्ति वाजैः,7.709 |
| Rigvedha_001_0091.wav,सोमासो दध्याशिरः,4.125 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0160.wav,यथा सूर्यश्च चन्द्रश्च न बिभीतो न रिष्यतः,4.795 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0526.wav,य उपरिष्टाज्जुह्वति जातवेद,3.108 |
| Rigveda_31_0333.wav,उपो ते अन्धो मद्यमयामि यस्य देव दधिषे पूर्वपेयम्,7.24 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0281.wav,या अग्निं गर्भं दधिरे सुवर्णास्ता न आपः शं स्योना भवन्तु,6.911 |
| Rigveda_38_0430.wav,ता वां विश्वको हवते तनूकृथे मा नो वि यौष्टं सख्या मुमोचतम्,7.91 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0329.wav,ध्रुवा दिग्विष्णुरधिपतिः कल्माषग्रीवो रक्षिता वीरुध इषवः,5.842 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0750.wav,दृंह प्रत्नान् जनयाजातान् जातान् उ वर्षीयसस्कृधि,5.82 |
| Rigvedha_007_0126.wav,प्रत्यस्य प्रयामन्यधायि शस्मन्समयन्त आ दिशः,6.058 |
| Rigvedha_002_0416.wav,वाश्रा अभिज्ञु यातवे,3.334 |
| Rigvedha_002_0378.wav,यमग्निं मेध्यातिथिः कण्व ईध ऋतादधि,4.892 |
| Rigvedha_001_0082.wav,आ त्वेता नि षीदतेन्द्रमभि प्र गायत,6.428 |
| Atharvaveda_Part_020_10271.wav,अभि प्र गोपतिं गिरेन्द्रमर्च यथा विदे,4.652 |
| Rigveda_39_0296.wav,अस्येदिन्द्रो मदेष्वा विश्वा वृत्राणि जिघ्नते शूरो मघा च मंहते पवस्व देववीरति पवित्रं सोम रंह्या,15.299 |
| Atharvaveda_Part_020_40016.wav,इन्द्रं सुते हवामहे,3.077 |
| RigVeda_53_0301.wav,अपेन्द्र द्विषतो मनोऽप जिज्यासतो वधम्,5.326 |
| RigVeda_Part_023_0016.wav,हिरण्यरूपमुषसो व्युष्टावयस्थूणमुदिता सूर्यस्य,6.354 |
| Rigvedha_002_0396.wav,त्वेषासो अग्नेरमवन्तो अर्चयो भीमासो न प्रतीतये,6.997 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0066.wav,मा हिंसीस्तत्र नो भूमे सर्वस्य प्रतिशीवरि यत्ते भूमे विखनामि क्षिप्रं तदपि रोहतु,10.246 |
| Atharvaveda_Part_020_10220.wav,इन्द्राभिमातिषाह्ये,3.232 |
| RigVeda_Part_017_0137.wav,ऋतं वोचे नमसा पृच्छ्यमानस्तवाशसा जातवेदो यदीदम्,7.551 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0568.wav,आदित्य एषामस्त्रं वि नाशयतु चन्द्रमा युतामगतस्य पन्थाम्,7.383 |
| Rigveda_31_0103.wav,उत स्वेन शवसा शूशुवुर्नर उत क्षियन्ति,5.782 |
| Rigveda_31_0263.wav,शं नः क्षेमे शमु योगे नो अस्तु यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः,7.389 |
| Atharvaveda_Part_020_20393.wav,गोदा इद्रेवतो मदः,2.915 |
| RigVeda_49_0156.wav,वरेयवो न मर्या घृतप्रुषोऽभिस्वर्तारो अर्कं न सुष्टुभः,6.526 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0570.wav,तनूपानं परिपाणं कृण्वाना यदुपोचिरे सर्वं तदरसं कृधि,6.872 |
| Rigveda_40_0502.wav,तुभ्यं वाता अभिप्रियस्तुभ्यमर्षन्ति सिन्धवः,5.5 |
| RigVeda_43_0183.wav,प्र सेनानीः शूरो अग्रे रथानां गव्यन्नेति हर्षते अस्य सेना,9.065 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0260.wav,उत त्रातासि पाकस्याथो हन्तासि रक्षसः यददो देवा असुरांस्त्वयाग्रे निरकुर्वत ततस्त्वमध्योषधेऽपामार्गो अजायथाः विभिन्दती शतशाखा विभिन्दन् नाम ते पिता प्रत्यग्वि भिन्धि त्वं तं यो अस्मामभिदासति,24.511 |
| Rigvedha_009_0294.wav,तस्य नाक्षस्तप्यते भूरिभारः सनादेव न शीर्यते सनाभिः,7.254 |
| Rigveda_34_0388.wav,प्र राधसा चोदयाते महित्वना,4.197 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0204.wav,ऊरू ते मरिष्यत इत्येनमाह,3.935 |
| Atharvaveda_Part_020_10322.wav,यज्ञैरथर्वा प्रथमः पथस्तते ततः सूर्यो व्रतपा वेन आजनि,7.177 |
| RigVeda_53_0258.wav,सविता यन्त्रैः पृथिवीमरम्णादस्कम्भने सविता द्यामदृंहत्,8.719 |
| Atharvaveda_Part_020_20165.wav,पश्यं जन्मानि सूर्य,3.002 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0237.wav,पाटामिन्द्रो व्याश्नादसुरेभ्य,3.708 |
| Rigvedha_009_0071.wav,ह प्रथमा अजूर्यन्,2.69 |
| Rigveda_29_0266.wav,ह्वयामि देवाँ अयातुरग्ने साधन्नृतेन धियं दधामि,6.878 |
| Rigveda_29_0039.wav,अस्मे ते सन्तु सख्या शिवानि यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः,6.829 |
| RigVeda_49_0298.wav,यथासो वशिनी त्वं विदथमा वदासि,4.564 |
| Atharvaveda_Part_014_0333.wav,प्रति तिष्ठ विराडसि विष्णुरिवेह सरस्वति,3.974 |
| Rigvedha_012_0256.wav,अस्वप्नजो अनिमिषा अदब्धा उरुशंसा ऋजवे मर्त्याय,6.0590625 |
| RigVeda_44_0279.wav,सदासरो वाजमच्छा सनिष्यदत्,3.7 |
| Rigvedha_013_0021.wav,ईशानादस्य भुवनस्य भूरेर्न वा उ योषद्रुद्रादसुर्यम्,7.841 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0133.wav,देवो अग्निः संकसुको दिवस्पृष्ठान्यारुहत्,4.595 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0030.wav,शतकाण्डो दुश्च्यवनः सहस्रपर्ण उत्तिरः,4.549 |
| Rigvedha_008_0263.wav,अवास्या शिशुमतीरदीदेर्वर्मेव युत्सु परिजर्भुराणः,7.205 |
| Rigveda_38_0262.wav,निराविध्यद्गिरिभ्य आ धारयत्पक्वमोदनम्,5.811 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0325.wav,स्वमेतदछायन्ति यद्वशां ब्राह्मणा अभि,4.544 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0252.wav,ब्रह्मेवासंस्थितं हविरनदन्त इमान् यवान् अहिंसन्तो अपोदित,6.414 |
| RigVeda_Part_018_0076.wav,वावृधानस्तविषीर्यस्य पूर्वीर्द्यौर्न क्षत्रमभिभूति पुष्यात्,8.573 |
| RigVeda_Part_023_0093.wav,वृष्टिद्यावा रीत्यापेषस्पती दानुमत्याः,6.262 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0021.wav,यत्ते पितृभ्यो ददतो यज्ञे वा नाम जगृहुः,5.089 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0061.wav,तेषां पन्नानामधमा तमांस्यग्ने वास्तून्यनुनिर्दह त्वम्,7.215 |
| Rigveda_39_0251.wav,आ वाजैरुप नो गमत्,4.096 |
| Rigvedha_009_0348.wav,न वि जानामि यदिवेदमस्मि निण्यः संनद्धो मनसा चरामि,5.97 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0374.wav,वाचं क्षुणुवानो दमयन्त्सपत्नान्त्सिंह इव जेष्यन्न् अभि तंस्तनीहि,7.368 |
| Rigveda_35_0156.wav,सदो द्वा चक्राते उपमा दिवि सम्राजा सर्पिरासुती,7.777 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0042.wav,सोमो राजाधिपा मृडिता च भूतस्य नः पतयो मृडयन्तु,6.384 |
| Rig_veda_54_0339.wav,सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्,5.903 |
| RigVeda_Part_028_0344.wav,त्वं नृभिर्नृमणो देववीतौ भूरीणि वृत्रा हर्यश्व हंसि,6.587 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0358.wav,तां मा देवा व्यदधुः पुरुत्रा भूरिस्थात्रां भूर्यावेशयन्तः अहमेव स्वयमिदं वदामि जुष्टं देवानामुत मानुषाणाम्,14.037 |
| Atharvaveda_Part_020_20018.wav,अस्येदेव शवसा शुशन्तं वि वृश्चद्वज्रेण वृत्रमिन्द्रः,5.951 |
| Atharvaveda_Part_020_20427.wav,ईशानो यवया वधम्,2.761 |
| RigVeda_Part_020_0027.wav,यह्वा इव प्र वयामुज्जिहानाः प्र भानवः सिस्रते नाकमच्छ,7.134 |
| Atharvaveda_Part_018_1_0240.wav,उशन्तस्त्वेधीमह्युशन्तः समिधीमहि,4.078 |
| Rigvedha_008_0037.wav,अधा हि त्वा जनिता जीजनद्वसो रक्षोहणं त्वा जीजनद्वसो,7.778 |
| Rigveda_38_0460.wav,योद्धासि क्रत्वा शवसोत दंसना विश्वा जाताभि मज्मना,9.009 |
| Rigvedha_005_0317.wav,स मातरिश्वा पुरुवारपुष्टिर्विदद्गातुं तनयाय स्वर्वित्,6.868 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0271.wav,षट्च मे षष्टिश्च मेऽपवक्तार ओषधे ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला करः सप्त च मे सप्ततिश्च मेऽपवक्तार ओषधे ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला करः,16.793 |
| RigVeda_44_0079.wav,मिमीते अस्य योजना वि सुक्रतुः,3.906 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0184.wav,न त्वदन्यः कवितरो न मेधया धीरतरो वरुण स्वधावन्,5.667 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0261.wav,न्यूर्मयो नदीनां न्यदृष्टा अलिप्सत,6.208 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0128.wav,सर्वे नो अद्य दित्सन्तोऽरातिं प्रति हर्यत,4.874 |
| RigVeda_42_0188.wav,अभि प्रियाणि पवते चनोहितो नामानि यह्वो अधि येषु वर्धते,7.228 |
| Rigveda_41_0142.wav,वरिवोविद्घृतं पयः,2.775 |
| Rigvedha_009_0215.wav,मा तद्भूम्यामा श्रिषन्मा तृणेषु देवेभ्यस्तदुशद्भ्यो रातमस्तु,7.508 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0410.wav,उत्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते देवान् यज्ञेन बोधय,4.551 |
| Atharvaveda_Part_020_20022.wav,अस्येदु प्र ब्रूहि पूर्व्याणि तुरस्य कर्माणि नव्य उक्थैः,6.656 |
| Rigveda_36_0261.wav,परि णो वृणजन्नघा दुर्गाणि रथ्यो यथा स्यामेदिन्द्रस्य शर्मण्यादित्यानामुतावस्यनेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः परिह्वृतेदना जनो युष्मादत्,19.64 |
| RigVeda_Part_021_0250.wav,यं वै सूर्यं स्वर्भानुस्तमसाविध्यदासुरः,5.171 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0213.wav,तयाहं दुर्णाम्नां शिरो वृश्चामि शकुनेरिव,5.541 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0334.wav,एषा पशून्त्सं क्षिणाति क्रव्याद्भूत्वा व्यद्वरी,5.905 |
| Rigvedha_005_0152.wav,शुचिष्ट्वमसि प्रियो न मित्रो दक्षाय्यो अर्यमेवासि सोम,6.966 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0070.wav,तेषां सा वृक्षाणामिवाहं भूयासमुत्तमः,5.233 |
| Rigveda_30_0078.wav,ते सिन्धवो वरिवो धातना नो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः,7.146 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0301.wav,ते मे द्रविणं यच्छन्तु ते मे ब्राह्मणवर्चसम्,4.98 |
| RigVeda_Part_024_0045.wav,वि य इनोत्यजरः पावकोऽश्नस्य चिच्छिश्नथत्पूर्व्याणि,5.827 |
| RigVeda_47_0011.wav,युवं श्वेतं पेदवेऽश्विनाश्वं नवभिर्वाजैर्नवती च वाजिनम्,7.625 |
| Rigveda_29_0011.wav,अभि क्रत्वेन्द्र भूरध ज्मन्न ते विव्यङ्महिमानं रजांसि,6.444 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0497.wav,तेभिष्ट्वमाज्ये हुते सर्वैरुत्तिष्ठ सेनया प्रतिघ्नानाश्रुमुखी कृधुकर्णी च क्रोशतु,9.582 |
| RigVeda_46_0020.wav,समु प्र यन्ति धीतयः सर्गासोऽवताँ इव,5.553 |
| RigVeda_Part_016_0286.wav,अस्माकमत्र पितरो मनुष्या अभि प्र सेदुरृतमाशुषाणाः,7.747 |
| RigVeda_43_0128.wav,असर्जि वक्वा रथ्ये यथाजौ धिया मनोता प्रथमो मनीषी,6.974 |
| Rigvedha_004_0030.wav,अस्मा इदु त्यदनु दाय्येषामेको यद्वव्ने भूरेरीशानः,7.003 |
| Rigveda_34_0108.wav,युयुयातामितो रपो अप स्रिधः,4.498 |
| Rigveda_32_0339.wav,यं मे दुरिन्द्रो मरुतः पाकस्थामा कौरयाणः,5.485 |
| RigVeda_47_0384.wav,मान्त स्थुर्नो अरातयः,3.513 |
| Rigvedha_009_0052.wav,आ वां भूषन्क्षितयो जन्म रोदस्योः प्रवाच्यं वृषणा दक्षसे महे,8.436 |
| RigVeda_Part_024_0066.wav,स तत्कृधीषितस्तूयमग्ने स्पृधो बाधस्व सहसा सहस्वान्,7.289 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0301.wav,तं त्वा वयं जातवेदः समिद्धं प्रजावन्त उप सदेम सर्वे,6.52 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0285.wav,परीदं वासो अधिथाः स्वस्तयेऽभूर्वापीनामभिशस्तिपा उ शतं च जीव शरदः पुरूचीर्वसूनि चारुर्वि भजासि जीवन्,13.877 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0242.wav,ब्रध्नलोको भवति ब्रध्नस्य विष्टपि श्रयते य एवं वेद,5.59 |
| RigVeda_Part_023_0413.wav,रुशन्तमग्निं दर्शतं बृहन्तं वपावन्तं विश्वहा दीदिवांसम्,7.957 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0601.wav,आरोहणमाक्रमणं जीवतोजीवतोऽयनम्,4.612 |
| RigVeda_48_0377.wav,स नो अजामीँरुत वा विजामीनभि तिष्ठ शर्धतो वाध्र्यश्व,8.266 |
| Rigvedha_004_0134.wav,विदन्तीमत्र नरो धियंधा हृदा यत्तष्टान्मन्त्राँ अशंसन्,7.627 |
| RigVeda_Part_018_0246.wav,परि ष्ठा इन्द्र मायया,3.101 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0355.wav,द्व्यास्या द्विजिह्वा भू,2.454 |
| RigVeda_Part_026_0222.wav,प्रथमभाजं यशसं वयोधां सुपाणिं देवं सुगभस्तिमृभ्वम्,8.594 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0353.wav,ओष दर्भ सपत्नान् मे ओष मे पृतनायतः,4.584 |
| Atharvaveda_Part_015_0088.wav,तं भूमिश्चाग्निश्चौषधयश्च वनस्पतयश्च वानस्पत्याश्च वीरुधश्चानुव्यचलन्,8.511 |
| RigVeda_43_0228.wav,प्रास्य धारा बृहतीरसृग्रन्नक्तो गोभिः कलशाँ आ विवेश,7.001 |
| Rigvedha_006_0148.wav,यानीन्द्राग्नी चक्रथुर्वीर्याणि यानि रूपाण्युत वृष्ण्यानि,7.753 |
| Rigveda_33_0491.wav,नाभा यज्ञस्य दोहना प्राध्वरे,5.245 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0398.wav,यो वेद परमेष्ठिनं यश्च वेद प्रजापतिम्,4.591 |
| Rigveda_34_0095.wav,अनर्वाणो ह्येषां पन्था आदित्यानाम्,6.329 |
| Rigvedha_012_0250.wav,तेनादित्या अधि वोचता नो यच्छता नो दुष्परिहन्तु शर्म,6.2290625 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0108.wav,सं मा सिञ्चन्तु मरुतः सं पूषा सं बृहस्पतिः,5.145 |
| RigVeda_Part_028_0089.wav,यथा वः स्वाहाग्नये दाशेम परीळाभिर्घृतवद्भिश्च हव्यैः,7.781 |
| Rigveda_38_0160.wav,अन्ति षद्भूतु वामवः,3.236 |
| Rigvedha_008_0045.wav,अविन्दद्दिवो निहितं गुहा निधिं वेर्न गर्भं परिवीतमश्मन्यनन्ते अन्तरश्मनि,9.683 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0325.wav,तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः प्रतीची दिग्वरुणोऽधिपतिः पृदाकू रक्षितान्नमिषवः,18.203 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0334.wav,ताजद्भङ्ग इव भज्यन्तां हन्त्वेनान् वधको वधैः,5.941 |
| RigVeda_49_0318.wav,या न ऊरू उशती विश्रयाते यस्यामुशन्तः प्रहराम शेपम्,7.714 |
| RigVeda_50_0287.wav,एते वदन्ति शतवत्सहस्रवदभि क्रन्दन्ति हरितेभिरासभिः,6.423 |
| RigVeda_50_0302.wav,ते सोमादो हरी इन्द्रस्य निंसतेऽंशुं दुहन्तो अध्यासते गवि,6.656 |
| RigVeda_Part_026_0256.wav,अत्रिं न महस्तमसोऽमुमुक्तं तूर्वतं नरा दुरितादभीके,7.625 |
| Rigveda_29_0407.wav,अभि यं देव्यदितिर्गृणाति सवं देवस्य सवितुर्जुषाणा,6.39 |
| Rigveda_32_0115.wav,स नो यवसमिच्छतु,2.554 |
| Atharvaveda_Part_018_1_0163.wav,रात्रीभिरस्मा अहभिर्दशस्येत्सूर्यस्य चक्षुर्मुहुरुन् मिमीयात्,7.632 |
| RigVeda_Part_025_0345.wav,अध्वर्यो वीर प्र महे सुतानामिन्द्राय भर स ह्यस्य राजा,6.628 |
| RigVeda_44_0017.wav,इन्द्राय मत्सरिन्तमश्चमूष्वा नि षीदसि,5.09 |
| Rigvedha_012_0274.wav,तव व्रते सुभगासः स्याम स्वाध्यो वरुण तुष्टुवांसः,6.4 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0401.wav,छन्दांसि पक्षौ मुखमस्य सत्यं विष्टारी जातस्तपसोऽधि यज्ञः,6.292 |
| Rig_veda_45_0387.wav,ष्टीदस्य गातुरेति,2.292 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0096.wav,अग्नेरिवास्य दहत एति शुष्मिण उतेव मत्तो विलपन्न् अपायति,6.839 |
| Rigvedha_008_0348.wav,तमीं हिन्वन्ति धीतयो दश व्रिशो देवं मर्तास ऊतये हवामहे,8.349 |
| Atharvaveda_Part_017_0139.wav,मा मा प्रापन्न् इषवो दैव्या या मा मानुषीरवसृष्टाः वधाय,6.575 |
| Rigveda_40_0137.wav,अभि वह्निरमर्त्यः,1.468 |
| Rigveda_40_0237.wav,गाः कृण्वानो न निर्णिजम्,4.172 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0560.wav,भिन्दत्सपत्नान् अधरांश्च कृण्वदा मा रोह महते सौभगाय,6.581 |
| RigVeda_47_0189.wav,चित्रं वृषणं रयिं दाः,2.402 |
| Rigveda_38_0198.wav,श्रद्विश्वा वार्या कृधि,4.846 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0287.wav,एकं पादं नोत्खिदति सलिलाद्धंस उच्चरन्,4.968 |
| Rig_veda_45_0377.wav,अग्निमीळे भुजां यविष्ठं शासा मित्रं दुर्धरीतुम्,5.899 |
| RigVeda_Part_023_0303.wav,दृळ्हा चिद्या वनस्पतीन्क्ष्मया दर्धर्ष्योजसा,5.51 |
| Rigvedha_003_0322.wav,त्वमेताञ्जनराज्ञो द्विर्दशाबन्धुना सुश्रवसोपजग्मुषः,7.315 |
| RigVeda_Part_018_0258.wav,अर्णाचित्ररथावधीः,3.614 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0064.wav,शिवा अभि क्षरन्तु त्वापो दिव्याः पयस्वतीः,5.179 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0163.wav,यथा सत्यं चानृतं च न बिभीतो न रिष्यतः,5.172 |
| Rigvedha_012_0183.wav,इन्द्रेण युजा तमसा परीवृतं बृहस्पते निरपामौब्जो अर्णवम्,7.8580625 |
| Rigvedha_005_0135.wav,वि नः पथः सुविताय चियन्त्विन्द्रो मरुतः,4.955 |
| Rigveda_37_0366.wav,महि वो महतामवो वरुण मित्रार्यमन् अवांस्या वृणीमहे,8.512 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0452.wav,तस्मान् मनुष्येभ्य उभयद्युरुप हरन्त्युपास्य गृहे हरन्ति य एवं वेद सोदक्रामत्सासुरान् आगच्छत्तामसुरा उपाह्वयन्त माय एहीति,14.936 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0418.wav,आ त्वाग्न इधीमहि द्युमन्तं देवाजरम्,4.367 |
| RigVeda_Part_025_0318.wav,अयं स सोम इन्द्र ते सुतः पिब,3.313 |
| Rig_veda_45_0023.wav,ऋतावा स रोहिदश्वः पुरुक्षुर्द्युभिरस्मा अहभिर्वाममस्तु,6.055 |
| Atharvaveda_Part_018_1_0191.wav,आ नो वह रोदसी देवपुत्रे माकिर्देवानामप भूरिह स्याः,7.118 |
| Rigvedha_008_0255.wav,ओजायमानस्तन्वश्च शुम्भते भीमो न शृङ्गा दविधाव दुर्गृभिः,6.981 |
| Rigvedha_011_0081.wav,उपस्तुतिं नमस उद्यतिं च श्लोकं यंसत्सवितेव प्र बाहू,6.1140625 |
| Rigvedha_014_0372.wav,अग्ने वृधान आहुतिं पुरोळाशं जातवेदः,5.2880625 |
| RigVeda_Part_019_0011.wav,शच्या हरी धनुतरावतष्टेन्द्रवाहावृभवो वाजरत्नाः,7.4 |
| RigVeda_47_0248.wav,अहं सप्त स्रवतो धारयं वृषा द्रवित्न्वः पृथिव्यां सीरा अधि,7.523 |
| Rigveda_30_0354.wav,आ वां वहन्तु स्थविरासो अश्वाः पिबाथो अस्मे सुषुता मधूनि,7.777 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0185.wav,ऋचा कुम्भीमध्यग्नौ श्रयाम्या सिञ्चोदकमव धेह्येनम्,6.591 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0398.wav,यद्वो वयं प्रमिनाम व्रतानि विदुषां देवा अविदुष्टरासः,5.917 |
| RigVeda_Part_025_0230.wav,यदि स्तोतारः शतं यत्सहस्रं गृणन्ति गिर्वणसं शं तदस्मै,6.35 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0009.wav,पुष्टिं पशूनां परि जग्रभाहं चतुष्पदां द्विपदां यच्च धान्यम्,7.037 |
| Rigvedha_003_0394.wav,क्राणा रुद्रेभिर्वसुभिः पुरोहितो होता निषत्तो रयिषाळमर्त्यः,6.476 |
| RigVeda_Part_025_0101.wav,स्था ऊ षु ऊर्ध्व ऊती अरिषण्यन्नक्तोर्व्युष्टौ परितक्म्यायाम्,7.546 |
| Rigvedha_004_0387.wav,बर्हिर्वा यत्स्वपत्याय वृज्यतेऽर्को वा श्लोकमाघोषते दिवि,7.888 |
| Atharvaveda_Part_020_20270.wav,पिशङ्गरूपं मघवन् विचर्षणे मक्षू गोमन्तमीमहे,5.555 |
| RigVeda_48_0339.wav,यदा वलस्य पीयतो जसुं भेद्बृहस्पतिरग्नितपोभिरर्कैः,6.819 |
| Rigveda_40_0029.wav,पवीतारः,1.656 |
| RigVeda_Part_023_0170.wav,उत वां ककुहो मृगः पृक्षः कृणोति वापुषो माध्वी मम श्रुतं हवम्,7.066 |
| RigVeda_52_0143.wav,कुवित्सोमस्यापामिति,2.922 |
| Rigveda_38_0258.wav,एकया प्रतिधापिबत्साकं सरांसि त्रिंशतम्,6.079 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0191.wav,दिवं समुद्रमाद्भूमिं सर्वं भूतं वि रक्षति,5.006 |
| RigVeda_Part_024_0335.wav,पप्राथ क्षां महि दंसो व्युर्वीमुप द्यामृष्वो बृहदिन्द्र स्तभायः,8.127 |
| RigVeda_Part_016_0046.wav,पुरोळाशं पचत्यं जुषस्वेन्द्रा गुरस्व च,5.83 |
| Rigvedha_013_0352.wav,प्र दीधितिर्विश्ववारा जिगाति होतारमिळः प्रथमं यजध्यै,6.64 |
| Rigvedha_014_0067.wav,ऋतं शंसन्त ऋतमित्त आहुरनु व्रतं व्रतपा दीध्यानाः,6.884 |
| Rigvedha_009_0329.wav,गौरमीमेदनु वत्सं मिषन्तं मूर्धानं हिङ्ङकृणोन्मातवा उ,7.223 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0458.wav,बलं च क्षत्रमोजश्च शरीरमनु प्राविशन्,4.887 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0224.wav,यत्ते अपोदकं विषं तत्त एतास्वग्रभम्,4.251 |
| Atharvaveda_Part_020_30034.wav,वि त्वा ततस्रे मिथुना अवस्यवो व्रजस्य साता गव्यस्य निःसृजः सक्षन्त इन्द्र निःसृजः,9.127 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0117.wav,विषं गवां यातुधाना भरन्तामा वृश्चन्तामदितये दुरेवाः,7.011 |
| Rigveda_38_0259.wav,इन्द्रः सोमस्य काणुका,2.989 |
| Rigveda_35_0295.wav,उतो अह क्रतुं रघुम्,2.916 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0200.wav,यस्य स्थ तमत्त यो वो प्राहैत्तमत्त स्वा मांसान्यत्त,6.148 |
| Rigveda_37_0109.wav,नित्याद्रायो अमंहत,3.414 |
| RigVeda_47_0061.wav,दोहेन गामुप शिक्षा सखायं प्र बोधय जरितर्जारमिन्द्रम्,7.126 |
| Rigvedha_011_0150.wav,त्वमग्ने राजा वरुणो धृतव्रतस्त्वं मित्रो भवसि दस्म ईड्यः,6.5270625 |
| Rigveda_34_0282.wav,युवो रथस्य परि चक्रमीयत ईर्मान्यद्वामिषण्यति,7.136 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0518.wav,प्रतिसरेण हन्मि,3.199 |
| RigVeda_44_0329.wav,यत्रामूर्यह्वतीरापस्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परि स्रव,7.922 |
| Rigvedha_014_0117.wav,देवं मर्तास इन्धते समध्वरे,3.8770625 |
| Rigvedha_006_0228.wav,याभिः कुत्सं श्रुतर्यं नर्यमावतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्,7.474 |
| RigVeda_Part_024_0228.wav,आ देवान्वक्षि यक्षि च,3.359 |
| Atharvaveda_Part_020_40446.wav,पनाय्यं तदश्विना कृतं वां वृषभो दिवो रजसः पृथिव्याः,6.089 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0080.wav,यानि नक्षत्राणि दिव्यन्तरिक्षे अप्सु भूमौ यानि नगेषु दिक्षु,7.148 |
| Rigvedha_014_0080.wav,र्चो धा यज्ञवाहसे,2.78 |
| RigVeda_Part_021_0259.wav,पूषा भगः प्रभृथे विश्वभोजा आजिं न जग्मुराश्वश्वतमाः,7.046 |
| RigVeda_Part_025_0206.wav,विरप्शिने वज्रिणे शंतमानि वचांस्यासा स्थविराय तक्षम्,6.365 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0245.wav,यो देवाः कृत्यां कृत्वा हरादविदुषो गृहम्,5.125 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0225.wav,स्वर्गं लोकमभि नो नयासि सं जायया सह पुत्रैः स्याम,6.058 |
| Rigvedha_003_0318.wav,युधा युधमुप घेदेषि धृष्णुया पुरा पुरं समिदं हंस्योजसा,6.693 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0216.wav,य इमे द्यावापृथिवी जनित्री रूपैरपिंशद्भुवनानि विश्वा,6.67 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0014.wav,वि रोहितो अमृशद्विश्वरूपं समाकुर्वाणः प्ररुहो रुहश्च,5.836 |
| Atharvaveda_Part_020_30068.wav,विश्वानि शक्रो नर्याणि विद्वान् अपो रिरेच सखिभिर्निकामैः,6.884 |
| Atharvaveda_Part_020_10183.wav,राजेव दस्म नि षदोऽधि बर्हिष्यस्मिन्त्सु सोमेऽवपानमस्तु ते,7.137 |
| Rigvedha_009_0041.wav,मर्तो यो अस्मै सुतुको ददाश,3.987 |
| RigVeda_44_0418.wav,ऋतस्य पदं कवयो नि पान्ति गुहा नामानि दधिरे पराणि,6.574 |
| RigVeda_Part_021_0088.wav,नहि त्वदिन्द्र वस्यो अन्यदस्त्यमेनाँश्चिज्जनिवतश्चकर्थ,6.816 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0054.wav,प्रजामृतत्वमुत दीर्घमायू रायश्च पोषैरुप त्वा सदेम वृषभोऽसि स्वर्ग ऋषीन् आर्षेयान् गच्छ सुकृतां लोके सीद तत्र नौ संस्कृतम्,15.236 |
| RigVeda_Part_019_0172.wav,हंसासो ये वां मधुमन्तो अस्रिधो हिरण्यपर्णा उहुव उषर्बुधः,7.836 |
| Atharvaveda_Part_020_20430.wav,युञ्जन्त्यस्य काम्या हरी विपक्षसा रथे,4.763 |
| RigVeda_47_0102.wav,वयं राजभिः प्रथमा धनान्यस्माकेन वृजनेना जयेम,6.313 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0354.wav,इमं यज्ञं नयत देवता नो घृतस्य धारा मधुमत्पवन्ताम्,6.038 |
| Rigveda_37_0088.wav,पर्वतासो वनस्पतिः शृणोतु पृथिवी हवम् यदिन्द्र राधो अस्ति ते माघोनं मघवत्तम,10.9 |
| Rigveda_30_0111.wav,मित्रस्तन्नो वरुणो मामहन्त शर्म तोकाय तनयाय गोपाः,6.888 |
| Atharvaveda_Part_020_20158.wav,भ्राजन्तो अग्नयो यथा,3.414 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0221.wav,त्वष्टा येषां रूपधेयानि वेदास्मिन् तान् गोष्ठे सविता नि यच्छतु,7.772 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0148.wav,असौ यो अधराद्गृहस्तत्र सन्त्वराय्यः,5.096 |
| Rigveda_32_0254.wav,इमे त इन्द्र सोमास्तीव्रा अस्मे सुतासः,5.638 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0325.wav,द्यावापृथिवी भवतं मे स्योने ते नो मुञ्चतमंहसः ये अमृतं बिभृथो ये हवींषि ये स्रोत्या बिभृथो ये मनुष्यान्,12.366 |
| RigVeda_49_0198.wav,सं बाहुभ्यां धमति सं पतत्रैर्द्यावाभूमी जनयन्देव एकः,7.452 |
| Rigveda_32_0341.wav,रोहितं मे पाकस्थामा सुधुरं कक्ष्यप्राम्,5.649 |
| Rigvedha_008_0216.wav,अध प्र सू न उप यन्तु धीतयो देवाँ अच्छा न धीतयः,6.915 |
| Rigveda_35_0407.wav,सस्थावाना यवयसि त्वमेक इच्छचीपत इन्द्र विश्वाभिरूतिभिः,7.918 |
| RigVeda_Part_027_0356.wav,सोमारुद्रा धारयेथामसुर्यं प्र वामिष्टयोऽरमश्नुवन्तु,8.745 |
| RigVeda_Part_022_0041.wav,उक्थेभिर्हि ष्मा कवयः सुयज्ञा आविवासन्तो मरुतो यजन्ति,7.32 |
| Rig_veda_45_0010.wav,अधा ह्यग्ने मह्ना निषद्या सद्यो जज्ञानो हव्यो बभूथ,6.45 |
| Atharvaveda_Part_020_30052.wav,गिरश्च ये ते तुविजात पूर्वीर्नर इन्द्र प्रतिशिक्षन्त्यन्नैः,6.803 |
| Rigvedha_001_0357.wav,स नः सिषक्तु यस्तुरः,2.743 |
| RigVeda_51_0307.wav,मन्मानि धीभिरुत यज्ञमृन्धन्देवत्रा च कृणुह्यध्वरं नः,7.323 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0518.wav,स तांल्लोकान्त्समाप्नोति ये दिव्या ये च पार्थिवाः,6.38 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0108.wav,यामन्वैच्छद्धविषा विश्वकर्मान्तरर्णवे रजसि प्रविष्टाम्,6.92 |
| RigVeda_Part_019_0221.wav,अस्य सोमस्य पीतये,3.188 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0581.wav,यश्च कवची यश्चाकवचोऽमित्रो यश्चाज्मनि,6.453 |
| Rig_veda_54_0182.wav,ष्ठं ज्योतिषां ज्योतिरुत्तमं विश्वजिद्धनजिदुच्यते बृहत्,6.146 |
| Rig_veda_54_0193.wav,देवानां चित्तिरो वशम्,3.328 |
| Rigvedha_007_0041.wav,मध्वः सोमस्याश्विना मदाय,3.421 |
| Rigveda_31_0380.wav,आङ्गूषैराविवासतः,3.382 |
| RigVeda_47_0331.wav,गर्भे योषामदधुर्वत्समासन्यपीच्येन मनसोत जिह्वया,7.622 |
| Atharvaveda_Part_020_20121.wav,ऊर्ध्वस्तिष्ठा न ऊतयेऽस्मिन् वाजे शतक्रतो,5.217 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0092.wav,आ जिह्वया मूरदेवान् रभस्व क्रव्यादो वृष्ट्वापि धत्स्वासन्,7.078 |
| Rigveda_37_0368.wav,कद्ध स्थ हवनश्रुतः,2.406 |
| Rigveda_41_0247.wav,अर्षा सोम द्युमत्तमोऽभि द्रोणानि रोरुवत् सीदञ्छ्येनो न योनिमा,9.986 |
| Atharvaveda_Part_015_0047.wav,ऋचः प्राञ्चस्तन्तवो यजूंषि तिर्यञ्चः,4.571 |
| Rigveda_40_0060.wav,पवमान इन्द्रो वृषा,3.031 |
| RigVeda_53_0158.wav,त्वे इषः सं दधुर्भूरिवर्पसश्चित्रोतयो वामजाताः,7.622 |
| Rigveda_35_0306.wav,दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो,5.076 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0027.wav,ओजीयः शुष्मिन्त्स्थिरमा तनुष्व मा त्वा दभन् दुरेवासः कशोकाः,8.046 |
| Atharvaveda_Part_018_1_0176.wav,तस्य वा त्वं मन इछा स वा तवाधा कृणुष्व संविदं सुभद्राम्,6.845 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0316.wav,इहेडया सधमादं मदन्तो ज्योक्पश्येम सूर्यमुच्चरन्तम्,6.463 |
| RigVeda_Part_018_0152.wav,सध्रीचीनेन मनसाविवेनन्तमित्सखायं कृणुते समत्सु,7.089 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0068.wav,जुषस्व हव्यमाहुतं प्रजां देवि ररास्व नः,4.886 |
| Rigvedha_005_0339.wav,त्वं हि विश्वतोमुख विश्वतः परिभूरसि,3.894 |
| Rigvedha_008_0035.wav,अन्यमस्मद्रिरिषेः कं चिदद्रिवो रिरिक्षन्तं चिदद्रिवः पाहि न इन्द्र सुष्टुत स्रिधोऽवयाता सदमिद्दुर्मतीनां देवः सन्दुर्मतीनाम्,15.821 |
| RigVeda_Part_023_0066.wav,अध व्रतेव मानुषं स्वर्ण धायि दर्शतम्,6.007 |
| Rigveda_38_0108.wav,आ दशभिर्विवस्वत इन्द्रः कोशमचुच्यवीत्,5.467 |
| Rigvedha_001_0332.wav,विश्वमित्सवनं सुतमिन्द्रो मदाय गच्छति,5.078 |
| RigVeda_48_0338.wav,बृहस्पतिरनुमृश्या वलस्याभ्रमिव वात आ चक्र आ गाः,6.457 |
| Rigvedha_008_0322.wav,प्र तव्यसीं नव्यसीं धीतिमग्नये वाचो मतिं सहसः सूनवे भरे,8.468 |
| RigVeda_Part_016_0244.wav,बृहस्पतिं वरेण्यम्,2.771 |
| RigVeda_Part_016_0223.wav,शतं केतेभिरिषिरेभिरायवे सहस्रणीथो अध्वरस्य होमनि,7.58 |
| RigVeda_48_0321.wav,बृहस्पतिं वृषणं शूरसातौ भरेभरे अनु मदेम जिष्णुम्,6.422 |
| Atharvaveda_Part_016_0196.wav,म्रोको मनोहा खनो निर्दाह आत्मदूषिस्तनूदूषिः,6.171 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0090.wav,को अस्मिन्त्सत्यं कोऽनृतं कुतो मृत्युः कुतोऽमृतम्,5.252 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0285.wav,यूयं गावो मेदयथ कृशं चिदश्रीरं चित्कृणुथा सुप्रतीकम्,6.316 |
| Atharvaveda_Part_014_0378.wav,मर्य इव योषामधि रोहयैनां प्रजां कृण्वाथामिह पुष्यतं रयिम्,6.371 |
| RigVeda_Part_026_0311.wav,एदं बर्हिर्नि षीदत,3.631 |
| RigVeda_47_0373.wav,सुवितो धर्म प्रथमानु सत्या सुवितो देवान्सुवितोऽनु पत्म,6.35 |
| Rigveda_35_0381.wav,आ यातमश्विना गतमवस्युर्वामहं हुवे धत्तं रत्नानि दाशुषे नमोवाके प्रस्थिते अध्वरे नरा विवक्षणस्य पीतये,16.534 |
| Atharvaveda_Part_020_10291.wav,उत त्वमस्मयुर्वसो,2.609 |
| RigVeda_Part_024_0330.wav,महामनूनं तवसं विभूतिं मत्सरासो जर्हृषन्त प्रसाहम्,7.338 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0366.wav,यावत्परस्वतः पसस्तावत्ते वर्धतां पसः यावदङ्गीनं पारस्वतं हास्तिनं गार्दभं च यत्,9.849 |
| Rigvedha_005_0293.wav,त्रीणि जाना परि भूषन्त्यस्य समुद्र एकं दिव्येकमप्सु,6.35 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0093.wav,शते शरत्सु नो पुरा समिमां मात्रां मिमीमहे यथापरं न मासातै,8.065 |
| RigVeda_Part_019_0050.wav,वि नो वाजा ऋभुक्षणः पथश्चितन यष्टवे,5.259 |
| Rigveda_35_0036.wav,उदु ष्य शरणे दिवो ज्योतिरयंस्त सूर्यः,4.973 |
| Rigveda_40_0646.wav,तं गीर्भिर्वासयामसि,3.143 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0097.wav,उतान्तरिक्षे पतन्तं यातुधानं तमस्ता विध्य शर्वा शिशानः,7.003 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0399.wav,प्रजामेका जिन्वत्यूर्जमेका राष्ट्रमेका रक्षति देवयूनाम्,7.2 |
| RigVeda_49_0190.wav,अग्नये ब्रह्म ऋभवस्ततक्षुरग्निं महामवोचामा सुवृक्तिम्,6.228 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0283.wav,तेऽवदन् प्रथमा ब्रह्मकिल्बिषेऽकूपारः सलिलो मातरिश्वा,6.967 |
| Rigveda_31_0101.wav,ता यंसतो मघवद्भ्यो ध्रुवं यशश्छर्दिरस्मभ्यं,6.706 |
| RigVeda_Part_027_0013.wav,अथेमस्मभ्यं रन्धय,3.603 |
| Rigveda_32_0152.wav,यां वां होत्रां परिहिनोमि मेधयेमा ब्रह्माणि नृपतीव जिन्वतम्,8.836 |
| Rigveda_30_0333.wav,ऋतावान ऋतजाता ऋतावृधो घोरासो अनृतद्विषः,7.156 |
| RigVeda_Part_026_0272.wav,अर्यमणं भगमदब्धधीतीनच्छा वोचे सधन्यः पावकान्,7.441 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0486.wav,सर्वं तदर्बुदे त्वममित्रेभ्यो दृशे कुरूदारांश्च प्र दर्शय,6.499 |
| Rigveda_40_0193.wav,दिवो नाभा विचक्षणोऽव्यो वारे महीयते,6.082 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0654.wav,अयं तस्माद्गार्हपत्यो नो अग्निरुदिन् नयाति सुकृतस्य लोकम्,6.028 |
| RigVeda_48_0249.wav,पृक्षा इव महयन्तः सुरातयो देवा स्तवन्ते मनुषाय सूरयः,7.732 |
| Rigvedha_012_0135.wav,रध्रचोदः श्नथनो वीळितस्पृथुरिन्द्रः सुयज्ञ उषसः स्वर्जनत्,5.863 |
| Rigveda_33_0350.wav,आ वां स्तोमा इमे मम नभो न चुच्यवीरत,4.091 |
| Atharvaveda_Part_020_20336.wav,अया वाजं देवहितं सनेम मदेम शतहिमाः सुवीराः,6.225 |
| Rigveda_29_0196.wav,तवेदिन्द्रावमं वसु त्वं पुष्यसि मध्यमम्,4.394 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0467.wav,जाया इद्वो अप्सरसो गन्धर्वाः पतयो यूयम्,5.14 |
| RigVeda_Part_020_0161.wav,दधदस्मे सुवीर्यमुत त्यदाश्वश्व्यमिषं स्तोतृभ्य आ भर,7.078 |
| Atharvaveda_Part_020_30313.wav,यस्त्वा स्वप्नेन तमसा मोहयित्वा निपद्यते,5.37 |
| Rig_veda_54_0116.wav,यदिन्द्र ब्रह्मणस्पतेऽभिद्रोहं चरामसि,5.204 |
| Rigveda_40_0175.wav,हस्तच्युतेभिरद्रिभिः सुतं सोमं पुनीतन,4.633 |
| RigVeda_51_0287.wav,दूरमित पणयो वरीय उद्गावो यन्तु मिनतीरृतेन बृहस्पतिर्या अविन्दन्निगूळ्हाः सोमो ग्रावाण ऋषयश्च विप्राः,15.385 |
| Rigvedha_003_0405.wav,अग्ने गृणन्तमंहस उरुष्योर्जो नपात्पूर्भिरायसीभिः,6.476 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0082.wav,वारिदं वारयातै वरणावत्यामधि,3.977 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0259.wav,नमस्ते अस्त्वायते नमो अस्तु परायते,4.471 |
| RigVeda_42_0179.wav,दधाति गर्भमदितेरुपस्थ आ येन तोकं च तनयं च धामहे,7.122 |
| RigVeda_Part_015_0219.wav,इन्द्र कृण्वन्तु वाघतः,3.194 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0023.wav,अव्यनच्च व्यनच्च सस्नि सं ते नवन्त प्रभृता मदेषु,6.256 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0335.wav,एतास्ते असौ धेनवः कामदुघा भवन्तु,4.783 |
| RigVeda_Part_016_0208.wav,अभि श्रवोभिः पृथिवीम्,3.185 |
| RigVeda_Part_019_0251.wav,अस्थुरु चित्रा उषसः पुरस्तान्मिता इव स्वरवोऽध्वरेषु,6.793 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0131.wav,समिन्धते संकसुकं स्वस्तये शुद्धा भवन्तः शुचयः पावकाः,6.976 |
| RigVeda_51_0345.wav,इन्द्र पिब प्रतिकामं सुतस्य प्रातःसावस्तव हि पूर्वपीतिः,6.381 |
| Rigveda_31_0028.wav,वि वां रथो वध्वा यादमानोऽन्तान्दिवो बाधते,11.085 |
| Rigveda_30_0031.wav,इषं रयिं पप्रथद्वाजमस्मे यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः,7.24 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0063.wav,तावन् मे चक्षुर्मा मेष्टोत्तरामुत्तरां समाम्,5.84 |
| Rigveda_40_0534.wav,आ पवस्व सहस्रिणः,2.629 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0204.wav,आजुह्वान ईड्यो वन्द्यश्चा याह्यग्ने वसुभिः सजोषाः,6.441 |
| Rigveda_30_0232.wav,यदद्य सूर्य ब्रवोऽनागा उद्यन्मित्राय वरुणाय सत्यम्,6.957 |
| Rigveda_33_0305.wav,कृतं न ऋत्वियावतो मा नो रीरधतं निदे,5.804 |
| Rigvedha_003_0290.wav,जघन्वाँ उ हरिभिः सम्भृतक्रतविन्द्र वृत्रं मनुषे गातुयन्नपः,7.044 |
| Rigveda_39_0206.wav,भरन्त्यस्मै संयतः पुरःप्रस्रवणा बलिम्,4.991 |
| RigVeda_Part_020_0076.wav,त्वमर्यमा भवसि यत्कनीनां नाम स्वधावन्गुह्यं बिभर्षि,6.638 |
| Rigvedha_008_0009.wav,तमीशानास इरधन्त वाजिनं पृक्षमत्यं न वाजिनम्,6.581 |
| Rig_veda_45_0349.wav,उच्छ्वञ्चस्व पृथिवि मा नि बाधथाः सूपायनास्मै भव सूपवञ्चना,7.843 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0239.wav,योऽजं पञ्चौदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति,5.711 |
| Rigveda_37_0221.wav,यत इन्द्र भयामहे ततो नो अभयं कृधि,5.254 |
| Rigvedha_012_0095.wav,प्र यद्वयो न स्वसराण्यच्छा प्रयांसि च नदीनां चक्रमन्त,5.279 |
| Rigveda_37_0250.wav,उज्जातमिन्द्र ते शव उत्त्वामुत्तव क्रतुम्,5.116 |
| RigVeda_Part_024_0370.wav,अग्निर्न शुष्कं वनमिन्द्र हेती रक्षो नि धक्ष्यशनिर्न भीमा,6.258 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0055.wav,तद्वै पुत्रस्य वेदनं तत्स्त्रीष्वा भरामसि पुंसि वै रेतो भवति तत्स्त्रियामनु षिच्यते तद्वै पुत्रस्य वेदनं तत्प्रजापतिरब्रवीत्प्रजापतिरनुमतिः सिनीवाल्यचीकॢपत् स्त्रैषूयमन्यत्र दधत्पुमांसमु दधदिह,22.644 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0222.wav,अहोरात्रैर्विमितं त्रिंशदङ्गं त्रयोदशं मासं यो निर्मिमीते,8.045 |
| Rigveda_38_0421.wav,युञ्जाथां रासभं रथे वीड्वङ्गे वृषण्वसू,6.589 |
| Atharvaveda_Part_014_0332.wav,सा वः प्रजां जनयद्वक्षणाभ्यो बिभ्रती दुग्धमृषभस्य रेतः,6.507 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0215.wav,वर्म मे द्यावापृथिवी वर्माहर्वर्म सूर्यः,5.93 |
| RigVeda_Part_019_0080.wav,दधिक्राव्ण इष ऊर्जो महो यदमन्महि मरुतां नाम भद्रम्,7.255 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0396.wav,तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्न् अन्यो अभि चाकशीति,7.578 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0531.wav,ईशां व ऋषयश्चक्रुरमित्रेषु समीक्षयन् रदिते अर्बुदे तव,6.189 |
| RigVeda_47_0137.wav,क्षामा रेरिहद्वीरुधः समञ्जन्,3.696 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0103.wav,तासामधि त्वचो अहं भेषजं समु जग्रभम्,4.481 |
| Rigveda_32_0263.wav,वयमु त्वा तदिदर्था इन्द्र त्वायन्तः सखायः,5.564 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0090.wav,इन्द्रस्य युज्यः सखा तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः,7.703 |
| Rigveda_34_0137.wav,अस्य मेधस्य सोम्यस्य सोभरे प्रेमध्वराय पूर्व्यम्,7.17 |
| RigVeda_Part_021_0196.wav,चक्रं न वृत्तं पुरुहूत वेपते मनो भिया मे अमतेरिदद्रिवः,7.071 |
| Atharvaveda_Part_020_30089.wav,न त्वा वज्रिन्त्सहस्रं सूर्या अनु न जातमष्ट रोदसी,6.328 |
| Rigvedha_007_0349.wav,क्तमवो व्यन्तो अजरा अग्नयो व्यन्तो अजराः,6.265 |
| Rigvedha_003_0117.wav,श्रुष्टीवानो हि दाशुषे देवा अग्ने विचेतसः,5.48 |
| Rigvedha_007_0336.wav,शोचिष्केशं वृषणं यमिमा विशः प्रावन्तु जूतये विशः,6.845 |
| RigVeda_50_0141.wav,न्यमित्रेषु वधमिन्द्र तुम्रं वृषन्वृषाणमरुषं शिशीहि,6.92 |
| Rigveda_40_0371.wav,सर्गाः सृष्टा अहेषत,3.167 |
| Rigveda_29_0457.wav,सुहवा देव्यदितिरनर्वा ते नो अंहो अति पर्षन्नरिष्टान्,6.573 |
| Rigveda_37_0099.wav,मह्ना दिवं न तस्तभुः,2.39 |
| RigVeda_Part_022_0384.wav,ते नो वसूनि काम्या पुरुश्चन्द्रा रिशादसः,5.427 |
| RigVeda_Part_021_0213.wav,प्रियः सूर्ये प्रियो अग्ना भवाति य इन्द्राय सुतसोमो ददाशत्,7.831 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0430.wav,यमो मह्यं पुनरित्त्वां ददाति तस्मै यमाय नमो अस्तु मृत्यवे,6.211 |
| Rig_veda_45_0413.wav,क्रेण शोचिषोरु प्रथयसे बृहत्,3.703 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0312.wav,प्रजापतिश्च परमेष्ठी च शृङ्गे इन्द्रः शिरो अग्निर्ललाटं यमः कृकाटम्,8.156 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0318.wav,सांतपना इदं हविर्मरुतस्त,2.951 |
| Rigveda_39_0108.wav,चिकित्विन्मनसं धियं प्रत्नामृतस्य पिप्युषीम्,3.024 |
| RigVeda_50_0318.wav,न नौ मन्त्रा अनुदितास एते मयस्करन्परतरे चनाहन्,6.2 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0302.wav,भूतं च भव्यं च श्रद्धा च रुचिश्च स्वर्गश्च स्वधा च य एतं देवमेकवृतं वेद य एतं देवमेकवृतं वेद स एव मृत्युः सोऽमृतं सोऽभ्वं स रक्षः,16.453 |
| Rigveda_40_0215.wav,ते नः सहस्रिणं रयिं पवन्तामा सुवीर्यम्,6.137 |
| Rigvedha_003_0188.wav,उषो ये ते प्र यामेषु युञ्जते मनो दानाय सूरयः,6.431 |
| Rigveda_29_0344.wav,प्र ब्रह्मैतु सदनादृतस्य वि रश्मिभिः ससृजे सूर्यो गाः,6.663 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0481.wav,तस्माद्वै विद्वान् पुरुषमिदं ब्रह्मेति मन्यते सर्वा ह्यस्मिन् देवता गावो गोष्ठ इवासते प्रथमेन प्रमारेण त्रेधा विष्वङ्वि गच्छति,14.59 |
| Rigvedha_006_0024.wav,इमां ते धियं प्र भरे महो महीमस्य स्तोत्रे धिषणा यत्त आनजे,7.432 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0352.wav,वसोर्वसोर्वसुदान एधि वयं त्वेन्धानास्तन्वं पुषेम,6.412 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0023.wav,यत्ते मध्यं पृथिवि यच्च नभ्यं यास्त ऊर्जस्तन्वः संबभूवुः,6.616 |
| Rigveda_34_0192.wav,यमादित्यासो अद्रुहः पारं नयथ मर्त्यम्,5.972 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0071.wav,एतौ यक्ष्मं वि बाधेते एतौ मुञ्चतो अंहसः,5.456 |
| Rigvedha_010_0104.wav,यच्च्यावयथ विथुरेव संहितं व्यद्रिणा पतथ त्वेषमर्णवम्,6.464 |
| Rigveda_35_0117.wav,नि द्विपादश्चतुष्पादो अर्थिनोऽविश्रन्पतयिष्णवः,4.699 |
| Rigveda_34_0244.wav,वयमु त्वामपूर्व्य स्थूरं न कच्चिद्भरन्तोऽवस्यवः,6.726 |
| RigVeda_47_0395.wav,वयं सोम व्रते तव मन,2.98 |
| RigVeda_Part_019_0250.wav,नूनं दिवो दुहितरो विभातीर्गातुं कृणवन्नुषसो जनाय,7.465 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0355.wav,पुरोगवा ये अभिसाचो अस्य ते त्वा वहन्ति सुकृतामु लोकम्,6.097 |
| Rigvedha_006_0222.wav,याभिः कर्कन्धुं वय्यं च जिन्वथस्ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्,7.423 |
| Rigveda_37_0117.wav,युवं देवा क्रतुना पूर्व्येण युक्ता रथेन तविषं यजत्रा,7.66 |
| Rigvedha_011_0160.wav,त्वामग्ने पितरमिष्टिभिर्नरस्त्वां भ्रात्राय शम्या तनूरुचम्,7.1340625 |
| Atharvaveda_Part_020_40224.wav,अनामयोपजिह्विका,3.194 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0358.wav,मृत्योराषमा पद्यन्तां क्षुधं सेदिं वधं भयम्,4.544 |
| Rigvedha_007_0163.wav,दुहीयन्मित्रधितये युवाकु राये च नो मिमीतं वाजवत्यै,5.503 |
| Rigvedha_011_0034.wav,करम्भ ओषधे भव पीवो वृक्क उदारथिः,4.672 |
| Atharvaveda_Part_014_0373.wav,नमो गन्धर्वस्य नमसे नमो भामाय चक्षुषे च कृण्मः,5.773 |
| RigVeda_Part_021_0340.wav,अच्छा मही बृहती शंतमा गीर्दूतो न गन्त्वश्विना हुवध्यै,8.325 |
| Rigvedha_008_0050.wav,तष्टेव वृक्षं वनिनो नि वृश्चसि परश्वेव नि वृश्चसि,4.838 |
| RigVeda_Part_026_0004.wav,अविप्रे चिद्वयो दधदनाशुना चिदर्वता,5.889 |
| RigVeda_Part_026_0076.wav,इन्द्र ज्येष्ठं न आ भरँ ओजिष्ठं पपुरि श्रवः,6.843 |
| RigVeda_Part_019_0258.wav,प्रबोधयन्तीरुषसः ससन्तं द्विपाच्चतुष्पाच्चरथाय जीवम्,7.478 |
| Atharvaveda_Part_020_20495.wav,विश्वायुर्धेह्यक्षितम्,2.89 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0335.wav,तेनेमां मणिना कृषिमश्विनावभि रक्षतः स भिषग्भ्यां महो दुहे भूयोभूयः श्वःश्वस्तेन त्वं द्विषतो जहि,11.413 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0758.wav,केशा नडा इव वर्धन्तां शीर्ष्णस्ते असिताः परि,5.608 |
| Rigveda_34_0234.wav,रिहते ककुभो मिथः,2.873 |
| Rigvedha_005_0300.wav,स दक्षाणां दक्षपतिर्बभूवाञ्जन्ति यं दक्षिणतो हविर्भिः,7.168 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0172.wav,उत प्रहामतिदीवा जयति कृतमिव श्वघ्नी वि चिनोति काले,5.432 |
| Rig_veda_45_0206.wav,उरूणसावसुतृपा उदुम्बलौ यमस्य दूतौ चरतो जनाँ अनु,6.872 |
| RigVeda_Part_024_0172.wav,कृणोषि यच्छवसा भूरि पश्वो वयो वृकायारये जसुरये,6.529 |
| RigVeda_Part_018_0177.wav,इन्द्रं परेऽवरे मध्यमास इन्द्रं यान्तोऽवसितास इन्द्रम्,6.953 |
| Rigveda_37_0085.wav,वसवो रुद्रा अवसे न आ गमञ्छृण्वन्तु मरुतो हवम्,7.08 |
| Rigvedha_006_0237.wav,याभिर्महामतिथिग्वं कशोजुवं दिवोदासं शम्बरहत्य आवतम्,7.153 |
| Rigvedha_003_0092.wav,अद्या दूतं वृणीमहे वसुमग्निं पुरुप्रियम्,4.664 |
| Rigveda_33_0035.wav,वोळ्हमश्वावतीरिषः,3.428 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0358.wav,ये भक्षयन्तो न वसून्यानृधुर्यान् अग्नयो अन्वतप्यन्त धिष्ण्याः,7.024 |
| Rigveda_30_0155.wav,स्वायुधास इष्मिणः सुनिष्का उत स्वयं तन्वः शुम्भमानाः,7.087 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0014.wav,अनभ्रयः खनमाना विप्रा गम्भीरे अपसः,5.293 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0200.wav,तेनैनं प्राशिषं तेनैनमजीगमम्,4.146 |
| RigVeda_48_0166.wav,परावतो ये दिधिषन्त आप्यं मनुप्री,3.862 |
| Atharvaveda_Part_020_10038.wav,आखण्डल प्र हूयसे,3.163 |
| Atharvaveda_Part_020_30415.wav,नि तद्दधिषेऽवरे परे च यस्मिन्न् आविथावसा दुरोणे,5.672 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0292.wav,मधोरस्मि मधुतरो मदुघान् मधुमत्तरः,4.707 |
| RigVeda_42_0057.wav,तं मर्जयन्त सुवृधं नदीष्वाँ उशन्तमंशुं परियन्तमृग्मियम्,8.071 |
| RigVeda_Part_022_0168.wav,ये वावृधन्त पार्थिवा य उरावन्तरिक्ष आ,5.69 |
| Rigvedha_005_0276.wav,अयं मित्रस्य वरुणस्य धायसेऽवयातां मरुतां हेळो अद्भुतः,7.671 |
| Rigvedha_004_0245.wav,न योरुपब्दिरश्व्यः शृण्वे रथस्य कच्चन,4.479 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0628.wav,यावन्तो अस्मान् पितरः सचन्ते तेषां सर्वेषां शिवो अस्तु मन्युः,7.484 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0381.wav,तां देवा अमीमांसन्त वशेया अवशेति,5.721 |
| Rigvedha_001_0012.wav,यदङ्ग दाशुषे त्वमग्ने भद्रं करिष्यसि,6.101 |
| RigVeda_47_0242.wav,अहं स यो नववास्त्वं बृहद्रथं सं वृत्रेव दासं वृत्रहारुजम्,7.45 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0126.wav,शं न ओषधीर्वनिनो भवन्तु शं नो रजसस्पतिरस्तु जिष्णुः,5.972 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0344.wav,स आभ्यो विश्वमिद्दुहे भूयोभूयः श्वःश्वस्तेन त्वं द्विषतो जहि ऋतवस्तमबध्नतार्तवास्तमबध्नत संवत्सरस्तं बद्ध्वा सर्वं भूतं वि रक्षति,15.3 |
| Rigvedha_006_0347.wav,यदश्विना ऊहथुर्भुज्युमस्तं शतारित्रां नावमातस्थिवांसम् ॐ,12.468 |
| Rigveda_32_0280.wav,स्वादवः सोमा आ याहि श्रीताः सोमा आ याहि,6.324 |
| RigVeda_Part_026_0261.wav,उत स्य देवः सविता भगो नोऽपां नपादवतु दानु पप्रिः,7.446 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0079.wav,वणेषु शुष्मो अस्तु ते पृथिव्यामस्तु यद्धरः,4.986 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0102.wav,तृतीया ह प्रद्यौरिति यस्यां पितर आसते,5.039 |
| RigVeda_43_0178.wav,नमस्यन्तीरुप च यन्ति सं चा च विशन्त्युशतीरुशन्तम्,5.922 |
| RigVeda_Part_025_0120.wav,एवा न स्पृधः समजा समत्स्विन्द्र रारन्धि मिथतीरदेवीः,6.956 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0340.wav,पञ्चापूपं शितिपादमविं लोकेन संमितम्,4.968 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0418.wav,येन सूर्यां सावित्रीमश्विनोहतुः पथा,5.001 |
| Rigvedha_003_0010.wav,प्र वेपयन्ति पर्वतान्वि विञ्चन्ति वनस्पतीन्,5.827 |
| Rigveda_33_0126.wav,वृषा ह्युग्र शृण्विषे,2.701 |
| RigVeda_49_0099.wav,प्र सप्तसप्त त्रेधा हि चक्रमुः प्र सृत्वरीणामति सिन्धुरोजसा,6.528 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0029.wav,चोदयामि त आयुधा वचोभिः सं ते शिशामि ब्रह्मणा वयांसि,7.134 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0201.wav,आयमगन् युवा भिषक्पृश्निहापराजितः,4.418 |
| Rigveda_40_0323.wav,क्थ्यं दिव्यं पार्थिवं वसु,3.606 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0481.wav,तद्विषं सर्पा उप जीवन्त्युपजीवनीयो भवति य एवं वेद,6.111 |
| Rigveda_32_0005.wav,स वावृधे नर्यो योषणासु वृषा शिशुर्वृषभो यज्ञियासु,6.613 |
| Rig_veda_54_0268.wav,बृहस्पतिर्नयतु दुर्गहा तिरः पुनर्नेषदघशंसाय मन्म,6.447 |
| RigVeda_47_0369.wav,संवेशने तन्वश्चारुरेधि प्रियो देवानां परमे जनित्रे,7.947 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0364.wav,घृतं ते देवीर्नप्त्य आ वहन्तु घृतं तुभ्यं,5.847 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0452.wav,सर्वे देवा उपाशिक्षन् तदजानाद्वधूः सती,5.528 |
| Rig_veda_54_0079.wav,शतमिन्द्राग्नी सविता बृहस्पतिः शतायुषा हविषेमं पुनर्दुः,7.234 |
| Rigvedha_008_0182.wav,तमर्यमाभि रक्षत्यृजूयन्तमनु व्रतम्,4.347 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0230.wav,कैरात पृश्न उपतृण्य बभ्र आ मे शृणुतासिता अलीकाः,6.174 |
| Atharvaveda_Part_020_40125.wav,वेधा ऋतस्य वीरिणीन्द्रपत्नी महीयते विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः,6.725 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0477.wav,अस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् कर्मण्यस्यां पुरोधायामस्यां प्रतिष्ठायामस्याम् चित्त्यामस्यामाकूत्यामस्यामाशिष्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा वायुरन्तरिक्षस्याधिपतिः स मावतु,18.341 |
| Rig_veda_45_0334.wav,शतं जीवन्तु शरदः पुरूचीरन्तर्मृत्युं दधतां पर्वतेन,6.772 |
| Rigvedha_009_0302.wav,अवः परेण पर एनावरेण पदा वत्सं बिभ्रती गौरुदस्थात्,7.09 |
| Rigvedha_013_0307.wav,अग्ने दुव इच्छमानास आप्यमुपासते द्रविणं धेहि तेभ्यः,7.445 |
| Atharvaveda_Part_020_30027.wav,ससन्तु त्या अरातयो बोधन्तु शूर रातयः,5.212 |
| Rig_veda_45_0085.wav,र्तार उर्विया परि ख्यन्,2.823 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0465.wav,श्वेवैकः कपिरिवैकः कुमारः सर्वकेशकः,4.421 |
| RigVeda_Part_027_0265.wav,परि यद्भूथो रोदसी चिदुर्वी सन्ति स्पशो अदब्धासो अमूराः,7.399 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0089.wav,सर्वांस्तान् विश्वभेषजोऽरसां जङ्गिडस्करत्,5.58 |
| Atharvaveda_Part_014_0375.wav,राया वयं सुमनसः स्यामोदितो गन्धर्वमावीवृताम,5.492 |
| Atharvaveda_Part_015_0041.wav,कीर्तिश्च यशश्च पुरःसरौ ऐनं कीर्तिर्गच्छत्या यशो गच्छति य एवं वेद,7.717 |
| RigVeda_Part_027_0332.wav,अदब्धेभिः सवितः पायुभिष्ट्वं शिवेभिरद्य परि पाहि नो गयम्,7.075 |
| RigVeda_Part_024_0165.wav,त्वं भगो न आ हि रत्नमिषे परिज्मेव क्षयसि दस्मवर्चाः,6.387 |
| Rigvedha_005_0010.wav,शुक्रस्य त्वाभ्यक्षरन्धारा ऋतस्य सादने,5.251 |
| RigVeda_Part_022_0267.wav,विश्वस्य तस्य भवथा नवेदसः शुभं यातामनु रथा अवृत्सत,6.937 |
| RigVeda_51_0233.wav,ष्ठां पादेव गाधं तरते विदाथः,4.244 |
| RigVeda_Part_020_0376.wav,उतो ते तन्यतुर्यथा स्वानो अर्त त्मना दिवः,6.137 |
| RigVeda_Part_027_0188.wav,दृळ्हस्य चिद्गोमतो वि व्रजस्य दुरो वर्तं गृणते चित्रराती,7.04 |
| RigVeda_43_0174.wav,नृभिर्यतः कृणुते निर्णिजं गा अतो मतीर्जनयत स्वधाभिः,6.776 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0013.wav,तेनान्तरिक्षं विमिता रजांसि तेन देवा अमृतमन्वविन्दन्,6.602 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0448.wav,ध्रुवा द्यौर्ध्रुवा पृथिवी ध्रुवं विश्वमिदं जगत् ध्रुवासः पर्वता इमे ध्रुवो राजा विशामयम्,9.168 |
| RigVeda_Part_024_0127.wav,पुर उक्थेभिः स हि नो विभावा स्वध्वरा करति जातवेदाः,6.866 |
| Rigveda_32_0325.wav,नही न्वस्य महिमानमिन्द्रियं स्वर्गृणन्त आनशुः,5.531 |
| Rigveda_33_0010.wav,स्थूरं राधः शताश्वं कुरुङ्गस्य दिविष्टिषु,4.694 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0120.wav,मृडया नस्तनूभ्यो मयस्तोकेभ्यस्कृधि,4.645 |
| RigVeda_Part_020_0255.wav,अग्निर्जुषत नो गिरो होता यो मानुषेष्वा,5.691 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0103.wav,तस्य वृश्चामि ते मूलं न छायां करवोऽपरम्,4.765 |
| Rigveda_33_0449.wav,यं विप्रा उक्थवाहसोऽभिप्रमन्दुरायवः,5.088 |
| Rigveda_38_0315.wav,नह्यन्यं बळाकरं मर्डितारं शतक्रतो,6.346 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0385.wav,विलिप्त्या बृहस्पते या च सूतवशा वशा,4.721 |
| RigVeda_Part_028_0104.wav,स मा नो अत्र जुहुरः सहस्वः सदा त्वे सुमनसः स्याम,6.053 |
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