| audio_file,text,length |
| RigVeda_43_0379.wav,स वां यज्ञेषु मानवी इन्दुर्जनिष्ट रोदसी,5.271 |
| Rig_veda_45_0463.wav,विद्मा ह्यस्य भोजनमिनस्य यदा पशुं न गोपाः करामहे,6.613 |
| RigVeda_44_0408.wav,कूचिज्जायते सनयासु नव्यो वने तस्थौ पलितो धूमकेतुः,6.874 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0134.wav,यो नः पाप्मन् न जहासि तमु त्वा जहिमो वयम्,4.344 |
| Rigveda_32_0264.wav,कण्वा उक्थेभिर्जरन्ते न घेमन्यदा पपन वज्रिन्नपसो नविष्टौ तवेदु स्तोमं चिकेत,12.142 |
| Rigveda_30_0030.wav,एवाग्निं सहस्यं वसिष्ठो रायस्कामो विश्वप्स्न्यस्य स्तौत्,7.991 |
| Rigveda_40_0251.wav,यत्रामृतास आसते,3.412 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0070.wav,को अस्य बाहू समभरद्वीर्यां करवादिति,4.722 |
| RigVeda_44_0103.wav,शिशुं न यज्ञैः परि भूषत श्रिये,4.042 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0439.wav,असंज्ञा गन्धेन शुगुद्ध्रियमाणाशीविष उद्धृता,5.677 |
| Rigveda_29_0229.wav,त्रयः कृण्वन्ति भुवनेषु रेत,2.829 |
| RigVeda_42_0274.wav,अवन्त्यस्य पवीतारमाशवो दिवस्पृष्ठमधि तिष्ठन्ति चेतसा,7.408 |
| RigVeda_48_0078.wav,स इद्दानाय दभ्याय वन्वञ्च्यवानः सूदैरमिमीत वेदिम्,7.637 |
| RigVeda_51_0268.wav,कास्मेहितिः का परितक्म्यासीत्कथं रसाया अतरः पयांसि,7.015 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0398.wav,यद्गायत्रे अधि गायत्रमाहितं त्रैष्टुभं वा त्रैष्टुभान् निरतक्षत,8.078 |
| RigVeda_Part_020_0284.wav,पदं न तायुर्गुहा दधानो महो राये चितयन्नत्रिमस्पः,6.791 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0095.wav,अश्वस्यास्नः संपतिता सा वृक्षामभि सिष्यदे सरा पतत्रिणी भूत्वा सा न एह्यरुन्धति,10.894 |
| RigVeda_Part_024_0217.wav,अग्ने विश्वेभिः स्वनीक देवैरूर्णावन्तं प्रथमः सीद योनिम्,7.835 |
| Rigveda_30_0123.wav,वास्तोष्पते प्रति जानीह्यस्मान्स्वावेशो अनमीवो भवा नः,8.367 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0393.wav,त्वं हि विश्वतोमुख विश्वतः परिभूरसि,3.696 |
| Rigvedha_010_0233.wav,स्तीर्णं बर्हिरा तु शक्र प्र याहि पिबा निषद्य वि मुचा हरी इह,7.645 |
| Rigvedha_004_0238.wav,धनंजयो रणेरणे,2.82 |
| Rigvedha_011_0147.wav,तव प्रशास्त्रं त्वमध्वरीयसि ब्रह्मा चासि गृहपतिश्च नो दमे,6.9860625 |
| Rig_veda_45_0065.wav,शं योरभि स्रवन्तु नः,2.499 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0272.wav,त्वं नो अग्ने अग्निभिर्ब्रह्म यज्ञं वर्धय,4.617 |
| RigVeda_Part_022_0123.wav,देवेभिर्हव्यदातये,3.186 |
| Rigvedha_005_0161.wav,त्वं नः सोम विश्वतो रक्षा राजन्नघायतः,4.958 |
| Rigvedha_006_0256.wav,याभिर्ध्वसन्तिं पुरुषन्तिमावतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्,7.072 |
| Rigveda_35_0041.wav,भोजेष्वस्माँ अभ्यु,3.411 |
| RigVeda_Part_018_0143.wav,स वृत्रहत्ये हव्यः स ईड्यः स सुष्टुत इन्द्रः सत्यराधाः,7.234 |
| RigVeda_Part_023_0045.wav,आ नो मित्र सुदीतिभिर्वरुणश्च सधस्थ आ,5.065 |
| Rigveda_41_0204.wav,अक्रान्देवो न सूर्यः इन्दुः पविष्ट चेतनः प्रियः कवीनां मती सृजदश्वं रथीरिव,12.697 |
| Atharvaveda_Part_020_20114.wav,यस्मिन्न् उक्थानि रण्यन्ति विश्वानि च श्रवस्य,4.372 |
| RigVeda_46_0184.wav,आग्मन्नाप उशतीर्बर्हिरेदं न्यध्वरे असदन्देवयन्तीः,7.112 |
| Rigveda_35_0085.wav,तव वायवृतस्पते त्वष्टुर्जामातरद्भुत,5.349 |
| RigVeda_46_0053.wav,प्र श्मश्रु हर्यतो दूधोद्वि वृथा यो अदाभ्यः,5.285 |
| Rigveda_34_0166.wav,भद्रा उत प्रशस्तयः,2.677 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0202.wav,अस्मै ग्रामाय प्रदिशश्चतस्र ऊर्जं सुभूतं स्वस्ति सविता नः कृणोतु,7.111 |
| RigVeda_Part_025_0347.wav,अस्य मदे पुरु वर्पांसि विद्वानिन्द्रो वृत्राण्यप्रती जघान,7.033 |
| RigVeda_Part_028_0335.wav,सप्तेदिन्द्रं न स्रवतो गृणन्ति नि युध्यामधिमशिशादभीके,7.035 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0442.wav,आ त्वाहार्षमन्तरभूर्ध्रुवस्तिष्ठाविचाचलत्,5.354 |
| Rigveda_32_0077.wav,शतं वर्चिनः सहस्रं च साकं हथो अप्रत्यसुरस्य वीरान्,6.889 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0048.wav,यो विष्टभ्नाति पृथिवीं दिवं च तस्माद्देवा अधि सृष्टीः सृजन्ते,6.852 |
| RigVeda_42_0308.wav,पवमाना अभ्यर्षन्ति सुष्टुतिमेन्द्रं विशन्ति मदिरास इन्दवः,6.603 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0566.wav,सर्वविद्द्विपाच्च सर्वं नो रक्ष चतुष्पाद् यच्च नः स्वम्,5.567 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0236.wav,यद्रोहितमजनयन्त देवाः तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति,10.19 |
| RigVeda_48_0268.wav,विश्वे देवासः शृणवन्वचांसि मे सरस्वती सह धीभिः पुरंध्या,7.796 |
| Rig_veda_45_0438.wav,गुहा यदी कवीनां विशां नक्षत्रशवसाम्,5.489 |
| Rigveda_40_0307.wav,पवित्रे सोमो अक्षाः,3.307 |
| Rigvedha_010_0168.wav,समत्सु त्वा शूर सतामुराणं प्रपथिन्तमं परितंसयध्यै,6.407 |
| Atharvaveda_Part_014_0224.wav,भागं देवेभ्यो वि दधास्यायन् प्र चन्द्रमस्तिरसे दीर्घमायुः,6.659 |
| Rigvedha_008_0245.wav,वेदिषदे प्रियधामाय सुद्युते धासिमिव प्र भरा योनिमग्नये,8.062 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0400.wav,आ देवानामपि पन्थामगन्म यच्छक्नवाम तदनुप्रवोढुम्,6.041 |
| RigVeda_44_0174.wav,जनो न पुरि चम्वोर्विशद्धरिः सदो वनेषु दधिषे,5.467 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0097.wav,वषट्ते पूषन्न् अस्मिन्त्सूतावर्यमा होता कृणोतु वेधाः,7.044 |
| Rigvedha_006_0248.wav,याभिः सुदास ऊहथुः सुदेव्यं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्,8.049 |
| RigVeda_43_0181.wav,इष्यन्वाचमुपवक्तेव होतुः पुनान इन्दो वि ष्या मनीषाम्,7.471 |
| Rigveda_35_0322.wav,आ याहि पर्वतेभ्यः समुद्रस्याधि विष्टपः,5.811 |
| Rigvedha_003_0184.wav,अश्वावतीर्गोमतीर्विश्वसुविदो भूरि च्यवन्त वस्तवे,6.654 |
| Rigveda_40_0128.wav,सुवानो याति कविक्रतुः,3.193 |
| RigVeda_Part_015_0016.wav,सहदानुं पुरुहूत क्षियन्तमहस्तमिन्द्र सं पिणक्कुणारुम्,6.68 |
| Atharvaveda_Part_020_30102.wav,इन्द्रा याहि धियेषितो विप्रजुतः सुतावतः,4.811 |
| RigVeda_50_0003.wav,नह्यस्या अपरं चन जरसा मरते पतिर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः,5.312 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0578.wav,ततस्त्वा ब्रह्मोदह्वयत्स हि नेत्रमवेत्तव सर्वे गर्भादवेपन्त जायमानादसूस्वः ससूव हि तामाहु वशेति ब्रह्मभिः कॢप्तः स ह्यस्या बन्धुः युध एकः सं सृजति यो अस्या एक इद्वशी,21.048 |
| RigVeda_Part_019_0219.wav,अश्वावन्तं सहस्रिणम्,3.718 |
| RigVeda_48_0114.wav,तद्बन्धुः सूरिर्दिवि ते धियंधा नाभाने,5.032 |
| Rig_veda_54_0201.wav,इन्द्र इवेह ध्रुवस्तिष्ठेह राष्ट्रमु धारय,4.876 |
| Rigvedha_010_0214.wav,तामनु त्वा निविदं जोहवीमि विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्,6.862 |
| Rigvedha_009_0192.wav,अशपत यः करस्नं व आददे यः प्राब्रवीत्प्रो तस्मा अब्रवीतन,7.645 |
| Rigvedha_003_0257.wav,महान्तं चिदर्बुदं नि क्रमीः पदा सनादेव दस्युहत्याय जज्ञिषे,7.756 |
| Rigveda_38_0385.wav,अधि न इन्द्रैषां विष्,2.562 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0115.wav,यो वै तां ब्रह्मणो वेदामृतेनावृतां पुरम्,5.724 |
| Rigvedha_010_0247.wav,मिनाति श्रियं जरिमा तनूनामप्यू नु पत्नीर्वृषणो जगम्युः,6.053 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0008.wav,गृह्णेऽहं त्वेषां भूमानं बिभ्रदौदुम्बरं मणिम्,7.43 |
| RigVeda_52_0190.wav,यः प्राणतो निमिषतो महित्वैक इद्राजा जगतो बभूव,6.958 |
| Rig_veda_45_0026.wav,बाहुभ्यामग्निमायवोऽजनन्त वि,3.826 |
| RigVeda_53_0302.wav,वि मन्योः शर्म यच्छ वरीयो यवया वधम्,5.394 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0138.wav,इन्द्रा याहि मे हवमिदं करिष्यामि तच्छृणु,4.64 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0128.wav,सा मातुर्बध्यतां गृहेऽथो भ्रातुरथो पितुः,4.946 |
| RigVeda_Part_023_0103.wav,पुरूरुणा चिद्ध्यस्त्यवो नूनं वां वरुण,4.878 |
| RigVeda_44_0417.wav,समानं नीळं वृषणो वसानाः सं जग्मिरे महिषा अर्वतीभिः,6.787 |
| RigVeda_51_0043.wav,अस्मे धेहि द्युमतीं वाचमासन्बृहस्पते अनमीवामिषिराम्,7.031 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0250.wav,परमेभिः पथिभि स्तेनो धावतु तस्करः,4.27 |
| RigVeda_51_0161.wav,इमं सजाता अनु वीरयध्वमिन्द्रं सखायो अनु सं रभध्वम्,6.939 |
| Rigveda_38_0477.wav,तत्ते य,1.733 |
| RigVeda_44_0185.wav,तरत्समुद्रं पवमान ऊर्मिणा राजा देव ऋतं बृहत्,6.245 |
| Atharvaveda_Part_020_10427.wav,जातो व्यख्यत्पित्रोरुपस्थे भुवो न वेद जनितुः परस्य,5.807 |
| Rigveda_30_0248.wav,युष्मद्भिया वृषणो रेजमाना दक्षस्य चिन्महिना मृळता नः,6.84 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0437.wav,यो न स्तायद्दिप्सति यो न आविः स्वो विद्वान् अरणो वा नो अग्ने,6.373 |
| Rigvedha_003_0376.wav,त्वं दिवो धरुणं धिष ओजसा पृथिव्या इन्द्र सदनेषु माहिनः,6.473 |
| Rigvedha_013_0224.wav,सुमङ्गलश्च शकुने भवासि मा त्वा का चिदभिभा विश्व्या विदत्,6.5990625 |
| RigVeda_Part_020_0206.wav,पुरू यो दग्धासि वनाग्ने पशुर्न यवसे,5.229 |
| Atharvaveda_Part_020_40036.wav,यदा कृणोषि नदनुं समूहस्यादित्पितेव हूयसे,5.681 |
| RigVeda_Part_024_0224.wav,अस्थूरि नो गार्हपत्यानि सन्तु तिग्मेन नस्तेजसा सं शिशाधि,7.102 |
| Rigveda_38_0357.wav,इषा मन्दस्वादु तेऽरं वराय मन्यवे,5.686 |
| Rigvedha_008_0060.wav,महो धनानि दयमान ओजसा विश्वा धनान्योजसा,6.385 |
| RigVeda_Part_016_0168.wav,त्री षधस्था सिन्धवस्त्रिः कवीनामुत त्रिमाता विदथेषु सम्राट्,7.789 |
| Atharvaveda_Part_020_20247.wav,इन्द्र तानि त आ वृणे,3.049 |
| RigVeda_50_0377.wav,ममद्धि सोमं मधुमन्तमिन्द्र सत्रा वृषञ्जठर आ वृषस्व,7.09 |
| Rig_veda_45_0306.wav,आसद्यास्मिन्बर्हिषि मादयस्वानमीवा इष आ धेह्यस्मे,6.526 |
| Atharvaveda_Part_020_10042.wav,स पाहि मध्वो अन्धसः,2.808 |
| Atharvaveda_Part_020_40222.wav,अश्वस्य वारो गोशपद्यके,3.839 |
| Rigvedha_010_0016.wav,अतो वयमन्तमेभिर्युजानाः स्वक्षत्रेभिस्तन्वः शुम्भमानाः,8.378 |
| Rigveda_37_0091.wav,वीती होत्राभिरुत देववीतिभिः ससवांसो वि शृण्विरे,7.695 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0311.wav,यस्मिन् राष्ट्रे निरुध्यते ब्रह्मजायाचित्त्या,4.95 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0015.wav,उत पुत्रः पितरं क्षत्रमीडे ज्येष्ठं मर्यादमह्वयन्त्स्वस्तये,7.85 |
| Atharvaveda_Part_015_0161.wav,मनसान्नादेनान्नमत्ति य एवं वेद स यद्दक्षिणां दिशमनु व्यचलदिन्द्रो भूत्वानुव्यचलद्बलमन्नादं कृत्वा,13.07 |
| RigVeda_Part_025_0357.wav,आ त्वा हरयो वृषणो युजाना वृषरथासो वृषरश्मयोऽत्याः,7.202 |
| RigVeda_Part_019_0287.wav,दिवो धर्ता भुवनस्य प्रजापतिः पिशङ्गं द्रापिं प्रति मुञ्चते कविः,7.393 |
| RigVeda_53_0026.wav,विराण्मित्रावरुणयोरभिश्रीरिन्द्रस्य त्रिष्टुबिह भागो अह्नः विश्वान्देवाञ्जगत्या विवेश तेन चाकॢप्र ऋषयो मनुष्याः चाकॢप्रे तेन ऋषयो मनुष्या यज्ञे जाते पितरो नः पुराणे,24.99 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0278.wav,विष्णोः क्रमोऽसि सपत्नहा द्यौसंशितः सूर्यतेजाः,6.168 |
| RigVeda_Part_022_0175.wav,एतेभिर्मह्यं नामभिर्यज्ञं विष्टार ओहते,5.932 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0227.wav,परेहि न त्वा कामये वृक्षां वनानि सं चर गृहेषु गोषु मे मनः,6.748 |
| Rigvedha_008_0314.wav,तन्नस्तुरीपमद्भुतं पुरु वारं पुरु त्मना,5.358 |
| RigVeda_Part_019_0086.wav,दधिक्राव्ण इदु नु चर्किराम विश्वा इन्मामुषसः सूदयन्तु,6.231 |
| Rigveda_30_0221.wav,सस्वश्चिद्धि तन्वः शुम्भमाना आ हंसासो नीलपृष्ठा अपप्तन्,7.964 |
| RigVeda_Part_023_0337.wav,प्र ये जाता महिना ये च नु स्वयं प्र विद्मना ब्रुवत एवयामरुत्,7.138 |
| RigVeda_Part_028_0289.wav,त्वे गावः सुदुघास्त्वे ह्यश्वास्त्वं वसु देवयते वनिष्ठः,6.698 |
| Rigveda_37_0399.wav,वि षु द्वेषो व्यंहतिमादि,3.31 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0249.wav,उत्तानपर्णे सुभगे देवजूते सहस्वति,4.647 |
| Rigvedha_003_0415.wav,स्वर्वते सत्यशुष्माय पूर्वीर्वैश्वानराय नृतमाय यह्वीः,6.833 |
| Rigvedha_011_0254.wav,सपर्येम सपर्यवः,2.3720625 |
| Rigveda_33_0217.wav,इमां मे मरुतो गिरमिमं स्तोममृभुक्षणः,5.341 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0315.wav,स वा ऋग्भ्योऽजायत तस्मादृचोऽजायन्त,4.728 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0012.wav,यद्देवा देवान् हविषाऽयजन्तामर्त्यान् मनसा मर्त्येन,5.879 |
| RigVeda_Part_027_0400.wav,यो नः स्वो अरणो यश्च निष्ट्यो जिघांसति,4.958 |
| Rigveda_31_0065.wav,निरंहसस्तमस स्पर्तमत्रिं नि जाहुषं शिथिरे,7.136 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0349.wav,अग्निं ब्रूमो वनस्पतीन् ओषधीरुत वीरुधः,4.847 |
| RigVeda_48_0116.wav,सा नो नाभिः परमास्य वा घाहं तत्पश्चा कतिथश्चिदास,7.102 |
| Rigveda_32_0060.wav,त्केवलः सोमो अस्य,2.975 |
| RigVeda_Part_017_0191.wav,दूतं वो विश्ववेदसं हव्यवाहममर्त्यम्,5.318 |
| Rigvedha_013_0170.wav,इमौ देवौ जायमानौ जुषन्तेमौ तमांसि गूहतामजुष्टा,6.4170625 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0157.wav,पुच्छं वातस्य देवस्य तेन धूनोत्योषधीः,5.428 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0045.wav,अर्चामि सत्यसवं रत्नधामभि प्रियं मतिम्,4.23 |
| Rigvedha_012_0308.wav,अहरहर्यात्यक्तुरपां कियात्या प्रथमः सर्ग आसाम्,6.51 |
| Rig_veda_45_0097.wav,यमस्य मा यम्यं काम आगन्समाने योनौ सहशेय्याय,7.897 |
| RigVeda_51_0218.wav,उष्टारेव फर्वरेषु श्रयेथे प्रायोगेव श्वात्र्या शासुरेथः,7.769 |
| Rigvedha_009_0142.wav,युक्तो ह यद्वां तौग्र्याय पेरुर्वि मध्ये अर्णसो धायि पज्रः,6.699 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0511.wav,ये पुरस्ताज्जुह्वति जातवेदः प्राच्या दिशोऽभिदासन्त्यस्मान्,7.107 |
| Rigvedha_007_0102.wav,प्रवद्यामना सुवृता रथेन दस्राविमं शृणुतं श्लोकमद्रेः,7.543 |
| Rigveda_38_0055.wav,उदू षु णो वसो महे मृशस्व शूर राधसे,5.484 |
| RigVeda_Part_019_0192.wav,इह प्रयाणमस्तु वामिन्द्रवायू विमोचनम्,5.187 |
| RigVeda_Part_024_0179.wav,नाना ह्यग्नेऽवसे स्पर्धन्ते रायो अर्यः,6.828 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0463.wav,सर्वेषां च क्रिमीणां सर्वासां च क्रिमीनाम्,5.906 |
| Rigvedha_001_0060.wav,महो अर्णः सरस्वती प्र चेतयति केतुना,6.296 |
| Rigvedha_013_0324.wav,मन्द्रं होतारं शुचिमद्वयाविनं दमूनसमुक्थ्यं विश्वचर्षणिम्,7.242 |
| RigVeda_Part_026_0124.wav,पादाविव प्रहरन्नन्यमन्यं कृणोति पूर्वमपरं शचीभिः,8.179 |
| Rigvedha_014_0281.wav,जुषन्तां यज्ञमद्रुहोऽनमीवा इषो महीः,5.233 |
| RigVeda_52_0216.wav,इषं दुहन्सुदुघां विश्वधायसं यज्ञप्रिये यजमानाय सुक्रतो,7.894 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0032.wav,ऋषीन् तपस्वतो यम तपोजामपि गच्छतात्,4.963 |
| RigVeda_Part_018_0312.wav,युजो वाजाय घृष्वये,3.34 |
| Rigvedha_012_0094.wav,यस्मिन्निन्द्रः प्रदिवि वावृधान ओको दधे ब्रह्मण्यन्तश्च नरः अस्य मन्दानो मध्वो वज्रहस्तोऽहिमिन्द्रो अर्णोवृतं वि वृश्चत्,13.671 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0557.wav,त्रिषन्धिं देवा अभजन्तौजसे च बलाय च,5.02 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0266.wav,प्रजायै पत्ये त्वा पिङ्गः परि पातु किमीदिनः,4.961 |
| Rigvedha_005_0094.wav,पितुः प्रत्नस्य जन्मना वदामसि सोमस्य जिह्वा प्र जिगाति चक्षसा,7.31 |
| RigVeda_53_0154.wav,बृहद्भानो शवसा वाजमुक्थ्यं दधासि दाशुषे कवे,8.599 |
| RigVeda_Part_020_0108.wav,वधेन दस्युं प्र हि चातयस्व वयः कृण्वानस्तन्वे स्वायै,9.629 |
| RigVeda_Part_024_0037.wav,घृणा न यो ध्रजसा पत्मना यन्ना रोदसी वसुना दं सुपत्नी,7.318 |
| Rig_veda_54_0015.wav,यया गा आकरामहे सेनयाग्ने तवोत्या,6.222 |
| Rigveda_32_0124.wav,यदीमेनाँ उशतो अभ्यवर्षीत्तृष्यावतः प्रावृष्यागतायाम्,8.431 |
| Rigveda_31_0174.wav,अश्वावतीर्गोमतीर्न उषासो वीरवतीः सदमुच्छन्तु भद्राः घृतं दुहाना विश्वतः प्रपीता यूयं पात स्वस्तिभिः सदा,17.321 |
| Rigveda_29_0401.wav,उदु तिष्ठ सवितः श्रुध्यस्य हिरण्यपाणे प्रभृतावृतस्य,6.197 |
| Rigvedha_007_0317.wav,शतं राज्ञो नाधमानस्य निष्काञ्छतमश्वान्प्रयतान्सद्य आदम्,8.171 |
| Rigvedha_004_0106.wav,अर्वद्भिर्वाजं भरते धना नृभिरापृच्छ्यं क्रतुमा क्षेति पुष्यति,7.553 |
| RigVeda_Part_026_0143.wav,महि राधो विश्वजन्यं दधानान्भरद्वाजान्सार्ञ्जयो अभ्ययष्ट,9.639 |
| RigVeda_43_0168.wav,देवेषु यशो मर्ताय भूषन्दक्षाय रायः पुरुभूषु नव्यः,6.932 |
| Rigveda_34_0029.wav,येन ज्योतींष्यायवे मनवे च विवेदिथ,5.081 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0450.wav,अवास्तुमेनमस्वगमप्रजसं करोत्यपरापरणो भवति क्षीयते,7.266 |
| Rigveda_35_0279.wav,य उग्रः सन्ननिष्टृत स्थिरो रणाय संस्कृतः,5.57 |
| Atharvaveda_Part_020_10148.wav,अस्मै भीमाय नमसा समध्वर उषो न शुभ्र आ भरा पनीयसे,6.437 |
| RigVeda_53_0090.wav,यं कुमार नवं रथमचक्रं मनसाकृणोः,5.332 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0351.wav,चरेदस्य तावद्गोषु नास्य श्रुत्वा गृहे वसेत्,5.453 |
| Rigvedha_005_0189.wav,त्वमिमा ओषधीः सोम विश्वास्त्वमपो अजनयस्त्वं गाः,6.709 |
| RigVeda_Part_025_0298.wav,तया पाहि प्र ते अध्वर्युरस्थात्सं ते वज्रो वर्ततामिन्द्र गव्युः,7.561 |
| Rigvedha_012_0191.wav,यो नन्त्वान्यनमन्न्योजसोतादर्दर्मन्युना शम्बराणि वि,6.3320625 |
| Rigveda_40_0310.wav,मदेषु सर्वधा असि,2.919 |
| Rigvedha_011_0214.wav,इमं विधन्तो अपां सधस्थे द्वितादधुर्भृगवो विक्ष्वायोः,9.9750625 |
| RigVeda_48_0067.wav,एवा दाधार ते मनो जीवातवे न मृत्यवेऽथो अरिष्टतातये,8.308 |
| Rigvedha_008_0041.wav,पुत्रासो न पितरं वाजसातये मंहिष्ठं वाजसातये,5.873 |
| Atharvaveda_Part_020_10282.wav,इमा ब्रह्म ब्रह्मवाहः क्रियन्त आ बर्हिः सीद,5.195 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0200.wav,समिद्धो अद्य मनुषो दुरोणे देवो देवान् यजसि जातवेदः,5.887 |
| Rigvedha_014_0151.wav,त्वे देवास एरिरे,2.4080625 |
| RigVeda_Part_024_0024.wav,अग्ने स क्षेषदृतपा ऋतेजा उरु ज्योतिर्नशते देवयुष्टे,7.231 |
| RigVeda_Part_019_0151.wav,उरुष्यतं जरितारं युवं ह श्रितः कामो नासत्या युवद्रिक्,7.051 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0348.wav,अहिंसन्तीरनामया निर्द्रवन्तु बहिर्बिलम्,5.041 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0348.wav,अग्नीषोमाभ्यां कामाय मित्राय वरुणाय च,5.487 |
| RigVeda_Part_017_0135.wav,अध द्युतानः पित्रोः सचासामनुत गुह्यं चारु पृश्नेः,6.665 |
| RigVeda_Part_017_0320.wav,ऊतिभिस्तमिषणो द्युम्नहूतौ नि मायावानब्रह्मा दस्युरर्त,7.612 |
| RigVeda_51_0305.wav,कविरसि प्रचेताः,2.752 |
| RigVeda_Part_024_0345.wav,आ क्षोदो महि वृतं नदीनां परिष्ठितमसृज ऊर्मिमपाम्,6.432 |
| RigVeda_50_0310.wav,तदिद्वदन्त्यद्रयो विमोचने यामन्नञ्जस्पा इव घेदुपब्दिभिः,7.185 |
| Rigvedha_005_0030.wav,तद्विदच्छर्यणावति,2.913 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0465.wav,तां बृहस्पतिराङ्गिरसोऽधोक्तां ब्रह्म च तपश्चाधोक्,6.558 |
| Rigvedha_014_0131.wav,भवा स्तोतृभ्यो अन्तमः स्वस्तये,4.4620625 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0017.wav,अर्वाङेहि मा वि दीध्यो मात्र तिष्ठः पराङ्मनाः मैतं पन्थामनु गा भीम एष येन पूर्वं नेयथ तं ब्रवीमि,12.834 |
| Rigveda_29_0286.wav,ता नो रासन्रातिषाचो वसून्या रोदसी वरुणानी शृणोतु,6.883 |
| Rigveda_29_0205.wav,त्वाय रासीय,1.706 |
| Rigveda_35_0032.wav,मित्रस्य व्रता वरुणस्य दीर्घश्रुत्,3.553 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0165.wav,अपां नपातमश्विना हुवे धिय इन्द्रियेण त इन्द्रियं दत्तमोजः,6.842 |
| Rigveda_30_0081.wav,ऋभुरृभुभिरभि वः स्याम विभ्वो विभुभिः शवसा शवांसि,5.919 |
| RigVeda_Part_015_0238.wav,अभि तष्टेव दीधया मनीषामत्यो न वाजी सुधुरो जिहानः,6.596 |
| Rigveda_29_0280.wav,उत न एषु नृषु श्रवो धुः प्र राये यन्तु शर्धन्तो अर्यः,6.351 |
| RigVeda_44_0272.wav,पर्यू षु प्र धन्व वाजसातये परि वृत्राणि सक्षणिः,5.957 |
| Rigvedha_014_0136.wav,स हव्यवाळमर्त्य उशिग्दूतश्चनोहितः,4.233 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0048.wav,सपत्नहा शतकाण्डः सहस्वान् ओषधीनां प्रथमः सं बभूव,6.624 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0297.wav,सिंहप्रतीको विशो अद्धि सर्वा व्याघ्रप्रतीकोऽव बाधस्व शत्रून्,7.111 |
| RigVeda_Part_025_0058.wav,भुवो जनस्य दिव्यस्य राजा पार्थिवस्य जगतस्त्वेषसंदृक्,6.196 |
| Rigvedha_009_0034.wav,महः स राय एषते पतिर्दन्निन इनस्य वसुनः पद आ,6.229 |
| RigVeda_46_0136.wav,वने न वा यो न्यधायि चाकञ्छुचिर्वां स्तोमो भुरणावजीगः,7.413 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0764.wav,कुरीरमस्य शीर्षणि कुम्बं चाधिनिदध्मसि,4.08 |
| Rigveda_30_0194.wav,प्र णोऽवत सुमतिभिर्यजत्राः प्र वाजेभिस्तिरत पुष्यसे नः,7.035 |
| RigVeda_Part_020_0340.wav,समिद्धः शुक्र दीदिह्यृतस्य योनिमासदः ससस्य योनिमासदः,6.676 |
| RigVeda_51_0170.wav,प्रेता जयता नर इन्द्रो वः शर्म यच्छतु,5.125 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0202.wav,तनूनपात्पथ ऋतस्य यानान् मध्वा समञ्जन्त्स्वदया सुजिह्व,6.684 |
| RigVeda_Part_015_0025.wav,सं यदानळध्वन आदिदश्वैर्विमोचनं कृणुते तत्त्वस्य,6.279 |
| Rigveda_41_0013.wav,देवान्सखिभ्य आ वरम्,3.216 |
| Rigveda_40_0183.wav,मनश्चिन्मनसस्पतिः,2.614 |
| Rigvedha_003_0216.wav,सुपेशसं सुखं रथं यमध्यस्था उषस्त्वम्,4.713 |
| RigVeda_49_0163.wav,सुभागान्नो देवाः कृणुता सुरत्नानस्मान्स्तोतॄन्मरुतो वावृधानाः,8.806 |
| RigVeda_Part_027_0010.wav,परि तृन्धि पणीनामारया हृदया कवे,4.904 |
| RigVeda_Part_023_0129.wav,तदू षु वामेना कृतं विश्वा यद्वामनु ष्टवे,5.612 |
| RigVeda_Part_019_0014.wav,प्रातः सुतमपिबो हर्यश्व माध्यंदिनं सवनं केवलं ते,7.405 |
| Rigvedha_004_0232.wav,शकेम रायः सुधुरो यमं तेऽधि श्रवो देवभक्तं दधानाः,7.252 |
| Rigvedha_006_0101.wav,ते सेधन्ति पथो वृकं तरन्तं यह्वतीरपो वित्तं मे अस्य रोदसी *,8.086 |
| RigVeda_Part_015_0285.wav,तिर स्तवान विश्पते,2.728 |
| Rigvedha_002_0270.wav,दासपत्नीरहिगोपा अतिष्ठन्निरुद्धा आपः पणिनेव गावः,6.787 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0451.wav,दृष्टांश्च घ्नन्न् अदृष्टांश्च सर्वांश्च प्रमृणन् क्रिमीन्,5.521 |
| Atharvaveda_Part_020_30122.wav,यद्योधया महतो मन्यमानान् साक्षाम तान् बाहुभिः शाशदानान्,8.315 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0163.wav,कामान् अस्माकं पूरय प्रति गृह्णाहि नो हविः,6.305 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0086.wav,तत्रैतावग्नी आधत्त हिमं घ्रंसं च रोहितः हिमं घ्रंसं चाधाय यूपान् कृत्वा पर्वतान्,10.154 |
| Rigvedha_001_0389.wav,मरुद्भिरग्न आ गहि,3.122 |
| Atharvaveda_Part_020_20030.wav,यः पत्यते वृषभो वृष्ण्यावान्त्सत्यः सत्वा पुरुमायः सहस्वान्,7.466 |
| Rigvedha_001_0195.wav,गवामप व्रजं वृधि कृणुष्व राधो अद्रिवः,5.488 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0646.wav,अयं तस्माद्गार्हपत्यो नो अग्निरुदिन् नयाति सुकृतस्य लोकम्,6.066 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0307.wav,यत्सभागयति दक्षिणाः सभागयति यदनुतिष्ठत उदवस्यत्येव तत्स उपहूतः पृथिव्यां भक्षयत्युपहूतस्तस्मिन् यत्पृथिव्यां विश्वरूपम् स उपहूतोऽन्तरिक्षे भक्षयत्युपहूतस्तस्मिन् यद्दिवि विश्वरूपम् स उपहूतो दिवि भक्षयत्युपहूतस्तस्मिन् यद्दिवि विश्वरूपम्,29.521 |
| RigVeda_Part_025_0292.wav,उप ब्रह्माणि शृणव इमा नोऽथा ते यज्ञस्तन्वे वयो धात्,9.473 |
| RigVeda_50_0207.wav,आ ते यतन्ते रथ्यो यथा पृथक्छर्धांस्यग्ने अजराणि धक्षतः,10.243 |
| Atharvaveda_Part_020_20122.wav,समन्येषु ब्रवावहै,2.521 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0662.wav,अन्वारभेथामनुसंरभेथामेतं लोकं श्रद्दधानाः सचन्ते यद्वां पक्वं परिविष्टमग्नौ तस्य गुप्तये दम्पती सं श्रयेथाम्,13.449 |
| RigVeda_49_0134.wav,श्रिये मर्यासो अञ्जीँरकृण्वत सुमारुतं न पूर्वीरति क्षपः,7.144 |
| Atharvaveda_Part_014_0303.wav,ब्रह्मापरं युज्यतां ब्रह्म पूर्वं ब्रह्मान्ततो मध्यतो ब्रह्म सर्वतः,7.526 |
| Atharvaveda_Part_020_30146.wav,अप्नस्वती मम धीरस्तु शक्र वसुविदं भगमिन्द्रा भरा नः,5.603 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0409.wav,तान्त्सर्वान् अह्व ऊतयेऽस्मा अरिष्टतातये अप्सु ते जन्म दिवि ते सधस्थं समुद्रे अन्तर्महिमा ते पृथिव्याम्,11.732 |
| Rigvedha_012_0020.wav,पार्थिवस्य क्षम्यस्य राजा,3.6280625 |
| Rigveda_38_0467.wav,बृहदिन्द्राय गायत मरुतो वृत्रहन्तमम्,5.477 |
| RigVeda_44_0231.wav,आ वच्यस्व सुदक्ष चम्वोः सुतो विशां वह्निर्न विश्पतिः,6.047 |
| Rigveda_35_0013.wav,धृतव्रता क्षत्रिया क्षत्रमाशतुः,4.717 |
| Rigveda_33_0458.wav,अस्माकमित्सुते रणा समिन्दुभिः,4.267 |
| RigVeda_49_0290.wav,उदीर्ष्वातो विश्वावसो नमसेळा महे त्वा,5.412 |
| RigVeda_52_0373.wav,धाता धातॄणां भुवनस्य यस्पतिर्देवं त्रातारमभिमातिषाहम्,8.034 |
| RigVeda_53_0043.wav,स सुत्रामा स्ववाँ इन्द्रो अस्मे आराच्चिद्द्वेषः सनुतर्युयोतु,9.018 |
| Rigveda_39_0245.wav,हुवे वातस्वनं कविं पर्जन्यक्रन्द्यं सहः,4.915 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0182.wav,सत्यमहं गभीरः काव्येन सत्यं जातेनास्मि जातवेदाः,6.995 |
| Rigveda_39_0057.wav,प्रतिष्कुतं देवी शुष्मं सपर्यतः,4.431 |
| Rigveda_35_0179.wav,उभा हिरण्यपेशसा,2.839 |
| Rigvedha_003_0073.wav,यथा नो अदितिः करत्पश्वे नृभ्यो यथा गवे,5.606 |
| Rigveda_40_0200.wav,नित्यस्तोत्रो वनस्पतिर्धीनामन्तः सबर्दुघः,5.968 |
| RigVeda_47_0186.wav,चित्रं वृषणं रयिं दाः,2.465 |
| Rigvedha_014_0116.wav,त्वामग्ने मनीषिणः सम्राजं चर्षणीनाम्,4.79 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0770.wav,तया सहस्रपर्ण्या हृदयं शोषयामि ते,4.19 |
| Rigveda_39_0037.wav,अधा चिदिन्द्र मे सचा,3.445 |
| Rigvedha_001_0374.wav,नहि देवो न मर्त्यो महस्तव क्रतुं परः,5.766 |
| RigVeda_50_0060.wav,प्रत्यगेनं शपथा यन्तु तृष्टाः,4.098 |
| Rigvedha_008_0121.wav,वनोति हि सुन्वन्क्षयं परीणसः सुन्वानो हि ष्मा यजत्यव द्विषो देवानामव द्विषः,9.797 |
| Rigveda_35_0427.wav,तनिं जुषेथां सुष्टुतिं मम,3.219 |
| RigVeda_48_0349.wav,अभि श्यावं न कृशनेभिरश्वं नक्षत्रेभिः पितरो द्यामपिंशन्,6.905 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0578.wav,मेधां सूर्यस्य रश्मिभिर्वचसा वेशयामहे,5.583 |
| RigVeda_Part_015_0360.wav,आ मन्द्रैरिन्द्र हरिभिर्याहि मयूररोमभिः,5.391 |
| Rigvedha_001_0246.wav,सुसमिद्धो न आ वह देवाँ अग्ने हविष्मते,6.35 |
| Atharvaveda_Part_015_0157.wav,कर्षेदेनं न चैनं कर्षेत्,3.898 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0024.wav,नीचैः खनन्त्यसुरा अरुस्राणमिदं महत्,4.646 |
| RigVeda_Part_017_0142.wav,कदा नो देवीरमृतस्य पत्नीः सूरो वर्णेन ततनन्नुषासः,7.678 |
| Rigveda_38_0389.wav,मातुर्गर्भे भरामहे,3.38 |
| RigVeda_44_0312.wav,अश्वो वोळ्हा सुखं रथं हसनामुपमन्त्रिणः,5.686 |
| RigVeda_Part_020_0142.wav,अग्निं तं मन्ये यो वसुरस्तं यं यन्ति धेनवः,5.888 |
| Rigvedha_005_0315.wav,तमीळत प्रथमं यज्ञसाधं विश आरीराहुतमृञ्जसानम्,6.514 |
| RigVeda_Part_024_0331.wav,येभिः सूर्यमुषसं मन्दसानोऽवासयोऽप दृळ्हानि दर्द्रत्,6.854 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0106.wav,यो अद्य देव सूर्य त्वां च मां चान्तरायति,5.319 |
| RigVeda_Part_025_0333.wav,अविदद्दक्षं मित्रो नवीयान्पपानो देवेभ्यो वस्यो अचैत्,7.795 |
| RigVeda_Part_027_0355.wav,अपः सिषासन्स्वरप्रतीतो बृहस्पतिर्हन्त्यमित्रमर्कैः,8.585 |
| Rigveda_37_0218.wav,यदिन्न्विन्द्रं वृषणं सचा सुते सखायं कृणवामहै,6.796 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0271.wav,एकपाद्द्विपदो भूयो वि चक्रमे द्विपात्त्रिपादमभ्येति पश्चात्,7.032 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0095.wav,शान्तानि पूर्वरूपाणि शान्तं नो अस्तु कृताकृतम्,5.828 |
| RigVeda_48_0316.wav,स ईं सत्येभिः सखिभिः शुचद्भिर्गोधायसं वि धनसैरदर्दः,6.775 |
| Atharvaveda_Part_020_30418.wav,आ दर्शति शवसा भूर्योजाः प्र सक्षति प्रतिमानं पृथिव्याः,6.415 |
| RigVeda_Part_020_0009.wav,इन्द्र एकं सूर्य एकं जजान वेनादेकं स्वधया निष्टतक्षुः,7.839 |
| Rigveda_36_0193.wav,दभ्रं चिद्धि त्वावतः कृतं शृण्वे अधि क्षमि,5.198 |
| Rigveda_35_0031.wav,अनु पूर्वाण्योक्या साम्राज्यस्य सश्चिम,6.368 |
| Atharvaveda_Part_020_40057.wav,इन्द्रं समीके वनिनो हवामह इन्द्रं धनस्य सातये,5.982 |
| RigVeda_42_0285.wav,परि तान्यर्षति,2.081 |
| Rigvedha_006_0265.wav,यथा प्रसूता सवितुः सवायँ एवा रात्र्युषसे योनिमारैक्,8.069 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0388.wav,यत्र लोकाम्श्च कोशांश्चापो ब्रह्म जना विदुः,5.419 |
| RigVeda_52_0026.wav,वृत्रं यदुग्रो व्यवृश्चदोजसापो बिभ्रतं तमसा परीवृतम्,7.404 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0186.wav,अग्ने यत्ते शोचिस्तेन तं प्रति शोच योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः अग्ने यत्ते तेजस्तेन तमतेजसं कृणु योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः,18.9 |
| RigVeda_Part_019_0286.wav,छर्दिर्येन दाशुषे यच्छति त्मना तन्नो महाँ उदयान्देवो अक्तुभिः,9.137 |
| Rigveda_37_0304.wav,आर्जीकीये मदिन्तमः,3.571 |
| RigVeda_Part_028_0105.wav,आ यो योनिं देवकृतं ससाद क्रत्वा ह्यग्निरमृताँ अतारीत्,9.375 |
| Rigvedha_006_0128.wav,रथं न दुर्गाद्वसवः सुदानवो विश्वस्मान्नो अंहसो नि,5.916 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0221.wav,पितेव पुत्रान् अभि सं स्वजस्व नः शिवा नो वाता इह वान्तु भूमौ यमोदनं पचतो देवते इह तं नस्तप उत सत्यं च वेत्तु,13.216 |
| Rigvedha_014_0058.wav,महि त्वाष्ट्रमूर्जयन्तीरजुर्यं स्तभूयमानं वहतो वहन्ति,7.5 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0134.wav,तेषां त्वामग्रे उज्जहरुर्मणिं वि,3.214 |
| RigVeda_Part_021_0131.wav,एकं नु त्वा सत्पतिं पाञ्चजन्यं जातं शृणोमि यशसं जनेषु,7.694 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0093.wav,वीरान् नो अत्र मा दभन् तद्व एतत्पुरो दधे,5.392 |
| RigVeda_Part_017_0250.wav,दोषा शिवः सहसः सूनो अग्ने यं देव आ चित्सचसे स्वस्ति,6.982 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0062.wav,तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे,5.705 |
| Atharvaveda_Part_020_20067.wav,तेषामिन्द्र वृत्रहत्ये शिवो भूः सखा च शूरोऽविता च नृणाम्,7.763 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0305.wav,उप मा देवीर्देवेभिरेत,3.316 |
| RigVeda_44_0199.wav,मृज्यमानः सुहस्त्य समुद्रे वाचमिन्वसि,4.725 |
| Rigveda_29_0324.wav,शं नो विष्णुः शमु पूषा नो अस्तु शं नो भवित्रं शम्वस्तु वायुः,6.884 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0482.wav,इमे ते स्तोका बहुला एह्यर्वाङियं ते कर्कीह ते मनोऽस्तु,7.214 |
| Rigvedha_012_0296.wav,किमू नु वः कृणवामापरेण किं सनेन वसव आप्येन,5.731 |
| RigVeda_Part_024_0081.wav,स बाधस्वाप भया सहोभि स्पृधो वनुष्यन्वनुषो नि जूर्व,6.896 |
| RigVeda_Part_017_0218.wav,हव्यं मर्तस्य वोळ्हवे,3.185 |
| Rigveda_29_0093.wav,इन्द्रं नरो नेमधिता हवन्ते यत्पार्या युनजते धियस्ताः,6.378 |
| Rigvedha_009_0297.wav,सूर्यस्य चक्षू रजसैत्यावृतं तस्मिन्नार्पिता भुवनानि विश्वा,7.995 |
| Rigvedha_014_0083.wav,जातो जायते सुदिनत्वे अह्नां समर्य आ विदथे वर्धमानः,6.6380625 |
| RigVeda_Part_024_0102.wav,व्यस्तभ्नाद्रोदसी मित्रो अद्भुतोऽन्तर्वावदकृणोज्ज्योतिषा तमः,8.244 |
| Atharvaveda_Part_020_40331.wav,महानग्न्युलूखलमतिक्रामन्त्यब्रवीत्,4.399 |
| Atharvaveda_Part_020_40293.wav,इहेत्थ प्रागपागुदगधराक्स वै पृथु लीयते,5.285 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0043.wav,पिबा सुतस्य मतेरिह मधोश्चकानश्चारुर्मदाय,5.747 |
| RigVeda_48_0053.wav,यो जनान्महिषाँ इवातितस्थौ पवीरवान्,5.905 |
| RigVeda_Part_027_0343.wav,उप द्यां स्कम्भथु स्कम्भनेनाप्रथतं पृथिवीं मातरं वि,7.263 |
| RigVeda_Part_019_0305.wav,न प्रमिये सवितुर्दैव्यस्य तद्यथा विश्वं भुवनं धारयिष्यति,7.398 |
| Rigvedha_001_0280.wav,घृतपृष्ठा मनोयुजो ये त्वा वहन्ति वह्नयः,5.907 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0093.wav,यदुवक्थानृतं जिह्वया वृजिनं बहु,4.21 |
| RigVeda_Part_028_0185.wav,अग्ने याहि दूत्यं मा रिषण्यो देवाँ अच्छा ब्रह्मकृता गणेन,9.145 |
| Rigveda_34_0048.wav,तं सुष्टुत्या विवासे ज्येष्ठराजं भरे कृत्नुम्,6.006 |
| RigVeda_47_0200.wav,अभि तद्द्यावापृथिवी गृणीतामस्मभ्यं चि,4.967 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0256.wav,तं त्वा दंपती जीवन्तौ जीवपुत्रावुद्वासयातः पर्यग्निधानात्,7.161 |
| Rigveda_39_0159.wav,समीं रेभासो अस्वरन्निन्द्रं सोमस्य पीतये,6.385 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0006.wav,यस्यामिदं जिन्वति प्राणदेजत्सा नो भूमिः पूर्वपेये दधातु,6.996 |
| Rigveda_36_0297.wav,तस्मै त इन्दो हविषा विधेम वयं स्याम पतयो रयीणाम्,7.801 |
| Rigveda_40_0259.wav,एष वसूनि पिब्दना परुषा ययिवाँ अति,5.497 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0170.wav,यथा यशः प्रजापतौ यथास्मिन् परमेष्ठिनि,4.335 |
| Rigveda_39_0116.wav,र्नृभ्यस्तराय सिन्धवः सुपाराः अतिविद्धा विथुरेणा चिदस्त्रा त्रिः सप्त सानु संहिता गिरीणाम्,13.033 |
| Atharvaveda_Part_020_40018.wav,तमिद्वर्धन्तु नो गिरः,2.749 |
| RigVeda_Part_028_0206.wav,क्रतुं ह्यस्य वसवो जुषन्ताथा देवा दधिरे हव्यवाहम्,6.934 |
| Rigvedha_013_0010.wav,उन्नो वीराँ अर्पय भेषजेभिर्भिषक्तमं त्वा भिषजां शृणोमि,7.6580625 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0041.wav,तां त्वा वयं खनामस्योषधिं शेपहर्षणीम्,5.376 |
| Rigveda_32_0267.wav,महाँ इव युवजानिः,3.541 |
| RigVeda_Part_020_0133.wav,इमं नो यज्ञमा गतम्,3.13 |
| RigVeda_Part_024_0184.wav,सहावा यस्यावृतो रयिर्वाजेष्ववृतः,4.603 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0443.wav,आविः सन् निहितं गुहा जरन् नाम महत्पदम्,4.21 |
| RigVeda_Part_021_0058.wav,अपृच्छमन्याँ उत ते म आहुरिन्द्रं नरो बुबुधाना अशेम,7.306 |
| Atharvaveda_Part_020_20211.wav,कण्वेभिर्धृष्णवा धृसद्वाजं दर्षि सहस्रिणम्,5.184 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0509.wav,प्रतिघ्नानाः सं धावन्तूरः पटौरावाघ्नानाः,5.773 |
| Rigveda_32_0294.wav,सत्योऽविता विधन्तम्,3.375 |
| RigVeda_47_0299.wav,अहरहर्जायते मासिमास्यथा देवा दधिरे हव्यवाहम्,7.05 |
| RigVeda_48_0334.wav,आप्रुषायन्मधुन ऋतस्य योनिमवक्षिपन्नर्क,4.981 |
| RigVeda_46_0118.wav,कक्षात्,1.441 |
| RigVeda_52_0016.wav,तमस्य विष्णुर्महिमानमोजसांशुं दधन्वान्मधुनो वि रप्शते,7.338 |
| Atharvaveda_Part_020_40155.wav,नष्टे जिह्वा चर्चरीति क्षुरो न भुरिजोरिव,4.842 |
| Rigvedha_005_0258.wav,शकेम त्वा समिधं साधया धियस्त्वे देवा हविरदन्त्याहुतम्,6.811 |
| RigVeda_Part_020_0324.wav,ता अस्य सन्धृषजो न तिग्माः सुसंशिता वक्ष्यो वक्षणेस्थाः,7.574 |
| Atharvaveda_Part_020_20452.wav,वि गोभिरिन्द्रमैरयत्,2.484 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0353.wav,गोष्वचीचरत्,2.712 |
| Rigveda_40_0516.wav,उभे सोमावचाकशन्मृगो न तक्,3.835 |
| Rigveda_33_0543.wav,तमीमहे पुरुष्टुतं यह्वं प्रत्नाभिरूतिभिः,5.744 |
| Rigvedha_013_0318.wav,वैश्वानरः प्रत्नथा नाकमारुहद्दिवस्पृष्ठं भन्दमानः सुमन्मभिः,7.0180625 |
| Rigveda_33_0193.wav,सोमपेयाय वक्षतः,2.686 |
| RigVeda_53_0113.wav,रेणापिबत्सह,2.633 |
| RigVeda_53_0202.wav,समस्मे भूषतं नरोत्सं न पिप्युषीरिषः अयं हि ते अमर्त्य इन्दुरत्यो न पत्यते,11.306 |
| Rig_veda_54_0006.wav,अराय्यं ब्रह्मणस्पते तीक्ष्णशृङ्गोदृषन्निहि,5.693 |
| Rigveda_40_0525.wav,अभि द्रोणानि बभ्रवः शुक्रा ऋतस्य धारया,5.502 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0033.wav,आ दर्शति शवसा भूर्योजाः प्र सक्षति प्रतिमानं पृथिव्याः,6.833 |
| RigVeda_Part_020_0289.wav,अस्य स्तोमे मघोनः सख्ये वृद्धशोचिषः,5.381 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0312.wav,प्राणेन विश्वतोमुखं सूर्यं देवा अजनयन्,5.805 |
| RigVeda_46_0036.wav,गोमतः,1.345 |
| Rigveda_35_0014.wav,अक्ष्णश्चिद्गातुवित्,1.893 |
| Rig_veda_54_0219.wav,असपत्नः सपत्नहाभिराष्ट्रो विषासहिः,4.487 |
| RigVeda_52_0365.wav,मयि देवा द्रविणमा यजन्तां मय्याशीरस्तु मयि देवहूतिः,7.492 |
| Rigvedha_011_0248.wav,इमां मे अग्ने समिधमिमामुपसदं वनेः,5.262 |
| Rigvedha_002_0186.wav,अनु प्रत्नस्यौकसो हुवे तुविप्रतिं नरम्,4.755 |
| Rigveda_34_0209.wav,यत्रा नरो देदिशते तनूष्वा त्वक्षांसि बाह्वोजसः,7.502 |
| Rigveda_32_0140.wav,इन्द्रासोमा तपतं रक्ष उब्जतं न्यर्पयतं वृषणा तमोवृधः,7.771 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0058.wav,धाता विश्वा वार्या दधातु प्रजाकामाय दाशुषे दुरोणे,6.303 |
| RigVeda_Part_022_0304.wav,हये नरो मरुतो मृळता नस्तुवीमघासो अमृता ऋतज्ञाः,6.916 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0126.wav,वाताज्जातो अन्तरिक्षाद्विद्युतो ज्योतिषस्परि,5.44 |
| RigVeda_Part_027_0034.wav,माकिर्नेशन्माकीं रिषन्माकीं सं शारि केवटे,6.826 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0201.wav,आ च वह मित्रमहश्चिकित्वान् त्वं दूतः कविरसि प्रचेताः,6.261 |
| RigVeda_Part_017_0169.wav,अयमिह प्रथमो धायि धातृभिर्होता यजिष्ठो अध्वरेष्वीड्यः,7.544 |
| Rigveda_31_0321.wav,ट्टे सुवितं च नव्यम्,2.437 |
| Atharvaveda_Part_020_20271.wav,श्रायन्त इव सूर्यं विश्वेदिन्द्रस्य भक्षत,4.638 |
| Rigveda_37_0004.wav,शतानीका हेतयो अस्य दुष्टरा इन्द्रस्य समिषो महीः,7.174 |
| Rigvedha_007_0091.wav,प्रावतं मे,1.793 |
| RigVeda_51_0195.wav,वीरेण्यः क्रतुरिन्द्रः सुशस्तिरुतापि धेना पुरुहूतमीट्टे,6.852 |
| Rigveda_31_0249.wav,प्र नाकमृष्वं नुनुदे बृहन्तं द्विता नक्षत्रं पप्रथच्च,5.775 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0110.wav,आप्नुहि श्रेयांसमति समं क्राम,4.616 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0339.wav,पिंश मे सर्वान् दुर्हार्दो पिंश मे द्विषतो मणे,5.728 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0127.wav,इतस्ताः सर्वा नश्यन्तु वाका अपचितामिव,5.019 |
| Rigvedha_013_0155.wav,शृङ्गेव नः प्रथमा गन्तमर्वाक्छफाविव जर्भुराणा तरोभिः,7.102 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0346.wav,यावस्येशथे द्विपदो यौ चतुष्पदस्तौ नो मुञ्चतमंहसः अधि नो ब्रूतं पृतनासूग्रौ सं वज्रेण सृजतं यः किमीदी,12.5 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0111.wav,शं रुद्राः शं वसवः शमादित्याः शमग्नयः शं नो महर्षयो देवाः शं देवाः शं बृहस्पतिः,11.164 |
| Atharvaveda_Part_020_30419.wav,इमा ब्रह्म बृहद्दिवः कृणवदिन्द्राय शूषमग्नियः स्वर्षाः,6.143 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0368.wav,उग्रं ते पाजो नन्वा रुरुध्रे वशी वशं नयासा एकज त्वम्,6.21 |
| Rigvedha_006_0143.wav,तावाँ अयं पातवे सोमो अस्त्वरमिन्द्राग्नी मनसे युवभ्याम्,8.263 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0334.wav,नास्मै कामाः समृध्यन्ते यामदत्त्वा चिकीर्षति,5.252 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0088.wav,अपपापं परिक्षवं पुण्यं भक्षीमहि क्षवम्,5.055 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0270.wav,एते वै प्रियाश्चाप्रियाश्च र्त्विजः स्वर्गं लोकं गमयन्ति यदतिथयः,7.925 |
| Rigvedha_006_0333.wav,यदेदयुक्त हरितः सधस्थादाद्रात्री वासस्तनुते सिमस्मै,7.356 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0066.wav,ब्राह्मणो जज्ञे प्रथमो दशशीर्षो दशास्यः,5.024 |
| Rigveda_31_0255.wav,प्र तन्मे वोचो दूळभ स्वधावोऽव त्वानेना नमसा तुर इयाम्,7.34 |
| Rigveda_29_0317.wav,शं नः सोमो भवतु ब्रह्म शं नः शं नो ग्रावाणः शमु सन्तु यज्ञाः,7.729 |
| Rigvedha_007_0219.wav,श्रुतं मे मित्रावरुणा हवेमोत श्रुतं सदने विश्वतः सीम्,7.0 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0165.wav,इन्द्र एषां नेता बृहस्पतिर्दक्षिणा यज्ञः पुर एतु सोमः,6.842 |
| Rigvedha_005_0014.wav,नकिष्ट्वानु मज्मना नकिः स्वश्व आनशे,4.514 |
| Rigveda_40_0318.wav,परि यो रोदसी उभे सद्यो वाजेभिरर्षति,5.416 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0092.wav,बलं को अस्मै प्रायच्छत्को अस्याकल्पयज्जवम्,5.052 |
| RigVeda_Part_020_0105.wav,जुषस्व नः समिधं जातवेद आ च देवान्हविरद्याय वक्षि,7.459 |
| Rigveda_36_0148.wav,अयुद्ध इद्युधा वृतं शूर आजति सत्वभिः,4.778 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0656.wav,प्रेहामृतस्य यच्छतां प्रैतु बद्धकमोचनम्,4.234 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0021.wav,मा त्वा क्रव्यादभि मंस्तारात्संकसुकाच्चर,5.768 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0325.wav,आचार्यो मृत्युर्वरुणः सोम ओषधयः पयः,5.105 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0323.wav,तास्ते सन्तूद्भ्वीः प्रभ्वीस्तास्ते यमो राजानु मन्यताम्,7.077 |
| RigVeda_48_0246.wav,तेषां हि मह्ना महतामनर्वणां स्तोमाँ इयर्म्यृतज्ञा ऋतावृधाम्,8.43 |
| Rigveda_30_0179.wav,अध स्मा नो मरुतो रुद्रियासस्त्रातारो भूत पृतनास्वर्यः,7.345 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0441.wav,इदं सवितर्वि जानीहि षड्यमा एक एकजः,5.263 |
| Rigveda_36_0216.wav,सदा राया पुरुस्पृहा,4.158 |
| RigVeda_Part_016_0113.wav,सरस्वती शृणवन्यज्ञियासो धाता रयिं सहवीरं तुरासः विष्णुं स्तोमासः पुरुदस्ममर्का भगस्येव कारिणो यामनि ग्मन्,14.957 |
| RigVeda_Part_020_0056.wav,क्षेत्रादपश्यं सनुतश्चरन्तं सुमद्यूथं न पुरु शोभमानम्,7.311 |
| Rigvedha_013_0217.wav,प्रेतां यज्ञस्य शम्भुवा युवामिदा वृणीमहे,5.4090625 |
| Rigvedha_010_0309.wav,पर्णा मृगस्य पतरोरिवारभ उदश्विना ऊहथुः श्रोमताय कम्,6.492 |
| Rigveda_32_0248.wav,अभित्सरन्ति धेनुभिः,3.121 |
| RigVeda_47_0244.wav,अहं सूर्यस्य परि याम्याशुभिः प्रैतशेभिर्वहमान ओजसा,7.408 |
| Rigveda_36_0255.wav,अधिरुक्मा वि नीयते महि वो महतामवो वरुण मित्र दाशुषे यमादित्या अभि द्रुहो रक्षथा नेमघं नशदनेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः,19.67 |
| RigVeda_Part_016_0184.wav,सुयुग्भिरश्वैः सुवृता रथेन दस्राविमं शृणुतं श्लोकमद्रेः,8.044 |
| RigVeda_Part_016_0043.wav,प्र बाहू शूर राधसे,3.473 |
| Atharvaveda_Part_020_10051.wav,गिर्वणः पाहि नः सुतं मधोर्धाराभिरज्यसे,5.244 |
| RigVeda_47_0301.wav,अग्निर्विद्वान्यज्ञं नः कल्पयाति पञ्चयामं त्रिवृतं सप्ततन्तुम्,7.715 |
| RigVeda_Part_028_0181.wav,अमूरः कविरदितिर्विवस्वान्सुसंसन्मित्रो अतिथिः शिवो नः,6.907 |
| Rigveda_35_0397.wav,यं ते भागमधारयन्विश्वाः सेहानः पृतना उरु ज्रयः समप्सुजिन्मरुत्वाँ इन्द्र सत्पते,11.361 |
| RigVeda_Part_016_0017.wav,इन्द्रः स्वाहा पिबतु यस्य सोम आगत्या तुम्रो वृषभो मरुत्वान्,7.795 |
| Rigveda_40_0369.wav,सतः प्रासाविषुर्मतिम्,3.158 |
| Rigveda_41_0230.wav,वृषा ह्यसि भानुना द्युमन्तं त्वा हवामहे पवमान स्वाध्यः,2.808 |
| RigVeda_44_0302.wav,त्रिधातुभिररुषीभिर्वयो दधे रोचमानो वयो दधे,6.37 |
| Rigvedha_005_0270.wav,वधैर्दुःशंसाँ अप दूढ्यो जहि दूरे वा ये अन्ति वा के चिदत्रिणः,9.116 |
| RigVeda_46_0159.wav,स वो दददूर्मिमद्या सुपूतं तस्मै सोमं मधुमन्तं सुनोत,7.011 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0137.wav,मृत्योरोजीयसो वधाद्वरणो वारयिष्यते,5.398 |
| RigVeda_Part_015_0231.wav,इन्द्र सोमं शतक्रतो,3.04 |
| Rigveda_35_0042.wav,च्चरा सदा,2.259 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0153.wav,सा नो रयिं विश्ववारं नि यछाद्ददातु वीरं शतदायमुक्थ्यम्,6.496 |
| Atharvaveda_Part_020_10166.wav,यदा वलस्य पीयतो जसुं भेद्बृहस्पतिरग्नितपोभिरर्कैः,6.248 |
| Rigvedha_011_0302.wav,यस्याश्वासः प्रदिशि यस्य गावो यस्य ग्रामा यस्य विश्वे रथासः,6.9850625 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0405.wav,प्रास्मत्पाशान् वरुण मुञ्च सर्वान् यैः समामे बध्यते यैर्व्यामे,6.657 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0217.wav,ऐन्द्राग्नं वर्म बहुलं यदुग्रं विश्वे देवा नातिविध्यन्ति सर्वे तन् मे तन्वं त्रायतां सर्वतो बृहदायुष्मां जरदष्टिर्यथासानि,15.656 |
| RigVeda_46_0282.wav,प्र याः सिस्रते सूर्यस्य रश्मिभिर्ज्योतिर्भरन्तीरुषसो व्युष्टिषु,7.671 |
| Atharvaveda_Part_020_30082.wav,मा नो अज्ञाता वृजना दुराध्यो माशिवासो अव क्रमुः,7.819 |
| Rigveda_38_0350.wav,अस्माभिः सु तं सनुहि,2.545 |
| Rigveda_40_0224.wav,योनावृतस्य सीदत,3.075 |
| Rigvedha_010_0032.wav,संचक्ष्या मरुतश्चन्द्रवर्णा अच्छान्त मे छदयाथा च नूनम्,7.161 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0145.wav,इदं विष्कन्धं सहत इदं बाधते अत्त्रिणः,4.992 |
| Rigvedha_008_0297.wav,समिद्धो अग्न आ वह देवाँ अद्य यतस्रुचे,5.568 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0266.wav,अस्रामस्त्वा हविषा यजाम्यश्लोणस्त्वा घृतेन जुहोमि,6.038 |
| Rigveda_32_0207.wav,यदि स्तोमं मम श्रवदस्माकमिन्द्रमिन्दवः,4.975 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0392.wav,को विराजो मिथुनत्वं प्र वेद क ऋतून् क उ कल्पमस्याः,6.112 |
| RigVeda_Part_025_0015.wav,प्र यत्समुद्रमति शूर पर्षि पारया तुर्वशं यदुं स्वस्ति,6.407 |
| Rigvedha_013_0126.wav,जोष्यग्ने समिधं जोष्याहुतिं जोषि ब्रह्म जन्यं जोषि सुष्टुतिम्,6.9160625 |
| Rigveda_40_0061.wav,भारती पवमानस्य सरस्वतीळा मही,5.194 |
| RigVeda_Part_023_0063.wav,आ चिकितान सुक्रतू देवौ मर्त रिशादसा,5.404 |
| Rigveda_30_0275.wav,नू मित्रो वरुणो अर्यमा नस्त्मने तोकाय वरिवो दधन्तु,6.763 |
| RigVeda_Part_025_0157.wav,भूयोभूयो रयिमिदस्य वर्धयन्नभिन्ने खिल्ये नि दधाति देवयुम्,6.968 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0192.wav,सूर्य यत्तेऽर्चिस्तेन तं प्रत्यर्च योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः सूर्य यत्ते शोचिस्तेन तं प्रति शोच योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः सूर्य यत्ते तेजस्तेन तमतेजसं कृणु योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः,27.518 |
| RigVeda_44_0251.wav,शुक्रः पवस्व देवेभ्यः सोम दिवे पृथिव्यै शं च प्रजायै,6.701 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0317.wav,स्तौमीन्द्रं नाथितो जोहवीमि स नो मुञ्चत्वंहसः,5.676 |
| Rigveda_39_0173.wav,त्वं हि शश्वतीनामिन्द्र दर्ता पुरामसि,4.913 |
| Rigveda_37_0058.wav,तुरीयादित्य हवनं त इन्द्रियमा तस्थावमृतं दिवि,6.657 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0248.wav,नि यन् नियन्ति उपरस्य निष्कृतिं पुरू रेतो दधिरे सूर्यश्रितः,5.946 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0104.wav,यो माभिछायमत्येषि मां चाग्निं चान्तरा,5.538 |
| RigVeda_47_0193.wav,प्र सप्तगुमृतधीतिं सुमेधां बृहस्पतिं मतिरच्छा जिगाति,6.629 |
| Rigveda_35_0404.wav,माध्यंदिनस्य सवनस्य वृत्रहन्ननेद्य पिबा सोमस्य वज्रिवः,7.789 |
| Atharvaveda_Part_020_40379.wav,द्युम्नी श्लोकी स सोम्यः,3.013 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0292.wav,विश्वा अग्ने अभियुजो विहत्य शत्रूयतामा भरा भोजनानि अग्ने शर्ध महते सौभगाय तव द्युम्नान्युत्तमानि सन्तु सं जास्पत्यं सुयममा कृणुष्व शत्रूयतामभि तिष्ठा महांसि सूयवसाद्भगवती हि भूया अधा वयं भगवन्तः स्याम,24.171 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0232.wav,ताभ्यामेनं प्राशिषं ताभ्यामेनमजीगमम्,5.275 |
| Rigvedha_013_0162.wav,ओष्ठाविव मध्वास्ने वदन्ता स्तनाविव पिप्यतं जीवसे नः,7.9770625 |
| RigVeda_Part_023_0252.wav,वि होत्रा दधे वयुनाविदेक इन्मही देवस्य सवितुः परिष्टुतिः,6.991 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0365.wav,सप्त युञ्जन्ति रथमेकचक्रमेको अश्वो वहति सप्तनामा,7.14 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0423.wav,तांस्ते रन्धयामि हरसा जातवेदः सहस्रऋष्टिः सपत्नान् प्रमृणन् पाहि वज्रः,8.23 |
| RigVeda_50_0187.wav,मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च प्राणाद्वायुरजायत,5.34 |
| Atharvaveda_Part_015_0010.wav,नीलेनैवाप्रियं भ्रातृव्यं प्रोर्णोति लोहितेन द्विषन्तं विध्यतीति ब्रह्मवादिनो वदन्ति,10.122 |
| RigVeda_Part_017_0094.wav,स ते जानाति सुमतिं यविष्ठ य ईवते ब्रह्मणे गातुमैरत्,7.305 |
| Rigveda_39_0017.wav,विश्वा हि मर्त्यत्वनानु,2.544 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0141.wav,स कुष्ठो विश्वभेषजः साकं सोमेन तिष्ठति,4.9 |
| Rigveda_33_0298.wav,विश्वान्यश्विना युवं प्र धीतान्यगच्छतम्,5.127 |
| RigVeda_Part_018_0059.wav,उशन्नु षु णः सुमना उपाके सोमस्य नु सुषुतस्य स्वधावः,6.267 |
| Rigvedha_002_0351.wav,हिरण्याक्षः सविता देव आगाद्दधद्रत्ना दाशुषे वार्याणि,7.162 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0094.wav,वातस्य प्रवामुपवामनु वात्यर्चिः,3.844 |
| Rigveda_40_0636.wav,एष प्रत्नेन मन्मना देवो देवेभ्यस्परि,5.312 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0204.wav,जूर्णि पुनर्वो यन्तु यातवः पुनर्हेतिः किमीदिनः,5.882 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0005.wav,शूद्रकृता राजकृता स्त्रीकृता ब्रह्मभिः कृता,5.871 |
| Rigvedha_007_0168.wav,सोमपेयं सुखो रथः,3.009 |
| Rigveda_34_0343.wav,उशना काव्यस्त्वा नि होतारमसादयत् आयजिं त्वा मनवे जातवेदसम्,9.78 |
| Rigveda_35_0037.wav,अग्निर्न शुक्रः समिधान आहुतः,4.232 |
| RigVeda_53_0160.wav,स दर्शतस्य वपुषो वि राजसि पृणक्षि सानसिं क्रतुम्,6.483 |
| Rigvedha_011_0124.wav,कुषुम्भकस्तदब्रवीद्गिरेः प्रवर्तमानकः,4.5740625 |
| Rig_veda_45_0119.wav,तस्य वा त्,1.445 |
| Rigvedha_003_0198.wav,उष आ भाहि भानुना चन्द्रेण दुहितर्दिवः,5.184 |
| Rigveda_37_0273.wav,अस्य वृष्णो व्योदन उरु क्रमिष्ट जीवसे,5.486 |
| Rigvedha_002_0329.wav,कदा योगो वाजिनो रासभस्य येन यज्ञं नासत्योपयाथः,6.974 |
| Atharvaveda_Part_020_30164.wav,जनाय चिद्य ईवते उ लोकं बृहस्पतिर्देवहूतौ चकार,6.0 |
| RigVeda_Part_021_0283.wav,मा नोऽहिर्बुध्न्यो रिषे धादस्माकं भूदुपमातिवनिः,6.55 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0039.wav,उभौ सहस्वन्तौ भूत्वा सपत्नान् सहिषीवहि,4.784 |
| Rigveda_36_0030.wav,अस्मा ऊ षु प्रभूतये वरुणाय मरुद्भ्योऽर्चा विदु,6.131 |
| Rigveda_41_0122.wav,गच्छन्निन्द्रस्य निष्कृतम्,2.964 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0334.wav,यत्कामास्ते जुहुमस्तन् नो अस्तु वयं स्याम पतयो रयीणाम्,7.136 |
| Rigvedha_007_0148.wav,विद्वांसाविद्दुरः पृच्छेदविद्वानित्थापरो अचेताः,6.233 |
| Rigvedha_003_0209.wav,सा न स्तोमाँ अभि गृणीहि राधसोषः शुक्रेण शोचिषा,6.517 |
| Rigveda_40_0052.wav,बर्हिः प्राचीनमोजसा पवमान स्तृणन्हरिः,5.27 |
| RigVeda_52_0163.wav,गृहो याम्यरंकृतो देवेभ्यो हव्यवाहनः,5.776 |
| Rigvedha_001_0380.wav,ये शुभ्रा घोरवर्पसः सुक्षत्रासो रिशादसः,6.2 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0262.wav,यदशनकृतं ह्वयन्ति हविष्कृतमेव तद्ध्वयन्ति,5.116 |
| Rigveda_33_0294.wav,आ वां विप्र इहावसेऽह्वत्स्तोमेभिरश्विना,5.859 |
| RigVeda_Part_018_0121.wav,को अस्य वीरः सधमादमाप समानंश सुमतिभिः को अस्य,6.699 |
| RigVeda_Part_026_0023.wav,हव्यः स श्रुधी हवम्,3.494 |
| Atharvaveda_Part_020_40173.wav,उप नो न रमसि सूक्तेन वचसा वयं भद्रेण वचसा वयम्,6.273 |
| Rigvedha_014_0311.wav,अमर्धन्ता सोमपेयाय देवा,3.7460625 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0140.wav,तत्रामृतस्य चक्षणं ततः कुष्ठो अजायत,4.628 |
| Rigveda_32_0129.wav,सर्वं तदेषां समृधेव पर्व यत्सुवाचो वदथनाध्यप्सु,7.669 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0369.wav,अस्य श्रियमुपसंयात सर्व उग्रस्य चेत्तुः संमनसः सजाताः,6.665 |
| Rigvedha_009_0209.wav,यद्वा घास्य प्रभृतमास्ये तृणं सर्वा ता ते अपि देवेष्वस्तु,10.559 |
| RigVeda_48_0101.wav,वसोर्वसुत्वा कारवोऽनेहा विश्वं विवेष्टि द्रविणमुप क्षु,7.23 |
| RigVeda_Part_027_0043.wav,रथीरृतस्य नो भव,3.029 |
| Atharvaveda_Part_020_30357.wav,हव्यवाहं पुरुप्रियम्,2.543 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0061.wav,यथा न रिष्या अमृतः सजूरसस्तत्ते कृणोमि तदु ते समृध्यताम्,6.706 |
| Atharvaveda_Part_020_20139.wav,इन्द्रो वज्री हिरण्ययः,3.228 |
| RigVeda_46_0025.wav,पशुं नः सोम रक्षसि पुरुत्रा विष्ठितं जगत्,4.491 |
| Rigvedha_010_0228.wav,ये ते वृषणो वृषभास इन्द्र ब्रह्मयुजो वृषरथासो अत्याः,6.326 |
| Rig_veda_54_0204.wav,ध्रुवा द्यौर्ध्रुवा पृथिवी ध्रुवासः,3.619 |
| Rigvedha_011_0297.wav,यं स्मा पृच्छन्ति कुह सेति घोरमुतेमाहुर्नैषो अस्ती,6.3690625 |
| Rigveda_40_0527.wav,सुता इन्द्राय वायवे वरुणाय मरुद्भ्यः,4.95 |
| Rigvedha_011_0296.wav,पुष्टानि स जनास इन्द्रः,2.532 |
| RigVeda_48_0046.wav,समिन्द्रेरय गामनड्वाहं य आवहदुशीनराण्या अनः,6.868 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0281.wav,यदि सप्तवृषोऽसि सृजारसोऽसि यद्यष्टवृषोऽसि सृजारसोऽसि यदि नववृषोऽसि सृजारसोऽसि,9.636 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0183.wav,तेन देवा देवतामग्र आयन् तेन रोहान् रुरुहुर्मेध्यासः,6.579 |
| Rigvedha_008_0241.wav,जगृभ्मा दूरआदिशं श्लोकमद्रेरध त्मना,5.782 |
| Atharvaveda_Part_020_40342.wav,इमास्तदस्य गा रक्ष यभ मामद्ध्यौदनम्,4.45 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0150.wav,इमे जीवा वि मृतैराववृत्रन्न् अभूद्भद्रा देवहूतिर्नो अद्य प्राञ्चो अगाम नृतये हसाय सुवीरासो विदथमा वदेम,12.808 |
| RigVeda_44_0209.wav,अपो वसानः परि कोशमर्षतीन्दुर्हियानः सोतृभिः,6.055 |
| RigVeda_Part_027_0309.wav,अकृणुतमन्तरिक्षं वरीयोऽप्रथतं जीवसे नो रजांसि,6.939 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0113.wav,ततो यक्ष्मं वि बाधस उग्रो मध्यमशीरिव,4.614 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0470.wav,तामूर्जां देवा उप जीवन्त्युपजीवनीयो भवति य एवं वेद,6.823 |
| Rigveda_37_0346.wav,कदू न्वस्याकृतमिन्द्रस्यास्ति पौंस्यम्,6.21 |
| RigVeda_Part_021_0334.wav,असावि ते जुजुषाणाय सोमः क्रत्वे दक्षाय बृहते मदाय,7.088 |
| Rigveda_29_0177.wav,वि त्वाहतस्य वेदनं भजेमह्या दूणाशो भरा गयम्,5.946 |
| Rigveda_30_0050.wav,संविदान उषसा सूर्येणादित्येभिर्वसुभिरङ्गिरोभिः,6.327 |
| RigVeda_48_0042.wav,शं रोदसी सुबन्धवे यह्वी ऋतस्य मातरा,5.429 |
| Rigvedha_002_0407.wav,को वो वर्षिष्ठ आ नरो दिवश्च ग्मश्च धूतयः,5.087 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0151.wav,गृहस्य बुध्न आसीनास्ता इन्द्रो वज्रेणाधि तिष्ठतु,6.028 |
| Atharvaveda_Part_020_10205.wav,कण्वा उक्थेभिर्जरन्ते,3.245 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0248.wav,एष वा उद्यन्नामर्तुर्यदजः पञ्चौदनः निरेवाप्रियस्य भ्रातृव्यस्य श्रियं दहति भवत्यात्मना,10.719 |
| Rigveda_38_0117.wav,उभा कर्णा हिरण्यया,3.324 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0617.wav,यद्विद्वांसो यदविद्वांस एनांसि चकृमा वयम्,4.914 |
| Rigveda_36_0010.wav,नहि वां वव्रयामहेऽथेन्द्रमिद्यजामहे शविष्ठं नृणां नरम्,8.035 |
| Rigveda_30_0043.wav,दधिक्रां वः प्रथममश्विनोषसमग्निं समिद्धं भगमूतये हुवे,7.001 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0021.wav,तत्ते कृणोमि भेषजं सुभेषजं यथाससि,4.819 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0189.wav,ते मे देवाः पुरोहिताः प्रतीचीः कृत्याः प्रतिसरैरजन्तु,7.288 |
| Atharvaveda_Part_020_10053.wav,अभि द्युम्नानि वनिन इन्द्रं सचन्ते अक्षिता,4.891 |
| Rigveda_35_0011.wav,अधि या बृहतो दिवोऽभि यूथेव पश्यतः,7.046 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0394.wav,अधा मासि पुनरा यात नो गृहान् हविरत्तुं सु,4.331 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0234.wav,विद्म ते स्वप्न जनित्रं देवजामीनां पुत्रोऽसि यमस्य करणः,6.37 |
| Rigvedha_008_0122.wav,सुन्वान इत्सिषासति सहस्रा वाज्यवृतः,4.949 |
| RigVeda_Part_022_0161.wav,मरुतामधा महो दिवि क्षमा च मन्महे,4.67 |
| RigVeda_Part_019_0173.wav,उदप्रुतो मन्दिनो मन्दिनिस्पृशो मध्वो न मक्षः सवनानि गच्छथः,7.34 |
| Rigveda_38_0071.wav,नहि मन्युः पौरुषेय ईशे हि वः प्रियजात,4.728 |
| RigVeda_Part_025_0247.wav,अनु प्र येजे जन ओजो अस्य सत्रा दधिरे अनु वीर्याय,7.081 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0013.wav,य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्य देवाः,6.793 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0276.wav,वृक्षादिव स्रजं कृत्वाप्रिये प्रति मुञ्च तत्,5.244 |
| RigVeda_Part_024_0012.wav,त्वेषस्ते धूम ऋण्वति दिवि षञ्छुक्र आततः,5.664 |
| RigVeda_Part_027_0083.wav,ताभिर्यासि दूत्यां सूर्यस्य कामेन कृत श्रव इच्छमानः,7.661 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0290.wav,अध रात्रि तृष्टधूममशीर्षाणमहिं कृणु,5.108 |
| Rigvedha_010_0155.wav,तृणस्कन्दस्य नु विशः परि वृङ्क्त सुदानवः ऊर्ध्वान्नः कर्त जीवसे,7.551 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0206.wav,प्राचीनं बर्हिः प्रदिशा पृथिव्या वस्तोरस्या वृज्यते अग्रे अह्नाम्,7.115 |
| RigVeda_52_0121.wav,समौ चिद्धस्तौ न समं विविष्टः सम्मातरा चिन्न समं दुहाते,7.515 |
| Rigvedha_005_0016.wav,ईशानो अप्रतिष्कुत इन्द्रो अङ्ग,5.081 |
| Rigvedha_001_0235.wav,देवममीवचातनम्,2.929 |
| RigVeda_Part_015_0015.wav,भद्रा त इन्द्र सुमतिर्घृताची सहस्रदाना पुरुहूत रातिः,6.349 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0028.wav,अयमौदुम्बरो मणिर्वीरो वीराय बध्यते,4.768 |
| RigVeda_Part_024_0273.wav,वस्वी ते अग्ने संदृष्टिरिषयते मर्त्याय,5.278 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0448.wav,यो युक्ता अनुसंवहन्ति,3.18 |
| Rigvedha_003_0133.wav,अयं सोमः सुदानवस्तं पात तिरोअह्न्यम्,4.164 |
| RigVeda_Part_018_0229.wav,यत्रोत बाधितेभ्यश्चक्रं कुत्साय युध्यते,6.07 |
| RigVeda_42_0141.wav,अंशुं दुहन्ति स्तनयन्तमक्षितं कविं कवयोऽपसो मनीषिणः,6.959 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0083.wav,सूर्यो द्यां सूर्यः पृठिवीं सूर्य आपोऽति पश्यति,5.802 |
| RigVeda_Part_018_0323.wav,अवीवृधन्त गोतमा इन्द्र त्वे स्तोमवाहसः,5.878 |
| RigVeda_Part_028_0198.wav,स हि क्षपावाँ अभवद्रयीणामतन्द्रो दूतो यजथाय देवान्,8.35 |
| Rigvedha_009_0099.wav,उरुक्रमस्य स हि बन्धुरित्था विष्णोः पदे परमे मध्व उत्सः,6.725 |
| RigVeda_Part_021_0310.wav,यो वः शमीं शशमानस्य निन्दात्तुच्छ्यान्कामान्करते सिष्विदानः,7.515 |
| Rigveda_30_0214.wav,नहि वश्चरमं चन वसिष्ठः परिमंसते,4.247 |
| Rigvedha_008_0291.wav,अस्मे रयिं न स्वर्थं दमूनसं भगं दक्षं न पपृचासि धर्णसिम्,6.981 |
| RigVeda_Part_015_0368.wav,स्वयुरिन्द्र स्वराळसि स्मद्दिष्टिः स्वयशस्तरः,5.134 |
| Rigveda_35_0107.wav,वयं वो वृक्तबर्हिषो हितप्रयस आनुषक्,4.953 |
| RigVeda_Part_018_0007.wav,त्वष्टुर्गृहे अपिबत्सोममिन्द्रः शतधन्यं चम्वोः सुतस्य,6.675 |
| Rigveda_34_0366.wav,ऋतावाना सम्राजा पूतदक्षसा,5.644 |
| Rigvedha_001_0472.wav,ता मित्रावरुणा हुवे,3.164 |
| Rigvedha_014_0089.wav,आदित्या रुद्रा वसवः सुनीथा द्यावाक्षामा पृथिवी अन्तरिक्षम्,7.284 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0281.wav,आपो अग्रं दिव्या ओषधयः तास्ते यक्ष्ममेनस्यमङ्गादङ्गादनीनशन्,10.544 |
| RigVeda_Part_018_0174.wav,नासुष्वेरापिर्न सखा न जामिर्दुष्प्राव्योऽवहन्तेदवाचः,7.248 |
| Rigvedha_010_0050.wav,यूयं न उग्रा मरुतः सुचेतुनारिष्टग्रामाः सुमतिं पिपर्तन,6.696 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0021.wav,अप तस्य द्वेषो गमेदभिह्रुतो यावयच्छत्रुमन्तितम्,5.444 |
| RigVeda_44_0421.wav,ऋतस्य हि वर्तनयः सुजातमिषो वाजाय प्रदिवः सचन्ते,6.902 |
| Rigvedha_011_0014.wav,इयं सा वो अस्मे दीधितिर्यजत्रा अपिप्राणी च सदनी च भूयाः,7.6080625 |
| Rigveda_31_0260.wav,अरं दासो न मीळ्हुषे कराण्यहं देवाय भूर्णयेऽनागाः,8.119 |
| Rigveda_41_0274.wav,पवमानस्य ते कवे वाजिन् त्सर्गा असृक्षत,5.682 |
| Rigvedha_014_0219.wav,आ देवेषु यतत आ सुवीर्य आ शंस उत नृणाम्,5.352 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0178.wav,त्रायन्तामिमं देवास्त्रायन्तां मरुतां गणाः त्रायन्तां विश्वा भूतानि यथायमरपा असत् आ त्वागमं शंतातिभिरथो अरिष्टतातिभिः,16.535 |
| Rigvedha_013_0136.wav,उत्संहायास्थाद्व्यृतूँरदर्धररमतिः सविता देव आगात्,8.143 |
| RigVeda_Part_028_0252.wav,तपिष्ठैरजरो दह,2.687 |
| RigVeda_46_0050.wav,आधीषमाणायाः पतिः शुचायाश्च शुचस्य च,5.224 |
| Atharvaveda_Part_020_10250.wav,इन्द्रेण दस्युं दरयन्त इन्दुभिर्युतद्वेषसः समिषा रभेमहि,6.882 |
| Rig_veda_45_0400.wav,वेति त्वामुपसेचनी वि वो मद ऋजीतिरग्न आहुतिर्विवक्षसे,7.095 |
| Rigveda_30_0317.wav,सुप्रावीरस्तु स क्षयः प्र नु यामन्सुदानवः,4.98 |
| RigVeda_51_0217.wav,सध्रीचीना यातवे प्रेमजीगः सुदिनेव पृक्ष आ तंसयेथे,7.999 |
| RigVeda_Part_016_0204.wav,तस्मा एतत्पन्यतमाय जुष्टमग्नौ मित्राय हविरा जुहोत,7.348 |
| RigVeda_42_0275.wav,अरूरुचदुषसः पृश्निरग्रिय उक्षा बिभर्ति भुवनानि वाजयुः,6.819 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0336.wav,वृश्च दर्भ सपत्नान् मे वृश्च मे पृतनायतः,4.686 |
| RigVeda_49_0252.wav,सत्येनोत्तभिता भूमिः सूर्येणोत्तभिता द्यौः ऋतेनादित्यास्तिष्ठन्ति दिवि सोमो अधि श्रितः,11.413 |
| Rigveda_35_0265.wav,कदा सुतं तृषाण ओक आ गम इन्द्र स्वब्दीव वंसगः,6.27 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0170.wav,शतं जीव शरदो वर्धमानः शतं हेमन्तान् छतमु वसन्तान्,7.299 |
| Rigveda_34_0213.wav,गोबन्धवः सुजातास इषे भुजे महान्तो न स्परसे नु,8.045 |
| Rig_veda_45_0055.wav,त्वाष्ट्रस्य चिद्विश्वरूपस्य गोनामाचक्राणस्,5.404 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0458.wav,इन्द्रस्य कुक्षिरसि सोमधान आत्मा देवानामुत मानुषाणाम्,6.562 |
| RigVeda_Part_028_0250.wav,दितिश्च दाति वार्यम्,3.032 |
| Rigvedha_003_0378.wav,प्र मंहिष्ठाय बृहते बृहद्रये सत्यशुष्माय तवसे मतिं भरे,6.318 |
| Rigvedha_011_0028.wav,यददो पितो अजगन्विवस्व पर्वतानाम्,4.566 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0203.wav,सर्गा वर्षस्य वर्षतो वर्षन्तु पृथिवीमनु,4.321 |
| Rigvedha_006_0125.wav,नराशंसं वाजिनं वाजयन्निह क्षयद्वीरं पूषणं सुम्नैरीमहे,8.529 |
| Atharvaveda_Part_020_40440.wav,नू नो रयिं पुरुवीरं बृहन्तं दस्रा मिमाथामुभयेष्वस्मे,6.738 |
| Rig_veda_54_0011.wav,परीमे गामनेषत पर्यग्निमहृषत,4.448 |
| RigVeda_Part_016_0170.wav,त्रिरा दिवः सवितर्वार्याणि दिवेदिव आ सुव त्रिर्नो अह्नः त्रिधातु राय आ सुवा वसूनि भग त्रातर्धिषणे सातये धाः त्रिरा दिवः सविता सोषवीति राजाना मित्रावरुणा सुपाणी,22.388 |
| RigVeda_52_0360.wav,ममाग्ने वर्चो विहवेष्वस्तु वयं त्वेन्धानास्तन्वं पुषेम,6.868 |
| RigVeda_42_0225.wav,ता ईं हिन्वन्ति हर्म्यस्य सक्षणिं याचन्ते सुम्नं पवमानमक्षितम्,7.754 |
| Rigvedha_001_0131.wav,युजं वृत्रेषु वज्रिणम्,3.99 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0279.wav,या अग्निं गर्भं दधिरे सुवर्णास्ता न आपः शं स्योना भवन्तु,6.956 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0271.wav,आविष्कृणुष्व रूपाणि मात्मानमप गूहथाः,5.004 |
| Rigveda_33_0120.wav,येनेन्द्रः शुष्ममिद्दधे,3.419 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0310.wav,आप्नोतीमं लोकमाप्नोत्यमुम्,4.173 |
| Rigvedha_006_0013.wav,इन्द्रं यं विश्वा भुवनाभि संदधुर्मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे,7.193 |
| RigVeda_52_0077.wav,इति त्वाग्ने वृष्टिहव्यस्य पुत्,3.063 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0487.wav,तत्रामृतस्य चक्षणं देवाः कुष्ठमवन्वत,4.712 |
| RigVeda_Part_024_0213.wav,अग्ने यदद्य विशो अध्वरस्य होतः पावकशोचे वेष्ट्वं हि यज्वा,7.291 |
| RigVeda_Part_025_0245.wav,सत्रा मदासस्तव विश्वजन्याः सत्रा रायोऽध ये पार्थिवासः,7.218 |
| Rigveda_40_0074.wav,अभि त्यं पूर्व्यं मदं सुवानो अर्ष पवित्र आ,5.623 |
| Rigvedha_008_0177.wav,अयं मित्राय वरुणाय शंतमः सोमो भू,4.695 |
| RigVeda_53_0188.wav,त्ते अग्ने शशमानस्य वाजाः,4.175 |
| Rigvedha_014_0337.wav,अति द्वेषांसि तरेम,2.7190625 |
| Rigvedha_005_0089.wav,श्चोतन्ति कोशा उप वो रथेष्वा घृतमुक्षता मधुवर्णमर्चते,7.268 |
| Rigveda_34_0375.wav,न परिबाधो हरिवो गविष्टिषु आ त्वा गोभिरिव व्रजं गीर्भिरृणोम्यद्रिवः,10.608 |
| Rigveda_36_0276.wav,त्रिते दुष्वप्न्यं सर्वमाप्त्ये परि दद्मस्यनेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः,9.906 |
| Rigveda_38_0099.wav,गृभ्णन्ति जिह्वया ससम्,3.127 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0070.wav,उत पृथिव्यामव स्यन्ति विद्युत उग्रो वो देवः प्र मृणत्सपत्नान् च्युता चेयं बृहत्यच्युता च विद्युद्बिभर्ति स्तनयित्नूंश्च सर्वान्,13.655 |
| Rigvedha_008_0127.wav,मन्दन्तु त्वा मन्दिनो वायविन्दवोऽस्मत्क्राणासः सुकृता अभिद्यवो गोभिः क्राणा अभिद्यवः,10.349 |
| RigVeda_42_0165.wav,विद्वान्स विश्वा भुवनाभि पश्यत्यवाजुष्टान्विध्यति कर्ते अव्रतान्,7.645 |
| RigVeda_Part_016_0077.wav,विश्वामित्रा अरासत ब्रह्मेन्द्राय वज्रिणे,5.705 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0021.wav,बभ्रुं कृष्णां रोहिणीं विश्वरूपां ध्रुवां भूमिं पृथिवीमिन्द्रगुप्ताम्,8.117 |
| Rigvedha_003_0311.wav,अतः संगृभ्याभिभूत आ भर मा त्वायतो जरितुः काममूनयीः,7.452 |
| Rigvedha_013_0171.wav,आभ्यामिन्द्रः पक्वमामास्वन्तः सोमापूषभ्यां जनदुस्रियासु,7.82 |
| RigVeda_44_0034.wav,शर्धन्तमांसि जिघ्नसे विश्वानि दाशुषो गृहे,5.553 |
| Rigveda_37_0158.wav,अद्रोघमा वहोशतो यविष्ठ्य देवाँ अजस्र वीतये,7.369 |
| Atharvaveda_Part_020_20118.wav,वचस्तच्चिन् न ओहसे,2.88 |
| RigVeda_49_0125.wav,दिवश्चिदा वोऽमवत्तरेभ्यो विभ्वना चिदाश्वपस्तरेभ्यः,6.946 |
| Rigvedha_013_0262.wav,अस्थुरत्र धेनवः पिन्वमाना मही दस्मस्य मातरा समीची,6.8060625 |
| Rigvedha_013_0073.wav,तमू शुचिं शुचयो दीदिवांसमपां नपातं परि तस्थुरापः,6.826 |
| Atharvaveda_Part_020_40321.wav,इरामह प्रशंसत्यनिरामप सेधति,4.177 |
| Rigveda_38_0011.wav,इन्द्राय गाव आशिरं दुदुह्रे वज्रिणे मधु,5.293 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0443.wav,अङ्गा पर्वाणि मज्जानं को मांसं कुत आभरत्,5.23 |
| RigVeda_Part_018_0195.wav,न घा स मामप जोषं जभाराभीमास त्वक्षसा वीर्येण,7.463 |
| RigVeda_50_0208.wav,मेधाकारं विदथस्य प्रसाधनमग्निं होतारं परिभूतमं मतिम्,6.938 |
| RigVeda_50_0350.wav,उप त्वा रातिः सुकृतस्य तिष्ठान्नि वर्तस्व हृदयं तप्यते मे,6.23 |
| Atharvaveda_Part_018_1_0201.wav,स्वावृग्देवस्यामृतं यदी गोरतो जातासो धारयन्त उर्वी,6.599 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0161.wav,अञ्जते व्यञ्जते समञ्जते क्रतुं रिहन्ति मधुनाभ्यञ्जते,6.637 |
| Atharvaveda_Part_020_30333.wav,तस्मा उ अद्य समना सुतं भरा नूनं भूषत श्रुते,5.569 |
| Rigveda_37_0395.wav,नास्माकमस्ति तत्तर आदित्यासो अतिष्कदे,5.771 |
| Rigveda_40_0404.wav,श्रीणाना अप्सु मृञ्जत,3.12 |
| Rigvedha_008_0200.wav,अयं वां मित्रावरुणा नृभिः सुतः सोम आ पीतये सुतः,6.161 |
| Rigveda_40_0481.wav,एन्दो पार्,1.798 |
| RigVeda_Part_022_0361.wav,अग्नितपो यथासथ,2.621 |
| RigVeda_49_0016.wav,तिस्रो देवीर्बर्हिरिदं वरीय आ सीदत चकृमा वः स्योनम्,7.528 |
| Rig_veda_45_0036.wav,मुमोद गर्भो वृषभः ककुद्मानस्रेमा वत्सः शिमीवाँ अरावीत्,8.138 |
| Rigvedha_003_0310.wav,शचीव इन्द्र पुरुकृद्द्युमत्तम तवेदिदमभितश्चेकिते वसु,5.687 |
| Atharvaveda_Part_015_0012.wav,तं बृहच्च रथन्तरं चादित्याश्च विश्वे च देवा अनुव्यचलन्,7.22 |
| Rigveda_38_0456.wav,द्युक्षं सुदानुं तविषीभिरावृतं गिरिं न पुरुभोजसम्,6.785 |
| Rigveda_33_0509.wav,मदेमदे ववक्षिथा सुकृत्वने,4.183 |
| Rigveda_33_0055.wav,वहतं पीवरीरिषः,2.772 |
| Atharvaveda_Part_020_10147.wav,यत्पर्वते न समशीत हर्यत इन्द्रस्य वज्रः श्नथिता हिरण्ययः,6.532 |
| Rigveda_29_0213.wav,सुशक्तिरिन्मघवन्तुभ्यं मावते देष्णं यत्,4.723 |
| Rigveda_40_0641.wav,क्रन्दन्देवाँ अजीजनत्,3.946 |
| Rigveda_33_0357.wav,यातं छर्दि,1.619 |
| Atharvaveda_Part_020_10017.wav,ब्रह्माणस्त्वा वयं युजा सोमपामिन्द्र सोमिनः,5.403 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0338.wav,कालेन वातः पवते कालेन पृथिवी मही,4.137 |
| RigVeda_Part_027_0134.wav,इन्द्राग्नी शृणुतं हवं यजमानस्य सुन्वतः,5.198 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0302.wav,आचार्य उपनयमानो ब्रह्मचारिणं कृणुते गर्भमन्तः,6.037 |
| Rigvedha_007_0248.wav,सिषासन्ती द्योतना शश्वदागादग्रमग्रमिद्भजते वसूनाम्,7.78 |
| Atharvaveda_Part_020_40353.wav,यद्ध प्राचीरजगन्तोरो मण्डूरधाणिकीः,5.188 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0218.wav,आ मारुक्षद्देवमणिर्मह्या अरिष्टतातये,5.405 |
| RigVeda_48_0202.wav,स्वस्तिरिद्धि प्रपथे श्रेष्ठा रेक्णस्वत्यभि या वाममेति,6.838 |
| Rigvedha_013_0289.wav,महान्ति वृष्णे सवना कृतेमा जन्मञ्जन्मन्निहितो जातवेदाः,7.62 |
| RigVeda_Part_027_0292.wav,नू न इन्द्रावरुणा गृणाना पृङ्क्तं रयिं सौश्रवसाय देवा,7.055 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0154.wav,यथा यमस्य त्वा गृहेऽरसं प्रतिचाकशान् आभूकं प्रतिचाकशान्,7.275 |
| RigVeda_43_0259.wav,अभि प्रियाणि पवते पुनानो देवो देवान्स्वेन रसेन पृञ्चन्,7.517 |
| Atharvaveda_Part_020_40022.wav,यद्वासि सुन्वतो वृधो यजमानस्य सत्पते,4.718 |
| RigVeda_Part_026_0146.wav,दिवस्पृथिव्याः पर्योज उद्भृतं वनस्पतिभ्यः पर्याभृतं सहः,7.948 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0102.wav,अनागसं ब्रह्मणा त्वा कृणोमि शिवे ते द्यावापृथिवी उभे स्ताम्,7.663 |
| RigVeda_Part_020_0097.wav,नाहायमग्निरभिशस्तये नो न रीषते वावृधानः परा दात्,7.363 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0207.wav,बृहस्पतिर्यज्ञमतनुत ऋषिः प्रियां यमस्तन्वमा रिरेच,6.504 |
| Atharvaveda_Part_020_20339.wav,कदा मर्तमराधसं पदा क्षुम्पमिव स्फुरत्,4.695 |
| RigVeda_Part_017_0243.wav,त्वदग्ने काव्या त्वन्मनीषास्त्वदुक्था जायन्ते राध्यानि,7.85 |
| Atharvaveda_Part_020_10324.wav,बर्हिर्वा यत्स्वपत्याय वृज्यतेऽर्को वा श्लोकमाघोषते दिवि,6.529 |
| RigVeda_Part_022_0224.wav,प्र वो मरुतस्तविषा उदन्यवो वयोवृधो अश्वयुजः परिज्रयः,7.245 |
| Rigveda_31_0302.wav,वह वायो नियुतो याह्यच्छा पिबा सुतस्यान्धसो मदाय,7.543 |
| Rigveda_33_0364.wav,यदद्याश्विनावहं हुवेय वाजसातये,5.233 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0523.wav,त्यगेनान् प्रतिसरेण हन्मि,3.103 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0434.wav,इन्द्रस्य वचसा वयं मित्रस्य वरुणस्य च देवानां सर्वेषां वाचा यक्ष्मं ते वारयामहे,9.868 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0011.wav,विश्वंभरा वसुधानी प्रतिष्ठा हिरण्यवक्षा जगतो निवेशनी,6.602 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0195.wav,ते देवेभ्य आ वृश्चन्ते पापं जीवन्ति सर्वदा,5.505 |
| RigVeda_Part_025_0296.wav,गावो न वज्रिन्स्वमोको अच्छेन्द्रा गहि प्रथमो यज्ञियानाम्,7.058 |
| RigVeda_53_0167.wav,प्र नो यच्छत्वर्यमा प्र भगः प्र बृहस्पतिः,5.317 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0498.wav,विकेशी पुरुषे हते रदिते अर्बुदे तव,4.339 |
| RigVeda_Part_015_0099.wav,स आ ववृत्स्व हर्यश्व यज्ञैः सरण्युभिरपो अर्णा सिसर्षि,6.506 |
| RigVeda_46_0302.wav,उषासानक्ता बृहती सुपेशसा द्यावाक्षामा वरुणो मित्रो अर्यमा,8.418 |
| Rigvedha_012_0139.wav,पोषं रयीणामरिष्टिं तनूनां स्वाद्मानं वाचः सुदिनत्वमह्नाम्,8.0370625 |
| RigVeda_Part_026_0294.wav,जही न्यत्रिणं पणिं वृको हि षः,5.528 |
| Rigveda_38_0247.wav,अनु त्वा रोदसी उभे क्रक्षमाणमकृपेताम्,5.977 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0348.wav,मन्वे वां मित्रावरुणावृतावृधौ सचेतसौ द्रुह्वणो यौ नुदेथे प्र सत्यावानमवथो भरेषु तौ नो मुञ्चतमंहसः सचेतसौ द्रुह्वणो यौ नुदेथे प्र सत्यावानमवथो भरेषु यौ गच्छथो नृचक्षसौ बभ्रुणा सुतं तौ नो मुञ्चतमंहसः यावङ्गिरसमवथो यावगस्तिं मित्रावरुणा जमदग्निमत्त्रिम्,30.455 |
| RigVeda_Part_021_0044.wav,अनासो दस्यूँरमृणो वधेन नि दुर्योण आवृणङ्मृध्रवाचः,6.861 |
| RigVeda_Part_027_0150.wav,यस्या अनन्तो अह्रुतस्त्वेषश्चरिष्णुरर्णवः,5.955 |
| RigVeda_Part_026_0264.wav,विश्वे देवा ऋतावृधो हुवाना स्तुता मन्त्राः कविशस्ता अवन्तु,8.908 |
| RigVeda_42_0153.wav,पवित्रवन्तः परि वाचमासते पितैषां प्रत्नो अभि रक्षति व्रतम्,7.18 |
| Atharvaveda_Part_014_0298.wav,आ रोह सूर्ये अमृतस्य लोकं स्योनं पतिभ्यो वहतुं कृणु त्वम्,6.593 |
| Rigvedha_007_0327.wav,उपोप मे परा मृश मा मे दभ्राणि मन्यथाः,6.098 |
| Rigveda_30_0229.wav,इहेह वः स्वतवसः कवयः सूर्यत्वचः,4.53 |
| Rigvedha_005_0203.wav,अतारिष्म तमसस्पारमस्योषा उच्छन्ती वयुना कृणोति,6.765 |
| Rigvedha_007_0311.wav,दक्षिणावतामिदिमानि चित्रा दक्षिणावतां दिवि सूर्यासः,7.202 |
| Rigveda_31_0350.wav,सं यन्मही मिथती स्पर्धमाने तनूरुचा शूरसाता यतैते,7.677 |
| Rigvedha_012_0006.wav,अध्वर्यवो यो दृभीकं जघान यो गा उदाजदप हि वलं वः,6.026 |
| Rigvedha_010_0203.wav,त्वमस्माकमिन्द्र विश्वध स्या अवृकतमो नरां नृपाता स नो विश्वासां स्पृधां सहोदा विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्,13.958 |
| RigVeda_52_0079.wav,ताँश्च पाहि गृणतश्च सूरीन्वषड्वषळित्यूर्ध्वासो अनक्षन्नमो नम इत्यूर्ध्वासो अनक्षन्,11.788 |
| Rigveda_31_0039.wav,धत्तं रत्नानि जरतं च सूरीन्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा,7.678 |
| Rigvedha_012_0234.wav,हविष्कृणुष्व सुभगो यथाससि ब्रह्मणस्पतेरव आ वृणीमहे,6.469 |
| Rigveda_31_0119.wav,रुजद्दृळ्हानि दददुस्रियाणां प्रति गाव उषसं,7.073 |
| Rigveda_37_0297.wav,इन्द्रं क उ स्विदा चके,3.138 |
| Atharvaveda_Part_015_0018.wav,कीर्तिश् च यशश् च पुरःसरौ ऐनं कीर्तिर्गच्छत्या यशो गच्छति य एवं वेद,8.187 |
| Rigveda_32_0304.wav,जनित्वनाय मामहे पिबा सुतस्य रसिनो मत्स्वा न इन्द्र गोमतः,8.766 |
| Atharvaveda_Part_020_20213.wav,क ईं वेद सुते सचा पिबन्तं कद्वयो दधे,4.974 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0143.wav,अति धावतातिसरा इन्द्रस्य वचसा हत,4.026 |
| Rigveda_40_0170.wav,देवं देवाय देवयु,3.142 |
| Atharvaveda_Part_020_40437.wav,पिबाथ इन् मधुनः सोम्यस्य दधथो रत्नं विधते जनाय,6.588 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0047.wav,तस्मा अरं गमाम वो यस्य क्षयाय जिन्वथ,5.064 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0421.wav,को नु गौः क एकऋषिः किमु धाम का आशिषः,4.871 |
| RigVeda_Part_027_0069.wav,करम्भमन्य इच्छति,2.631 |
| RigVeda_Part_026_0245.wav,श्रुत्वा हवं मरुतो यद्ध याथ भूमा रेजन्ते अध्वनि प्रविक्ते,9.656 |
| RigVeda_Part_028_0068.wav,ऊर्ध्वं नो अध्वरं कृतं हवेषु ता देवेषु वनथो वार्याणि,7.896 |
| RigVeda_50_0248.wav,प्र नः पूषा चरथं विश्वदेव्योऽपां नपादवतु वायुरिष्टये,7.018 |
| Rigveda_39_0106.wav,श्रुधी हवं तिरश्च्या इन्द्र यस्त्वा सपर्यति सुवीर्यस्य गोमतो रायस्पूर्धि महाँ असि,17.788 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0121.wav,इन्द्राग्नी रक्षतां शालाममृतौ सोम्यं सदः कुलायेऽधि कुलायं कोशे कोशः समुब्जितः,10.426 |
| Rigveda_41_0149.wav,सहस्रोतिः शतामघो विमानो रजसः कविः,4.517 |
| RigVeda_Part_023_0290.wav,अर्वाङेतेन स्तनयित्नुनेह्यपो निषिञ्चन्नसुरः पिता नः,6.598 |
| RigVeda_Part_017_0371.wav,अयं चक्रमिषणत्सूर्यस्य न्येतशं रीरमत्ससृमाणम्,6.204 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0100.wav,ते द्यामुदित्याविदन्त लोकं नाकस्य पृष्ठे अधि दीध्यानाः,6.902 |
| RigVeda_Part_020_0391.wav,न्यग्निं जातवेदसं होत्रवाहं यविष्ठ्यम्,5.943 |
| RigVeda_Part_023_0124.wav,यद्वा पुरू पुरुभुजा यदन्तरिक्ष आ गतम्,5.059 |
| Atharvaveda_Part_014_0392.wav,आण्डात्पतत्रीवामुक्षि विश्वस्मादेनसस्परि,5.433 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0499.wav,अधि स्कन्द वीरयस्व गर्भमा धेहि योन्याम्,4.729 |
| Rigveda_33_0551.wav,अभि स्वरन्तु ये तव रुद्रासः सक्षत श्रियम्,5.338 |
| Rigveda_37_0095.wav,महि स्थूरं शशयं राधो अह्रयं प्रस्कण्वाय नि तोशय,6.965 |
| Rigvedha_001_0303.wav,तवेद्धि सख्यमस्तृतम्,2.897 |
| Rigveda_41_0143.wav,अयं विचर्षणिर्हितः पवमानः स चेतति,4.7 |
| Rigveda_37_0255.wav,सत्यमिद्वा उ तं वयमिन्द्रं स्तवाम नानृतम्,5.325 |
| RigVeda_52_0287.wav,एवो ष्वस्मन्मुञ्चता व्यंहः प्र तार्यग्ने प्रतरं न आयुः,8.561 |
| RigVeda_Part_028_0109.wav,परिषद्यं ह्यरणस्य रेक्णो नित्यस्य रायः पतयः स्याम,6.315 |
| Rigveda_38_0171.wav,हव्यान्यैरयद्दिवि आगन्म वृत्रहन्तमं ज्येष्ठमग्निमानवम्,8.788 |
| RigVeda_44_0018.wav,अभी नवन्ते अद्रुहः प्रियमिन्द्रस्य काम्यम्,4.91 |
| RigVeda_Part_018_0067.wav,ईक्षे रायः क्षयस्य चर्षणीनामुत व्रजमपवर्तासि गोनाम्,7.701 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0406.wav,तनूस्तन्वा मे सहे दतः सर्वमायुरशीय,7.449 |
| RigVeda_Part_022_0311.wav,अयं यो अग्निर्मरुतः समिद्ध एतं जुषध्वं कवयो युवानः,6.116 |
| RigVeda_Part_027_0207.wav,सं वां शता नासत्या सहस्राश्वानां पुरुपन्था गिरे दात्,8.444 |
| Rigvedha_003_0238.wav,उद्वयं तमसस्परि ज्योतिष्पश्यन्त उत्तरम्,4.896 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0105.wav,यद्वदामि मधुमत्तद्वदामि यदीक्षे तद्वनन्ति मा,5.626 |
| Rigvedha_008_0186.wav,ज्योग्जीवन्तः प्रजया सचेमहि सोमस्योती सचेमहि,6.758 |
| Rigvedha_009_0126.wav,अस्माकं ब्रह्म पृतनासु जिन्वतं वयं धना शूरसाता भजेमहि,6.394 |
| RigVeda_51_0311.wav,व्यु प्रथते वितरं वरीयो देवेभ्यो अदितये स्योनम्,6.949 |
| Atharvaveda_Part_020_40058.wav,इन्द्रो मह्ना रोदसी पप्रथच्छव इन्द्रः सूर्यमरोचयत्,6.466 |
| RigVeda_Part_028_0260.wav,सुब्रह्मा यज्ञः सुशमी वसूनां देवं राधो जनानाम्,7.247 |
| RigVeda_42_0058.wav,त्वां मृजन्ति दश योषणः सुतं सोम ऋषिभिर्मतिभिर्धीतिभिर्हितम्,6.991 |
| Rigvedha_002_0385.wav,कृधी न ऊर्ध्वाञ्चरथाय जीवसे विदा देवेषु नो दुवः,7.262 |
| Rigvedha_008_0227.wav,मा वां रातिरुप दसत्कदा चनास्मद्रातिः कदा चन,7.012 |
| Rigveda_33_0557.wav,वृषायमिन्द्र ते रथ उतो ते वृषणा हरी,5.319 |
| Rigveda_38_0371.wav,पिबेदस्य त्वमीशिषे,3.111 |
| RigVeda_Part_021_0060.wav,वेददविद्वाञ्छृणवच्च विद्वान्वहतेऽयं मघवा सर्वसेनः,6.912 |
| Rigveda_38_0121.wav,उप स्रक्वेषु बप्सतः कृण्वते धरुणं दिवि,5.338 |
| Rigvedha_006_0278.wav,परायतीनामन्वेति पाथ आयतीनां प्रथमा शश्वतीनाम्,7.635 |
| Rigvedha_014_0257.wav,तिस्र उ ते तन्वो देववातास्ताभिर्नः पाहि गिरो अप्रयुच्छन्,7.6680625 |
| Rigvedha_011_0061.wav,युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम,7.427 |
| Rigveda_31_0158.wav,तिल्विलायध्वमुषसो विभातीर्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा,7.044 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0760.wav,इमं मे अद्य पुरुषं क्लीबमोपशिनं कृधि,4.85 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0364.wav,समुद्रा नद्यो वेशन्तास्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः,5.705 |
| Rigvedha_014_0135.wav,स वेद यज्ञमानुषक्,2.726 |
| Rigveda_41_0272.wav,विप्रमाजा विवस्वतः मृजन्ति त्वा समग्रुवोऽव्ये जीरावधि ष्वणि,8.751 |
| RigVeda_Part_027_0287.wav,इषा स द्विषस्तरेद्दास्वान्वंसद्रयिं रयिवतश्च जनान्,7.391 |
| Rigveda_35_0389.wav,त्वां पिबा सोमं मदाय कं शतक्रतो,5.069 |
| RigVeda_Part_022_0375.wav,अत्र श्रवांसि दधिरे,2.942 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0029.wav,परेणैतु पथा वृकः परमेणोत तस्करः,4.236 |
| RigVeda_Part_021_0321.wav,प्रैष स्तोमः पृथिवीमन्तरिक्षं वनस्पतीँरोषधी राये अश्याः,7.422 |
| Rigveda_41_0139.wav,ताभिः पवित्रमासदः,2.718 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0320.wav,वयांसि हंसा या विदुर्यास्च सर्वे पतत्रिणः,5.231 |
| Rigveda_29_0113.wav,त्तूतुजिरशिश्नत्,1.72 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0158.wav,यथा यशश्चन्द्रमस्यादित्ये च नृचक्षसि,4.195 |
| Rigveda_39_0096.wav,आ ये विश्वा पार्थिवानि पप्रथन्रोचना दिवः,6.3 |
| RigVeda_Part_024_0192.wav,रायः सूनो सहसो मर्त्येष्वा छर्दिर्यच्छ वीतहव्याय सप्रथो भरद्वाजाय सप्रथः,9.921 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0540.wav,आदानेन संदानेनामित्रान् आ द्यामसि,4.991 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0177.wav,चक्षुरसि चक्षुर्मे दाः स्वाह,4.112 |
| Rigvedha_005_0106.wav,एतत्त्यन्न योजनमचेति सस्वर्ह यन्मरुतो गोतमो वः,6.188 |
| Rigveda_31_0266.wav,आत्मा ते वातो रज आ नवीनोत्पशुर्न भूर्णिर्यवसे ससवान्,8.018 |
| Rigveda_31_0033.wav,तेन नः शं योरुषसो व्युष्टौ न्यश्विना वहतं यज्ञे,7.539 |
| Rigvedha_002_0423.wav,प्र यात शीभमाशुभिः सन्ति कण्वेषु वो दुवः,5.443 |
| Rigveda_37_0184.wav,अतन्द्रो हव्या वहसि हविष्कृत आदिद्देवेषु राजसि,6.397 |
| Rigveda_36_0014.wav,अभ्यर्च नभाकवदिन्द्राग्नी यजसा गिरा,5.811 |
| Rig_veda_45_0083.wav,न ते सखा सख्यं वष्ट्येतत्सलक्ष्मा यद्विषुरूपा भवाति,6.346 |
| Rigveda_35_0034.wav,उभे आ पप्,1.313 |
| Rigveda_39_0289.wav,ष्ठो वृत्रहन्तमः,2.371 |
| Atharvaveda_Part_020_20013.wav,मुषायद्विष्णुः पचतं सहीयान् विध्यद्वराहं तिरो अद्रिमस्ता,7.881 |
| RigVeda_Part_020_0132.wav,वातस्य पत्मन्नीळिता दैव्या होतारा मनुषः,6.231 |
| Rigvedha_012_0093.wav,अपाय्यस्यान्धसो मदाय मनीषिणः सुवानस्य प्रयसः,6.9860625 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0278.wav,यदि चतुर्वृषोऽसि सृजारसोऽसि,3.267 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0147.wav,स मे राष्ट्रं च क्षत्रं च पशून् ओजश्च मे दधत्,5.405 |
| RigVeda_Part_022_0321.wav,सत्यश्रुतः कवयो युवानो बृहद्गिरयो बृहदुक्षमाणाः,6.684 |
| Rigveda_35_0304.wav,दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो,5.253 |
| RigVeda_Part_016_0029.wav,वाजसनिं पूर्भिदं तूर्णिमप्तुरं धामसाचमभिषाचं स्वर्विदम् आकरे वसोर्जरिता पनस्यतेऽनेहस स्तुभ इन्द्रो दुवस्यति विवस्वतः सदन आ हि पिप्रिये सत्रासाहमभिमातिहनं स्तुहि,22.48 |
| Rigveda_39_0282.wav,कुविन्नो अस्य सुमतिर्नवीयस्यच्छा वाजेभिरागमत् प्रेष्ठमु प्रियाणां स्तुह्यासावातिथिम् अग्निं रथानां यमम् उदिता यो निदिता वेदिता वस्वा यज्ञियो ववर्तति दुष्टरा यस्य प्रवणे नोर्मयो धिया वाजं सिषासतः मा नो हृणीतामतिथिर्वसुरग्निः पुरुप्रशस्त एषः,36.387 |
| RigVeda_43_0295.wav,अश्वो नो क्रदो वृषभिर्युजानः सिंहो न भीमो मनसो जवीयान्,7.659 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0124.wav,वृश्चामि तं कुलिशेनेव वृक्षं यो अस्माकं मन इदं हिनस्ति,5.954 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0258.wav,हिरण्यपक्षं वरुणस्य दूतं यमस्य योनौ शकुनं भुरन्युम्,5.88 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0267.wav,प्राणो मृत्युः प्राणस्तक्मा प्राणं देवा उपासते,5.418 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0251.wav,सोमो राजा वरुणो अश्विना यमः पूषास्मान् परि पातु मृत्योः,7.229 |
| RigVeda_Part_015_0348.wav,शुनं हुवेम मघवानमिन्द्रमस्मिन्भरे नृतमं वाजसातौ,6.442 |
| RigVeda_Part_020_0277.wav,ऋतेन ऋतं धरुणं धारयन्त यज्ञस्य शाके परमे व्योमन्,7.781 |
| Rigveda_35_0434.wav,आहं सरस्वतीवतोरिन्द्राग्न्योरवो वृणे,5.967 |
| RigVeda_Part_021_0013.wav,क्षत्रं धारयतं बृहद्दिवि सूर्यमिवाजरम्,5.632 |
| RigVeda_Part_022_0298.wav,पुरुद्रप्सा अञ्जिमन्तः सुदानवस्त्वेषसंदृशो अनवभ्रराधसः,7.097 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0424.wav,ता शश्वन्ता विषूचीना वियन्ता न्यन्यं चिक्युर्न नि चिक्युरन्यम्,8.492 |
| Rigvedha_003_0020.wav,असाम्योजो बिभृथा सुदानवोऽसामि धूतयः शवः,5.912 |
| RigVeda_Part_028_0002.wav,अग्निं नरो दीधितिभिररण्योर्हस्तच्युती जनयन्त प्रशस्तम्,6.847 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0250.wav,क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति,5.256 |
| Rigvedha_002_0289.wav,धनोरधि विषुणक्ते व्यायन्नयज्वानः सनकाः प्रेतिमीयुः,6.99 |
| RigVeda_44_0333.wav,स्वधा च यत्र तृप्तिश्च तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परि स्रव,7.453 |
| RigVeda_43_0131.wav,प्र यो नृभिरमृतो मर्त्येभिर्मर्मृजानोऽविभिर्गोभिरद्भिः,6.389 |
| Atharvaveda_Part_020_10165.wav,अप ज्योतिषा तमो अन्तरिक्षदुद्नः शीपालमिव वात आजत्बृहस्पतिरनुमृश्या वलस्याभ्रमिव वात आ चक्र आ गाः,12.636 |
| RigVeda_Part_025_0004.wav,वि पिप्रोरहिमायस्य दृळ्हाः पुरो वज्रिञ्छवसा न दर्दः,6.393 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0110.wav,अथास्मभ्यं वरुणो वायुरग्निर्बृहद्राष्ट्रं संवेश्यं दधातु,6.941 |
| RigVeda_Part_015_0179.wav,स्थिरं रथं सुखमिन्द्राधितिष्ठन्प्रजानन्विद्वाँ उप याहि सोमम्,8.61 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0237.wav,अपां पयसो यत्पयस्तेन मा सह शुम्भतु,4.692 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0212.wav,नयाम्यर्वतीरिवाहे निरैतु विषम्,4.574 |
| Rigveda_36_0199.wav,बिभया हि त्वावत उग्रादभिप्रभङ्गिणः,4.82 |
| Atharvaveda_Part_020_30126.wav,तवेदं विश्वमभितः पशव्यं यत्पश्यसि चक्षसा सूर्यस्य,7.398 |
| Rigvedha_007_0154.wav,प्र या घोषे भृगवाणे न शोभे यया वाचा यजति पज्रियो वाम्,7.102 |
| Rig_veda_54_0061.wav,इन्द्रेदमद्य सवनं जुषाणो विश्वस्य विद्वाँ इह पाहि सोमम्,8.362 |
| Rigveda_32_0311.wav,इन्द्रं समीके वनिनो हवामह इन्द्रं धनस्य सातये इन्द्रो मह्ना रोदसी पप्रथच्छव इन्द्रः सूर्यमरोचयत् इन्द्रे ह विश्वा भुवनानि येमिर इन्द्रे सुवानास इन्दवः,21.575 |
| RigVeda_Part_020_0327.wav,ये अग्ने नेरयन्ति ते वृद्धा उग्रस्य शवसः,5.526 |
| Rigvedha_001_0337.wav,ता नो मृळात ईदृशे,3.833 |
| Rigvedha_012_0271.wav,मा रायो राजन्सुयमादव स्थां बृहद्वदेम विदथे सुवीराः,7.936 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0073.wav,स हिन त्वमसि यस्त्वमात्मानमावयः तौविलिकेऽवेलयावायमैलब ऐलयीत्,9.186 |
| RigVeda_Part_023_0238.wav,या स्तोतृभ्यो विभावर्युच्छन्ती न प्रमीयसे सुजाते अश्वसूनृते,8.325 |
| Rigvedha_002_0027.wav,अद्वेषो हस्तयोर्दधे,3.464 |
| Rigveda_29_0157.wav,ऊर्ध्वासस्त्वान्विन्दवो भुवन्दस्ममुप द्यवि,5.357 |
| RigVeda_Part_015_0158.wav,इन्द्रस्तुजो बर्हणा आ विवेश नृवद्दधानो नर्या पुरूणि,7.236 |
| RigVeda_43_0348.wav,अभी नो अर्ष दिव्या वसून्यभि विश्वा पार्थिवा पूयमानः,6.826 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0088.wav,उरु विष्णो वि क्रमस्वोरु क्षयाय नस्कृधि,4.097 |
| RigVeda_Part_026_0219.wav,ग्नाभिरच्छिद्रं शरणं सजोषा दुराधर्षं गृणते शर्म यंसत्,7.89 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0353.wav,या गुदा अनुसर्पन्त्यान्त्राणि मोहयन्ति च अहिंसन्तीरनामया निर्द्रवन्तु बहिर्बिलम्,10.173 |
| RigVeda_44_0012.wav,स पुनानो मदिन्तमः सोमश्चमूषु सीदति,4.654 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0093.wav,अन्यत्रोग्र वि वर्तय पियारूणां प्रजां जहि,5.549 |
| RigVeda_Part_017_0324.wav,ऋज्रा वाजं न गध्यं युयूषन्कविर्यदहन्पार्याय भूषात्,7.49 |
| Rigveda_40_0234.wav,निरिणानो वि धावति जहच्छर्याणि तान्वा,5.945 |
| Rigveda_29_0279.wav,मा नोऽहिर्बुध्न्यो रिषे धान्मा यज्ञो अस्य स्रिधदृतायोः,6.457 |
| Rigveda_36_0020.wav,यदिन्द्राग्नी जना इमे विह्वयन्ते तना गिरा अस्माकेभिर्नृभिर्वयं सासह्याम पृतन्यतो वनुयाम वनुष्यतो नभन्तामन्यके समे,18.021 |
| Rigveda_32_0071.wav,उदस्तभ्ना नाकमृष्वं बृहन्तं दाधर्थ प्राचीं ककुभं पृथिव्याः,8.857 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0154.wav,तांस्त्वं प्र छिन्द्धि वरण पुरा दिष्टात्पुरायुषः,5.103 |
| RigVeda_49_0126.wav,वायोश्चिदा सोमरभस्तरेभ्योऽग्नेश्चिदर्च पितुकृत्तरेभ्यः,7.202 |
| RigVeda_Part_019_0291.wav,अदाभ्यो भुवनानि प्रचाकशद्व्रतानि देवः सविताभि रक्षते,7.508 |
| Rigvedha_005_0070.wav,मरुतः शृणुता हवम्,2.802 |
| RigVeda_42_0230.wav,अचोदसो नो धन्वन्त्विन्दवः प्र सुवानासो बृहद्दिवेषु हरयः,7.372 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0106.wav,प्रजायै चक्रे त्वा शाले परमेष्ठी प्रजापतिः,5.556 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0400.wav,ब्रह्मास्य शीर्षं बृहदस्य पृष्ठं वामदेव्यमुदरमोदनस्य,6.523 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0145.wav,आज्यं बिभर्ति घृतमस्य रेतः साहस्रः पोषस्तमु यज्ञमाहुः,6.673 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0580.wav,तां देवाः समकल्पयन्न् इयं जीवितवा अलम्,5.101 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0425.wav,मृत्युर्हिङ्कृण्वत्युग्रो देवः,3.991 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0202.wav,अमीवाः सर्वाश्चातयन् नाशयदभिभा इतः,5.144 |
| Atharvaveda_Part_020_10121.wav,स न स्तुतो वीरवद्धातु गोमद्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः,6.231 |
| Rigvedha_012_0089.wav,न म इन्द्रेण सख्यं वि योषदस्मभ्यमस्य दक्षिणा दुहीत,5.754 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0461.wav,आपः सप्त सुस्रुवुर्देवीस्ता नो मुञ्चन्त्वंहसः,5.244 |
| RigVeda_Part_018_0371.wav,ते रायस्पोषं द्रविणान्यस्मे धत्त ऋभवः क्षेमयन्तो न मित्रम्,7.635 |
| RigVeda_53_0146.wav,देव इव सविता स,2.385 |
| Atharvaveda_Part_014_0353.wav,वि तिष्ठन्तां मातुरस्या उपस्थान् नानारूपाः पशवो जायमानाः,7.12 |
| Atharvaveda_Part_017_0126.wav,तुभ्यं यज्ञो वि तायते तुभ्यं जुह्वति जुह्वतस्तवेद्विष्णो बहुधा वीर्याणि,8.401 |
| Atharvaveda_Part_016_0232.wav,तेऽमुष्मै परा वहन्त्वरायान् दुर्णाम्नः सदान्वाः,6.983 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0437.wav,जीवला स्थ जीव्यासं सर्वमायुर्जीव्यासम्,5.124 |
| RigVeda_46_0191.wav,अभ्यानश्म सुवितस्य शूषं नवेदसो अमृतानामभूम,6.531 |
| Rigveda_38_0148.wav,किमिदं वां पुराणवज्जरतोरिव शस्यते,5.146 |
| RigVeda_Part_022_0164.wav,अर्हन्तो ये सुदानवो नरो असामिशवसः,5.391 |
| RigVeda_Part_016_0035.wav,तव प्रणीती तव शूर शर्मन्ना विवासन्ति कवयः सुयज्ञाः,6.975 |
| RigVeda_51_0040.wav,उपस्तिरस्तु सोऽस्माकं यो अस्माँ अभिदासति,8.319 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0217.wav,तांस्त्वं देवि पृश्निपर्ण्यग्निरिवानुदहन्न् इहि,5.143 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0508.wav,पुमांसं पुत्रमा धेहि दशमे मासि सूतवे यजूंषि यज्ञे समिधः स्वाहाग्निः प्रविद्वान् इह वो युनक्तु,10.747 |
| Atharvaveda_Part_020_20357.wav,इन्द्र स्थातर्हरीणां नकिष्ते पूर्व्यस्तुतिम्,4.67 |
| RigVeda_Part_019_0354.wav,तेनेमामुप सिञ्चतम्,2.958 |
| RigVeda_Part_021_0112.wav,महान्तमिन्द्र पर्वतं वि यद्वः सृजो वि धारा अव दानवं हन्,7.231 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0169.wav,अस्माकमिन्द्रः समृतेषु ध्वजेष्वस्माकं या इषवस्ता जयन्तु,6.711 |
| Rigvedha_001_0264.wav,इह त्वष्टारमग्रियं विश्वरूपमुप ह्वये,5.797 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0006.wav,उत्त्वा निर्ऋत्याः पाशेभ्यो दैव्या वचा भरामसि,6.541 |
| Rigveda_37_0284.wav,पदा पणीँरराधसो नि बाधस्व महाँ असि,5.984 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0253.wav,यश्चकार न शशाक कर्तुं शश्रे पादमङ्गुरिम्,4.981 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0229.wav,इन्द्रस्य त्वा वर्मणा परि धापयामो यो देवानामधिराजो बभूव,7.078 |
| Rigvedha_002_0326.wav,त्रिरश्विना सिन्धुभिः सप्तमातृभिस्त्रय आहावास्त्रेधा हविष्कृतम्,6.838 |
| Rigveda_38_0159.wav,अरुणप्सुरुषा अभूदकर्ज्योतिरृतावरी,5.263 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0127.wav,अथर्ववज्ज्योतिषा दैव्येन सत्यं धूर्वन्तमचितं न्योष,7.037 |
| RigVeda_Part_015_0380.wav,मरुत्वाँ इन्द्र वृषभो रणाय पिबा सोममनुष्वधं मदाय,7.0 |
| Rigvedha_012_0255.wav,त्री रोचना दिव्या धारयन्त हिरण्ययाः शुचयो धारपूताः,7.0590625 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0354.wav,वसोर्वसोर्वसुदान एधीन्धानास्त्वा शतंहिमा ऋधेम,6.179 |
| RigVeda_47_0131.wav,तृतीयमप्सु नृमणा अजस्रमिन्धान एनं जरते स्वाधीः,6.54 |
| Rigvedha_002_0190.wav,अस्माकं शिप्रिणीनां सोमपाः सोमपाव्नाम्,6.676 |
| RigVeda_Part_028_0230.wav,कविर्गृहपतिर्युवा,2.867 |
| RigVeda_47_0353.wav,चतुस्त्रिंशता पुरुधा वि,2.474 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0215.wav,प्रतीची दिशामियमिद्वरं यस्यां सोमो अधिपा मृडिता च,5.942 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0464.wav,अघ्न्ये पदवीर्भव ब्राह्मणस्याभिशस्त्या,4.92 |
| Rigveda_36_0204.wav,एवारे वृषभा सुतेऽसिन्वन्भूर्यावयः,6.125 |
| Rigveda_35_0315.wav,दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो,5.375 |
| RigVeda_50_0131.wav,यो अक्षेणेव चक्रिया शचीभिर्विष्वक्तस्तम्भ पृथिवीमुत द्याम्,7.367 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0314.wav,इमां भूमिं पृथिवीं ब्रह्मचारी भिक्षामा जभार प्रथमो दिवं च,7.095 |
| RigVeda_Part_021_0331.wav,होतेव नः प्रथमः पाह्यस्य देव मध्वो ररिमा ते मदाय,7.353 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0257.wav,संशितं क्षत्रमजरमस्तु जिष्णुर्येषामस्मि पुरोहितः,5.426 |
| RigVeda_Part_021_0078.wav,ऋणंचयस्य प्रयता मघानि प्रत्यग्रभीष्म नृतमस्य नृणाम्,6.467 |
| RigVeda_Part_022_0006.wav,अत्यं हविः सचते सच्च धातु चारिष्टगातुः स होता सहोभरिः,7.549 |
| Rigvedha_003_0386.wav,भूरि त इन्द्र वीर्यं तव स्मस्यस्य स्तोतुर्मघवन्काममा पृण,7.517 |
| Rigvedha_001_0420.wav,इन्द्राग्नी शर्म यच्छतम्,3.663 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0165.wav,यथा भूतं च भव्यं च न बिभीतो न रिष्यतः,5.264 |
| RigVeda_Part_016_0103.wav,समान्या वियुते दूरेअन्ते ध्रुवे पदे तस्थतुर्जागरूके,8.027 |
| Rigveda_40_0420.wav,पीतये हरे,1.937 |
| RigVeda_48_0098.wav,त्तुरण्यन्,1.622 |
| RigVeda_Part_025_0220.wav,वधीर्वनेव सुधितेभिरत्कैरा पृत्सु दर्षि नृणां नृतम,6.379 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0509.wav,अकामो धीरो अमृतः स्वयंभू रसेन तृप्तो न कुतश्चनोनः,6.306 |
| RigVeda_Part_025_0338.wav,वर्षीयो वयः कृणुहि शचीभिर्धनस्य सातावस्माँ अविड्ढि,7.044 |
| Rigveda_29_0467.wav,ठैरृतावानो वरुणो मित्रो अग्निः,4.146 |
| Rigvedha_013_0030.wav,स्ता शं च योश्च रुद्रस्य वश्मि,3.638 |
| Rigvedha_003_0418.wav,प्र नू महित्वं वृषभस्य वोचं यं पूरवो वृत्रहणं सचन्ते,6.838 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0176.wav,कृतं मे दक्षिणे हस्ते जयो मे सव्य आहितः,5.032 |
| Rigveda_38_0196.wav,नि होता पूर्व्यः सदः,6.158 |
| Rigveda_41_0098.wav,ईशानः सोम विश्वतः,3.672 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0023.wav,आपो अग्रे विश्वमावन् गर्भं दधाना अमृता ऋतज्ञाः यासु देवीष्वधि देव आसीत्कस्मै देवाय हविषा विधेम,12.794 |
| Atharvaveda_Part_020_30298.wav,शतं जीव शरदो वर्धमानः शतं हेमन्तान् छतमु वसन्तान्,6.842 |
| RigVeda_48_0281.wav,सरस्वान्धीभिर्वरुणो धृतव्रतः पूषा विष्णुर्महिमा वायुरश्विना,7.442 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0022.wav,ववृधानः शवसा भूर्योजाः शत्रुर्दासाय भियसं दधाति,7.098 |
| Rigveda_38_0006.wav,जन्मन्देवानां विशस्त्रिष्वा रोचने दिवः,5.42 |
| Atharvaveda_Part_020_10251.wav,समिन्द्र राया समिषा रभेमहि सं वाजेभिः पुरुश्चन्द्रैरभिद्युभिः,6.501 |
| Rigvedha_002_0135.wav,उक्थैरग्निर्बृहद्भानुः,2.874 |
| Rigvedha_001_0477.wav,इन्द्रज्येष्ठा मरुद्गणा देवासः पूषरातयः,6.35 |
| Rigveda_37_0430.wav,तिष्ठन्ति स्वादुरातयः,3.143 |
| RigVeda_Part_015_0282.wav,इन्द्र क्रतुविदं सुतं सोमं हर्य पुरुष्टुत,4.992 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0179.wav,आप्राद् द्वायापृथिवी अन्तरिक्षं सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च,7.335 |
| RigVeda_51_0075.wav,स नृतमो नहुषोऽस्मत्सुजातः पुरोऽभिनदर्हन्दस्युहत्ये,7.106 |
| RigVeda_48_0154.wav,ये अग्नेः परि जज्ञिरे विरूपासो दिवस्परि,5.421 |
| RigVeda_Part_020_0039.wav,आ यस्ततान रोदसी ऋतेन नित्यं मृजन्ति वाजिनं घृतेन,7.026 |
| RigVeda_51_0167.wav,उद्धर्षय मघवन्नायुधान्युत्सत्वनां मामकानां मनांसि उद्वृत्रहन्वाजिनां वाजिनान्युद्रथानां जयतां यन्तु घोषाः,16.087 |
| RigVeda_44_0274.wav,अनु हि त्वा सुतं सोम मदामसि महे समर्यराज्ये,6.727 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0272.wav,नुदाम एनमप रुध्मो अस्मदादित्या एनमङ्गिरसः सचन्ताम्,6.833 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0120.wav,ब्रह्मणा शालां निमितां कविभिर्निमितां मिताम्,5.502 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0151.wav,तिष्ठावरे तिष्ठ पर उत त्वं तिष्ठ मध्यमे,4.732 |
| Rigveda_41_0180.wav,पवमान विदा रयिमस्मभ्यं सोम दुष्टरम्,5.48 |
| Rigveda_35_0347.wav,हारिद्रवेव पतथो वनेदुप सोमं सुतं महिषेवाव गच्छथः,7.386 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0388.wav,सन्न् उच्छिष्टे असंश्चोभौ मृत्युर्वाजः प्रजापतिः,4.9 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0044.wav,नमस्ते मृत्यो चक्षुषे नमः प्राणाय तेऽकरम्,4.639 |
| Rigvedha_004_0225.wav,त्वे अग्ने सुमतिं भिक्षमाणा दिवि श्रवो दधिरे यज्ञियासः,6.453 |
| Rigvedha_009_0129.wav,आ न ऊर्जं वहतमश्विना युवं मधुमत्या नः कशया मिमिक्षतम्,6.566 |
| RigVeda_Part_017_0133.wav,इदमु त्यन्महि महामनीकं यदुस्रिया सचत पूर्व्यं गौः,7.067 |
| RigVeda_51_0160.wav,गोत्रभिदं गोविदं वज्रबाहुं जयन्तमज्म प्रमृणन्तमोजसा,7.466 |
| RigVeda_51_0011.wav,गोभाज इत्किलासथ यत्सनवथ पूरुषम्,4.527 |
| Rigveda_29_0365.wav,प्र वो महीमरमतिं कृणुध्वं प्र पूषणं विद,4.829 |
| Rigvedha_005_0207.wav,उषस्तमश्यां यशसं सुवीरं दासप्रवर्गं रयिमश्वबुध्यम्,7.194 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0396.wav,देवा वशां पर्यवदन् न नोऽदादिति हीडिताः,5.264 |
| RigVeda_Part_022_0159.wav,ते यामन्ना धृषद्विनस्त्मना पान्ति शश्वतः,5.383 |
| Rigveda_38_0494.wav,महीव कृत्तिः शरणा त इन्द्र प्र ते सुम्ना नो अश्नवन्,7.176 |
| Rigveda_34_0295.wav,यदध्रिगावो अध्रिगू इदा चिदह्नो अश्विना हवामहे,7.413 |
| RigVeda_52_0369.wav,देवीः षळुर्वीरुरु नः कृणोत विश्वे देवास इह वीरयध्वम्,7.412 |
| Atharvaveda_Part_020_20274.wav,सो अस्य कामं विधतो न रोषति मनो दानाय चोदयन्,6.245 |
| Rigveda_32_0286.wav,सनादमृक्तो दयते,2.58 |
| RigVeda_42_0333.wav,सहस्रधारः परि कोशमर्षति वृषा पवित्रमत्येति रोरुवत्,7.188 |
| RigVeda_Part_023_0272.wav,विश्वा वामानि धीमहि,3.276 |
| RigVeda_Part_018_0301.wav,आ तू न इन्द्र वृत्रहन्नस्माकमर्धमा गहि,5.162 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0295.wav,अनडुद्भ्यस्त्वं प्रथमं धेनुभ्यस्त्वमरुन्धति,4.013 |
| Rigveda_30_0321.wav,प्रति वां सूर उदिते मित्रं गृणीषे वरुणम्,5.293 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0488.wav,संदृष्टा गुप्ता वः सन्तु या नो मित्राण्यर्बुदे,5.216 |
| RigVeda_48_0325.wav,पश्चा मृधो अप भवन्तु विश्वास्तद्रोदसी शृणुतं विश्वमिन्वे,6.702 |
| RigVeda_Part_024_0368.wav,उदावता त्वक्षसा पन्यसा च वृत्रहत्याय रथमिन्द्र तिष्ठ,6.904 |
| Rigvedha_009_0210.wav,यदश्वस्य क्रविषो मक्षिकाश यद्वा स्वरौ स्वधितौ रिप्तमस्ति,6.319 |
| Rigvedha_011_0089.wav,अनर्वाणो अभि ये चक्षते नोऽपीवृता अपोर्णुवन्तो अस्थुः,6.693 |
| RigVeda_46_0239.wav,अधि पुत्रोपमश्रवो नपान्मित्रातिथेरिहि,4.697 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0154.wav,पश्यन् जन्मानि सूर्य सप्त त्वा हरितो रथे वहन्ति देव सूर्य शोचिष्केशं विचक्षणम्,10.462 |
| RigVeda_50_0361.wav,त्वंत्वमहर्यथा उपस्तुतः पूर्वेभिरिन्द्र हरिकेश यज्वभिः,6.04 |
| Atharvaveda_Part_017_0084.wav,विषासहिं सहमानं सासहानं सहीयांसम्,5.485 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0285.wav,एतद्वा उ स्वादीयो यदधिगवं क्षीरं वा मांसं वा तदेव नाश्नीयात् स य एवं विद्वान् क्षीरमुपसिच्योपहरति,14.035 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0359.wav,यदन्नमद्मि बहुधा विरूपं हिरण्यमश्वमुत गामजामविम्,5.582 |
| Rigveda_37_0342.wav,सचा सोमेषु पुरुहूत वज्रिवो मदाय द्युक्ष सोमपाः त्वमिद्धि ब्रह्मकृते काम्यं वसु देष्ठः सुन्वते भुवः,13.545 |
| Rigveda_40_0290.wav,पृथिवीमिव,1.695 |
| Atharvaveda_Part_020_20482.wav,एवा ह्यस्य काम्या स्तोम उक्थं च शंस्या,5.731 |
| Rigveda_36_0269.wav,त्रिधातु यद्वरूथ्यं तदस्मासु वि यन्तनानेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः,10.508 |
| Rigvedha_013_0357.wav,नृपेशसो विदथेषु प्र जाता अभीमं यज्ञं वि चरन्त पूर्वीः,9.9380625 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0583.wav,गात्राण्यस्य वर्धन्तामंशुरिवा प्यायतामयम्,5.242 |
| Rigveda_34_0305.wav,मनोजवसा वृषणा मदच्युता मक्षुंगमाभिरूतिभिः,6.174 |
| RigVeda_Part_021_0329.wav,पिता माता मधुवचाः सुहस्ता भरेभरे नो यशसावविष्टाम्,7.334 |
| RigVeda_48_0271.wav,देवान्वसिष्ठो अमृतान्ववन्दे ये विश्वा भुवनाभि प्रतस्थुः,7.094 |
| RigVeda_48_0185.wav,य ईशिरे भुवनस्य प्रचेतसो विश्वस्य स्थातुर्जगतश्च मन्तवः,7.668 |
| Rigvedha_003_0143.wav,पातं सोमस्य धृष्णुया,2.86 |
| Rigveda_38_0276.wav,शता च शूर गोनाम्,2.864 |
| Atharvaveda_Part_016_0239.wav,वैश्वानरस्यैनं दंष्ट्रयोरपि दधामि,4.724 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0034.wav,आदु ष्टेनमथो अहिं यातुधानमथो वृकम्,4.243 |
| Rigveda_30_0042.wav,राया युजा सधमादो अरिष्टा यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः,7.083 |
| Atharvaveda_Part_020_10159.wav,जने मित्रो न दम्पती अनक्ति बृहस्पते वाजयाशूंरिवाजौ,6.506 |
| RigVeda_Part_021_0099.wav,त्वमपो यदवे तुर्वशायारमयः सुदुघाः पार इन्द्र,6.403 |
| Atharvaveda_Part_020_30094.wav,शिक्षेयमिन् महयते दिवेदिवे राय आ कुहचिद्विदे,6.096 |
| RigVeda_Part_015_0374.wav,प्र मात्राभी रिरिचे रोचमानः प्र देवेभिर्विश्वतो अप्रतीतः,7.369 |
| RigVeda_Part_023_0008.wav,आ वामश्वासः सुयुजो वहन्तु यतरश्मय उप यन्त्वर्वाक्,6.95 |
| Rigveda_36_0009.wav,येन दृळ्हा समत्स्वा वीळु चित्साहिषीमह्यग्निर्वनेव वात इन्नभन्तामन्यके समे,9.959 |
| Rigvedha_005_0208.wav,सुदंससा श्रवसा या विभासि वाजप्रसूता सुभगे बृहन्तम्,6.526 |
| Rigveda_35_0213.wav,वयं घा ते अपि ष्मसि स्तोतार इन्द्र गिर्वणः,5.662 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0237.wav,तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम्,5.297 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0016.wav,यास्ते रुहः प्ररुहो यास्त आरुहो याभिरापृणासि दिवमन्तरिक्षम्,6.576 |
| RigVeda_49_0085.wav,अप ध्वान्तमूर्णुहि पूर्धि चक्षुर्मुमुग्ध्यस्मान्निधयेव बद्धान्,8.662 |
| Rigvedha_001_0095.wav,शं ते सन्तु प्रचेतसे,4.135 |
| Atharvaveda_Part_020_10415.wav,यः शस्वतो मह्येनो दधानान् अमन्यमानां छर्वा जघान,6.682 |
| RigVeda_Part_020_0371.wav,अग्निर्ददाति सत्पतिं सासाह यो युधा नृभिः,5.406 |
| Atharvaveda_Part_020_10237.wav,इन्द्रो अङ्गं महद्भयमभि षदप चुच्यवत्,4.392 |
| RigVeda_42_0096.wav,व्रतानि पानो अमृतस्य चारुण उभे नृचक्षा अनु पश्यते विशौ,7.084 |
| RigVeda_Part_022_0334.wav,वयो न ये श्रेणीः पप्तुरोजसान्तान्दिवो बृहतः सानुनस्परि,7.524 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0202.wav,यस्य स्थ तमत्त यो वो प्राहैत्तमत्त स्वा मांसान्यत्त,6.195 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0144.wav,यं वा वसो यमात्स्यस्तेनासि विश्वभेषजः,4.686 |
| Rig_veda_45_0414.wav,अभिक्रन्दन्वृषायसे वि वो मदे गर्भं दधासि जामिषु विवक्षसे,7.007 |
| Rig_veda_45_0435.wav,पुरुत्रा ते वि पूर्तयो नवन्त क्षोणयो यथा,5.429 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0004.wav,औदुम्बरो वृषा मणिः सं मा सृजतु पुष्ट्या,5.109 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0550.wav,तौ पक्षौ देवि कृत्वा सा पक्तारं दिवं वह उलूखले मुसले यश्च चर्मणि यो वा शूर्पे तण्डुलः कणः यं वा वातो मातरिश्वा पवमानो ममाथाग्निष्टद्धोता सुहुतं कृणोतु,18.764 |
| RigVeda_Part_015_0003.wav,तितिक्षन्ते अभिशस्तिं जनानामिन्द्र त्वदा कश्चन हि प्रकेतः,6.796 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0485.wav,ओते मे द्यावापृथिवी ओता देवी सरस्वती,5.954 |
| Rigvedha_008_0203.wav,अर्चामि सुम्नयन्नहमन्त्यूतिं मयोभुवम्,5.209 |
| RigVeda_52_0028.wav,ध्वान्तं तमोऽव दध्वसे हत इन्द्रो मह्ना पूर्वहूतावपत्यत,7.655 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0142.wav,ताभ्यामेनं प्राशिषं ताभ्यामेनमजीगमम्,5.554 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0046.wav,सेतोऽष्टापदी भूत्वा पुनः परेहि दुछुने,6.628 |
| Rigveda_35_0309.wav,स्मत्पुरंधिर्न आ गहि विश्वतोधीर्न ऊतये दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो,11.864 |
| Rigvedha_010_0006.wav,अभीपतो वृष्टिभिस्तर्पयन्तं सरस्वन्तमवसे जोहवीमि,5.949 |
| Atharvaveda_Part_014_0330.wav,तामर्यमा भगो अश्विनोभा प्रजापतिः प्रजया वर्धयन्तु,6.143 |
| RigVeda_47_0380.wav,स्वां प्रजां पितरः पित्र्यं सह आवरेष्वदधुस्तन्तुमाततम्,7.009 |
| Rigveda_38_0441.wav,पिबतं घर्मं मधुमन्तमश्विना बर्हिः सीदतं नरा,6.571 |
| RigVeda_44_0196.wav,पुरूणि बभ्रो नि चरन्ति मामव परिधीँरति ताँ इहि,6.782 |
| Rigveda_39_0140.wav,य एक इन्नर्यपांसि कर्ता स वृत्रहा प्रतीदन्यमाहुः,7.204 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0264.wav,य आशानामाशापालाश्चत्वार स्थन देवाः,5.801 |
| Atharvaveda_Part_020_30270.wav,वयं राजभिः प्रथमा धनान्यस्माकेन वृजनेना जयेम,6.157 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0047.wav,नीचैः सपत्नान् मम पादय त्वमभिष्टुतो महता वीर्येण,6.749 |
| Rigvedha_013_0082.wav,सो अपां नपादूर्जयन्नप्स्वन्तर्वसुदेयाय विधते वि भाति,9.0290625 |
| Rigvedha_008_0018.wav,नेषि णो यथा पुरानेनाः शूर मन्यसे,5.69 |
| Rig_veda_45_0075.wav,आपो अद्यान्वचारिषं रसेन समगस्महि,5.446 |
| RigVeda_Part_028_0276.wav,ताँ अंहसः पिपृहि पर्तृभिष्ट्वं शतं पूर्भिर्यविष्ठ्य,6.632 |
| RigVeda_Part_017_0045.wav,शुचन्तो अग्निं ववृधन्त इन्द्रमूर्वं गव्यं परिषदन्तो अग्मन्,8.352 |
| RigVeda_46_0181.wav,अध्वर्युभिर्मनसा संविदाना इन्द्राय सोमं सुषुतं भरन्तीः,7.471 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0290.wav,उत्कूलमुद्वहो भवोदुह्य प्रति धावतात्,4.681 |
| Rigveda_41_0163.wav,पवस्व वाचो अग्रियः सोम चित्राभिरूतिभिः,5.632 |
| Atharvaveda_Part_020_20308.wav,गिरींरज्रामपः स्वर्वृषत्वना,4.182 |
| RigVeda_43_0081.wav,विश्ववारो द्रविणोदा इव त्मन्पूषेव धीजवनोऽसि सोम,7.05 |
| RigVeda_51_0224.wav,इर्येव पुष्ट्यै किरणेव भुज्यै श्रुष्टीवानेव हवमा गमिष्टम्,6.761 |
| RigVeda_Part_018_0271.wav,कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृधः सखा,5.618 |
| RigVeda_Part_022_0281.wav,मरुतां पुरुतममपूर्व्यं गवां सर्गमिव ह्वये,5.861 |
| RigVeda_46_0166.wav,यो वो वृताभ्यो अकृणोदु लोकं यो वो मह्या अभिशस्तेरमुञ्चत्,8.017 |
| RigVeda_Part_023_0424.wav,सो अग्न ईजे शशमे च मर्तो यस्त आनट् समिधा हव्यदातिम्,6.921 |
| RigVeda_Part_020_0117.wav,जातवेदो यशो अस्मासु धेहि प्रजाभिरग्ने अमृतत्वमश्याम्,7.592 |
| Rigvedha_006_0201.wav,तक्षन्रथं सुवृतं विद्मनापसस्तक्षन्हरी इन्द्रवाहा वृषण्वसू,8.051 |
| RigVeda_Part_025_0341.wav,मा जस्वने वृषभ नो ररीथा मा ते रेवतः सख्ये रिषाम,6.393 |
| Atharvaveda_Part_020_20250.wav,अर्वावतो न आ गह्यथो शक्र परावतः,4.667 |
| Atharvaveda_Part_020_40211.wav,यत्रामूस्तिस्रः शिंशपाः,3.667 |
| Rigvedha_007_0350.wav,स हि शर्धो न मारुतं तुविष्वणिरप्नस्वतीषूर्वरास्विष्टनिरार्तनास्विष्टनिः,8.584 |
| Rigveda_36_0092.wav,यदग्ने दिविजा अस्यप्सुजा वा सहस्कृत,5.014 |
| Rig_veda_54_0178.wav,वातजूतो यो अभिरक्षति त्मना प्रजाः पुपोष पुरुधा वि राजति,7.64 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0037.wav,परि त्वा धात्सविता देवो अग्निर्वर्चसा मित्रावरुणावभि त्वा,6.831 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0148.wav,यो विश्वजिद्विश्वभृद्विश्वकर्मा घर्मं नो ब्रूत यतमश्चतुष्पात्,6.799 |
| RigVeda_42_0278.wav,था पदमस्य रक्षति पाति देवानां जनिमान्यद्भुतः,6.159 |
| RigVeda_48_0105.wav,अग्निर्ह नामोत जातवेदाः श्रुधी नो होतरृतस्य होताध्रुक्,7.41 |
| Rigvedha_002_0382.wav,ऊर्ध्व ऊ षु ण ऊतये तिष्ठा देवो न सविता,5.474 |
| RigVeda_50_0095.wav,मायामू तु यज्ञियानामेतामपो यत्तूर्णिश्चरति प्रजानन्,6.983 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0284.wav,शिवेन मा चक्षुषा पश्यतापः शिवया तन्वोप स्पृशत त्वचं मे,6.958 |
| Rig_veda_54_0137.wav,संयोपयन्तो दुरितानि विश्वा हित्वा न ऊर्जं प्र पतात्पतिष्ठः,6.604 |
| Rigvedha_013_0135.wav,पुनः समव्यद्विततं वयन्ती मध्या कर्तोर्न्यधाच्छक्म धीरः,7.0490625 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0291.wav,तस्मा उषा हिङ्कृणोति सविता प्र स्तौति,4.874 |
| Rig_veda_54_0046.wav,अहं तद्विद्वला पतिमभ्यसाक्षि विषासहिः,4.885 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0157.wav,एवा मे प्राण मा बिभेः,3.92 |
| Rigvedha_008_0363.wav,स ईं मृगो अप्यो वनर्गुरुप त्वच्युपमस्यां नि धायि,6.97 |
| RigVeda_46_0080.wav,कतरो मेनिं प्रति तं मुचाते य ईं वहाते य ईं वा वरेयात्,7.42 |
| Rigvedha_013_0101.wav,यज्ञैः सम्मिश्लाः पृषतीभिरृष्टिभिर्यामञ्छुभ्रासो अञ्जिषु प्रिया उत,8.4190625 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0503.wav,दिशो धेनवस्तासां चन्द्रो वत्सः,3.805 |
| Rigveda_36_0045.wav,अस्तभ्नाद्द्यामसुरो विश्ववेदा अमिमीत वरिमाणं पृथिव्याः आसीदद्विश्वा भुवनानि सम्राड्विश्वेत्तानि वरुणस्य व्रतानि,16.958 |
| RigVeda_49_0153.wav,वर्मण्वन्तो न योधाः शिमीवन्तः,3.93 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0387.wav,एकं यदङ्गमकृणोत्सहस्रधा कियता स्कम्भः प्र विवेश तत्र,6.538 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0200.wav,आ त्वा स्वो विशतां वर्णः परा शुक्लानि पातय,5.899 |
| Rigveda_34_0197.wav,मंहिष्ठो अर्यः सत्पतिः,3.371 |
| RigVeda_52_0130.wav,जरमाणः समिध्यसे देवेभ्यो हव्यवाहन,5.388 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0061.wav,स्वस्ति भूमे नो भव मा विदन् परिपन्थिनो वरीयो यावया वधम्,6.392 |
| RigVeda_Part_024_0080.wav,आ भानुना पार्थिवानि ज्रयांसि महस्तोदस्य धृषता ततन्थ,6.863 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0540.wav,क्रव्यादो वातरंहस आ सजन्त्वमित्रान् वज्रेण त्रिषन्धिना,6.76 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0173.wav,स उत्तिष्ठ प्रेहि प्र द्रव रथः सुचक्रः सुपविः सुनाभिः प्रति तिष्ठोर्ध्वः यदि कर्तं पतित्वा संशश्रे यदि वाश्मा प्रहृतो जघान ऋभू रथस्येवाङ्गानि सं दधत्परुषा परुः,18.541 |
| Rigvedha_004_0259.wav,अग्ने यक्षि स्वं दमम्,2.836 |
| Rig_veda_54_0196.wav,पितुभृतो न तन्तुमित्सुदानवः प्रति दध्मो यजामसि,5.653 |
| RigVeda_Part_019_0299.wav,अभूद्देवः सविता वन्द्यो नु न इदानीमह्न उपवाच्यो नृभिः,7.561 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0019.wav,यद्दुर्भगां प्रस्नपितां मृतवत्सामुपेयिम,4.903 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0223.wav,इदं वामन्धः परिषिक्तमासद्यास्मिन् बर्हिषि मादयेथाम्,5.806 |
| RigVeda_47_0260.wav,विश्वासु धूर्षु वाजकृत्येषु,3.013 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0006.wav,स हि विदः स पृथिव्या ऋतस्था मही क्षेमं रोदसी अस्कभायत्,5.981 |
| Rigveda_40_0651.wav,पवमान विदा रयिमस्मभ्यं सोम सुश्रियम्,5.195 |
| RigVeda_Part_024_0363.wav,स तोकसाता तनये स वज्री वितन्तसाय्यो अभवत्समत्सु,7.03 |
| RigVeda_Part_016_0120.wav,देवानां दूतः पुरुध प्रसूतोऽनागान्नो वोचतु सर्वताता,8.324 |
| Atharvaveda_Part_020_30005.wav,यद्गव्यन्ता द्वा जना स्वर्यन्ता समूहसि,6.852 |
| RigVeda_43_0199.wav,इन्द्रायेन्दो पवमानो मनीष्यंशोरूर्मिमीरय गा इषण्यन्,9.258 |
| Rigveda_40_0301.wav,त्वा वाजिनं नरो धीभिर्विप्रा अवस्यवः,5.368 |
| Rigveda_33_0441.wav,इन्द्रः सूर्यस्य रश्मिभिर्न्यर्शसानमोषति,5.263 |
| Rigvedha_002_0030.wav,नहि ते क्षत्रं न सहो न मन्युं वयश्चनामी पतयन्त आपुः,6.829 |
| RigVeda_47_0058.wav,अस्तेव सु प्रतरं लायमस्यन्भूषन्निव प्र भरा स्तोममस्मै,7.405 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0131.wav,अग्ने तिग्मेन शोचिषा तपुरग्राभिरर्चिभिः,5.041 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0129.wav,तेनैनं प्राशिषं तेनैनमजीगमम्,4.611 |
| Rigvedha_010_0321.wav,दिशं न दिष्टामृजूयेव यन्ता मे हवं नासत्योप यातम्,6.226 |
| Rigveda_35_0424.wav,इमा जुषेथां सवना येभिर्हव्यान्यूहथुः,5.846 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0369.wav,सर्वान् कामान् यमराज्ये वशा प्रददुषे दुहे,5.96 |
| RigVeda_47_0120.wav,गिरीँरज्रान्रेजमानाँ अधारयद्द्यौः क्रन्ददन्तरिक्षाणि कोपयत्,8.306 |
| Rigveda_40_0305.wav,चारुरृताय पीतये,3.244 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0390.wav,दृढो दृंह स्थिरो न्यो ब्रह्म विश्वसृजो दश,4.736 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0073.wav,इतः पश्यन्ति रोचनं दिवि सूर्यं विपश्चितम्,4.73 |
| RigVeda_48_0297.wav,दैव्या होतारा प्रथमा पुरोहित ऋतस्य पन्थामन्वेमि साधुया,7.897 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0286.wav,रश्मिभिर्नभ आभृतं महेन्द्र एत्यावृतः,4.529 |
| Rigveda_37_0129.wav,एक एवाग्निर्बहुधा समिद्ध एकः सूर्यो विश्वमनु,6.539 |
| Rigvedha_012_0116.wav,तमु स्तुष इन्द्रं तं गृणीषे यस्मिन्पुरा वावृधुः शाशदुश्च,6.491 |
| Rigveda_39_0288.wav,द्रुणा॑ सधस्थमासदत् वरिवोधातमो भव मंहि,6.291 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0417.wav,अष्टेन्द्रस्य षड्यमस्य ऋषीणां सप्त सप्तधा,5.734 |
| RigVeda_Part_020_0256.wav,स यक्षद्दैव्यं जनम्,3.289 |
| Rigveda_40_0626.wav,साह्वांसो दस्युमव्रतम्,3.747 |
| RigVeda_Part_022_0176.wav,अधा नरो न्योहतेऽधा नियुत ओहते,5.262 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0362.wav,प्रति सूर्यस्य पुरुधा च रश्मीन् प्रति द्यावापृथिवी आ ततान,6.292 |
| RigVeda_Part_026_0258.wav,दशस्यन्तो दिव्याः पार्थिवासो गोजाता अप्या मृळता च देवाः,9.755 |
| RigVeda_Part_023_0234.wav,साकं सूर्यस्य रश्मिभिः शुक्रैः शोचद्भिरर्चिभिः सुजाते अश्वसूनृते,7.786 |
| RigVeda_Part_027_0204.wav,स्तुतश्च वां माध्वी सुष्टुतिश्च रसाश्च ये वामनु रातिमग्मन्,7.58 |
| Rigveda_40_0343.wav,पवमानः सहस्रिणम्,2.922 |
| Rigveda_36_0244.wav,दानासः पृथुश्रवसः कानीतस्य सुराधसः,5.963 |
| RigVeda_48_0115.wav,दिष्ठो रपति प्र वेनन्,2.6 |
| RigVeda_Part_028_0093.wav,निर्यत्पूतेव स्वधितिः शुचिर्गात्स्वया कृपा तन्वा रोचमानः,9.468 |
| Rigvedha_001_0153.wav,विप्रासो वा धियायवः,3.621 |
| Rigveda_35_0120.wav,देवासो हि ष्मा मनवे समन्यवो विश्वे साकं सरातयः,7.243 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0306.wav,मह्यमापो मधुमदेरयन्तां मह्यं सूरो अभरज्ज्योतिषे कम्,6.294 |
| RigVeda_Part_018_0019.wav,अधा निविद्ध उत्तरो बभूवाञ्छिरो दासस्य सं पिणग्वधेन,7.126 |
| RigVeda_51_0110.wav,इष्कृणुध्वमायुधारं कृणुध्वं प्राञ्चं यज्ञं प्र णयता सखायः युनक्त सीरा वि युगा तनुध्वं कृते योनौ वपतेह बीजम्,14.506 |
| Atharvaveda_Part_020_20148.wav,रोचन्ते रोचना दिवि,2.758 |
| Rigvedha_013_0017.wav,प्र बभ्रवे वृषभाय श्वितीचे महो महीं सुष्टुतिमीरयामि,6.6470625 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0055.wav,विमृग्वरीं पृथिवीमा वदामि क्षमां भूमिं ब्रह्मणा वावृधानाम्,6.914 |
| Rigvedha_004_0382.wav,असंयत्तो व्रते ते क्षेति पुष्यति भद्रा शक्तिर्यजमानाय सुन्वते,8.416 |
| Rig_veda_54_0327.wav,अन्तश्चरति रोचनास्य प्राणादपानती,5.162 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0497.wav,अभिभूर्यज्ञो अभिभूरग्निरभिभूः सोमो अभिभूरिन्द्रः,5.984 |
| Rigvedha_009_0088.wav,अनक्ति यद्वां विदथेषु होता सुम्नं वां सूरिर्वृषणावियक्षन्,7.483 |
| Rigveda_39_0033.wav,ष्विन्द्र भूषसि अरं ते शक्र दावने,5.739 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0346.wav,येनावपत्सविता क्षुरेण सोमस्य राज्ञो वरुणस्य विद्वान्,5.921 |
| Rigveda_29_0433.wav,ताँ अध्वर उशतो यक्ष्यग्ने श्रु,4.012 |
| Rigvedha_003_0168.wav,कण्वासो वां ब्रह्म कृण्वन्त्यध्वरे तेषां सु शृणुतं हवम्,6.727 |
| Rigvedha_010_0294.wav,अभूदिदं वयुनमो षु भूषता रथो वृषण्वान्मदता मनीषिणः,7.145 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0204.wav,तत्कङ्कपर्वणो विषमियं वीरुदनीनशत्,4.013 |
| Rigvedha_009_0150.wav,देवेभिर्ये देवपुत्रे सुदंससेत्था धिया वार्याणि प्रभूषतः,7.537 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0149.wav,एवा सपत्नान् मे भङ्ग्धि पूर्वान् जातामुतापरान् वरणस्त्वाभि रक्षतु,8.202 |
| Rigvedha_010_0042.wav,ऐधेव यामन्मरुतस्तुविष्वणो युधेव शक्रास्तविषाणि कर्तन,6.875 |
| Rigveda_31_0283.wav,अधि यदपां स्नुभिश्चराव प्र प्रेङ्ख ईङ्खयावहै शुभे कम्,7.146 |
| Rigvedha_001_0470.wav,जज्ञाना पूतदक्षसा,3.349 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0176.wav,जरायै त्वा परि ददामि जरायै नि धुवामि त्वा,5.062 |
| RigVeda_42_0172.wav,दिवो य स्कम्भो धरुणः स्वातत आपूर्णो अंशुः पर्येति विश्वतः,7.419 |
| RigVeda_46_0296.wav,तन्नो देवा यच्छत सुप्रवाचनं छर्दिरादित्याः सुभरं नृपाय्यम्,8.217 |
| Atharvaveda_Part_020_10120.wav,एवेदिन्द्रं वृषणं वज्रबाहुं वसिष्ठासो अभ्यर्चन्त्यर्कैः,6.213 |
| Rigveda_34_0172.wav,यदी घृतेभिराहुतो वाशीमग्निर्भरत उच्चाव च,6.997 |
| RigVeda_48_0039.wav,ज्योक्पश्येम सूर्यमुच्चरन्तमनुमते मृळया नः स्वस्ति,6.17 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0037.wav,चिदेवापि गच्छतात्,2.807 |
| Rigvedha_001_0451.wav,अतो देवा अवन्तु नो यतो विष्णुर्विचक्रमे,6.062 |
| Rigvedha_006_0181.wav,तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः,7.345 |
| Atharvaveda_Part_020_40163.wav,कतरत्त आ हराणि दधि मन्थां परि श्रुतम्,4.813 |
| Rigvedha_007_0389.wav,स नस्त्रासते वरुणस्य धूर्तेर्महो देवस्य धूर्तेः,7.046 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0463.wav,आदाय जीतं जीताय लोकेऽमुष्मिन् प्र यच्छसि,5.954 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0219.wav,ताभ्यामेनं प्राशिषं ताभ्यामेनमजीगमम्,5.382 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0165.wav,ग्राहिर्जग्राह यद्येतदेनं तस्या इन्द्राग्नी प्र मुमुक्तमेनम्,7.167 |
| Rigveda_39_0079.wav,यदिन्द्र मृळयासि नः स नो विश्वान्या भर सुवितानि शतक्रतो,8.359 |
| Rigveda_35_0193.wav,देवानां य इन्मनो यजमान इयक्षत्यभीदयज्वनो भुवत्,6.57 |
| RigVeda_49_0362.wav,प्रिया तष्टानि मे कपिर्व्यक्ता व्यदूदुषत्,4.84 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0122.wav,विद्म ते धाम परमं गुहा यत्समुद्रे अन्तर्निहितासि नाभिः,6.512 |
| RigVeda_Part_024_0016.wav,क्रत्वा हि द्रोणे अज्यसेऽग्ने वाजी न कृत्व्यः,5.954 |
| Rigveda_36_0044.wav,स धाम पूर्व्यं ममे य स्कम्भेन वि रोदसी अजो न द्यामधारयन्नभन्तामन्यके समे,10.906 |
| Rig_veda_45_0319.wav,अयं देवो बृहस्पतिः सं तं सिञ्चतु राधसे,5.058 |
| Rig_veda_54_0330.wav,प्रति वस्तोरह द्युभिः,2.537 |
| Atharvaveda_Part_020_30042.wav,ते अन्यामन्यां नद्यं सनिष्णत श्रवस्यन्तः सनिष्णत,5.964 |
| Rigvedha_014_0238.wav,इध्मेनाग्न इच्छमानो घृतेन जुहोमि हव्यं तरसे बलाय,7.1880625 |
| Rigvedha_012_0201.wav,ऋतावानः प्रतिचक्ष्यानृता पुनरात आ तस्थुः कवयो महस्पथः,6.932 |
| RigVeda_46_0286.wav,श्रेष्ठं नो अद्य सवितर्वरेण्यं भागमा सुव स हि रत्नधा असि,7.747 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0244.wav,नहि ते अग्ने तन्वः क्रूरमानंश मर्त्यः,4.348 |
| Rigvedha_008_0178.wav,त्ववपानेष्वाभगो देवो देवेष्वाभगः,5.165 |
| RigVeda_Part_015_0290.wav,गिर्वणः पाहि नः सुतं मधोर्धाराभिरज्यसे,5.505 |
| RigVeda_53_0120.wav,आ त्वागमं शंतातिभिरथो अरिष्टतातिभिः,7.137 |
| Rigveda_41_0317.wav,पवित्रेण सवेन च मां पुनीहि विश्वतः,5.824 |
| Rigvedha_008_0089.wav,रिष्टं न यामन्नप भूतु दुर्मतिर्विश्वाप भूतु दुर्मतिः,5.713 |
| RigVeda_49_0269.wav,मनो अस्या अन आसीद्द्यौरासीदुत च्छदिः,5.27 |
| RigVeda_50_0295.wav,न्यङ्नि यन्त्युपरस्य निष्कृतं पुरू रेतो दधिरे सूर्यश्वितः,7.114 |
| Rigvedha_002_0224.wav,त्वमग्ने वृजिनवर्तनिं नरं सक्मन्पिपर्षि विदथे विचर्षणे,6.452 |
| RigVeda_Part_025_0226.wav,पुरा नूनं च स्तुतय ऋषीणां पस्पृध्र इन्द्रे अध्युक्थार्का,6.783 |
| Rigvedha_014_0207.wav,अच्छिद्रा शर्म जरितः पुरूणि देवाँ अच्छा दीद्यानः सुमेधाः रथो न सस्निरभि वक्षि वाजमग्ने त्वं रोदसी नः सुमेके,14.671 |
| RigVeda_Part_023_0264.wav,न मिनन्ति स्वराज्यम्,3.159 |
| RigVeda_Part_017_0267.wav,यं सीमकृण्वन्तमसे विपृचे ध्रुवक्षेमा अनवस्यन्तो अर्थम्,8.172 |
| Atharvaveda_Part_014_0289.wav,अहं वि ष्यामि मयि रूपमस्या वेददित्पश्यन् मनसः कुलायम्,6.243 |
| Rigveda_37_0055.wav,यस्मै त्वं वसो दानाय मंहसे स रायस्पोषमिन्वति,6.471 |
| RigVeda_48_0103.wav,वि शुष्णस्य संग्रथितमनर्वा विदत्पुरुप्रजातस्य गुहा यत्,5.945 |
| Atharvaveda_Part_018_1_0169.wav,न ते नाथं यम्यत्राहमस्मि न ते तनूं तन्वा सं पपृच्याम्,8.354 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0063.wav,स्वपन्त्वस्यै ज्ञातयः स्वप्त्वयमभितो जनः,4.425 |
| Rigvedha_002_0012.wav,आपः पृणीत भेषजं वरूथं तन्वे मम,8.068 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0146.wav,भ्राजन्तो अग्नयो यथा,3.255 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0392.wav,प्र यदग्नेः सहस्वतो विश्वतो यन्ति भानवः अप नः शोशुचदघम्,7.013 |
| Rigveda_29_0003.wav,प्र यन्ति यज्ञं विपयन्ति बर्हिः सोममादो विदथे दुध्रवाचः,7.4 |
| Rigvedha_013_0372.wav,बर्हिर्न आस्तामदितिः सुपुत्रा स्वाहा देवा अमृता मादयन्ताम्,9.352 |
| Atharvaveda_Part_020_20465.wav,इन्द्रं वो विश्वतस्परि हवामहे जनेभ्यः अस्माकमस्तु केवलः,7.305 |
| RigVeda_Part_025_0271.wav,वर्धाद्यं यज्ञ उत सोम इन्द्रं वर्धाद्ब्रह्म गिर उक्था च मन्म,6.812 |
| Rigvedha_004_0108.wav,धनस्पृतमुक्थ्यं विश्वचर्षणिं तोकं पुष्येम तनयं शतं हिमाः,7.505 |
| Rigveda_31_0308.wav,गव्यं चिदूर्वमुशिजो वि वव्रुस्तेषामनु,4.796 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0365.wav,ततो हिरन्ययो बिन्दुस्ततो दर्भो अजायत,6.874 |
| RigVeda_Part_026_0169.wav,आ यः पप्रौ भानुना रोदसी उभे धूमेन धावते दिवि,7.109 |
| Rigveda_38_0128.wav,परि द्यां जिह्वयातनत्,3.378 |
| Rigveda_40_0044.wav,समिद्धो विश्वतस्पतिः पवमानो वि राजति,5.134 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0073.wav,तवेमे पञ्च पशवो विभक्ता गावो अश्वाः पुरुषा अजावयः तव चतस्रः प्रदिशस्तव द्यौस्तव पृथिवी तवेदमुग्रोर्वन्तरिक्षम्,14.015 |
| RigVeda_Part_018_0390.wav,ये अश्विना ये पितरा य ऊती धेनुं ततक्षुरृभवो ये अश्वा,7.467 |
| RigVeda_Part_016_0252.wav,देवं नरः सवितारं विप्रा यज्ञैः सुवृक्तिभिः,5.769 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0264.wav,अथो यद्भेषजं तव तस्य नो धेहि जीवसे,4.91 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0603.wav,येभिः पाशैः परिवित्तो विबद्धोऽङ्गेअङ्ग आर्पित उत्सितश्च,6.473 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0232.wav,अथर्वा पूर्णं चमसं यमिन्द्रायाबिभर्वाजिनीवते,6.054 |
| RigVeda_47_0379.wav,द्विधा सूनवोऽसुरं स्वर्विदमास्थापयन्त तृतीयेन कर्मणा,8.151 |
| Rigvedha_006_0186.wav,तत्सविता वोऽमृतत्वमासुवदगोह्यं यच्छ्रवयन्त ऐतन,7.156 |
| RigVeda_50_0015.wav,न सेशे यस्य रोमशं निषेदुषो विजृम्भते,5.274 |
| RigVeda_47_0173.wav,तमायवः शुचयन्तं पावकं मन्द्रं होतारं दधिरे यजिष्ठम्,7.061 |
| RigVeda_Part_017_0155.wav,परि त्मना मितद्रुरेति होताग्निर्मन्द्रो मधुवचा ऋतावा,7.36 |
| Rigvedha_007_0225.wav,जनो यः पज्रेभ्यो वाजिनीवानश्वावतो रथिनो मह्यं सूरिः,7.753 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0273.wav,अस्मांस्त्रायस्व नर्याणि जाता अथो यानि गव्यानि पुष्ट्या,6.935 |
| RigVeda_Part_019_0346.wav,गामश्वं पोषयित्न्वा स नो मृळातीदृशे,5.538 |
| Rigvedha_012_0043.wav,प्र वः सतां ज्येष्ठतमाय सुष्टुतिमग्नाविव समिधाने हविर्भरे,6.803 |
| Rigvedha_013_0002.wav,आ ते पितर्मरुतां सुम्नमेतु मा नः सूर्यस्य संदृशो युयोथाः,8.22 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0088.wav,पूर्वे प्रतीमो नमो अस्त्वस्मै,4.245 |
| RigVeda_52_0258.wav,अहं मित्रावरुणोभा बिभर्म्यहमिन्द्राग्नी अहमश्विनोभा,7.47 |
| RigVeda_44_0407.wav,शये वव्रिश्चरति जिह्वयादन्रेरिह्यते युवतिं विश्पतिः सन्,7.393 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0283.wav,अंशुमतीः कण्डिनीर्या विशाखा ह्वयामि ते वीरुधो वैश्वदेवीरुग्राः पुरुषजीवनीः,10.539 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0295.wav,दिशो ज्योतिष्मतीरभ्यावर्ते,3.643 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0230.wav,इममग्ने चमसं मा वि जिह्वरः प्रियो देवानामुत सोम्यानाम्,6.607 |
| RigVeda_50_0172.wav,यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत,4.671 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0543.wav,यौ त उरू अष्ठीवन्तौ ये श्रोणी या च ते भसत्,5.226 |
| Rig_veda_54_0024.wav,बोधा स्तोत्रे वयो दधत्,3.929 |
| RigVeda_Part_017_0373.wav,असिक्न्यां यजमानो न होता,4.359 |
| Rig_veda_45_0029.wav,प्रचेताः,1.657 |
| RigVeda_Part_022_0251.wav,इदं सु मे मरुतो हर्यता वचो यस्य तरेम तरसा शतं हिमाः,7.292 |
| RigVeda_Part_019_0281.wav,आपप्रुषी विभावरि व्यावर्ज्योतिषा तमः,5.613 |
| RigVeda_Part_028_0019.wav,उतो न एभिः सुमना इह स्याः,4.209 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0258.wav,उत्तमेभ्यः स्वाहा,2.639 |
| Rigvedha_001_0341.wav,ता वां नेदिष्ठमीमहे,3.385 |
| RigVeda_46_0140.wav,कस्ते मद इन्द्र रन्त्यो भूद्दुरो गिरो अभ्युग्रो वि धाव,7.672 |
| Rigveda_35_0227.wav,आयन्तारं महि स्थिरं पृतनासु श्रवोजितम्,5.205 |
| Rigvedha_008_0135.wav,तुभ्यं धेनुः सबर्दुघा विश्वा वसूनि दोहते,5.687 |
| RigVeda_Part_020_0072.wav,तुविग्रीवो वृषभो वावृधानोऽशत्र्वर्यः समजाति वेदः,8.36 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0323.wav,अभ्रं पीबो मज्जा निधनम्,3.571 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0218.wav,अधस्पदेन ते पदमा ददे विषदूषणम्,4.461 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0283.wav,चक्षुष्मती मे उशती वपूम्षि प्रति त्वं दिव्या,4.745 |
| Rigveda_40_0377.wav,ष्टा अमर्त्याः ससृवांसो न शश्रमुः,4.067 |
| Rigveda_35_0374.wav,अत्रेरिव शृणुतं पूर्व्यस्तुतिं श्यावाश्वस्य सुन्वतो मदच्युता,8.003 |
| RigVeda_Part_028_0133.wav,तं नो अग्ने मघवद्भ्यः पुरुक्षुं रयिं नि वाजं श्रुत्यं युवस्व,7.087 |
| Rig_veda_45_0063.wav,आपो जनयथा च नः,2.661 |
| RigVeda_48_0279.wav,अदितिर्द्यावापृथिवी ऋतं महदिन्द्राविष्णू मरुतः स्वर्बृहत्,6.477 |
| RigVeda_Part_022_0287.wav,आ यस्मिन्तस्थौ सुरणानि बिभ्रती सचा मरुत्सु रोदसी,6.916 |
| RigVeda_Part_027_0326.wav,ऊर्जं नो द्यौश्च पृथिवी च पिन्वतां पिता माता विश्वविदा सुदंससा,9.474 |
| Rigveda_33_0412.wav,विप्रासो जातवेदसः,3.472 |
| RigVeda_Part_028_0191.wav,स्वर्ण वस्तोरुषसामरोचि यज्ञं तन्वाना उशिजो न मन्म,7.775 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0013.wav,पातां नो द्यावापृथिवी अभिष्टये पातु ग्रावा पातु सोमो नो अंहसः,7.702 |
| Rigvedha_009_0287.wav,द्वादशारं नहि तज्जराय वर्वर्ति चक्रं परि द्यामृतस्य,6.312 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0221.wav,ये सत्यासो हविरदो हविष्पा इन्द्रेण देवैः सरथं तुरेण,6.514 |
| Rigveda_34_0344.wav,विश्वे हि त्वा सजोषसो देवासो दूतमक्रत,7.0 |
| RigVeda_Part_022_0182.wav,अच्छ ऋषे मारुतं गणं दाना मित्रं न योषणा,5.791 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0445.wav,सर्वं संसिच्य मर्त्यं देवाः पुरुषमाविशन्,5.568 |
| RigVeda_Part_018_0305.wav,दभ्रेभिश्चिच्छशीयांसं हंसि व्राधन्तमोजसा,6.446 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0231.wav,अस्मिन् मणावेकशतं वीर्याणि सहस्रं प्राणा अस्मिन्न् अस्तृते,7.147 |
| RigVeda_53_0246.wav,त्वावृधो मघवन्दाश्वध्वरो मक्षू स वाजं भरते धना नृभिः,8.027 |
| RigVeda_Part_022_0095.wav,तामस्य रीतिं परशोरिव प्रत्यनीकमख्यं भुजे अस्य वर्पसः,6.97 |
| Rigvedha_001_0098.wav,अक्षितोतिः सनेदिमं वाजमिन्द्रः सहस्रिणम्,5.686 |
| Rigvedha_003_0050.wav,चतुरश्चिद्ददमानाद्बिभीयादा निधातोः,5.243 |
| Rigveda_34_0306.wav,आरात्ताच्चिद्भूतमस्मे अवसे पूर्वीभिः पुरुभोजसा,7.669 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0116.wav,ओता आपः कर्मण्या मुञ्चन्त्वितः प्रणीतये,5.107 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0031.wav,सर्वं तं रन्धयासि मे यजमानाय सुन्वते,4.822 |
| Rigvedha_005_0076.wav,सूरं चित्सस्रुषीरिषः,3.272 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0474.wav,अन्यत्रास्मत्सवितस्तामितो धा हिरण्यहस्तो वसु नो रराणः,6.379 |
| Rigvedha_002_0447.wav,मरुतो वीळुपाणिभिश्चित्रा रोधस्वतीरनु,4.322 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0120.wav,त्रयो दासा आञ्जनस्य तक्मा बलास आदहिः,5.022 |
| Rigvedha_009_0365.wav,त्रयः केशिन ऋतुथा वि चक्षते संवत्सरे वपत एक एषाम्,6.306 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0171.wav,शतं ते इन्द्रो अग्निः सविता बृहस्पतिः शतायुषा हविषाहार्षमेनम्,7.01 |
| Rigvedha_007_0270.wav,उषा उच्छन्ती समिधाने अग्ना उद्य,4.364 |
| Atharvaveda_Part_020_40300.wav,अलाबूनि पृषातकान्यश्वत्थपलाशम्,4.863 |
| Atharvaveda_Part_020_10321.wav,सर्वं पणेः समविन्दन्त भोजनमश्वावन्तं गोमन्तमा पशुं नरः,7.815 |
| Rig_veda_45_0456.wav,सो चिन्नु वृष्टिर्यूथ्या स्वा सचाँ इन्द्रः श्मश्रूणि हरिताभि,9.752 |
| Rigvedha_008_0028.wav,हतेमसन्न वक्षति क्षिप्ता जूर्णिर्न वक्षति,4.861 |
| Rigveda_32_0297.wav,कण्वासो गात वाजिनम्,3.384 |
| Rigveda_35_0400.wav,वर्धयन्,1.454 |
| Atharvaveda_Part_020_10288.wav,स मन्दस्वा ह्यन्धसो राधसे तन्वा महे,5.277 |
| Rigveda_34_0150.wav,सो अर्वद्भिः सनिता स विपन्युभिः स शूरैः सनिता कृतम्,7.134 |
| Rigveda_32_0111.wav,मयोभुवो वृष्टयः सन्त्वस्मे सुपिप्पला ओषधीर्देवगोपाः,8.209 |
| Rigveda_36_0240.wav,प्रासहा सम्राट् सहुरिं सहन्तं भुज्युं वाजेषु पूर्व्यम्,8.219 |
| Rigvedha_008_0225.wav,पथेव यन्तावनुशासता रजोऽञ्जसा शासता रजः,6.47 |
| RigVeda_Part_016_0265.wav,त्वां ह्यग्ने सदमित्समन्यवो देवासो देवमरतिं न्येरिर इति क्रत्वा न्येरिरे,10.424 |
| Rigveda_31_0381.wav,ताविद्दुःशंसं मर्त्यं दुर्विद्वांसं रक्षस्विनम्,5.883 |
| Rigvedha_005_0120.wav,स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः,7.361 |
| RigVeda_Part_027_0305.wav,सं वामञ्जन्त्वक्तुभिर्मतीनां सं स्तोमासः शस्यमानास उक्थैः,8.894 |
| RigVeda_42_0066.wav,इषुर्न धन्वन्प्रति धीयते मतिर्वत्सो न मातुरुप सर्ज्यूधनि,6.708 |
| RigVeda_Part_016_0053.wav,प्र यत्स्तोता जरिता तूर्ण्यर्थो वृषायमाण उप गीर्भिरीट्टे तृतीये धानाः सवने पुरुष्टुत पुरोळाशमाहुतं मामहस्व नः,15.325 |
| Rig_veda_54_0252.wav,परि त्वासते निधिभिः सखायः कुलपा न व्राजपतिं चरन्तम्,6.767 |
| Rigvedha_005_0040.wav,न त्वदन्यो मघवन्नस्ति मर्डितेन्द्र ब्रवीमि ते वचः,6.565 |
| RigVeda_53_0247.wav,त्वं शर्धाय महिना गृणान उरु कृधि मघवञ्छग्धि रायः त्वं नो मित्रो वरुणो न मायी पित्वो न दस्म दयसे विभक्ता,14.831 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0056.wav,यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत,4.77 |
| Rigvedha_010_0367.wav,उत नोऽहिर्बुध्न्यो मयस्कः शिशुं न पिप्युषीव वेति सिन्धुः,8.783 |
| RigVeda_Part_027_0360.wav,सोमारुद्रा युवमेतान्यस्मे विश्वा तनूषु भेषजानि धत्तम्,7.969 |
| RigVeda_44_0139.wav,पवस्व देववीतय इन्दो धाराभिरोजसा,5.357 |
| Rigvedha_002_0296.wav,चक्राणासः परीणहं पृथिव्या हिरण्येन मणिना शुम्भमानाः,7.035 |
| Atharvaveda_Part_020_30074.wav,तद्वो गाय सुते सचा पुरुहूताय सत्वने,5.217 |
| RigVeda_Part_021_0179.wav,यद्वा पञ्च क्षितीनामवस्तत्सु न आ भर,4.669 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0069.wav,यशा यासि प्रदिशो दिशश्च यशाः पशूनामुत चर्षणीनाम्,6.014 |
| Atharvaveda_Part_020_10265.wav,अभि त्वा वृषभा सुते सुतं सृजामि पीतये,4.659 |
| RigVeda_Part_027_0038.wav,पूषन्तव व्रते वयं न रिष्येम कदा चन,4.941 |
| RigVeda_42_0119.wav,समी रथं न भुरिजोरहेषत दश स्वसारो अदितेरुपस्थ आ,7.239 |
| Rig_veda_45_0362.wav,पुनरेना नि वर्तय पुनरेना न्या कुरु,4.275 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0042.wav,भूम्यां देवेभ्यो ददति यज्ञं हव्यमरंकृतम्,5.395 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0201.wav,इन्द्रो वः शक्तिभिर्देवीस्तस्माद्वार्नाम वो हितम्,6.191 |
| Rigveda_40_0485.wav,त्रे अक्षरन्,2.128 |
| Rigvedha_005_0216.wav,पशून्न चित्रा सुभगा प्रथाना सिन्धुर्न क्षोद उर्विया व्यश्वैत्,7.796 |
| Atharvaveda_Part_020_40117.wav,न मत्प्रतिच्यवीयसी न सक्थ्युद्यमीयसी विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः,6.223 |
| Rigvedha_007_0177.wav,पूर्व्यं राट् तुरो विशामङ्गिरसामनु द्यून्,5.077 |
| RigVeda_Part_027_0085.wav,यं देवासो अददुः सूर्यायै कामेन कृतं तवसं स्वञ्चम्,7.893 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0022.wav,रक्षतु त्वा द्यौ रक्षतु पृथिवी सूर्यश्च त्वा रक्षतां चन्द्रमाश्च अन्तरिक्षं रक्षतु देवहेत्याः,11.415 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0543.wav,अमित्रा येऽत्र नः सन्ति तान् अग्न आ द्या त्वम्,4.675 |
| Rigvedha_003_0402.wav,होतारं सप्त जुह्वो यजिष्ठं यं वाघतो वृणते अध्वरेषु,9.072 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0325.wav,अन्नाद्येन यशसा तेजसा ब्राह्मणवर्चसेन,5.929 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0363.wav,वशा माता राजन्यस्य तथा संभूतमग्रशः,5.026 |
| Rigveda_37_0041.wav,तिरश्चिदर्ये रुशमे परीरवि तुभ्येत्सो अज्यते रयिः,6.597 |
| Rigveda_32_0012.wav,अयमु ते सरस्वति वसिष्ठो द्वारावृतस्य सुभगे व्यावः,7.587 |
| Atharvaveda_Part_020_20322.wav,विश्वकर्मा विश्वदेवो महामसि,4.404 |
| Rigvedha_011_0347.wav,नीचा सन्तमुदनयः परावृजं प्रान्धं श्रोणं श्रवयन्सास्युक्थ्यः,7.2360625 |
| Atharvaveda_Part_020_30410.wav,स्वादोः स्वादीयः स्वादुना सृजा समदः सु मधु मधुनाभि योधीः,7.215 |
| Rigvedha_001_0034.wav,ऋतेन मित्रावरुणावृतावृधावृतस्पृशा,5.667 |
| RigVeda_52_0144.wav,उन्मा पीता अयंसत रथमश्वा इवाशवः,5.457 |
| Rigveda_34_0007.wav,उद्गा आजदङ्गिरोभ्य आविष्कृण्वन्गुहा सतीः,6.169 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0008.wav,सं श्रुतेन गमेमहि मा श्रुतेन वि राधिषि,5.424 |
| Rigvedha_011_0047.wav,दुरो घृतान्यक्षरन्,3.404 |
| RigVeda_50_0329.wav,समस्मिञ्जायमान आसत ग्ना उतेमवर्धन्नद्यः स्वगूर्ताः,7.357 |
| RigVeda_50_0313.wav,वि षू मुञ्चा सुषुवुषो मनीषां वि वर्तन्तामद्रयश्चायमानाः,7.406 |
| Rigveda_37_0331.wav,तरोभिर्वो विदद्वसुमिन्द्रं सबाध ऊतये,6.105 |
| RigVeda_Part_023_0212.wav,मायाभिरश्विना युवं वृक्षं सं च वि चाचथः,4.998 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0225.wav,सवितुः प्रपदाभ्याम्,2.74 |
| Rigveda_30_0014.wav,समध्वरायोषसो नमन्त दधि,3.361 |
| Atharvaveda_Part_020_40006.wav,स नो रास्व सुवीर्यम्,3.142 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0052.wav,उरुव्यचा नो महिषः शर्म यच्छत्वस्मिन् हवे पुरुहूतः पुरुक्षु,6.756 |
| Rigveda_33_0488.wav,इमां त इन्द्र सुष्टुतिं विप्र इयर्ति धीतिभिः,5.566 |
| Atharvaveda_Part_020_20468.wav,नि येन मुष्टिहत्यया नि वृत्रा रुणधामहै,4.367 |
| Rigvedha_003_0019.wav,असामिभिर्मरुत आ न ऊतिभिर्गन्ता वृष्टिं न विद्युतः,6.208 |
| Rigvedha_007_0077.wav,शतं मेषान्वृक्ये मामहानं तमः प्रणीतमशिवेन पित्रा,6.884 |
| Rigveda_33_0256.wav,आ नो मखस्य दावनेऽश्वैर्हिरण्यपाणिभिः,5.991 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0405.wav,असच्शाखां प्रतिष्ठन्तीं परममिव जना विदुः,5.088 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0616.wav,अकामा विश्वे वो देवाः शिक्षन्तो नोप शेकिम,5.375 |
| Rigveda_40_0418.wav,देवावीरघशंसहा,2.843 |
| Rigveda_35_0218.wav,इळाभिः सं रभेमहि,3.192 |
| RigVeda_Part_015_0222.wav,पुरुष्टुतस्य धामभिः शतेन महयामसि,4.262 |
| RigVeda_Part_020_0005.wav,उप ब्रह्मा शृणवच्छस्यमानं चतुःशृङ्गोऽवमीद्गौर एतत्,7.203 |
| RigVeda_51_0326.wav,मनीषिणः प्र भरध्वं मनीषां यथायथा मतयः सन्ति नृणाम्,7.627 |
| Rigveda_35_0333.wav,तिष्ठं वनस्य मध्य आ,2.895 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0574.wav,तदात्मना प्रजया पिशाचा वि यातयन्तामगदोऽयमस्तु,7.224 |
| Rigvedha_001_0351.wav,अस्मभ्यं शर्म यच्छतम्,2.858 |
| Rigvedha_006_0157.wav,अतः परि वृषणावा हि यातमथा सोमस्य पिबतं सुतस्य,5.518 |
| RigVeda_Part_019_0003.wav,अस्मिन्हि वः सवने रत्नधेयं गमन्त्विन्द्रमनु वो मदासः,6.865 |
| RigVeda_Part_024_0153.wav,आ यस्मिन्त्वे स्वपाके यजत्र यक्षद्राजन्सर्वतातेव नु द्यौः,7.902 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0218.wav,अयं यो भूरिमूलः समुद्रमवतिष्ठति,4.138 |
| RigVeda_50_0179.wav,छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत,5.44 |
| Atharvaveda_Part_017_0130.wav,शुक्रोऽसि भ्राजोऽसि स यथा त्वं भ्राजता भ्राजोऽस्येवाहं भ्राजता भ्राज्यासम्,10.265 |
| RigVeda_Part_025_0217.wav,त्वां हीन्द्रावसे विवाचो हवन्ते चर्षणयः शूरसातौ,9.786 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0075.wav,पुरा त उग्रा ग्रसत उपेन्द्रो वीर्यं ददौ,5.357 |
| RigVeda_Part_022_0283.wav,युङ्ग्ध्वं हरी अजिरा धुरि वोळ्हवे वहिष्ठा धुरि वोळ्हवे,5.746 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0700.wav,वि वृहामो विसल्पकं विद्रधं हृदयामयम्,3.986 |
| RigVeda_Part_028_0220.wav,वैश्वानर ब्रह्मणे विन्द गातुं यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः,7.864 |
| Rigvedha_007_0081.wav,मही वामूतिरश्विना मयोभूरुत स्रामं,4.791 |
| RigVeda_49_0205.wav,वाचस्पतिं विश्वकर्माणमूतये मनोजुवं वाजे अ,5.875 |
| RigVeda_Part_024_0050.wav,आ सूर्यो न भानुमद्भिरर्कैरग्ने ततन्थ रोदसी वि भासा,7.489 |
| RigVeda_43_0234.wav,आ ते रुचः पवमानस्य सोम योषेव यन्ति सुदुघाः सुधाराः,6.926 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0537.wav,सं परमान्त्समवमान् अथो सं द्यामि मध्यमान्,4.921 |
| RigVeda_53_0104.wav,पिशङ्गा वसते मला वातस्यानु ध्राजिं यन्ति यद्देवासो अविक्षत उन्मदिता मौनेयेन वाताँ आ तस्थिमा वयम्,16.392 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0118.wav,पुरं यो ब्रह्मणो वेद यस्याः पुरुष उच्यते अष्टाचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या,11.837 |
| Atharvaveda_Part_020_10155.wav,अवासृजो निवृताः सर्तवा अपः सत्रा विश्वं दधिषे केवलं सहः,7.322 |
| Rigveda_37_0274.wav,यवं न पश्व आ ददे,2.592 |
| RigVeda_Part_024_0009.wav,ऊती ष बृहतो दिवो द्विषो अंहो न तरति,5.012 |
| Rigveda_36_0029.wav,एवेन्द्राग्निभ्यां पितृवन्नवीयो मन्धातृवदङ्गिरस्वदवाचि त्रिधातुना शर्मणा पातमस्मान्वयं स्याम पतयो रयीणाम्,16.996 |
| Rigvedha_012_0154.wav,बृहस्पते भीमममित्रदम्भनं रक्षोहणं गोत्रभिदं स्वर्विदम्,7.2890625 |
| Atharvaveda_Part_020_20477.wav,विप्रासो वा धियायवः यः कुक्षिः सोमपातमः समुद्र इव पिन्वते,8.024 |
| Atharvaveda_Part_020_40086.wav,इमा नु कं भुवना सीषधामेन्द्रश्च विश्वे च देवाः,5.945 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0039.wav,अरण्यादन्य आभृतः कृष्या अन्यो रसेभ्यः,5.089 |
| Atharvaveda_Part_015_0020.wav,तं यज्ञायज्ञियं च वामदेव्यं च यज्ञश्च यजमानश्च पशवश्चानुव्यचलन्,7.951 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0230.wav,येषामध्येति प्रवसन् येषु सौमनसो बहुः,4.533 |
| Rig_veda_54_0279.wav,प्रजया पुत्रकामे,2.477 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0224.wav,यौ ते मातोन्ममार्ज जातायाः पतिवेदनौ,5.903 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0377.wav,युक्ता मातासिद्धुरि दक्षिणाया अतिष्ठद्गर्भो वृजनीष्वन्तः अमीमेद्वत्सो अनु गामपश्यद्विश्वरूप्यं त्रिषु योगनेषु,14.029 |
| Rigveda_40_0344.wav,परि विश्वानि चेतसा मृशसे पवसे मती,5.305 |
| Rigvedha_009_0234.wav,मा ते गृध्नुरविशस्तातिहाय छिद्रा गात्राण्यसिना मिथू कः,7.163 |
| Rigveda_40_0149.wav,सोमासो राये अक्रमुः,3.281 |
| RigVeda_Part_028_0177.wav,अबोधि जार उषसामुपस्थाद्धोता मन्द्रः कवितमः पावकः,7.185 |
| RigVeda_48_0091.wav,स ईं वृषा न फेनमस्यदाजौ स्मदा परैदप दभ्रचेताः,7.388 |
| Rigvedha_008_0358.wav,तमित्पृच्छन्ति न सिमो वि पृच्छति स्वेनेव धीरो मनसा यदग्रभीत्,7.795 |
| Rig_veda_54_0281.wav,अहं प्रजा अजनयं पृथिव्यामहं जनिभ्यो अपरीषु पुत्रान्,6.46 |
| Atharvaveda_Part_020_30156.wav,नाह दामानं मघवा नि यंसन् नि सुन्वते वहति भूरि वामम्,6.66 |
| Rigveda_38_0341.wav,एतो न्विन्द्रं स्तवामेशानं वस्वः स्वराजम्,6.619 |
| Rig_veda_54_0285.wav,गर्भं धेहि सिनीवालि गर्भं धेहि सरस्वति,5.113 |
| Rigvedha_001_0373.wav,मरुद्भिरग्न आ गहि,2.85 |
| Rigveda_41_0072.wav,अच्छा वाजं सहस्रिणम् अभि प्रियाणि काव्या विश्वा चक्षाणो अर्षति,9.172 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0299.wav,स दाधार पृथिवीं दिवं च स आचार्यं तपसा पिपर्ति,7.167 |
| Rigveda_30_0141.wav,सहस्रशृङ्गो वृषभो यः समुद्रादुदाचरत्,4.726 |
| Rigveda_40_0264.wav,प्त धीतयः,1.422 |
| Rigvedha_005_0380.wav,स पारिषत्क्रतुभिर्मन्दसानो मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती,6.62 |
| Rig_veda_45_0179.wav,उभे इदस्योभयस्य राजत उभे यतेते उभयस्य पुष्यतः,5.838 |
| RigVeda_46_0114.wav,त्वमेषाम्,1.817 |
| RigVeda_Part_025_0136.wav,वयं ते अस्यामिन्द्र द्युम्नहूतौ सखायः स्याम महिन प्रेष्ठाः,7.922 |
| Rig_veda_45_0297.wav,स्वस्तिदा आघृणिः सर्ववीरो,3.355 |
| Rigveda_40_0081.wav,सुतं भराय सं सृज,3.004 |
| Rigvedha_005_0190.wav,त्वमा ततन्थोर्वन्तरिक्षं त्वं ज्योतिषा वि तमो ववर्थ,7.273 |
| Rigveda_29_0187.wav,उदिन्न्वस्य रिच्यतेऽंशो धनं न जिग्युषः,4.183 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0130.wav,प्राच्या दिशः शालाया नमो महिम्ने स्वाहा देवेभ्यः स्वाह्येभ्यः,8.42 |
| Atharvaveda_Part_020_20401.wav,स्यामेदिन्द्रस्य शर्मणि,3.018 |
| Rigvedha_004_0057.wav,सनायुवो नमसा नव्यो अर्कैर्वसूयवो मतयो दस्म दद्रुः,7.562 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0744.wav,स्कन्धान् अमुष्य शातयन् वृत्रस्येव शचीपतिः,5.115 |
| RigVeda_48_0024.wav,यत्ते पराः परावतो मनो जगाम दूरकम्,5.531 |
| Rigveda_36_0303.wav,आ त्वा सुतास इन्दवो मदा य इन्द्र गिर्वणः,5.963 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0371.wav,शीर्ष्णः क्षीरं दुह्रते गावो अस्य वव्रिं वसाना उदकं पदाऽपुः,7.309 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0138.wav,ततश्चैनमन्याभ्यामक्षीभ्यां प्राशीर्याभ्यां चैतं पूर्व ऋषयः प्राश्नन्,9.468 |
| Atharvaveda_Part_020_30045.wav,प्र ते अस्या उषसः प्रापरस्या नृतौ स्याम नृतमस्य नृणाम्,7.007 |
| Rigvedha_012_0326.wav,ज्योगभूवन्ननुधूपितासो हत्वी तेषामा भरा नो वसूनि,7.154 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0055.wav,स नः पूर्णेन यच्छतु,2.523 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0362.wav,त्वामिन्द्रस्याहुर्वर्म त्वं राष्ट्राणि रक्षसि,4.75 |
| Rigveda_29_0222.wav,पितॄणामक्षमव्ययं न किला रिषाथ,3.956 |
| RigVeda_Part_026_0139.wav,दशाश्वान्दश कोशान्दश वस्त्राधिभोजना,5.958 |
| RigVeda_Part_016_0177.wav,अच्छा पुत्रं धेनवो वावशाना महश्चरन्ति बिभ्रतं वपूंषि अच्छा विवक्मि रोदसी सुमेके ग्राव्णो युजानो अध्वरे मनीषा इमा उ ते मनवे भूरिवारा ऊर्ध्वा भवन्ति दर्शता यजत्राः या ते जिह्वा मधुमती सुमेधा अग्ने देवेषूच्यत उरूची,32.395 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0207.wav,यस्य स्थ तमत्त यो वो प्राहैत्तमत्त स्वा मांसान्यत्त,6.27 |
| RigVeda_42_0283.wav,कृधी नो अद्य वरिवः स्वस्तिमदुरुक्षितौ गृणीहि दैव्यं जनम्,7.4 |
| Rigvedha_002_0058.wav,कदा क्षत्रश्रियं नरमा वरुणं करामहे,4.658 |
| RigVeda_Part_024_0109.wav,वयं जयेम शतिनं सहस्रिणं वैश्वानर वाजमग्ने तवोतिभिः,7.54 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0151.wav,ततश्चैनमन्यया जिह्वया प्राशीर्यया चैतं पूर्व ऋषयः प्राश्नन्,7.974 |
| Rigveda_34_0047.wav,यस्मिन्नुक्थानि रण्यन्ति विश्वानि च श्रवस्या अपामवो न समुद्रे,9.57 |
| Rigvedha_007_0127.wav,स्वदामि घर्मं प्रति यन्त्यूतय आ वामूर्जानी रथमश्विनारुहत्,7.064 |
| Rigvedha_005_0387.wav,दस्यूञ्छिम्यूँश्च पुरुहूत एवैर्हत्वा पृथिव्यां शर्वा नि बर्हीत्,8.411 |
| RigVeda_42_0122.wav,ए रिणन्ति बर्हिषि प्रियं गिराश्वो न देवाँ अप्,5.372 |
| Rigveda_40_0512.wav,आदीं त्रितस्य योषणो हरिं हिन्वन्त्यद्रिभिः,5.442 |
| Rigvedha_007_0138.wav,क्षेत्रादा विप्रं जनथो विपन्यया प्र वा,4.821 |
| RigVeda_51_0244.wav,आविरभून्महि माघोनमेषां विश्वं जीवं तमसो निरमोचि,7.584 |
| RigVeda_44_0398.wav,अग्निः सुतुकः सुतुकेभिरश्वै रभस्वद्भी रभस्वाँ एह गम्याः,7.58 |
| Rigvedha_012_0351.wav,सिनीवालि पृथुष्टुके या देवानामसि स्वसा,5.482 |
| RigVeda_Part_017_0238.wav,सा नो नाभिः सदने सस्मिन्नूधन्,4.44 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0079.wav,सर्वे ते वध्रयः कृता वध्रिर्विषगिरिः कृतः,4.403 |
| Atharvaveda_Part_020_20406.wav,तं त्वा वाजेषु वाजिनं वाजयामः शतक्रतो,5.594 |
| Rigvedha_010_0065.wav,अया धिया मनवे श्रुष्टिमाव्या साकं नरो दंसनैरा चिकित्रिरे,7.429 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0044.wav,महे रणाय चक्षसे,3.044 |
| Rigveda_34_0073.wav,पिबा सु शिप्रिन्नन्धसः आ ते सिञ्चामि कुक्ष्योरनु गात्रा वि धावतु,8.864 |
| RigVeda_52_0061.wav,त्यं चरन्,2.624 |
| Rigveda_29_0253.wav,ततो ह मान उदियाय मध्यात्ततो जातमृषिमाहुर्वसिष्ठम्,6.597 |
| Rigvedha_006_0272.wav,जिह्मश्ये चरितवे मघोन्याभोगय इष्टये राय उ त्वम्,9.805 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0172.wav,अहोरात्रे परि सूर्यं वसाने प्रास्य विश्वा तिरतो वीर्याणि,7.306 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0145.wav,अदृश्रन्न् अस्य केतवो वि रश्मयो जनामनु,4.219 |
| Rigveda_31_0258.wav,न स स्वो दक्षो वरुण ध्रुतिः सा सुरा मन्युर्विभीदको अचित्तिः,7.017 |
| Rigvedha_001_0436.wav,दाता राधांसि शुम्भति,3.283 |
| Rigveda_41_0181.wav,यो दूणाशो वनुष्यता अभ्यर्ष सहस्रिणं रयिं गोमन्तमश्विनम् अभि वाजमुत श्रवः,11.661 |
| Rigveda_31_0113.wav,अभिपश्यन्ती वयुना जनानां दिवो दुहिता भुवनस्य,7.336 |
| Rigveda_35_0343.wav,सजोषसा उषसा सूर्येण चेषं नो वोळ्हमश्विना,6.721 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0182.wav,सम्रादेको वि राजति,2.691 |
| RigVeda_Part_022_0144.wav,स्वस्तये वायुमुप ब्रवामहै सोमं स्वस्ति भुवनस्य यस्पतिः,7.048 |
| RigVeda_Part_020_0356.wav,अग्न एषु क्षयेष्वा रेवन्नः शुक्र दीदिहि द्युमत्पावक दीदिहि,7.414 |
| Rigvedha_008_0252.wav,आदस्य ते ध्वसयन्तो वृथेरते कृष्णमभ्वं महि वर्पः करिक्रतः,7.235 |
| Rigvedha_004_0376.wav,युनज्मि ते ब्रह्मणा केशिना हरी उप प्र याहि दधिषे गभस्त्योः,7.834 |
| RigVeda_Part_016_0036.wav,स वावशान इह पाहि सोमं मरुद्भिरिन्द्र सखिभिः सुतं नः,6.806 |
| Rigveda_31_0017.wav,यावघ्न्यामपिन्वतमपो,3.032 |
| RigVeda_Part_028_0110.wav,न शेषो अग्ने अन्यजातमस्त्यचेतानस्य मा पथो वि दुक्षः,7.25 |
| Rigveda_33_0237.wav,राये सु तस्य धीमहि,2.652 |
| RigVeda_Part_020_0081.wav,होतारमग्निं मनुषो नि षेदुर्दशस्यन्त उशिजः शंसमायोः,7.766 |
| RigVeda_Part_027_0291.wav,येषां शुष्मः पृतनासु साह्वान्प्र सद्यो द्युम्ना तिरते ततुरिः,7.71 |
| RigVeda_Part_015_0164.wav,सत्रासाहं वरेण्यं सहोदां ससवांसं स्वरपश्च देवीः,7.701 |
| Rigveda_31_0071.wav,आ नो देवेभिरुप यातमर्वाक्सजोषसा नासत्या,7.439 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0073.wav,येन देवा असुरान् प्राणुदन्त येनेन्द्रो दस्यून् अधमं तमो निनाय,7.443 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0088.wav,य ऋष्णवो देवकृता य उतो ववृतेऽन्यः,4.593 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0189.wav,अनु सूर्यमुदयतां हृद्द्योतो हरिमा च ते,4.904 |
| RigVeda_Part_023_0052.wav,वरुणो यस्य दर्शतो मित्रो वा वनते गिरः,5.06 |
| Atharvaveda_Part_014_0265.wav,तास्त्वा जरसे सं व्ययन्त्वायुष्मतीदं परि धत्स्व वासः,6.247 |
| RigVeda_49_0083.wav,मन्योरियाय हर्म्येषु तस्थौ यतः प्रजज्ञ इन्द्रो अस्य वेद,6.344 |
| Rigvedha_009_0146.wav,न मा गरन्नद्यो मातृतमा दासा यदीं सुसमुब्धमवाधुः,6.864 |
| RigVeda_52_0234.wav,ऊर्ध्वो गन्धर्वो अधि नाके अस्थात्प्र,5.129 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0296.wav,त्रायन्तामस्मिन् ग्रामे गामश्वं पुरुषं पशुम्,4.772 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0320.wav,तयोः श्रयन्ते रश्मयोऽधि दृढास्तान् आ तिष्ठति तपसा ब्रह्मचारी,6.692 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0456.wav,तस्या यमो राजा वत्स आसीद्रजतपात्रं पात्रम्,6.392 |
| RigVeda_50_0190.wav,सप्तास्यासन्परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः,5.497 |
| Rig_veda_45_0207.wav,तावस्मभ्यं दृशये सूर्याय पुनर्दातामसुमद्येह भद्रम्,7.142 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0019.wav,पुत्रैर्भ्रातृभिरदितिर्नु पातु नो दुष्टरं त्रायमाणं सहः,5.974 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0188.wav,वायो यत्ते हरस्तेन तं प्रति हर योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः,8.655 |
| Rigveda_40_0059.wav,उभा देवा नृचक्षसा होतारा दैव्या हुवे,6.104 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0147.wav,वर्चसा मां समनक्त्वग्निर्मेधां मे विष्णुर्न्यनक्त्वासन्,6.393 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0381.wav,त्वं हि मन्यो अभिभूत्योजाः स्वयंभूर्भामो अभिमातिषाहः,6.325 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0406.wav,अहमेनावुदतिष्ठिपं गावौ श्रान्तसदाविव,5.319 |
| Rigvedha_002_0026.wav,यश्चिद्धि त इत्था भगः शशमानः पुरा निदः,4.985 |
| RigVeda_Part_027_0054.wav,य एनमादिदेशति करम्भादिति पूषणम्,5.581 |
| Rigveda_33_0355.wav,यद्वां कक्षीवाँ उत यद्व्यश्व ऋषिर्यद्वां दीर्घतमा जुहाव,7.852 |
| RigVeda_43_0147.wav,तव त्ये सोम पवमान निण्ये विश्वे देवास्त्रय एकादशासः,7.848 |
| Rig_veda_54_0155.wav,सोमस्य राज्ञो वरुणस्य धर्मणि बृहस्पतेरनुमत्या उ शर्मणि,7.24 |
| RigVeda_52_0181.wav,आ मातरा स्थापयसे जिगत्नू अत इनोषि कर्वरा पुरूणि,7.08 |
| Rigveda_31_0054.wav,इमा ब्रह्माणि युवयून्यग्मन्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा,7.426 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0139.wav,अन्धो भविष्यसीत्येनमाह,3.756 |
| Rigveda_37_0324.wav,अस्मे धेहि श्रवो बृहत्,3.421 |
| RigVeda_51_0020.wav,आत्मा यक्ष्मस्य नश्यति पुरा जीवगृभो यथा,5.3 |
| RigVeda_Part_018_0057.wav,इमं यज्ञं त्वमस्माकमिन्द्र पुरो दधत्सनिष्यसि क्रतुं नः,6.285 |
| RigVeda_Part_017_0007.wav,विश्वे विश्वासु दुर्यासु देवा मित्र धिये वरुण सत्यमस्तु,6.764 |
| RigVeda_42_0196.wav,रोमाण्यव्या समया वि धावति मधोर्धारा पिन्वमाना दिवेदिवे,8.081 |
| Rigveda_40_0638.wav,वावृधानाय तूर्वये पवन्ते वाजसातये,5.686 |
| RigVeda_Part_020_0137.wav,यज्ञेयज्ञे न उदव,2.899 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0351.wav,अहिंसन्तीरनामया निर्द्रवन्तु बहिर्बिलम्,4.871 |
| Rigvedha_001_0315.wav,ऋतुना यज्ञवाहसा,3.228 |
| Atharvaveda_Part_014_0304.wav,अनाव्याधां देवपुरां प्रपद्य शिवा स्योना पतिलोके वि राज,7.106 |
| RigVeda_Part_023_0110.wav,मा शेषसा मा तनसा,3.197 |
| RigVeda_46_0272.wav,मित्रं कृणुध्वं खलु मृळता नो मा नो घोरेण चरताभि धृष्णु,7.067 |
| Rigvedha_005_0167.wav,सोम गीर्भिष्ट्वा वयं वर्धयामो वचोविदः,5.928 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0176.wav,आ वात वाहि भेषजं वि वात वाहि यद्रपः,4.844 |
| Rigvedha_005_0151.wav,राज्ञो नु ते वरुणस्य व्रतानि बृहद्गभीरं तव सोम धाम,6.904 |
| Rigvedha_014_0210.wav,इळामग्ने पुरुदंसं सनिं गोः शश्वत्तमं हवमानाय साध,6.552 |
| Rigveda_33_0463.wav,यज्ञेभिर्यज्ञवाहसं सोमेभिः सोमपातमम्,6.148 |
| RigVeda_Part_022_0219.wav,यं त्रायध्वे स्याम ते,3.508 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0053.wav,अप्सु मे सोमो अब्रवीदन्तर्विश्वानि भेषजा,5.426 |
| Rigvedha_013_0109.wav,जुषेथां यज्ञं बोधतं हवस्य मे स,4.062 |
| Rigvedha_014_0305.wav,ऋधग्देवाँ इह यजा चिकित्वः,4.1870625 |
| RigVeda_49_0009.wav,अहेळता मनसा देव बर्हिरिन्द्रज्येष्ठाँ उशतो यक्षि देवान्,7.537 |
| RigVeda_Part_022_0194.wav,ते म आहुर्य आययुरुप द्युभिर्विभिर्मदे,5.455 |
| Rigvedha_010_0366.wav,समाने अहन्विमिमानो अर्कं विषुरूपे पयसि सस्मिन्नूधन्,6.977 |
| Rigveda_34_0292.wav,युञ्जाथां पीवरीरिषः,3.893 |
| Atharvaveda_Part_020_20029.wav,य एक इद्धव्यश्चर्षणीनामिन्द्रं तं गीर्भिरभ्यर्च आभिः,5.81 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0007.wav,उपहूतो वाचस्पतिरुपास्मान् वाचस्पतिर्ह्वयताम्,6.542 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0093.wav,प्रैणान् नुदे मनसा प्र चित्तेनोत ब्रह्मणा,4.924 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0171.wav,शिशीते शक्रः पिशुनेभ्यो वधं नुनं सृजदशनिं यातुमद्भ्यः,6.753 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0277.wav,आ नो गोषु भजता प्रजायां निवात इद्वः शरणे स्याम,6.045 |
| RigVeda_Part_022_0051.wav,रघुः श्येनः पतयदन्धो अच्छा युवा कविर्दीदयद्गोषु गच्छन्,7.539 |
| RigVeda_Part_018_0183.wav,अहं पुरो मन्दसानो व्यैरं नव साकं नवतीः शम्बरस्य,7.608 |
| Rigvedha_012_0251.wav,पिपर्तु नो अदिती राजपुत्राति द्वेषांस्यर्यमा सुगेभिः,6.452 |
| RigVeda_Part_028_0169.wav,प्रप्रायमग्निर्भरतस्य शृण्वे वि यत्सूर्यो न रोचते बृहद्भाः,7.578 |
| RigVeda_49_0042.wav,किल्बिषस्पृत्पितुषणिर्ह्येषामरं हितो भवति वाजिनाय,6.235 |
| Rigveda_39_0077.wav,स्तोतृभ्य इन्द्रमर्चत आ ते दधामीन्द्रियमुक्था विश्वा शतक्रतो,8.855 |
| Rigveda_35_0423.wav,इन्द्राग्नी आ गतं नरा,3.664 |
| RigVeda_Part_027_0187.wav,आ परमाभिरुत मध्यमाभिर्नियुद्भिर्यातमवमाभिरर्वाक्,6.847 |
| Atharvaveda_Part_020_30065.wav,अन्धा तमांसि दुधिता विचक्षे नृभ्यश्चकार नृतमो अभिष्टौ,6.512 |
| Rigvedha_002_0096.wav,आ हि ष्मा सूनवे पितापिर्यजत्यापये,5.321 |
| Atharvaveda_Part_020_30299.wav,शतं त इन्द्रो अग्निः सविता बृहस्पतिः शतायुषा हविषाहार्षमेनम्,6.672 |
| Rigveda_40_0630.wav,अश्वावद्वाजवत्सुतः,3.218 |
| RigVeda_49_0255.wav,सोमं मन्यते पपिवान्यत्सम्पिंषन्त्योषधिम्,5.538 |
| RigVeda_Part_021_0048.wav,गव्यं चिदूर्वमपिधानवन्तं तं चिन्नरः शशमाना अप व्रन्,7.136 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0365.wav,अस्मादेतमघ्न्यौ तद्वशीयो दातुः पितृष्विहभोजनौ मम,5.958 |
| RigVeda_Part_024_0191.wav,स त्वं दक्षस्यावृको वृधो भूरर्यः परस्यान्तरस्य तरुषः,6.707 |
| Atharvaveda_Part_020_10270.wav,सरो गौरो यथा पिब,2.919 |
| Atharvaveda_Part_020_30113.wav,उप क्रमस्व पुरुरूपमा भर वाजं नेदिष्ठमूतये,5.659 |
| Rigvedha_001_0475.wav,मरुत्वन्तं हवामह इन्द्रमा सोमपीतये,5.652 |
| Atharvaveda_Part_020_20379.wav,अस्मासु तन् मरुतो यच्च दुष्टरं दिधृता यच्च दुष्टरम्,5.773 |
| RigVeda_Part_019_0353.wav,शुनासीराविमां वाचं जुषेथां यद्दिवि चक्रथुः पयः,6.937 |
| Rigveda_33_0138.wav,या इन्द्र प्रस्वस्त्वासा गर्भमचक्रिरन्,4.984 |
| Rigveda_34_0322.wav,अग्निं वः पूर्व्यं हुवे होतारं चर्षणीनाम्,6.413 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0358.wav,यक्ष्माणां सर्वेषां विषं निरवोचमहं त्वत्,5.526 |
| Atharvaveda_Part_020_30033.wav,आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ,7.349 |
| RigVeda_Part_016_0067.wav,इमे भोजा अङ्गिरसो विरूपा दिवस्पुत्रासो असुरस्य वीराः,7.536 |
| Rigvedha_009_0283.wav,युक्ता मातासीद्धुरि दक्षिणाया अतिष्ठद्गर्भो वृजनीष्वन्तः,7.334 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0148.wav,यो मा पाकेन मनसा चरन्तमभिचष्टे अनृतेभिर्वचोभिः,6.831 |
| Atharvaveda_Part_014_0225.wav,परा देहि शामुल्यं ब्रह्मभ्यो वि भजा वसु,4.585 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0210.wav,तेन लोकान्त्सूर्यवतो जयेम,4.134 |
| RigVeda_47_0118.wav,एवैवापागपरे सन्तु दूढ्योऽश्वा येषां दुर्युज आयुयुज्रे,7.354 |
| Rigveda_35_0175.wav,प्रति प्राशव्याँ इतः सम्यञ्चा बर्हिराशाते,6.106 |
| RigVeda_Part_021_0336.wav,आ नो महीमरमतिं सजोषा ग्नां देवीं नमसा रातहव्याम्,8.503 |
| RigVeda_Part_022_0096.wav,सचा यदि पितुमन्तमिव क्षयं रत्नं दधाति भरहूतये विशे,6.872 |
| RigVeda_Part_021_0232.wav,अस्मा इत्काव्यं वच उक्थमिन्द्राय शंस्यम्,5.784 |
| RigVeda_51_0082.wav,एवा महो असुर वक्षथाय वम्रकः पड्भिरुप सर्पदिन्द्रम्,6.663 |
| Rigveda_41_0090.wav,इन्द्रस्य हार्द्याविशन्,3.863 |
| RigVeda_Part_027_0001.wav,ॐ,3.908 |
| Rigveda_30_0021.wav,प्रुतो नवन्त युज्यातामद्री अध्वरस्य पेशः,5.274 |
| RigVeda_52_0159.wav,दिवि मे अन्यः पक्षोऽधो अन्यमचीकृषम्,7.634 |
| RigVeda_Part_015_0070.wav,मही यदि धिषणा शिश्नथे धात्सद्योवृधं विभ्वं रोदस्योः,8.349 |
| RigVeda_Part_025_0291.wav,आ याहि शश्वदुशता ययाथेन्द्र महा मनसा सोमपेयम्,6.746 |
| RigVeda_42_0053.wav,अंशुर्यवेन पिपिशे यतो नृभिः सं जामिभिर्नसते रक्षते शिरः,7.226 |
| RigVeda_47_0021.wav,रथं यान्तं कुह को ह वां नरा प्रति द्युमन्तं सुविताय भूषति,7.108 |
| Rigveda_39_0232.wav,प्रजा ह तिस्रो अत्यायमीयुर्न्यन्या अर्कमभितो विविश्रे बृहद्ध तस्थौ भुवनेष्वन्तः,11.549 |
| Rigvedha_003_0190.wav,आ घा योषेव सूनर्युषा याति प्रभुञ्जती,5.082 |
| Rigvedha_005_0165.wav,इमं यज्ञमिदं वचो जुजुषाण उपागहि,4.629 |
| Rigveda_32_0144.wav,इन्द्रासोमा दुष्कृतो वव्रे अन्तरनारम्भणे तमसि प्र विध्यतम्,7.769 |
| RigVeda_Part_018_0077.wav,तस्येदिह स्तवथ वृष्ण्यानि तुविद्युम्नस्य तुविराधसो नॄन्,6.894 |
| RigVeda_Part_017_0245.wav,त्वद्वाजी वाजम्भरो विहाया अभिष्टिकृज्जायते सत्यशुष्मः,7.097 |
| Rigvedha_012_0038.wav,भिनद्वलमङ्गिरोभिर्गृणानो वि पर्वतस्य दृंहितान्यैरत्,6.016 |
| Rigvedha_013_0103.wav,अमेव नः सुहवा आ हि गन्तन नि बर्हिषि सदतना रणिष्टन,6.046 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0011.wav,स देवानामधिपतिर्बभूव सो अस्मासु द्रविणमा दधातु,5.308 |
| Rigveda_33_0002.wav,इदं ते अन्नं युज्यं समुक्षितं तस्येहि प्र द्रवा पिब रथेष्ठायाध्वर्यवः सोममिन्द्राय सोतन अधि ब्रध्नस्याद्रयो वि चक्षते सुन्वन्तो दाश्वध्वरम्,17.846 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0160.wav,यथा यशः पृथिव्यां यथास्मिन् जातवेदसि,4.567 |
| Rigveda_34_0116.wav,एनस्वन्तं चिदेनसः सुदानवः,4.091 |
| RigVeda_Part_025_0312.wav,कुवित्समस्य जेन्यस्य शर्धतोऽभिशस्तेरवस्परत्,5.294 |
| RigVeda_Part_028_0308.wav,एकं च यो विंशतिं च श्रवस्या वैकर्णयोर्जनान्राजा न्यस्तः,8.358 |
| Rigvedha_003_0210.wav,उषो यदद्य भानुना वि द्वारावृणवो दिवः,5.202 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0433.wav,तमाववृत्रन्त्सदनादृतस्यादिद्घृतेन पृथिवीं व्यूदुः,6.26 |
| RigVeda_51_0194.wav,इन्द्र यास्त्वं वृत्रतूर्ये चकर्थ ताभिर्विश्वायुस्तन्वं पुपुष्याः,8.174 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0376.wav,अपानुदो जनममित्रयन्तमुरुं देवेभ्यो अकृणोरु लोकम्,6.353 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0435.wav,गर्भो भारं भरत्या चिदस्या ऋतं पिपर्ति अनृतं नि पाति,6.273 |
| Rigveda_40_0543.wav,अभीमृतस्य विष्टपं दुहते पृश्निमातरः,5.104 |
| RigVeda_44_0399.wav,प्र ते यक्षि प्र त इयर्मि मन्म भुवो यथा वन्द्यो नो हवेषु,6.654 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0397.wav,त्वं यज्ञेष्वीड्यः,2.784 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0145.wav,वर्चसा मां पितरः सोम्यासो अञ्जन्तु देवा मधुना घृतेन,6.225 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0107.wav,केनेदमूर्ध्वं तिर्यक्चान्तरिक्षं व्यचो हितम्,4.927 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0338.wav,यमबध्नाद्बृहस्पतिर्वाताय मणिमाशवे,4.514 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0142.wav,हेतिः पक्षिणी न दभात्यस्मान् आष्ट्री पदं कृणुते अग्निधाने शिवो गोभ्य उत पुरुषेभ्यो नो अस्तु मा नो देवा इह हिंसीत्कपोत,14.038 |
| Rigveda_35_0087.wav,त्वष्टुर्जामातरं वयमीशानं राय ईमहे,6.22 |
| Rigveda_37_0036.wav,कदा चन स्तरीरसि नेन्द्र सश्चसि दाशुषे,5.745 |
| RigVeda_Part_022_0061.wav,हुवे विष्णुं पूषणं ब्रह्मणस्पतिं भगं नु शंसं सवितारमूतये,7.798 |
| Rigveda_30_0357.wav,अविष्टं धीष्वश्विना न आसु प्रजावद्रेतो अह्रयं नो अस्तु,6.908 |
| Atharvaveda_Part_014_0202.wav,मघासु हन्यन्ते गावः फल्गुनीषु व्युह्यते,4.557 |
| Rigveda_33_0162.wav,उतो शविष्ठ वृष्ण्यम्,2.657 |
| RigVeda_50_0341.wav,प्रति ब्रवाणि वर्तयते अश्रु चक्रन्न क्रन्ददाध्ये शिवायै,7.354 |
| RigVeda_53_0263.wav,पश्चेदमन्यदभवद्यजत्रममर्त्यस्य भुवनस्य भूना,7.05 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0343.wav,काले गन्धर्वाप्सरसः काले लोकाः प्रतिष्ठिताः,5.494 |
| RigVeda_Part_017_0096.wav,सेदग्ने अस्तु सुभगः सुदानुर्यस्त्वा नित्येन हविषा य उक्थैः,7.097 |
| Rigvedha_013_0137.wav,नानौकांसि दुर्यो विश्वमायुर्वि तिष्ठते प्रभवः शोको अग्नेः,7.4630625 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0056.wav,एतैः सुकृतैरनु गच्छेम यज्ञं नाके तिष्ठन्तमधि सप्तरश्मौ,6.552 |
| Atharvaveda_Part_020_30406.wav,सद्यो जज्ञानो नि रिणाति शत्रून् अनु यदेनं मदन्ति विश्व ऊमाः,6.932 |
| Rig_veda_45_0197.wav,उभा राजाना स्वधया मदन्ता यमं पश्यासि वरुणं च देवम्,7.053 |
| Atharvaveda_Part_020_40412.wav,यदद्याश्विनावहं हुवेय वाजसातये,4.78 |
| Rigveda_29_0305.wav,स्तु शं न उरूची भवतु स्वधाभिः,3.435 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0455.wav,एयमगन्न् ओषधीनां वीरुधां वीर्यावती,5.677 |
| Atharvaveda_Part_015_0044.wav,तस्मै व्रात्यायासन्दीं समभरन्,4.797 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0636.wav,उग्रंपश्ये राष्ट्रभृत्किल्बिषाणि यदक्षवृत्तमनु दत्तं न एतत्,6.16 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0161.wav,शमिताय स्वाहा,2.675 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0437.wav,अघं प्रच्यमाना दुष्वप्न्यं पक्वा,4.255 |
| Rigvedha_012_0286.wav,त्वे हि कं पर्वते न श्रितान्यप्रच्युतानि दूळभ व्रतानि,5.7480625 |
| RigVeda_49_0332.wav,अघोरचक्षुरपतिघ्न्येधि शिवा पशुभ्यः सुमनाः सुवर्चाः,6.605 |
| RigVeda_Part_021_0030.wav,तद्धि हव्यं मनुषे गा अविन्ददहन्नहिं पपिवाँ इन्द्रो अस्य,7.902 |
| RigVeda_Part_025_0130.wav,त्वं तदुक्थमिन्द्र बर्हणा कः प्र यच्छता सहस्रा शूर दर्षि,6.37 |
| RigVeda_53_0256.wav,श्रुधी हवमिन्द्र शूर पृथ्या उत स्तवसे वेन्यस्यार्कैः,7.949 |
| Rigveda_30_0095.wav,आ मां मित्रावरुणेह रक्षतं कुलाययद्विश्वयन्मा न आ गन्,6.966 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0347.wav,रात्रिंरात्रिमप्रयातं भरन्तोऽश्वायेव तिष्ठते घासमस्मै,7.035 |
| Rigvedha_002_0267.wav,उत्तरा सूरधरः पुत्र आसीद्दानुः शये सहवत्सा न धेनुः,6.658 |
| Atharvaveda_Part_020_30179.wav,स्वेदाञ्जिभिराशिरमिच्छमानोऽरोदयत्पणिमा गा अमुष्णात्,6.639 |
| RigVeda_50_0074.wav,सखे सखायमजरो जरिम्णेऽग्ने मर्ताँ अमर्त्यस्त्वं नः,6.789 |
| Rigveda_32_0253.wav,दध्ना मन्दिष्ठः शूरस्य,3.321 |
| Rigvedha_008_0336.wav,इन्धानो अक्रो विदथेषु दीद्यच्छुक्रवर्णामुदु नो यंसते धियम्,7.979 |
| RigVeda_Part_021_0132.wav,तं मे जगृभ्र आशसो नविष्ठं दोषा वस्तोर्हवमानास इन्द्रम्,7.788 |
| RigVeda_Part_025_0287.wav,अस्य पिब यस्य जज्ञान इन्द्र मदाय क्रत्वे अपिबो विरप्शिन्,7.015 |
| Atharvaveda_Part_017_0140.wav,ऋतेन गुप्त ऋतुभिश्च सर्वैर्भूतेन गुप्तो भव्येन चाहम्,6.296 |
| Atharvaveda_Part_014_0292.wav,उरुं लोकं सुगमत्र पन्थां कृणोमि तुभ्यं सहपत्न्यै वधु,5.904 |
| RigVeda_43_0257.wav,अध धारया मध्वा पृचानस्तिरो रोम पवते अद्रिदुग्धः,6.477 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0463.wav,न्यग्वातो वाति न्यक् तपति सूर्यः,4.86 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0548.wav,त्र्यायुषं जमदग्नेः कश्यपस्य त्र्यायुषम्,4.0 |
| Rigvedha_003_0090.wav,जुष्टो हि दूतो असि हव्यवाहनोऽग्ने रथीरध्वराणाम्,6.309 |
| Rig_veda_54_0334.wav,अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी,4.96 |
| RigVeda_52_0375.wav,उरुव्यचा नो महिषः शर्म यंसदस्मिन्हवे पुरुहूतः पुरुक्षुः,6.311 |
| Rigvedha_002_0285.wav,इन्द्रं नमस्यन्नुपमेभिरर्कैर्य स्तोतृभ्यो हव्यो अस्ति यामन्,7.625 |
| RigVeda_53_0200.wav,यातमच्छा पतत्रिभिर्नासत्या सातये कृतम्,6.479 |
| Rigveda_30_0327.wav,बहवः सूरचक्षसोऽग्निजिह्वा ऋतावृधः,5.16 |
| Rigvedha_003_0002.wav,प्र यदित्था परावतः शोचिर्न मानमस्यथ,4.827 |
| Rig_veda_45_0449.wav,यजामह इन्द्रं वज्रदक्षिणं हरीणां रथ्यं विव्रतानाम्,8.206 |
| Rigveda_30_0047.wav,दधिक्रावाणं बुबुधानो अग्निमुप ब्रुव उषसं सूर्यं गाम्,6.809 |
| Rigvedha_004_0019.wav,स्वराळिन्द्रो दम आ विश्वगूर्तः स्वरिरमत्रो ववक्षे रणाय,6.487 |
| Rigvedha_004_0184.wav,अग्निं विश्वा अभि पृक्षः सचन्ते समुद्रं न स्रवतः सप्त,5.384 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0058.wav,इदमाज्यं घृतवज्जुषाणाः कामज्येष्ठा इह मादयध्वम्,6.397 |
| RigVeda_Part_024_0414.wav,शतैरपद्रन्पणय इन्द्रात्र दशोणये कवयेऽर्कसातौ,6.583 |
| Rigveda_34_0404.wav,स्तुहीन्द्रं व्यश्ववदनूर्मिं वाजिनं यमम् अर्यो गयं मंहमानं वि दाशुषे,10.458 |
| Rigveda_36_0288.wav,अग्निं न मा मथितं सं दिदीपः प्र चक्षय कृणुहि वस्यसो नः अथा हि ते मद आ सोम मन्ये रेवाँ इव,13.041 |
| RigVeda_51_0314.wav,आ सुष्वयन्ती यजते उपाके उषासानक्ता सदतां नि योनौ,8.221 |
| RigVeda_Part_025_0059.wav,धिष्व वज्रं दक्षिण इन्द्र हस्ते विश्वा अजुर्य दयसे वि मायाः,7.053 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0518.wav,जयंश्च जिष्णुश्चामित्रां जयतामिन्द्रमेदिनौ प्रब्लीनो मृदितः शयां हतोऽमित्रो न्यर्बुदे,11.299 |
| Rigveda_40_0040.wav,त्वां यज्ञैरवीवृधन्पवमान विधर्मणि,5.266 |
| RigVeda_Part_015_0084.wav,मिहः पावकाः प्रतता अभूवन्स्वस्ति नः पिपृहि पारमासाम्,6.903 |
| Rigveda_33_0316.wav,आ वां विश्वाभिरूतिभिः,3.21 |
| Rigveda_30_0303.wav,ता भूरिपाशावनृतस्य सेतू दुरत्येतू रिपवे मर्त्याय,7.419 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0160.wav,सं बाहुभ्यां भरति सं पतत्रैर्द्यावापृथिवी जनयन् देव एकः,7.022 |
| Rigveda_41_0091.wav,इन्द्रस्य सोम राधसे शं पवस्व विचर्षणे प्रजावद्रेत आ भर,8.211 |
| RigVeda_49_0365.wav,न मत्प्रतिच्यवीयसी न सक्थ्युद्यमीयसी विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः,6.889 |
| Rigveda_32_0121.wav,वाचं पर्जन्यजिन्वितां प्र मण्डूका अवादिषुः,6.068 |
| RigVeda_Part_016_0028.wav,शतक्रतुमर्णवं शाकिनं नरं गिरो म इन्द्रमुप यन्ति विश्वतः,6.903 |
| Rigveda_39_0221.wav,आ नो यज्ञं दिविस्पृशं वायो याहि सुमन्मभिः,6.477 |
| RigVeda_47_0054.wav,प्रातर्युजं नासत्याधि तिष्ठथः प्रातर्यावाणं मधुवाहनं रथम्,7.78 |
| Rig_veda_54_0062.wav,य उशता मनसा सोममस्मै सर्वहृदा देवकामः सुनोति,7.1 |
| Rigveda_37_0203.wav,सनेम वाजं तव शिप्रिन्नवसा मक्षू चिद्यन्तो अद्रिवः,7.134 |
| Rig_veda_45_0127.wav,प्रथमो वि वोचति,2.083 |
| RigVeda_48_0286.wav,यावीजिरे वृषणो देवयज्यया ता नः शर्म त्रिवरूथं वि यंसतः,7.468 |
| RigVeda_50_0356.wav,आ यं पृणन्ति हरिभिर्न धेनव इन्द्राय शूषं हरिवन्तमर्चत,6.286 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0341.wav,भृगुं हिंसित्वा सृञ्जया वैतहव्याः पराभवन्,4.364 |
| Atharvaveda_Part_020_40225.wav,को अर्य बहुलिमा इषूनि,3.206 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0143.wav,जनाद्विश्वजनीनात्सिन्धुतस्पर्याभृतम्,4.529 |
| Rig_veda_54_0065.wav,येषो अस्य यो अस्मै रेवान्न सुनोति सोमम्,5.598 |
| Atharvaveda_Part_020_30029.wav,आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ,6.988 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0566.wav,सं हि वातेनागत समु सर्वैः पतत्रिभिः,4.526 |
| RigVeda_Part_023_0243.wav,एषा गोभिररुणेभिर्युजानास्रेधन्ती रयिमप्रायु चक्रे,7.145 |
| Rigvedha_009_0239.wav,अनागास्त्वं नो अदितिः कृणोतु क्षत्रं,3.525 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0686.wav,इन्द्रस्यौजो मरुतामनीकं मित्रस्य गर्भो वरुणस्य नाभिः,6.381 |
| RigVeda_Part_017_0126.wav,पापासः सन्तो अनृता असत्या इदं पदमजनता गभीरम्,6.764 |
| Rigveda_29_0158.wav,सं ते नमन्त कृष्टयः,2.883 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0441.wav,शरीरं कृत्वा पादवत्कं लोकमनु प्राविशत्,4.867 |
| Rigveda_37_0219.wav,उग्रं युयुज्म पृतनासु सासहिमृणकातिमदाभ्यम्,6.001 |
| RigVeda_Part_020_0269.wav,अग्निर्जातो अरोचत घ्नन्दस्यूञ्ज्योतिषा तमः,6.047 |
| RigVeda_Part_020_0118.wav,यस्मै त्वं सुकृते जातवेद उ लोकमग्ने कृणवः स्योनम्,6.672 |
| Rigveda_33_0436.wav,त्वनाय मामहे,2.163 |
| Atharvaveda_Part_020_20241.wav,उप नः सवना गहि सोमस्य सोमपाः पिब,4.285 |
| Rigveda_38_0354.wav,मध्वः प्रति प्रभर्मणि,2.998 |
| Rigvedha_001_0300.wav,अग्ने देवाँ इहा वह सादया योनिषु त्रिषु,6.749 |
| RigVeda_49_0293.wav,प्र त्वा मुञ्चामि वरुणस्य पाशाद्येन त्वाबध्नात्सविता सुशेवः,7.258 |
| RigVeda_Part_023_0068.wav,रातहव्यस्य सुष्टुतिं दधृक्स्तोमैर्मनामहे,5.148 |
| Rigveda_40_0165.wav,अभि प्रिया दिवस्पदमध्वर्युभिर्गुहा हितम्,5.073 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0040.wav,यद्वो मनः परागतं यद्बद्धमिह वेह वा,4.722 |
| RigVeda_53_0164.wav,तमं त्वा गिरा दैव्यं मानुषा युगा,4.753 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0044.wav,इन्द्र जठरं नव्यो न पृणस्व मधोर्दिवो न,4.75 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0483.wav,अप्सु स्तीमासु वृद्धासु शरीरमन्तरा हितम्,4.511 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0162.wav,द्विपाद्ध षट्पदो भूयो वि चक्रमे त एकपदस्तन्वं समासते,7.697 |
| Rigvedha_011_0333.wav,यः पुष्पिणीश्च प्रस्वश्च धर्मणाधि दाने व्यवनीरधारयः,7.293 |
| RigVeda_Part_019_0118.wav,मम द्विता राष्ट्रं क्षत्रियस्य विश्वायोर्विश्वे अमृता यथा नः,7.719 |
| RigVeda_49_0082.wav,अश्वादियायेति यद्वदन्त्योजसो जातमुत मन्य एनम्,6.311 |
| Rigveda_33_0280.wav,आ नूनं यातमश्विना रथेन सूर्यत्वचा,4.704 |
| RigVeda_Part_024_0151.wav,मध्ये होता दुरोणे बर्हिषो राळग्निस्तोदस्य रोदसी यजध्यै,7.114 |
| Rigveda_35_0090.wav,वहस्व महः पृथुपक्षसा रथे,4.027 |
| Rigvedha_004_0333.wav,महत्तदस्य पौंस्यं वृत्रं जघन्वाँ असृजदर्चन्ननु स्वराज्यम्,8.46 |
| Rigvedha_007_0089.wav,स वां मधु प्र वोचदृतायन्त्वाष्ट्रं यद्दस्रावपिकक्ष्यं वाम्,7.259 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0375.wav,यो अक्रन्दयत्सलिलं महित्वा योनिं,4.137 |
| RigVeda_Part_022_0372.wav,यो मे धेनूनां शतं वैददश्विर्यथा ददत्,5.537 |
| Atharvaveda_Part_020_10025.wav,सोमः शमस्तु ते हृदे,2.731 |
| Atharvaveda_Part_020_30238.wav,त्वमीशिषे सुतानामिन्द्र त्वमसुतानाम्,4.377 |
| RigVeda_Part_026_0123.wav,क ईं स्तवत्कः पृणात्को यजाते यदुग्रमिन्मघवा विश्वहावेत्,8.786 |
| Atharvaveda_Part_018_1_0166.wav,उप बर्बृहि वृषभाय बाहुमन्यमिच्छस्व सुभगे पतिं मत्,5.462 |
| RigVeda_Part_018_0361.wav,कनिष्ठ आह चतुरस्करेति त्वष्ट ऋभवस्तत्पनयद्वचो वः,7.067 |
| RigVeda_47_0283.wav,सुगान्पथः कृणुहि देवयानान्वह हव्यानि सुमनस्यमानः,6.76 |
| RigVeda_Part_017_0368.wav,यो अस्य शुष्मं मुहुकैरियर्ति वातो न जूत स्तनयद्भिरभ्रैः,6.772 |
| Atharvaveda_Part_020_30414.wav,चोदयामि त आयुधा वचोभिः सं ते शिशामि ब्रह्मणा वयांसि,6.629 |
| Rigvedha_011_0195.wav,देव बर्हिर्वर्धमानं सुवीरं स्तीर्णं राये सुभरं वेद्यस्याम्,7.623 |
| Rigvedha_006_0070.wav,प्रति यत्स्या नीथादर्शि दस्योरोको नाच्छा सदनं जानती गात्,6.916 |
| Rigveda_29_0226.wav,दण्डा इवेद्गोअजनास आसन्परि,3.834 |
| RigVeda_43_0060.wav,एष स्य ते मधुमाँ इन्द्र सोमो वृषा वृष्णे,4.422 |
| Rigvedha_013_0321.wav,तं चित्रयामं हरिकेशमीमहे सुदीतिमग्निं सुविताय नव्यसे,6.7350625 |
| Rigvedha_010_0297.wav,पूर्णं रथं वहेथे मध्व आचितं तेन दाश्वांसमुप याथो अश्विना,7.779 |
| RigVeda_Part_016_0150.wav,नव्यानव्या युवतयो भवन्तीर्महद्देवानामसुरत्वमेकम् यदन्यासु वृषभो रोरवीति सो अन्यस्मिन्यूथे नि दधाति रेतः,15.034 |
| RigVeda_46_0208.wav,प्र कृष्णाय रुशदपिन्वतोधरृतमत्र नकिरस्मा अपीपेत्,6.308 |
| Rigveda_40_0448.wav,पवित्रे दक्षसाधनः,2.851 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0461.wav,हतासो अस्य वेशसो हतासः परिवेशसः,4.534 |
| RigVeda_48_0317.wav,ब्रह्मणस्पतिर्वृषभिर्वराहैर्घर्मस्वेदेभिर्द्रविणं व्यानट्,7.178 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0322.wav,ब्रह्मचारी सिञ्चति सानौ रेतः पृथिव्यां तेन जीवन्ति प्रदिशश्चतस्रः,7.188 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0033.wav,विश्वस्वं मातरमोषधीनां ध्रुवां भूमिं पृथिवीं धर्मणा धृताम्,7.457 |
| Rigvedha_010_0027.wav,एकस्य चिन्मे विभ्वस्त्वोजो या नु दधृष्वान्कृणवै मनीषा,7.947 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0131.wav,यस्य व्रतं पशवो यन्ति सर्वे यस्य व्रत उपतिष्ठन्त आपः यस्य व्रते पुष्टपतिर्निविष्टस्तं सरस्वन्तमवसे हवामहे,12.041 |
| RigVeda_Part_024_0057.wav,य इन्वति द्रविणानि प्रचेता विश्ववाराणि पुरुवारो अध्रुक्,7.218 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0141.wav,इन्द्रासोमा वर्तयतं दिवो वधं सं पृथिव्या अघशंसाय तर्हणम्,6.95 |
| Rigveda_41_0279.wav,महाँ असि सोम ज्येष्ठ उग्राणामिन्द ओजिष्ठः युध्वा सञ्छश्वज्जिगेथ य उग्रेभ्यश्चिदोजीयाञ्छूरेभ्यश्चिच्छूरतरः,16.383 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0217.wav,चतुर्वीरं नैर्ऋतेभ्यश्चतुर्भ्यो ग्राह्या बन्धेभ्यः परि पात्वस्मान्,7.935 |
| Atharvaveda_Part_020_30012.wav,नू चिन् नु ते मन्यमानस्य दस्मोदश्नुवन्ति महिमानमुग्र,5.885 |
| Rigveda_40_0475.wav,प्रभूवसो,1.393 |
| Rigvedha_010_0086.wav,उत च्यवन्ते अच्युता ध्रुवाणि वावृध ईं मरुतो दातिवारः,6.721 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0038.wav,स्वायसा असयः सन्ति नो गृहे विद्मा ते कृत्ये यतिधा परूंषि,6.738 |
| Rigvedha_014_0119.wav,गोपा ऋतस्य दीदिहि स्वे दमे,3.613 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0308.wav,अपूपवान् द्रप्सवांश्चरुरेह सीदतु,4.071 |
| Atharvaveda_Part_020_10127.wav,आ वां विशन्त्विन्दवः स्वाभुवोऽस्मे रयिं सर्ववीरं नि यच्छतम्,6.052 |
| RigVeda_Part_025_0280.wav,इमं केतुमदधुर्नू चिदह्नां शुचिजन्मन उषसश्चकार,5.833 |
| Rigvedha_004_0363.wav,विद्मा हि त्वा पुरूवसुमुप कामान्ससृज्महेऽथा नोऽविता भव,7.877 |
| Rigveda_38_0114.wav,अभ्यारमिदद्रयो निषिक्तं पुष्करे मधु,5.105 |
| Rigvedha_005_0281.wav,दधासि रत्नं द्रविणं च दाशुषेऽग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव,7.67 |
| Rigveda_40_0402.wav,प्र सोमासो अधन्विषुः,2.78 |
| RigVeda_52_0021.wav,पृधः प्रापश्यद्वीरो अभि पौंस्यं रणम्,4.472 |
| Rigvedha_012_0124.wav,तस्मै तवस्यमनु दायि सत्रेन्द्राय देवेभिरर्णसातौ,6.869 |
| Rigveda_41_0260.wav,पान्तमा पुरुस्पृहम् आ रयिमा सुचेतुनमा सुक्रतो तनूष्वा पान्तमा पुरुस्पृहम्,11.6 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0098.wav,एवाहं त्वां क्षेत्रियान् निर्ऋत्या जामिशंसाद्द्रुहो मुञ्चामि वरुणस्य पाशात्,9.341 |
| Rigveda_30_0071.wav,आपो यं वः प्रथमं देवयन्त इन्द्रपानमूर्मिमकृण्वतेळः,6.87 |
| RigVeda_Part_021_0306.wav,ये अश्वदा उत वा सन्ति गोदा ये वस्त्रदाः सुभगास्तेषु रायः,6.936 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0303.wav,तं रात्रीस्तिस्र उदरे बिभर्ति तं जातं द्रष्टुमभिसंयन्ति देवाः,7.296 |
| RigVeda_51_0335.wav,वज्रेण हि वृत्रहा वृत्रमस्तरदेवस्य शूशुवानस्य मायाः,7.774 |
| Rigvedha_013_0029.wav,यानि मनुरवृणीता पिता न,2.9290625 |
| RigVeda_48_0310.wav,अवो द्वाभ्यां पर एकया गा गुहा तिष्ठन्तीरनृतस्य सेतौ,7.783 |
| Rigveda_32_0246.wav,अपस्पृण्वते सुहार्दम्,3.613 |
| Atharvaveda_Part_014_0260.wav,यथा सिन्धुर्नदीनां साम्राज्यं सुषुवे वृषा,5.496 |
| Rigveda_37_0214.wav,त्वाया शतक्रतो प्राचामन्यो अहंसन,5.414 |
| Rigvedha_004_0204.wav,तेभी रक्षन्ते अमृतं सजोषाः पशूञ्च स्थातॄञ्चरथं च पाहि,8.117 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0438.wav,स्कम्भ इदं सर्वमात्मन्वद्यत्प्राणन् निमिषच्च यत्,5.127 |
| RigVeda_43_0165.wav,द्विता व्यूर्ण्वन्नमृतस्य धाम स्वर्विदे भुवनानि प्रथन्त,6.489 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0306.wav,पूर्वो जातो ब्रह्मणो ब्रह्मचारी घर्मं वसानस्तपसोदतिष्ठत्,7.402 |
| RigVeda_Part_018_0294.wav,अस्मान्विश्वाभिरूतिभिः,3.818 |
| Rigveda_40_0296.wav,उक्थैर्यज्ञेषु वर्धते,3.521 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0457.wav,तामन्तको मार्त्यवोऽधोक्तां स्वधामेवाधोक्,5.684 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0162.wav,इन्द्रपुत्रे सोमपुत्रे दुहितासि प्रजापतेः,5.07 |
| RigVeda_Part_022_0201.wav,वि पर्जन्यं सृजन्ति रोदसी अनु धन्वना यन्ति वृष्टयः,6.226 |
| Rigvedha_008_0020.wav,प्र तद्वोचेयं भव्यायेन्दवे हव्यो न य इषवान्मन्म रेजति रक्षोहा मन्म रेजति,9.822 |
| Rigveda_41_0263.wav,ताभ्यां विश्वस्य राजसि ये पवमान धामनी,5.53 |
| RigVeda_46_0032.wav,यत्सीं हवन्ते समिथे वि वो मदे युध्यमानास्तोकसातौ विवक्षसे,8.054 |
| RigVeda_Part_018_0043.wav,प्राग्रुवो नभन्वो न वक्वा ध्वस्रा अपिन्वद्युवतीरृतज्ञाः,10.917 |
| Rigvedha_003_0192.wav,वि या सृजति समनं व्यर्थिनः पदं न वेत्योदती,5.96 |
| Rigvedha_003_0047.wav,महि प्सरो वरुणस्य,2.516 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0010.wav,यत्र देवा अमृतमानशानाः समाने योनावध्यैरयन्त,6.878 |
| RigVeda_46_0111.wav,स रोरुवद्वृषभस्तिग्मशृङ्गो वर्ष्मन्तस्थौ वरिमन्ना पृथिव्याः,7.58 |
| Atharvaveda_Part_020_40356.wav,निष्टिग्र्यः पुत्रमा च्यावयोतय इन्द्रं सबाध इह सोमपीतये,6.981 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0269.wav,य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्य देवाः योऽस्येशे द्विपदो यश्चतुष्पदः तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति,18.211 |
| Rigveda_36_0221.wav,तयः पुरूवसुं मदाय हरयः सुतम् यस्ते मदो वरेण्यो य इन्द्र वृत्रहन्तमः,10.39 |
| Rigvedha_010_0315.wav,वपुर्वपुष्या सचतामियं गीर्दिवो दुहित्रोषसा सचेथे,6.514 |
| Rigveda_41_0088.wav,अति वारमपाविषुः,2.789 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0082.wav,ययोरोजसा स्कभिता रजांसि यौ वीर्यैर्वीरतमा शविष्ठा यौ पत्येते अप्रतीतौ सहोभिर्विष्णुमगन् वरुणं पूर्वहूतिः,12.885 |
| Rigveda_39_0035.wav,एवा ते राध्यं मनः,3.205 |
| Rigveda_34_0401.wav,घृतात्स्वादीयो मधुनश्च वोचत,4.601 |
| Rigvedha_006_0215.wav,युवं तासां दिव्यस्य प्रशासने विशां क्षयथो अमृतस्य मज्मना,7.633 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0050.wav,सहस्रार्घः शतकाण्डः पयस्वान् अपामग्निर्वीरुधां राजसूयम्,6.95 |
| RigVeda_51_0234.wav,कर्णेव शासुरनु हि स्मराथोऽंशेव नो भजतं,5.603 |
| RigVeda_Part_028_0024.wav,यमश्वी नित्यमुपयाति यज्ञं प्रजावन्तं स्वपत्यं क्षयं नः,7.195 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0360.wav,अमन्तवो मां त उप क्षियन्ति श्रुधि श्रुत श्रुद्धेयं ते वदामि,5.941 |
| Rigveda_34_0110.wav,शं वातो वात्वरपा अप स्रिधः,4.37 |
| RigVeda_Part_025_0236.wav,कदा स्तोमं वासयोऽस्य राया कदा धियः करसि वाजरत्नाः,6.805 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0380.wav,त्रातारमिन्द्रमवितारमिन्द्रं हवेहवे सुहवं शूरमिन्द्रम्,6.015 |
| RigVeda_53_0147.wav,त्यधर्मेन्द्रो न तस्थौ समरे धनानाम्,5.243 |
| RigVeda_Part_025_0326.wav,सोमः सुतः स इन्द्र तेऽस्ति स्वधापते मदः,4.739 |
| RigVeda_50_0186.wav,चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत,5.542 |
| RigVeda_Part_022_0018.wav,समुद्रमासामव तस्थे अग्रिमा न रिष्यति सवनं यस्मिन्नायता,7.297 |
| RigVeda_Part_024_0161.wav,स त्वं नो अर्वन्निदाया विश्वेभिरग्ने अग्निभिरिधानः,6.469 |
| RigVeda_Part_019_0094.wav,हंसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत्,7.105 |
| RigVeda_Part_021_0226.wav,यन्मन्यसे वरेण्यमिन्द्र द्युक्षं तदा भर,5.093 |
| Rigvedha_012_0143.wav,अधत्तान्यं जठरे प्रेमरिच्यत सैनं सश्चद्देवो देवं सत्यमिन्द्रं सत्य इन्दुः,9.3080625 |
| RigVeda_48_0217.wav,सहस्रसा मेधसाताविव त्मना महो ये धनं समिथेषु जभ्रिरे,7.798 |
| Rigveda_37_0073.wav,ष्टिभिरा स्वापे स्वापिभिः,3.861 |
| Rigveda_38_0228.wav,त्वन्तं न वृञ्जसे,2.766 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0146.wav,तक्मानं विश्वधावीर्याधराञ्चं परा सुव,5.084 |
| Rigveda_41_0232.wav,इहो ष्विन्दवा गहि दद्भिः परिषिच्यसे मृज्यमानो गभस्त्योः द्रुणा सधस्थमश्नुषे,12.285 |
| Atharvaveda_Part_014_0297.wav,सुकिंशुकं वहतुं विश्वरूपं हिरण्यवर्णं सुवृतं सुचक्रम्,5.899 |
| RigVeda_Part_017_0120.wav,पाकाय गृत्सो अमृतो विचेता वैश्वानरो नृतमो यह्वो अग्निः,7.824 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0240.wav,सा नः पयस्वती दुहामुत्तरामुत्तरां समाम्,4.742 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0262.wav,यत्किं चासौ मनसा यच्च वाचा यज्ञैर्जुहोति हविषा यजुषा तन् मृत्युना निर्ऋतिः संविदाना पुरा सत्यादाहुतिं हन्त्वस्य,12.344 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0435.wav,पाप्माधिधीयमाना पारुष्यमवधीयमाना,5.407 |
| RigVeda_Part_025_0006.wav,स वेतसुं दशमायं दशोणिं तूतुजिमिन्द्रः स्वभिष्टिसुम्नः,6.756 |
| RigVeda_47_0272.wav,महत्तदुल्बं स्थविरं तदासीद्येनावि,4.786 |
| Rigvedha_005_0052.wav,उतारुषस्य वि ष्यन्ति धाराश्चर्मेवोदभिर्व्युन्दन्ति भूम,7.378 |
| Rigveda_31_0066.wav,इयं मनीषा इयमश्विना गीरिमां,4.362 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0144.wav,सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद,6.005 |
| Rigvedha_010_0148.wav,येन मानासश्चितयन्त उस्रा व्युष्टिषु शवसा शश्वतीनाम् स नो मरुद्भिर्वृषभ श्रवो धा उग्र उग्रेभि स्थविरः सहोदाः,13.981 |
| Rigveda_39_0146.wav,त्वे वृक्तबर्हिषः,2.287 |
| Rigveda_40_0556.wav,सोमं जनस्य गोपतिम्,2.666 |
| Rig_veda_54_0174.wav,प्रजापतिर्मह्यमेता रराणो विश्वैर्देवैः पितृभिः संविदानः,7.668 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0289.wav,हिङ्कृण्वती वसुपत्नी वसूनां वत्समिच्छन्ती मनसा न्यागन्,6.72 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0029.wav,अचिक्रदत्स्वपा इह भुवदग्ने व्यचस्व रोदसी उरूची,5.781 |
| Rig_veda_45_0304.wav,सरस्वतीं सुकृतो अह्वयन्त सरस्वती दाशुषे वार्यं दात्,6.951 |
| RigVeda_46_0189.wav,उत स्वेन क्रतुना सं वदेत श्रेयांसं दक्षं मनसा जगृभ्यात्,7.638 |
| Rigveda_33_0031.wav,येभिस्तिस्रः परावतो दिवो विश्वानि रोचना,5.909 |
| RigVeda_Part_025_0199.wav,त्वं कुत्सेनाभि शुष्णमिन्द्राशुषं युध्य कुयवं गविष्टौ,6.211 |
| Atharvaveda_Part_020_30197.wav,उद्यद्ब्रध्नस्य विष्टपं गृहमिन्द्रश्च गन्वहि,4.926 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0377.wav,क्व व्रतं क्व श्रद्धास्य तिष्ठति कस्मिन्न् अङ्गे सत्यमस्य प्रतिष्ठितम्,6.523 |
| Rigveda_40_0121.wav,इन्दो सखायमा विश,3.049 |
| Rigvedha_013_0323.wav,अग्निं मूर्धानं दिवो अप्रतिष्कुतं तमीमहे नमसा वाजिनं बृहत्,7.763 |
| RigVeda_49_0311.wav,टुकमेतदपाष्ठवद्विषवन्नैतदत्तवे,4.589 |
| RigVeda_Part_017_0216.wav,हव्या च मानुषाणाम्,3.051 |
| Rig_veda_54_0171.wav,क्रुस्ताभ्यः पर्जन्य महि शर्म यच्छ,3.997 |
| Rigveda_37_0135.wav,इमानि वां भागधेयानि सिस्रत इन्द्रावरुणा प्र महे सुतेषु वाम्,8.399 |
| Rigvedha_011_0203.wav,सरस्वती साधयन्ती धियं न इळा देवी भारती विश्वतूर्तिः,6.9530625 |
| RigVeda_Part_020_0275.wav,प्र वेधसे कवये वेद्याय गिरं भरे यशसे पूर्व्याय,7.408 |
| RigVeda_Part_017_0063.wav,परिज्मने नासत्याय क्षे ब्रवः कदग्ने रुद्राय नृघ्ने,6.7 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0049.wav,भवाशर्वौ मृडतं शर्म यच्छतमपसिध्य दुरितं धत्तमायुः,6.379 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0137.wav,ते ते यक्ष्मं सवेदसो दूराद्दूरमनीनशन्,5.089 |
| Rigvedha_002_0035.wav,अपदे पादा प्रतिधातवेऽकरुतापवक्ता हृदयाविधश्चित्,6.427 |
| RigVeda_46_0011.wav,नासत्यावब्रुवन्देवाः पुनरा वहतादिति,4.816 |
| RigVeda_Part_018_0068.wav,शिक्षानरः समिथेषु प्रहावान्वस्वो राशिमभिनेतासि भूरिम्,7.729 |
| Rigvedha_003_0333.wav,बृहच्छ्रवा असुरो बर्हणा कृतः पुरो हरिभ्यां वृषभो रथो हि षः,6.831 |
| RigVeda_53_0091.wav,एकेषं विश्वतः प्राञ्चमपश्यन्नधि तिष्ठसि,5.985 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0419.wav,यो अस्तभ्नाद्दिवमूर्ध्वो महिम्ना तेनौदनेनाति तराणि मृत्युम्,6.508 |
| RigVeda_Part_015_0117.wav,अंहसो यत्र पीपरद्यथा नो नावेव यान्तमुभये हवन्ते,7.525 |
| RigVeda_Part_020_0188.wav,त्वामग्ने धर्णसिं विश्वधा वयं गीर्भिर्गृणन्तो नमसोप सेदिम,7.463 |
| Rigveda_38_0190.wav,शर्धांसीव स्तुकाविनां मृक्षा शीर्षा चतुर्णाम्,6.962 |
| Rigveda_30_0112.wav,मा वो भुजेमान्यजातमेनो मा तत्कर्म वसवो यच्चयध्वे,7.245 |
| Rigvedha_006_0281.wav,यन्मानुषान्यक्ष्यमाणाँ अजीगस्तद्देवेषु चकृषे भद्रमप्नः,9.1 |
| RigVeda_Part_018_0227.wav,विश्वे चनेदना त्वा देवास इन्द्र युयुधुः,5.664 |
| Atharvaveda_Part_020_30365.wav,अग्ने दीद्यतं बृहत्,2.634 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0458.wav,तां स्वधां पितर उप जीवन्त्युपजीवनीयो भवति य एवं वेद,6.6 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0377.wav,वृषेव यूथे सहसा विदानो गव्यन्न् अभि रुव संधनाजित् शुचा विध्य हृदयं परेषां हित्वा ग्रामान् प्रच्युता यन्तु शत्रवः,12.801 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0410.wav,शुनो दिव्यस्य यन् महस्तेना ते हविषा विधेम,5.077 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0045.wav,यस्ते गन्धः पुष्करमाविवेश यं संजभ्रुः सूर्याया विवाहे अमर्त्याः पृथिवि गन्धमग्रे तेन मा सुरभिं कृणु मा नो द्विक्षत कश्चन,14.083 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0371.wav,एवा मयि प्रजा पशवोऽन्नमन्नं वि रोहतु,4.495 |
| RigVeda_43_0095.wav,याभिरस्यान्दिवो न वृष्टिः पवमानो अक्षाः,5.805 |
| Atharvaveda_Part_018_1_0168.wav,काममूता बह्वेतद्रपामि तन्वा मे तन्वं सं पिपृग्धि,9.021 |
| Rigvedha_003_0278.wav,स पर्वतो न धरुणेष्वच्युतः सहस्रमूतिस्तविषीषु वावृधे,6.286 |
| Rig_veda_54_0284.wav,आ सिञ्चतु प्रजापतिर्धाता गर्भं दधातु ते,5.876 |
| RigVeda_Part_021_0193.wav,धन्वचरो न वंसगस्तृषाणश्चकमानः पिबतु दुग्धमंशुम्,6.169 |
| Atharvaveda_Part_020_10169.wav,आण्डेव भित्वा शकुनस्य गर्भमुदुस्रियाः पर्वतस्य त्मनाजत्,6.772 |
| Rigveda_32_0146.wav,इन्द्रासोमा वर्तयतं दिवो वधं सं पृथिव्या अघशंसाय तर्हणम्,8.16 |
| RigVeda_Part_015_0094.wav,ये ते शुष्मं ये तविषीमवर्धन्नर्चन्त इन्द्र मरुतस्त ओजः,6.68 |
| RigVeda_51_0350.wav,अस्माभिरिन्द्र सखिभिर्हुवानः सध्रीचीनो मादयस्वा निषद्य,6.971 |
| Rigveda_39_0284.wav,आग्ने याहि मरुत्सखा रुद्रेभिः सोमपीतये,6.289 |
| Rigveda_29_0284.wav,प्रति न स्तोमं त्व,1.741 |
| Rigvedha_013_0139.wav,समाववर्ति विष्ठितो जिगीषुर्विश्वेषां कामश्चरताममाभूत्,6.362 |
| RigVeda_Part_021_0315.wav,प्र सू महे सुशरणाय मेधां गिरं भरे नव्यसीं जायमानाम्,7.758 |
| RigVeda_Part_017_0079.wav,प्रति ष्फुर वि रुज वीड्वंहो जहि रक्षो महि चिद्वावृधानम्,6.398 |
| Rigvedha_009_0027.wav,जुषन्त विश्वान्यस्य कर्मोपस्तुतिं भरमाणस्य कारोः,6.13 |
| RigVeda_53_0319.wav,गच्छतात्,1.548 |
| Atharvaveda_Part_020_30173.wav,बृहस्पतिरभिकनिक्रदद्गा उत प्रास्तौदुच्च विद्वामगायत्,6.699 |
| RigVeda_Part_023_0307.wav,प्र सम्राजे बृहदर्चा गभीरं ब्रह्म प्रियं वरुणाय श्रुताय,6.674 |
| Rigvedha_007_0315.wav,अमन्दान्स्तोमान्प्र भरे मनीषा सिन्धावधि क्षियतो भाव्यस्य,7.429 |
| Rigvedha_007_0369.wav,अयं जायत मनुषो धरीमणि होता यजिष्ठ उशिजामनु व्रतमग्निः स्वमनु व्रतम्,8.474 |
| RigVeda_Part_023_0348.wav,दीर्घं पृथु पप्रथे सद्म पार्थिवं येषामज्मेष्वा महः शर्धांस्यद्भुतैनसाम्,9.526 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0093.wav,अपामसि स्वसा लाक्षे वातो हात्मा बभूव ते सिलाची नाम कानीनोऽजबभ्रु पिता तव,10.742 |
| RigVeda_Part_015_0180.wav,मा ते हरी वृषणा वीतपृष्ठा नि रीरमन्यजमानासो अन्ये,7.111 |
| RigVeda_48_0023.wav,तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे,5.002 |
| Rigvedha_010_0130.wav,अन्यस्य चि,1.504 |
| RigVeda_Part_024_0134.wav,नू नश्चित्रं पुरुवाजाभिरूती अग्ने रयिं मघवद्भ्यश्च धेहि,6.775 |
| Rigveda_36_0144.wav,अग्ने दीदयसि द्यवि पुराग्ने दुरितेभ्यः पुरा मृध्रेभ्यः कवे प्र ण आयुर्वसो तिर,12.011 |
| RigVeda_44_0400.wav,धन्वन्निव प्रपा असि,2.631 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0496.wav,दिव्यादित्याय समनमन्त्स आर्ध्नोत्,4.756 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0330.wav,प्रजापतिर्वि राजति विराडिन्द्रोऽभवद्वशी,4.553 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0302.wav,निधनं भूत्याः प्रजायाः पशूनां भवति य एवं वेद यत्क्षत्तारं ह्वयत्या श्रावयत्येव तत्,10.899 |
| Rig_veda_45_0427.wav,अध ग्मन्तोशना पृच्छते वां कदर्था न आ गृहम्,5.699 |
| Rigvedha_001_0413.wav,ता मित्रस्य प्रशस्तय इन्द्राग्नी ता हवामहे,6.112 |
| Rig_veda_45_0191.wav,अङ्गिरोभिरा गहि यज्ञियेभिर्यम वैरूपैरिह मादयस्व,6.751 |
| RigVeda_Part_024_0214.wav,ऋता यजासि महिना वि यद्भूर्हव्या वह यविष्ठ या ते अद्य,6.893 |
| Atharvaveda_Part_015_0092.wav,स उत्तमां दिशमनु व्यचलत् तमृचश्च सामानि च यजूंषि च ब्रह्म चानुव्यचलन्,5.721 |
| RigVeda_50_0273.wav,पृक्षं वाजस्य सातये पृक्षं रायोत तुर्वणे,5.055 |
| Rigveda_41_0286.wav,पवमानो अति स्रिधोऽभ्यर्षति सुष्टुतिम्,4.471 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0039.wav,स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्,5.397 |
| Rigvedha_008_0048.wav,दादृहाणो वज्रमिन्द्रो गभस्त्योः क्षद्मेव तिग्ममसनाय सं श्यदहिहत्याय सं श्यत्,10.181 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0267.wav,उप हरति हवींष्या सादयति,3.882 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0466.wav,आपो विश्वस्य भेषजीस्तास्ते कृण्वन्तु भेषजम्,4.99 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0585.wav,प्रत्नो हि कमीड्यो अध्वरेषु सनाच्च होता नव्यश्च सत्सि,5.934 |
| RigVeda_Part_028_0114.wav,सं त्वा ध्वस्मन्वदभ्येतु पाथः सं रयि स्पृहयाय्यः सहस्री,7.279 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0057.wav,य पितरः सनीडा घासाद्घासं पुनरा वेशयन्तु,6.107 |
| Rigvedha_009_0326.wav,श्रेष्ठं सवं सविता साविषन्नोऽभीद्धो घर्मस्तदु षु प्र वोचम्,7.595 |
| Rigvedha_003_0345.wav,व्यश्नुहि तर्पया काममेषामथा मनो वसुदेयाय कृष्व,6.627 |
| Rigvedha_006_0137.wav,इन्द्र इन्द्रियैर्मरुतो मरुद्भिरादित्यैर्नो अदितिः शर्म यंसत्,7.371 |
| RigVeda_Part_021_0166.wav,न पञ्चभिर्दशभिर्वष्ट्यारभं नासुन्वता सचते पुष्यता चन,6.8 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0042.wav,इन्द्र जुषस्व प्र वहा याहि शूर हरिभ्याम्,4.817 |
| RigVeda_Part_026_0315.wav,सुमृळीका भवन्तु नः,2.993 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0457.wav,आनृत्यतः शिखण्डिनो गन्धर्वस्याप्सरापतेः,5.024 |
| Rigvedha_009_0224.wav,इष्टं वीतमभिगूर्तं वषट्कृतं तं देवासः प्रति गृभ्णन्त्यश्वम्,7.064 |
| Rigvedha_007_0039.wav,प्र वां दंसांस्यश्विनाववोचमस्य पतिः स्यां सुगवः सुवीरः,6.864 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0490.wav,गर्भो अस्योषधीनां गर्भो हिमवतामुत,5.022 |
| RigVeda_Part_015_0040.wav,इमं कामं मन्दया गोभिरश्वैश्चन्द्रवता राधसा पप्रथश्च,7.24 |
| RigVeda_Part_016_0188.wav,एह यातं पथिभिर्देवयानैर्दस्राविमे वां निधयो मधूनाम्,8.372 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0666.wav,यत्काम इदमभिषिञ्चामि वोऽहमिन्द्रो मरुत्वान्त्स ददातु तन् मे,6.442 |
| Atharvaveda_Part_015_0036.wav,श्यैताय च वै स नौधसाय च सप्तर्षिभ्यश्च सोमाय च राज्ञ आ वृश्चते य एवं विद्वांसं व्रात्यमुपवदति,11.15 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0020.wav,यास्ते शोचयो रंहयो जातवेदो याभिरापृणासि दिवमन्तरिक्षम्,7.277 |
| Rigveda_30_0105.wav,आदित्यासो अदितिर्मादयन्तां मित्रो अर्यमा वरुणो रजिष्ठाः,7.293 |
| Rigvedha_003_0374.wav,वि यत्तिरो धरुणमच्युतं रजोऽतिष्ठिपो दिव आतासु बर्हणा,6.149 |
| Rigveda_38_0172.wav,यस्य श्रुतर्वा बृहन्नार्क्षो अनीक एधते,5.934 |
| RigVeda_Part_025_0056.wav,आ जनाय द्रुह्वणे पार्थिवानि दिव्यानि दीपयोऽन्तरिक्षा,7.061 |
| RigVeda_52_0081.wav,त्राय हन्तवे शविष्ठ,2.482 |
| RigVeda_Part_027_0261.wav,सं यावप्नस्थो अपसेव जनाञ्छ्रुधीयतश्चिद्यतथो महित्वा,7.324 |
| Rigveda_33_0522.wav,जुषाण इन्द्र सप्तिभिर्न आ गहि,3.878 |
| Rigveda_33_0139.wav,परि धर्मेव सूर्यम्,3.25 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0190.wav,पञ्चौदनः पञ्चधा वि क्रमतामाक्रंस्यमानस्त्रीणि ज्योतींषि,7.251 |
| Rigveda_29_0210.wav,आ व इन्द्रं पुरुहूतं नमे गिरा नेमिं त,4.498 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0216.wav,यदाशसा वदतो मे विचुक्षुभे यद्याचमानस्य चरतो जनामनु,6.267 |
| Atharvaveda_Part_015_0066.wav,हैमनावेनं मासौ ध्रुवाया दिशो गोपायतो भूमिश्चाग्निश्चानु तिष्ठतो य एवं वेद,9.535 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0307.wav,स काम कामेन बृहता सयोनी रायस्पोषं यजमानाय धेहि,6.708 |
| Rigveda_37_0014.wav,यद्ध नूनं परावति यद्वा पृथिव्यां दिवि,5.643 |
| RigVeda_Part_021_0350.wav,आ धर्णसिर्बृहद्दिवो रराणो विश्वेभिर्गन्त्वोमभिर्हुवानः,7.572 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0176.wav,चन्द्राय स्वाहा,2.577 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0416.wav,वहमाना भरमाणाः स्वा वसूनि वसुं घर्मं दिवमा रोहतानु,6.852 |
| Rigveda_35_0171.wav,अस्य प्रजावती गृहेऽसश्चन्ती दिवेदिवे,4.594 |
| Rigveda_31_0183.wav,तच्चित्रं राध आ भरोषो यद्दीर्घश्रुत्तमम्,5.515 |
| Atharvaveda_Part_020_40144.wav,पुनरेहि वृषाकपे सुविता कल्पयावहै,4.359 |
| Rigvedha_001_0289.wav,पिबा मित्रस्य धामभिः,3.326 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0212.wav,यथा संमनसौ भूत्वा सखायाविव सचावहै,5.075 |
| Rigveda_31_0282.wav,आ यद्रुहाव वरुणश्च नावं प्र यत्समुद्रमीरयाव मध्यम्,6.782 |
| Rigvedha_014_0362.wav,अग्ने जुषस्व नो हविः पुरोळाशं जातवेदः,5.4270625 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0324.wav,यस्मिन् कस्मिंश्च जायते,3.012 |
| Rigvedha_005_0080.wav,यस्य प्रयांसि पर्षथ शशमानस्य वा नरः स्वेदस्य सत्यशवसः,7.928 |
| Atharvaveda_Part_020_30264.wav,समीचीने धिषणे वि ष्कभायति वृष्णः पीत्वा मद उक्थानि शंसति,6.591 |
| RigVeda_Part_026_0304.wav,अवन्तु मामुषसो जायमाना अवन्तु मा सिन्धवः पिन्वमानाः,8.487 |
| Rigveda_41_0290.wav,कृष्णा तमांसि जङ्घनत्,3.382 |
| Rigvedha_012_0107.wav,ब्रह्मण्यन्त इन्द्र ते नवीय इषमूर्जं सुक्षितिं सुम्नमश्युः,6.475 |
| RigVeda_Part_027_0321.wav,प्र प्रजाभिर्जायते धर्मणस्परि युवोः सिक्ता विषुरूपाणि सव्रता,7.846 |
| Rigvedha_011_0054.wav,त्वष्टा रूपाणि हि प्रभुः पशून्विश्वान्समानजे,5.584 |
| Rigveda_34_0039.wav,सत्रा विश्वा स्वपत्यानि दधिषे,4.246 |
| Atharvaveda_Part_020_40070.wav,अश्वायन्तो मघवन्न् इन्द्र वाजिनो गव्यन्तस्त्वा हवामहे,6.138 |
| Rigvedha_008_0243.wav,ये देवासो दिव्येकादश स्थ पृथिव्यामध्येकादश स्थ,7.057 |
| Rigvedha_006_0151.wav,तां सत्यां श्रद्धामभ्या हि यातमथा सोमस्य पिबतं सुतस्य,6.651 |
| Atharvaveda_Part_020_30400.wav,ओजस्तदस्य तित्विष उभे यत्समवर्तयत्,4.042 |
| Atharvaveda_Part_020_30320.wav,यक्ष्मं मतस्नाभ्यां प्लीह्नो यक्नस्ते वि वृहामसि,5.198 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0593.wav,ब्राह्मणेभ्यो वशां दत्त्वा सर्वांल्लोकान्त्समश्नुते ऋतं ह्यस्यामार्पितमपि ब्रह्माथो तपः,10.996 |
| Rig_veda_45_0450.wav,प्र श्मश्रु दोधुवदूर्ध्वथा भूद्वि सेनाभिर्दयमानो वि राधसा,7.771 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0480.wav,अस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् कर्मण्यस्यां पुरोधायामस्यां प्रतिष्ठायामस्याम् चित्त्यामस्यामाकूत्यामस्यामाशिष्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा मरुतां पिता पशूनामधिपतिः स मावतु,18.728 |
| RigVeda_Part_026_0177.wav,पर्षि तोकं तनयं पर्तृभिष्ट्वमदब्धैरप्रयुत्वभिः,6.482 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0519.wav,यद्वो देवा उपजीका आसिञ्चन् धन्वन्युदकम्,5.222 |
| RigVeda_Part_022_0090.wav,आमेन्यस्य रजसो यदभ्र आँ अपो वृणाना वितनोति मायिनी,8.32 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0019.wav,ताभ्यो गन्धर्वभ्योऽप्सराभ्योऽकरं नमः,6.259 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0120.wav,तस्मिन् हिरण्यये कोशे त्र्यरे त्रिप्रतिष्ठिते तस्मिन् यद्यक्षमात्मन्वत्तद्वै ब्रह्मविदो विदुः,11.506 |
| RigVeda_Part_019_0146.wav,उरु वां रथः परि नक्षति द्यामा यत्समुद्रादभि वर्तते वाम्,7.322 |
| Rigveda_40_0526.wav,वाजं गोमन्तमक्षरन्,3.352 |
| Rigvedha_002_0229.wav,ऋध्याम कर्मापसा नवेन देवैर्द्यावापृथिवी प्रावतं नः,7.619 |
| Rigveda_34_0019.wav,असुन्वामिन्द्र संसदं विषूचीं व्यनाशयः,5.44 |
| RigVeda_44_0013.wav,पशौ न रेत आदधत्पतिर्वचस्यते धियः,4.345 |
| Rigveda_33_0339.wav,अयं सोमो मधुमान्वाजिनीवसू येन वृत्रं चिकेतथः,6.946 |
| Rigvedha_003_0101.wav,स आ वह पुरुहूत प्रचेतसोऽग्ने देवाँ इह द्रवत्,6.8 |
| Rigvedha_008_0091.wav,नेदिष्ठे अस्मिन्नहन्यधि वोचा नु सुन्वते,5.274 |
| Rigvedha_002_0380.wav,रायस्पूर्धि स्वधावोऽस्ति हि तेऽग्ने देवेष्वाप्यम्,6.788 |
| Rigvedha_003_0269.wav,इन्द्र यथा सुतसोमेषु चाकनोऽनर्वाणं श्लोकमा रोहसे दिवि,7.29 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0235.wav,अरायां छ्वकिष्किणो बजः पिङ्गो अनीनशत्,4.94 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0188.wav,स्वर्यन्तो नापेक्षन्त आ द्यां रोहन्ति रोदसी,7.02 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0203.wav,क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति,5.695 |
| RigVeda_Part_020_0240.wav,घृतं न यज्ञ आस्ये सुपूतं गिरं भरे वृषभाय प्रतीचीम्,10.348 |
| Rigvedha_005_0195.wav,उदपप्तन्नरुणा भानवो वृथा स्वायुजो अरुषीर्गा अयुक्षत,7.264 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0032.wav,जङ्गिडो जम्भाद्विशराद्विष्कन्धादभिशोचनात्,6.001 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0330.wav,तेना नो यज्ञं पिपृहि विश्ववारे रयिं नो धेहि सुभगे सुवीरम्,6.36 |
| Rigveda_32_0007.wav,उत स्या नः सरस्वती जुषाणोप श्रवत्सुभगा यज्ञे अस्मिन्,6.993 |
| Rigveda_40_0064.wav,इन्दुरिन्द्रो वृषा हरिः पवमानः,3.604 |
| Rigveda_34_0210.wav,स्वधामनु श्रियं नरो महि त्वेषा अमवन्तो वृषप्सवः,6.223 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0279.wav,दिवमनु वि क्रमेऽहं दिवस्तं निर्भजामो योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः स मा जीवीत्तं प्राणो जहातु,11.583 |
| RigVeda_52_0277.wav,नयिष्ठा उ नो नेषणि पर्षिष्ठा उ नः पर्षण्यति द्विषः,5.533 |
| Rigvedha_007_0052.wav,शुभे रुक्मं न दर्शतं निखातमुदूपथुरश्विना वन्दनाय,6.522 |
| RigVeda_Part_016_0248.wav,वधूयुरिव योषणाम् यो विश्वाभि विपश्यति भुवना सं च पश्यति,8.295 |
| Rigvedha_012_0214.wav,वीळुद्वेषा अनु वश ऋणमाददिः स ह वाजी समिथे ब्रह्मणस्पतिः,7.433 |
| RigVeda_Part_026_0007.wav,नास्य क्षीयन्त ऊतयः,3.683 |
| Atharvaveda_Part_020_10115.wav,वि बाधिष्ट स्य रोदसी महित्वेन्द्रो वृत्राण्यप्रती जघन्वान्,7.332 |
| RigVeda_44_0175.wav,स मामृजे तिरो अण्वानि मेष्यो मीळ्हे सप्तिर्न वाजयुः,7.19 |
| Rigvedha_007_0037.wav,दश रात्रीरशिवेना नव द्यूनवनद्धं श्नथितमप्स्वन्तः,8.016 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0281.wav,रात्रीहि तान् असुतपा य स्तेनो न विद्यते यत्पुनर्न विद्यते,6.403 |
| Atharvaveda_Part_020_10311.wav,एष रारन्तु ते हृदि,2.54 |
| Rigveda_31_0013.wav,अधि यद्वर्प इतऊति,3.423 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0324.wav,तासामर्चींषि पृथगभ्रे चरन्ति तासामाज्यं पुरुषो वर्षमापः,7.186 |
| RigVeda_42_0318.wav,भानुः शुक्रेण शोचिषा व्यद्यौत्प्रारूरुचद्रोदसी मातरा शुचिः,7.94 |
| Rigveda_38_0104.wav,उतो न्वस्य यन्महदश्वावद्योजनं बृहद्,5.26 |
| Atharvaveda_Part_015_0133.wav,ऐनं वशो गच्छति वशी वशिनां भवति य एवं वेद,5.527 |
| RigVeda_49_0118.wav,उभे यथा नो अहनी सचाभुवा सदःसदो वरिवस्यात उद्भिदा,6.827 |
| Rigvedha_009_0012.wav,सिषासन्तः पर्यपश्यन्त सिन्धुमाविरेभ्यो अभवत्सूर्यो नॄन्,8.044 |
| Rigvedha_003_0159.wav,युवोरुषा अनु श्रियं परिज्मनोरुपाचरत्,4.223 |
| RigVeda_50_0081.wav,प्रत्यग्ने हरसा हरः शृणीहि विश्वतः प्रति,4.222 |
| RigVeda_48_0110.wav,स कक्षीवन्तं रेजयत्सो अग्निं नेमिं न,4.872 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0033.wav,इमं सहस्रवीर्येण मृत्योरुत्पारयामसि,4.712 |
| RigVeda_46_0246.wav,सोमस्येव मौजवतस्य भक्षो विभीदको जागृविर्मह्यमच्छान्,7.276 |
| Rigvedha_014_0340.wav,पृथुपाजा अमर्त्यो घृतनिर्णिक्स्वाहुतः,4.616 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0090.wav,शतवारो अनीनशद्यक्ष्मान् रक्षांसि तेजसा,5.428 |
| Rigvedha_012_0058.wav,तदस्मै नव्यमङ्गिरस्वदर्चत शुष्मा यदस्य प्रत्नथोदीरते,6.127 |
| RigVeda_53_0253.wav,ते स्याम ये रणयन्त सोमैरेनोत तुभ्यं रथोळ्ह भक्षैः,9.181 |
| Atharvaveda_Part_020_10198.wav,गोभिष्टरेमामतिं दुरेवां यवेन क्षुधं पुरुहूत विश्वाम्,6.766 |
| Rigveda_41_0051.wav,अभि वाजमुत श्रवः परि द्युक्षः सनद्रयिर्भरद्वाजं नो अन्धसा,8.649 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0050.wav,अस्मै मृत्यो अधि ब्रूहीमं दयस्वोदितोऽयमेतु,7.501 |
| RigVeda_Part_027_0240.wav,न य ईषन्ते जनुषोऽया न्वन्तः सन्तोऽवद्यानि पुनानाः,8.386 |
| RigVeda_43_0313.wav,इन्द्रमा विश बृहता रवेण वर्धया वाचं जनया पुरंधिम्,6.834 |
| Rigvedha_009_0026.wav,ददानमिन्न ददभन्त मन्माग्निर्वरूथं मम तस्य चाकन्,6.593 |
| Rigveda_30_0026.wav,यदा वीरस्य रेवतो दुरोणे स्योनशीरतिथिराचिकेतत्,7.296 |
| RigVeda_Part_027_0194.wav,उत्तानहस्तो युवयुर्ववन्दा वां नक्षन्तो अद्रय आञ्जन्,7.863 |
| RigVeda_Part_015_0227.wav,इन्द्र वृत्राय हन्तवे,3.106 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0076.wav,संवत्सरस्य तेजसा तेन बध्नामि त्वा मणे,4.308 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0269.wav,ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला करः,4.094 |
| Rigvedha_005_0059.wav,त्वष्टा यद्वज्रं सुकृतं हिरण्ययं सहस्रभृष्टिं स्वपा अवर्तयत्,7.089 |
| Rigveda_41_0305.wav,आ भक्षत्कन्यासु नः अयं त आघृणे सुतो घृतं न पवते शुचि आ भक्षत्कन्यासु नः,10.533 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0272.wav,अथो सहस्रचक्षो त्वं प्रति पश्याः किमीदिनः दर्शय मा यातुधानान् दर्शय यातुधान्यः पिशाचान्त्सर्वान् दर्शयेति त्वा रभ ओषधे,14.678 |
| RigVeda_Part_017_0097.wav,पिप्रीषति स्व आयुषि दुरोणे विश्वेदस्मै सुदिना सासदिष्टिः,6.896 |
| Rigveda_34_0203.wav,विष्णोरेषस्य मीळ्हुषाम्,4.077 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0152.wav,अवैरहत्यायेदमा पपत्यात्सुवीरताया इदमा ससद्यात्,6.347 |
| RigVeda_Part_022_0380.wav,को वेद नूनमेषां यत्रा मदन्ति धूतयः,5.614 |
| RigVeda_48_0022.wav,यत्ते विश्वमिदं जगन्मनो जगाम दूरकम्,5.368 |
| Rigvedha_002_0453.wav,मिमीहि श्लोकमास्ये पर्जन्य इव ततनः,4.81 |
| RigVeda_Part_018_0310.wav,अनाधृष्टाभिरा गहि,3.112 |
| Rigveda_37_0300.wav,अयं ते मानुषे जने सोमः,3.192 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0147.wav,उषा अप स्वसुस्तमः सं वर्तयति वर्तनिं सुजातता,5.9 |
| RigVeda_Part_024_0285.wav,यो नो अग्ने दुरेव आ मर्तो वधाय दाशति,5.425 |
| Rig_veda_54_0060.wav,स्त्वां गिरः श्वात्र्या आ ह्वयन्ति,4.045 |
| Rigvedha_010_0231.wav,युक्त्वा वृषभ्यां वृषभ क्षितीनां हरिभ्यां याहि प्रवतोप मद्रिक्,6.949 |
| Rigveda_38_0156.wav,अन्ति षद्भूतु वामवः,3.233 |
| Rigvedha_013_0181.wav,नियुत्वान्सोमपीतये,3.0160625 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0393.wav,परा यात पितरः सोम्यासो गम्भीरैः पथिभिः पूर्याणैः,6.148 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0185.wav,अमुत्रभूयादधि यद्यमस्य बृहस्पते अभिशस्तेरमुञ्चः,5.171 |
| RigVeda_49_0049.wav,उक्थेषु शस्यमानेषु यः पश्यादुत्तरे युगे,5.559 |
| Rigvedha_001_0087.wav,गमद्वाजेभिरा स नः,3.954 |
| Rigveda_38_0457.wav,क्षुमन्तं वाजं शतिनं सहस्रिणं मक्षू गोमन्तमीमहे,7.498 |
| RigVeda_Part_025_0295.wav,अहेळमान उप याहि यज्ञं तुभ्यं पवन्त इन्दवः सुतासः,6.459 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0172.wav,प्रियं पितृभ्य आत्मने ब्रह्मभ्यः कृणुता प्रियम्,4.941 |
| RigVeda_49_0225.wav,साह्याम दासमार्यं त्वया युजा सहस्कृतेन सहसा सहस्वता,6.998 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0595.wav,उन्मोचनप्रमोचने उभे वाचा वदामि ते,4.441 |
| Rigvedha_007_0261.wav,कन्येव तन्वा शाशदानाँ एषि देवि देवमियक्षमाणम्,9.837 |
| Rig_veda_45_0170.wav,सस्थे भवतमिन्दवे नः,2.462 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0313.wav,यस्य जुष्टिं सोमिनः कामयन्ते यं हवन्त इषुमन्तं गविष्टौ,6.13 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0082.wav,निधिं बिभ्रती बहुधा गुहा वसु मणिं हिरण्यं पृथिवी ददातु मे,6.266 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0385.wav,प्राणोऽछिन्नो नो अस्त्वछिन्ना वयमायुषो वर्चसः,5.446 |
| Rigvedha_013_0031.wav,परि णो हेती रुद्रस्य वृज्याः परि त्वेषस्य दुर्मतिर्मही गात्,7.5580625 |
| RigVeda_50_0297.wav,यच्छ्वसन्तो जग्रसाना अराविषुः शृण्व एषां प्रोथथो अर्वतामिव,7.624 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0224.wav,ये माघायवो ध्रुवाया दिशोऽभिदासान्,5.273 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0399.wav,अयं नो नभसस्पतिः सं,2.189 |
| RigVeda_Part_020_0110.wav,वयं ते अग्न उक्थैर्विधेम वयं हव्यैः पावक भद्रशोचे,7.712 |
| RigVeda_Part_022_0052.wav,आ सूर्यो अरुहच्छुक्रमर्णोऽयुक्त यद्धरितो वीतपृष्ठाः,7.098 |
| Atharvaveda_Part_020_10355.wav,स्थिराणि न पराणुदे,2.796 |
| RigVeda_Part_023_0228.wav,परि चिद्वष्टयो दधुर्ददतो राधो अह्रयं सुजाते अश्वसूनृते,7.832 |
| RigVeda_Part_026_0167.wav,यमापो अद्रयो वना गर्भमृतस्य पिप्रति,5.672 |
| Rigvedha_003_0252.wav,त्वमपामपिधानावृणोरपाधारयः पर्वते दानुमद्वसु,6.559 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0268.wav,अपि नह्यामि ते बाहू अपि नह्याम्यास्यम्,4.561 |
| Rigveda_29_0421.wav,पिबत मादयध्वं,1.836 |
| Rigvedha_002_0315.wav,त्रय स्कम्भास स्कभितास आरभे त्रिर्नक्तं याथस्त्रिर्वश्विना दिवा,7.68 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0261.wav,सर्वेभ्योऽङ्गिरोभ्यो विदगणेभ्यः स्वाहा पृथक्सहस्राभ्यां स्वाहा,9.548 |
| RigVeda_Part_024_0208.wav,यज्ञस्य वा निशितिं वोदितिं वा तमित्पृणक्षि शवसोत राया,6.684 |
| Rig_veda_54_0071.wav,ग्राहिर्जग्राह यदि वैतदेनं तस्या इन्द्राग्नी प्र मुमु,7.389 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0369.wav,तदा रोह पुरुष मेध्यो भवन् प्रति त्वा जानन्तु पितरः परेतम्,6.171 |
| Atharvaveda_Part_020_30261.wav,न ये शेकुर्यज्ञियां नावमारुहमिर्मैव ते न्यविशन्त केपयः,6.728 |
| RigVeda_Part_019_0040.wav,ते वो हृदे मनसे सन्तु यज्ञा जुष्टासो अद्य घृतनिर्णिजो गुः,7.573 |
| RigVeda_52_0102.wav,प्रेन्द्राग्निभ्यां सुवचस्यामियर्मि सिन्धाविव प्रेरयं नावमर्कैः,7.489 |
| RigVeda_Part_027_0042.wav,एहि वां विमुचो नपादाघृणे सं सचावहै,5.437 |
| RigVeda_Part_021_0172.wav,सं यज्जनौ सुधनौ विश्वशर्धसाववेदिन्द्रो मघवा गोषु शुभ्रिषु,7.665 |
| Rigvedha_001_0058.wav,चोदयित्री सूनृतानां चेतन्ती सुमतीनाम्,7.031 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0035.wav,अप तस्य बलं तिर महीव द्यौर्वधत्मना,4.779 |
| Atharvaveda_Part_020_30283.wav,तुभ्यमिमे सुतासः,2.128 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0372.wav,प्रियं ते नाम सहुरे गृणीमसि विद्मा तमुत्सं यत आबभूथ,5.454 |
| RigVeda_Part_026_0129.wav,रूपंरूपं प्रतिरूपो बभूव तदस्य रूपं प्रतिचक्षणाय,7.583 |
| RigVeda_53_0162.wav,रातिं वामस्य सुभगां महीमिषं दधासि सानसिं रयिम्,7.375 |
| Rigveda_31_0006.wav,अस्मभ्यं सूर्यावसू,4.123 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0285.wav,तेनेममस्माद्यक्ष्मात्पुरुषं मुञ्चतौषधीरथो कृणोमि भेषजम्,6.749 |
| Rigvedha_006_0344.wav,तिस्रः क्षपस्त्रिरहातिव्रजद्भिर्नासत्या भुज्युमूहथुः पतंगैः,7.633 |
| Rigveda_37_0256.wav,महाँ असुन्वतो वधो भूरि ज्योतींषि सुन्वतो भद्रा इन्द्रस्य रातयः,8.644 |
| Rigveda_31_0320.wav,इन्द्रवायू सुष्टुतिर्वामियाना मार्डीकमी,5.761 |
| Rigveda_30_0216.wav,नहि व ऊतिः पृतनासु मर्धति यस्मा अराध्वं नरः,6.101 |
| Rigveda_34_0336.wav,प्रति रक्षांसि सेधति,2.965 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0111.wav,परा शृणीहि तपसा यातुधानान् पराग्ने रक्षो हरसा शृणीहि,6.988 |
| RigVeda_Part_027_0403.wav,ॐ,3.976 |
| RigVeda_Part_018_0360.wav,ज्येष्ठ आह चमसा द्वा करेति कनीयान्त्रीन्कृणवामेत्याह,8.74 |
| Rigvedha_004_0048.wav,उपह्वरे यदुपरा अपिन्वन्मध्वर्णसो नद्यश्चतस्रः,7.09 |
| Rigvedha_011_0275.wav,शुभ्रस्त्वमिन्द्र वावृधानो अस्मे दासीर्विशः सूर्येण सह्याः,6.9380625 |
| Rigvedha_008_0197.wav,सुतो मित्राय वरुणाय पीतये चारुरृताय पीतये,6.189 |
| Rigveda_39_0022.wav,विद्मा हि यस्ते अद्रिवस्त्वादत्तः सत्य सोमपाः,6.062 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0182.wav,अभयं नक्तमभयं दिवा नः सर्वा आशा मम मित्रं भवन्तु,6.505 |
| Rigveda_33_0343.wav,या भुरण्यथो यद्वा देव भिषज्यथः,4.468 |
| Rigveda_35_0124.wav,प्र स क्षयं तिरते वि महीरिषो यो वो वराय दाशति,6.897 |
| Rigveda_30_0236.wav,धामानि मित्रावरुणा युवाकुः सं यो यूथेव जनिमानि चष्टे उद्वां पृक्षासो मधुमन्तो अस्थुरा सूर्यो अरुहच्छुक्रमर्णः,15.242 |
| RigVeda_47_0083.wav,अच्छा म इन्द्रं मतयः स्वर्विदः सध्रीचीर्विश्वा उशतीरनूषत,7.513 |
| Atharvaveda_Part_020_20249.wav,उत्ते शुष्मं तिरामसि,2.521 |
| Rigveda_40_0614.wav,ध्रुवे सदसि सीदति,2.208 |
| Rigveda_40_0351.wav,सोमश्चमूषु सीदति,2.646 |
| Atharvaveda_Part_020_20437.wav,अविन्द उस्रिया अनु,2.125 |
| RigVeda_Part_015_0011.wav,इमे चिदिन्द्र रोदसी अपारे यत्संगृभ्णा मघवन्काशिरित्ते,7.42 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0050.wav,तिस्रो देवीर्महि नः शर्म यच्छत प्रजायै नस्तन्वे यच्च पुष्टम्,9.113 |
| Rig_veda_54_0183.wav,विश्वभ्राड्भ्राजो महि सूर्यो दृश उरु पप्रथे सह ओजो अच्युतम्,7.56 |
| Rigveda_35_0135.wav,प्रचेतसे,1.976 |
| Atharvaveda_Part_020_40028.wav,ये सोमासः परावति ये अर्वावति सुन्विरे सर्वांस्तामिन्द्र गच्छसि,8.796 |
| Rigveda_30_0346.wav,पातं सोममृतावृधा,3.14 |
| Rigvedha_013_0093.wav,स ईं वृषाजनयत्तासु गर्भं स ईं शिशुर्धयति तं रिहन्ति,6.3830625 |
| Atharvaveda_Part_015_0128.wav,यदेनमाह व्रात्योदकमित्यप एव तेनाव रुन्धे,5.981 |
| RigVeda_48_0126.wav,अध यद्राजाना गविष्टौ सरत्सरण्युः,4.074 |
| RigVeda_52_0200.wav,यश्चिदापो महिना पर्यपश्यद्दक्षं दधाना जनयन्तीर्यज्ञम्,7.819 |
| RigVeda_52_0124.wav,स्वे क्षये शुचिव्रत,3.219 |
| RigVeda_43_0310.wav,पृच्छमानाः,2.11 |
| RigVeda_Part_015_0349.wav,शृण्वन्तमुग्रमूतये समत्सु घ्नन्तं वृत्राणि संजितं धनानाम्,7.958 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0290.wav,दिष्टं नो अत्र जरसे नि नेषज्जरा मृत्यवे परि णो ददात्वथ पक्वेन सह सं भवेम प्रतीच्यै त्वा दिशे वरुणायाधिपतये पृदाकवे रक्षित्रेऽन्नायेषुमते एतं परि दद्मस्तं नो गोपायतास्माकमैतोः दिष्टं नो अत्र जरसे नि नेषज्जरा मृत्यवे परि णो ददात्वथ पक्वेन सह सं भवेम उदीच्यै त्वा दिशे सोमायाधिपतये स्वजाय रक्षित्रेऽशन्या इषुमत्यै,35.442 |
| RigVeda_47_0377.wav,तनूषु विश्वा भुवना नि येमिरे,3.663 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0180.wav,अभयं पश्चादभयं पुरस्तादुत्तरादधरादभयं नो अस्तु,6.679 |
| Rigveda_30_0212.wav,युष्माकं देवा अवसाहनि प्रिय ईजानस्तरति द्विषः,6.834 |
| Rig_veda_54_0205.wav,पर्वता इमे,1.976 |
| RigVeda_48_0127.wav,कारवे जरण्युः,2.388 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0127.wav,शं न इन्द्रो वसुभिर्देवो अस्तु शमादित्येभिर्वरुणः सुशंसः,6.502 |
| Rigveda_37_0179.wav,शिशानो वृषभो यथाग्निः शृङ्गे दविध्वत्,5.439 |
| Rigvedha_001_0276.wav,प्र वो भ्रियन्त इन्दवो मत्सरा मादयिष्णवः,6.419 |
| RigVeda_Part_026_0324.wav,विश्वे देवा मम शृण्वन्तु यज्ञिया उभे रोदसी अपां नपाच्च मन्म,9.06 |
| RigVeda_Part_025_0209.wav,स वह्निभिरृक्वभिर्गोषु शश्वन्मितज्ञुभिः पुरुकृत्वा जिगाय,6.689 |
| Rigveda_39_0297.wav,इन्द्रमिन्दो वृषा विश आ वच्यस्व महि प्सरो वृषेन्दो द्युम्नवत्तमः,8.168 |
| Atharvaveda_Part_016_0231.wav,उषस्पतिर्वाचस्पतिना संविदानो वाचस्पतिना संविदानः,6.684 |
| RigVeda_Part_028_0262.wav,उद्धूमासो अरुषासो दिविस्पृशः समग्निमिन्धते नरः,6.977 |
| Rigveda_39_0242.wav,अभि ष्मो वाजसातये,2.789 |
| Rigveda_34_0170.wav,यजिष्ठं हव्यवाहनम्,2.909 |
| Rigveda_35_0310.wav,आ नो याहि महेमते सहस्रोते शतामघ,5.444 |
| Atharvaveda_Part_020_20279.wav,उदु त्ये मधु मत्तमा गिर स्तोमास ईरते,4.713 |
| Rigvedha_001_0437.wav,अग्ने पत्नीरिहा वह देवानामुशतीरुप,6.119 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0461.wav,पश्यन्ति सर्वे चक्षुषा न सर्वे मनसा विदुः,4.729 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0016.wav,अपामह दिव्यानामपां स्रोतस्यानाम्,5.597 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0070.wav,इमं मे कुष्ठ पूरुषं तमा वह तं निष्कुरु,4.891 |
| RigVeda_Part_022_0098.wav,न तस्य विद्म पुरुषत्वता वयं यतो भगः सविता दाति वार्यम्,7.436 |
| RigVeda_Part_015_0005.wav,स्थिराय वृष्णे सवना कृतेमा युक्ता ग्रावाणः समिधाने अग्नौ,7.465 |
| Rig_veda_45_0461.wav,तत्तदिदस्य पौंस्यं गृणीमसि पितेव यस्तविषीं वावृधे शवः,7.072 |
| Rigveda_31_0167.wav,देवंदेवं राधसे चोदयन्त्यस्मद्र्यक्सूनृता,7.556 |
| Rigveda_37_0412.wav,परोमात्रमृचीषममिन्द्र,3.718 |
| Rigvedha_013_0334.wav,चन्द्रमग्निं चन्द्ररथं हरिव्रतं वैश्वानरमप्सुषदं स्वर्विदम्,7.0810625 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0079.wav,आ रेवती चाश्वयुजौ भगं म आ मे रयिं भरण्य आ वहन्तु,6.741 |
| RigVeda_47_0135.wav,तृतीये त्वा रजसि तस्थिवांसमपामुपस्थे महिषा अवर्धन्,7.336 |
| Rigveda_40_0169.wav,अभि ते मधुना पयोऽथर्वाणो अशिश्रयुः,4.462 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0152.wav,जिह्वा ते मरिष्यतीत्येनमाह,4.178 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0344.wav,यक्ष्माणां सर्वेषां विषं निरवोचमहं त्वत्,5.557 |
| Rigveda_37_0162.wav,शोचा शोचिष्ठ दीदिहि विशे मयो रास्व स्तो,5.676 |
| Rigveda_34_0294.wav,ताभिर्नो मक्षू तूयमश्विना गतं भिषज्यतं यदातुरम्,6.973 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0331.wav,गौरेव तान् हन्यमाना वैतहव्यामवातिरत्,5.296 |
| Rigvedha_005_0173.wav,यः सोम सख्ये तव रारणद्देव मर्त्यः,5.214 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0418.wav,सर्वाण्यस्यां घोराणि सर्वे च मृत्यवः सर्वाण्यस्यां क्रूराणि सर्वे पुरुषवधाः,10.094 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0463.wav,सोदक्रामत्सा सप्तऋषीन् आगच्छत्तां सप्तऋषय उपाह्वयन्त ब्रह्मण्वत्येहीति,8.723 |
| RigVeda_Part_018_0184.wav,शततमं वेश्यं सर्वताता दिवोदासमतिथिग्वं यदावम्,7.571 |
| Rigveda_40_0423.wav,ऽभि योनिं कनि,1.61 |
| Rigvedha_007_0034.wav,शयवे चिन्नासत्या शचीभिर्जसुरये स्तर्यं पिप्यथुर्गाम्,7.533 |
| Rigvedha_008_0155.wav,तेषां पिबतमस्मयू आ नो गन्तमिहोत्या,5.705 |
| Rigveda_38_0284.wav,परिशक्तवे,1.918 |
| Rigvedha_005_0055.wav,तेऽवर्धन्त स्वतवसो महित्वना नाकं तस्थुरुरु चक्रिरे सदः,7.303 |
| Rigveda_37_0079.wav,त्वामिदेव तममे समश्वयुर्गव्युरग्रे मथीनाम्,6.031 |
| RigVeda_49_0175.wav,अक्रीळन्क्रीळन्हरिरत्तवेऽदन्वि पर्वशश्चकर्त गामिवासिः,6.992 |
| Rigvedha_001_0382.wav,ये नाकस्याधि रोचने दिवि देवास आसते,5.85 |
| RigVeda_Part_025_0353.wav,एना मन्दानो जहि शूर शत्रूञ्जामिमजामिं मघवन्नमित्रान्,7.664 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0260.wav,येषां प्रयाजा उत वानुयाजा हुतभागा अहुतादश्च देवाः,6.984 |
| RigVeda_44_0248.wav,क्रत्वे दक्षाय विश्वे च देवाः,3.764 |
| Rig_veda_54_0081.wav,सर्वाङ्ग सर्वं ते चक्षुः सर्वमायुश्च तेऽविदम्,6.075 |
| RigVeda_Part_026_0140.wav,दशो हिरण्यपिण्डान्दिवोदासादसानिषम्,6.036 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0282.wav,भद्रासि रात्रि चमसो न विष्टो विष्वङ्गोरूपं युवतिर्बिभर्षि,6.384 |
| Rigvedha_003_0132.wav,अर्वाञ्चं दैव्यं जनमग्ने यक्ष्व सहूतिभिः,5.212 |
| Rigveda_31_0323.wav,ते वायवे समनसो वि तस्थुर्विश्वेन्नरः स्वपत्य,4.832 |
| Rigveda_35_0349.wav,हंसाविव पतथो अध्वगाविव सोमं सुतं महिषेवाव गच्छथः,7.542 |
| Rigveda_34_0360.wav,पुरुस्पृहः,2.083 |
| RigVeda_46_0285.wav,आयुक्षातामश्विना तूतुजिं रथं स्वस्त्यग्निं समिधानमीमहे,8.171 |
| Rigveda_29_0190.wav,पूर्वीश्चन,1.691 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0213.wav,अत्तो हवींषि प्रयतानि बर्हिषि रयिं च नः सर्ववीरं दधात,6.285 |
| RigVeda_Part_018_0346.wav,बभ्रू यामेषु शोभेते,3.591 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0484.wav,अयं घासो अयं व्रज इह वत्सां नि बध्नीमः,4.283 |
| RigVeda_Part_018_0282.wav,अध त्वे अध सूर्ये,3.211 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0492.wav,याभ्यामन्तरिक्षमावृतमियं च पृथिवी मही,4.978 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0301.wav,य एतं देवमेकवृतं वेद,3.341 |
| Atharvaveda_Part_020_10093.wav,प्रारोचयन् मनवे केतुमह्नामविन्दज्ज्योतिर्बृहते रणाय,6.46 |
| Rigveda_32_0126.wav,अन्यो अन्यमनु गृभ्णात्येनोरपां प्रसर्गे यदमन्दिषाताम्,8.212 |
| Rigveda_36_0313.wav,एतावतस्त ईमह इन्द्र सुम्नस्य गोमतः,5.634 |
| RigVeda_52_0044.wav,सुपर्णं विप्राः कवयो वचोभिरेकं सन्तं बहुधा कल्पयन्ति,6.069 |
| Atharvaveda_Part_020_30287.wav,न गा इन्द्रस्तस्य परा ददाति प्रशस्तमिच्चारुमस्मै कृणोति,6.046 |
| RigVeda_52_0010.wav,नि षु सीद गणपते गणेषु त्वामाहुर्विप्रतमं कवीनाम्,6.876 |
| Atharvaveda_Part_014_0350.wav,तत्रोपविश्य सुप्रजा इममग्निं सपर्यतु,4.07 |
| Rigvedha_012_0002.wav,अध्वर्यवो भरतेन्द्राय सोममामत्रेभिः सिञ्चता मद्यमन्धः कामी हि वीरः सदमस्य पीतिं जुहोत वृष्णे तदिदेष वष्टि,13.009 |
| Rigveda_33_0442.wav,अग्निर्वनेव सासहिः प्र वावृधे,4.636 |
| Rig_veda_54_0225.wav,ग्रावाण उपरेष्वा महीयन्ते सजोषसः,5.776 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0344.wav,ये ब्राह्मणं प्रत्यष्ठीवन् ये वास्मिञ्छुल्कमीषिरे,6.127 |
| Rigvedha_014_0005.wav,पूर्वीर्ऋतस्य संदृशश्चकानः सं दूतो अद्यौदुषसो विरोके,7.7270625 |
| Rigvedha_002_0185.wav,वाजेभिरुप नो हवम्,3.109 |
| Atharvaveda_Part_015_0106.wav,तं प्रजापतिश्च परमेष्ठी च पिता च पितामहश्चापश्च श्रद्धा च वर्षं भूत्वानुव्यवर्तयन्त,9.651 |
| Rigveda_40_0537.wav,सुत इन्द्राय वायवे वरुणाय मरुद्भ्यः,4.672 |
| RigVeda_49_0258.wav,ग्राव्णामिच्छृण्वन्तिष्ठसि न ते अश्नाति पार्थिवः,5.417 |
| RigVeda_Part_020_0121.wav,अग्नये जातवेदसे,3.554 |
| Rigvedha_007_0314.wav,अन्यस्तेषां परिधिरस्तु कश्चिदपृणन्तमभि सं यन्तु शोकाः,6.759 |
| Rig_veda_54_0126.wav,अग्निर्हि विप्रो जुषतां हविर्नः परि हेतिः पक्षिणी नो वृणक्तु,7.245 |
| Rigvedha_004_0241.wav,तमित्सुहव्यमङ्गिरः सुदेवं सहसो यहो,5.137 |
| RigVeda_Part_024_0070.wav,प्र नव्यसा सहसः सूनुमच्छा यज्ञेन गातुमव इच्छमानः,7.083 |
| Atharvaveda_Part_020_20268.wav,कदा सुतं तृषाण ओक आ गम इन्द्र स्वब्दीव वंसगः,5.839 |
| Rigveda_34_0021.wav,तम्वभि प्र गायत पुरुहूतं पुरुष्टुतम्,4.814 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0401.wav,अङ्गानि यस्य यातवः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः यस्य ब्रह्म मुखमाहुर्जिह्वां मधुकशामुत,10.835 |
| Rigvedha_012_0343.wav,मा नो गुह्या रिप आयोरहन्दभन्मा न आभ्यो रीरधो दुच्छुनाभ्यः,8.507 |
| Rigvedha_011_0157.wav,त्वं भगो नृपते वस्व ईशिषे त्वं पायुर्दमे यस्तेऽविधत्,6.444 |
| Rigveda_29_0194.wav,मघोनः स्म वृत्रहत्येषु चोदय ये ददति प्रिया वसु,5.519 |
| RigVeda_42_0286.wav,कृण्वन्संचृतं विचृतमभिष्टय इन्दुः सिषक्त्युषसं न सूर्यः,7.145 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0340.wav,पृथक्सर्वे प्राजापत्याः प्राणान् आत्मसु बिभ्रति,5.356 |
| RigVeda_42_0255.wav,आ नः सोम पवमानः किरा वस्विन्दो भव मघवा राधसो महः,6.77 |
| Rigveda_33_0224.wav,यूयं हि ष्ठा सुदानवो रुद्रा ऋभुक्षणो दमे,4.615 |
| Rigveda_33_0394.wav,ययोरस्ति प्र णः,2.024 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0625.wav,शालायां कृत्यां यां चक्रुः पुनः प्रति हरामि ताम्,5.913 |
| Rigvedha_005_0275.wav,सुगं तत्ते तावकेभ्यो रथेभ्योऽग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव,8.373 |
| Atharvaveda_Part_020_10214.wav,त्वं वर्मासि सप्रथः पुरोयोधश्च वृत्रहन्,4.73 |
| Rigvedha_004_0212.wav,अध क्षरन्ति सिन्धवो न सृष्टाः प्र नीचीरग्ने अरुषीरजानन्,7.172 |
| Rigvedha_013_0099.wav,तुभ्यं हिन्वानो वसिष्ट गा अपोऽधुक्षन्सीमविभिरद्रिभिर्नरः,7.293 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0210.wav,तानि त्वं ब्रह्मणस्पते इषीकामिव सं नमः अरसस्य शर्कोटस्य नीचीनस्योपसर्पतः,9.272 |
| RigVeda_44_0266.wav,स वाज्यक्षाः सहस्ररेता अद्भिर्मृजानो गोभिः श्रीणानः,6.562 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0732.wav,तं ते तपामि वरुणस्य धर्मणा य इमां देवो मेखलामाबबन्ध यः संननाह य उ नो युयोज यस्य देवस्य प्रशिषा चरामः स पारमिच्छात्स उ नो वि मुञ्चात्,16.872 |
| RigVeda_Part_018_0378.wav,अयं वो यज्ञ ऋभवोऽकारि यमा मनुष्वत्प्रदिवो दधिध्वे,7.061 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0219.wav,अङ्गादङ्गात्प्र च्यावय हृदयं परि वर्जय,5.025 |
| Rig_veda_45_0122.wav,पयांसि यह्वो अदितेरदाभ्यः,3.487 |
| RigVeda_49_0159.wav,त्नवो विश्वरूपा अङ्गिरसो न सामभिः,4.598 |
| RigVeda_42_0340.wav,अभिक्रन्दन्कलशं वाज्यर्षति पतिर्दिवः शतधारो विचक्षणः,7.185 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0168.wav,गावः सन्तु प्रजाः सन्त्वथो अस्तु तनूबलम्,4.821 |
| Rigveda_38_0416.wav,शृणुतं जरितुर्हवं कृष्णस्य स्तुवतो नरा,5.157 |
| Rigveda_37_0097.wav,राधस्ते दस्यवे वृक,1.994 |
| RigVeda_Part_026_0236.wav,हुवे वो देवीमदितिं नमोभिर्मृळीकाय वरुणं मित्रमग्निम्,8.137 |
| Rigveda_30_0072.wav,तं वो वयं शुचिमरिप्रमद्य घृतप्रुषं मधुमन्तं वनेम,6.137 |
| Rigvedha_012_0305.wav,माहं मघोनो वरुण प्रियस्य भूरिदाव्न आ विदं शूनमापेः,7.252 |
| RigVeda_Part_025_0266.wav,पन्यसीं धीतिं दैव्यस्य यामञ्जनस्य रातिं वनते सुदानुः,6.762 |
| Atharvaveda_Part_020_10363.wav,विश्वा यदजय स्पृधः,2.709 |
| Rigveda_29_0289.wav,तन्नो रायः,1.271 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0238.wav,स वरुणः सायमग्निर्भवति स मित्रो भवति प्रातरुद्यन् स सविता भूत्वान्तरिक्षेण याति स इन्द्रो भूत्वा तपति मध्यतो दिवम् तस्य देवस्य,13.409 |
| Rigvedha_009_0081.wav,अस्माकं ब्रह्म पृतनासु सह्या अस्माकं वृष्टिर्दिव्या सुपारा,6.926 |
| RigVeda_Part_015_0223.wav,इन्द्रस्य चर्षणीधृतः,2.796 |
| Rigvedha_007_0128.wav,सं यन्मिथः पस्पृधानासो अग्मत शुभे मखा अमिता जायवो रणे,7.074 |
| RigVeda_53_0138.wav,प्रधिं पिता,1.726 |
| RigVeda_Part_022_0049.wav,उत्स आसां परमे सधस्थ ऋतस्य पथा सरमा विदद्गाः,6.968 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0078.wav,आ मे महच्छतभिषग्वरीय आ मे द्वया प्रोष्ठपदा सुशर्म,6.928 |
| Rigveda_36_0121.wav,अस्मिन्यज्ञे स्वध्वरे,3.208 |
| Rigveda_30_0245.wav,अव वेदिं होत्राभिर्यजेत रिपः काश्चिद्वरुणध्रुतः सः,6.556 |
| Rig_veda_54_0241.wav,अपश्यं गोपामनिपद्यमानमा च परा च पथिभिश्चरन्तम्,6.473 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0249.wav,यस्योर्ध्वा दिवं तन्वस्तपन्त्यर्वाङ्सुवर्णैः पटरैर्वि भाति तस्य देवस्य,9.076 |
| Rigveda_32_0100.wav,त्वा सुष्टुतयो गिरो मे यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः,7.076 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0394.wav,म्लापयामि भ्रजः शिभ्रं वरुणस्य व्रतेन ते यथा शेपो अपायातै स्त्रीषु चासदनावयाः,10.38 |
| Rigveda_38_0047.wav,न त्वा वज्रिन्सहस्रं सूर्या अनु न जातमष्ट रोदसी,6.598 |
| Atharvaveda_Part_020_20055.wav,प्र पौरुकुत्सिं त्रसदस्युमावः क्षेत्रसाता वृत्रहत्येषु पूरुम्,6.327 |
| RigVeda_51_0343.wav,सध्रीचीः सिन्धुमुशतीरिवायन्सनाज्जार आरितः पूर्भिदासाम्,8.618 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0293.wav,तेभिर्नो अद्य पारयाति दुर्गाणि विश्वहा,5.371 |
| Rigveda_32_0045.wav,दक्षाय्याय दक्षता सखायः करद्ब्रह्मणे सुतरा सुगाधा,7.606 |
| Rigvedha_007_0251.wav,उदीरतां सूनृता उत्पुरंधीरुदग्नयः शुशुचानासो अस्थुः,7.242 |
| Atharvaveda_Part_020_30063.wav,दिव इत्था जीजनत्सप्त कारून् अह्ना चिच्चक्रुर्वयुना गृणन्तः,7.004 |
| Rigvedha_007_0008.wav,क्षरन्नापो न पायनाय राये सहस्राय तृष्यते गोतमस्य,7.414 |
| RigVeda_Part_015_0311.wav,उत त्वमस्मयुर्वसो,2.861 |
| Rigvedha_010_0043.wav,नित्यं न सूनुं मधु बिभ्रत उप क्रीळन्ति क्रीळा विदथेषु घृष्वयः,7.095 |
| Rigvedha_009_0095.wav,यस्योरुषु त्रिषु विक्रमणेष्वधिक्षियन्ति भुवनानि विश्वा,6.036 |
| Rigvedha_011_0162.wav,त्वमग्न ऋभुराके नमस्यस्त्वं वाजस्य क्षुमतो राय ईशिषे,7.384 |
| Rigveda_38_0008.wav,सूनुं सत्यस्य सत्पतिम्,2.902 |
| Rigvedha_009_0061.wav,उपाह तं गच्छथो वीथो अध्वरमच्छा गिरः सुमतिं गन्तमस्मयू,6.932 |
| RigVeda_51_0339.wav,दूरं किल प्रथमा जग्मुरासामिन्द्रस्य याः प्रसवे सस्रुरापः,6.683 |
| Rigveda_33_0167.wav,विप्रा अतक्ष्म जीवसे,3.158 |
| Rigvedha_014_0291.wav,दृषद्वत्यां मानुष आपयायां सरस्वत्यां रेवदग्ने दिदीहि,7.092 |
| RigVeda_46_0341.wav,तं नो द्यावापृथिवी तन्न आप इन्द्रः शृण्वन्तु मरुतो हवं वचः,7.04 |
| Atharvaveda_Part_020_20026.wav,प्रैतशं सूर्ये पस्पृधानं सौवश्व्ये सुष्विमावदिन्द्रः,6.403 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0487.wav,एको ह देवो मनसि प्रविष्टः प्रथमो जातः स उ गर्भे अन्तः,6.551 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0199.wav,अबोध्यग्निः समिधा जनानां प्रति धेनुमिवायतीमुषासम्,6.414 |
| Rigvedha_010_0044.wav,नक्षन्ति रुद्रा अवसा नमस्विनं न मर्धन्ति स्वतवसो हविष्कृतम्,6.972 |
| RigVeda_50_0259.wav,विश्वे हि विश्वमहसो विश्वे यज्ञेषु यज्ञियाः,5.32 |
| Rigvedha_011_0216.wav,अग्निं देवासो मानुषीषु विक्षु प्रियं धुः क्षेष्यन्तो न मित्रम्,6.46 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0417.wav,सर्वं तदस्तु मे शिवं तज्जुषस्व यविष्ठ्य,3.911 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0112.wav,उप प्रेष्यन्तं पूषणं यो वहात्यञ्जोयानैः पथिभिस्,5.536 |
| Rigvedha_003_0205.wav,सास्मासु धा गोमदश्वावदुक्थ्यमुषो वाजं सुवीर्यम्,7.63 |
| RigVeda_Part_018_0343.wav,प्र ते बभ्रू विचक्षण शंसामि गोषणो नपात्,5.954 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0212.wav,प्रजां धनं च रक्षतु परिपाणः सुमङ्गलः,4.504 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0034.wav,दिवि ते तूलमोषधे पृथिव्यामसि निष्ठितः,4.458 |
| Rigveda_40_0544.wav,चारु प्रियतमं हविः,2.465 |
| Rigveda_38_0178.wav,मन्द्र सुजात सुक्रतोऽमूर दस्मातिथे,5.468 |
| RigVeda_Part_018_0034.wav,अहन्नहिं परिशयानमर्णः प्र वर्तनीररदो विश्वधेनाः,7.311 |
| Rigvedha_001_0230.wav,घृताहवन दीदिवः प्रति ष्म रिषतो दह,5.06 |
| Rigveda_34_0017.wav,विश्वा यदजय स्पृधः,2.662 |
| Rigvedha_009_0278.wav,वि यस्तस्तम्भ षळिमा रजांस्यजस्य रूपे किमपि स्विदेकम्,6.094 |
| Atharvaveda_Part_015_0124.wav,य आदित्यं क्षत्रं दिवमिन्द्रं वेद,4.109 |
| Rigveda_35_0231.wav,न नूनं ब्रह्मणामृणं प्राशूनामस्ति सुन्वताम्,6.585 |
| Rigvedha_011_0171.wav,त्वं तान्सं च प्रति चासि मज्मनाग्ने सुजात प्र च देव रिच्यसे,6.9780625 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0420.wav,यस्तेऽङ्कुशो वसुदानो बृहन्न् इन्द्र हिरण्ययः,4.628 |
| Rigvedha_009_0065.wav,न वां द्यावोऽहभिर्नोत सिन्धवो न देवत्वं पणयो नानशुर्मघम्,7.384 |
| Rigveda_35_0086.wav,अवांस्या वृणीमहे,2.722 |
| Rigveda_38_0291.wav,त्वे वसूनि संगता विश्वा च सोम सौभगा,5.678 |
| Rigveda_36_0043.wav,यस्य श्वेता विचक्षणा तिस्रो भूमीरधिक्षितः त्रिरुत्तराणि पप्रतुर्वरुणस्य ध्रुवं सदः स सप्तानामिरज्यति नभन्तामन्यके समे यः श्वेताँ अधिनिर्णिजश्चक्रे कृष्णाँ अनु व्रता,23.722 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0455.wav,सर्वान् नि मष्मषाकरं दृषदा खल्वामिव,4.598 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0222.wav,पञ्च रुक्मा ज्योतिरस्मै भवन्ति वर्म वासांसि तन्वे भवन्ति,6.608 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0363.wav,अथैषां बहु बिभ्यतामिषवः घ्नन्तु मर्मणि,4.994 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0274.wav,यद्रोदसी रेजमाने भूमिश्च निरतक्षतम्,4.577 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0161.wav,आ रोदसी वरुणानी शृणोतु व्यन्तु देवीर्य ऋतुर्जनीनाम्,6.405 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0072.wav,चतुर्नमो अष्टकृत्वो भवाय दश कृत्वः पशुपते नमस्ते,6.167 |
| Rigveda_41_0137.wav,शुभ्रमन्धो देववातमप्सु धूतो नृभिः सुतः स्वदन्ति गावः पयोभिः आदीमश्वं न हेतारोऽशूशुभन्नमृताय मध्वो रसं सधमादे,18.851 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0336.wav,यो ब्राह्मणं देवबन्धुं हिनस्ति न स पितृयाणमप्येति लोकम्,6.008 |
| Rig_veda_45_0335.wav,यथाहान्यनुपूर्वं भवन्ति यथ ऋतव ऋतुभिर्यन्ति साधु,6.519 |
| Rigveda_29_0172.wav,श्रवच्छ्रुत्कर्ण ईयते वसूनां नू चिन्नो मर्धिषद्गिरः,6.636 |
| RigVeda_44_0289.wav,अध यदिमे पवमान रोदसी इमा च विश्वा भुवनाभि मज्मना,6.977 |
| Rigveda_34_0042.wav,यदिन्द्र मन्मशस्त्वा नाना हवन्त ऊतये अस्माकेभिर्नृभिरत्रा स्वर्जय,9.863 |
| RigVeda_Part_023_0036.wav,ऋतेन विश्वं भुवनं वि राजथः सूर्यमा धत्थो दिवि चित्र्यं रथम्,7.045 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0208.wav,ऋणादृणमिव सं नय कृत्यां कृत्याकृतो गृहम्,5.079 |
| RigVeda_Part_018_0315.wav,न त्वा वरन्ते अन्यथा यद्दित्ससि स्तुतो मघम्,5.452 |
| RigVeda_Part_019_0033.wav,धीरासो हि ष्ठा कवयो विपश्चितस्तान्व एना ब्रह्मणा वेदयामसि,9.117 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0264.wav,तास्ते सन्तु विभ्वीः प्रभ्वीस्तास्ते यमो राजानु मन्यताम्,7.055 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0053.wav,यज्ञं दुहानं सदमित्प्रपीनं पुमांसं धेनुं सदनं रयीणाम्,6.73 |
| Rigveda_37_0037.wav,उपोपेन्नु मघवन्भूय इन्नु ते दानं देवस्य पृच्यते,6.85 |
| RigVeda_Part_017_0140.wav,गुहाध्वनः परमं यन्नो अस्य रेकु पदं न निदाना अगन्म,7.569 |
| RigVeda_Part_026_0099.wav,पुरूणि यश्च्यौत्ना शम्बरस्य वि नवतिं नव च देह्यो हन्,10.697 |
| Rigvedha_013_0364.wav,आ भारती भारतीभिः सजोषा इळा देवैर्मनुष्येभिरग्निः,7.2950625 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0374.wav,समस्मासु यद्दुष्वप्न्यं निर्द्विषते दुष्वप्न्यं सुवाम,5.209 |
| RigVeda_Part_022_0024.wav,सदापृणो यजतो वि द्विषो वधीद्बाहुवृक्तः श्रुतवित्तर्यो वः सचा,8.405 |
| Rigveda_39_0209.wav,ऋधगित्था स मर्त्यः शशमे देवतातये यो नूनं मित्रावरुणावभिष्टय आचक्रे हव्यदातये वर्षिष्ठक्षत्रा उरुचक्षसा नरा राजाना दीर्घश्रुत्तमा ता बाहुता न दंसना रथर्यतः साकं सूर्यस्य रश्मिभिः प्र यो वां मित्रावरुणाजिरो दूतो अद्रवत्,32.244 |
| RigVeda_Part_022_0346.wav,अज्येष्ठासो अकनिष्ठास एते सं भ्रातरो वावृधुः सौभगाय,6.918 |
| Rigveda_40_0272.wav,अनप्तमप्सु दुष्टरं सोमं पवित्र आ सृज,5.318 |
| Atharvaveda_Part_020_20252.wav,इन्द्रो अङ्ग महद्भयमभी षदप चुच्यवत्,4.418 |
| Atharvaveda_Part_014_0362.wav,वर्चो न्वस्यै सं दत्ताथास्तं विपरेतन,5.857 |
| RigVeda_Part_027_0036.wav,शृण्वन्तं पूषणं वयमिर्यमनष्टवेदसम्,5.207 |
| Rigvedha_010_0282.wav,वृष्ण स्थातारा मनसो जवीयानहम्पूर्वो यजतो धिष्ण्या यः,6.872 |
| Rigvedha_001_0469.wav,मित्रं वयं हवामहे वरुणं सोमपीतये,5.59 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0129.wav,अतीव यो मरुतो मन्यते नो ब्रह्म वा यो निन्दिषत्क्रियमाणम्,6.898 |
| Rigvedha_003_0129.wav,आ त्वा विप्रा अचुच्यवुः सुतसोमा अभि प्रयः,5.68 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0389.wav,विलिप्ती या बृहस्पतेऽथो सूतवशा वशा,5.061 |
| Rigveda_35_0072.wav,यो वामुरुव्यचस्तमं चिकेतति नृपाय्यम्,5.838 |
| Rigveda_31_0269.wav,ऋतावानः कवयो यज्ञधीराः प्रचेतसो य इषयन्त मन्म,7.479 |
| Rigvedha_002_0063.wav,वेद नावः समुद्रियः,3.362 |
| Rigveda_32_0358.wav,पुत्रं प्रावर्गं कृणुते सुवीर्ये दाश्नोति नमउक्तिभिः,7.012 |
| RigVeda_47_0104.wav,इन्द्रः पुरस्तादुत मध्यतो नः सखा सखिभ्यो वरिवः कृणोतु,5.928 |
| Rigvedha_008_0350.wav,त्वं ह्यग्ने दिव्यस्य राजसि त्वं पार्थिवस्य पशुपा इव,6.098 |
| RigVeda_52_0252.wav,क्षेमं कृण्वाना जनयो न सिन्धवस्ता अस्य वर्णं शुचयो भरिभ्रति,7.595 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0216.wav,तस्यां श्रयेथां सुकृतः सचेथामधा पक्वान् मिथुना सं भवाथः,6.609 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0164.wav,प्र या जिगाति खर्गलेव नक्तमप द्रुहुस्तन्वं गूहमाना,7.435 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0257.wav,या एव यज्ञ आपः प्रणीयन्ते ता एव ताः यत्तर्पणमाहरन्ति य एवाग्नीषोमीयः पशुर्बध्यते स एव सः यदावसथान् कल्पयन्ति सदोहविर्धानान्येव तत्कल्पयन्ति,19.191 |
| Rigvedha_009_0265.wav,तृतीयो भ्राता घृतपृ,2.797 |
| Rigvedha_002_0171.wav,मंहिष्ठं सिञ्च इन्दुभिः,2.655 |
| Rigveda_32_0213.wav,इन्द्राय सु मदिन्तमं सोमं सोता वरेण्यम्,6.058 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0473.wav,यमो मृत्युरघमारो निर्ऋथो बभ्रुः शर्वोऽस्ता नीलशिखण्डः,5.979 |
| RigVeda_Part_021_0348.wav,आ वेधसं नीलपृष्ठं बृहन्तं बृहस्पतिं सदने सादयध्वम्,6.497 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0518.wav,इन्द्रो युनक्तु बहुधा पयांस्यस्मिन् यज्ञे सुयुजः स्वाहा,6.158 |
| Rigvedha_004_0360.wav,मदेमदे हि नो ददिर्यूथा गवामृजुक्रतुः,5.842 |
| Atharvaveda_Part_020_40106.wav,वि हि सोतोरसृक्षत नेन्द्रं देवममंसत,4.756 |
| Rigvedha_014_0045.wav,प्राची अध्वरेव तस्थतुः सुमेके ऋतावरी ऋतजातस्य सत्ये,7.221 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0019.wav,रक्षन्तु त्वाग्नयो ये अप्स्वन्ता रक्षतु त्वा मनुष्या यमिन्धते,10.009 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0429.wav,सर्वाणि तस्मिन् ज्योतींषि यानि त्रीणि प्रजापतौ,5.376 |
| RigVeda_51_0113.wav,धीरा देवेषु सुम्नया,3.546 |
| RigVeda_48_0134.wav,वर्धदुक्थैर्वचोभिरा हि नूनं व्यध्वैति पयस उस्रियायाः,7.796 |
| Rigveda_35_0009.wav,सं या दानूनि येमथुर्दिव्याः पार्थिवीरिषः,6.215 |
| Rigveda_36_0188.wav,समानमु प्र शंसिषम् ऋभुक्षणं न वर्तव उक्थेषु तुग्र्यावृधम् इन्द्रं सोमे सचा सुते,11.57 |
| Atharvaveda_Part_020_40065.wav,यद्वा रुमे रुशमे श्यावके कृप इन्द्र मादयसे सचा,6.307 |
| Atharvaveda_Part_020_10057.wav,यदन्तरा परावतमर्वावतं च हूयसे,5.239 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0261.wav,यत्पुरा परिवेषात्स्वादमाहरन्ति पुरोडाशावेव तौ,6.326 |
| Rigveda_34_0405.wav,एवा नूनमुप स्तुहि वैयश्व दशमं नवम्,4.88 |
| Rig_veda_45_0132.wav,यदी विशो वृणते दस्ममार्या अग्निं होतारमध धीरजायत,7.786 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0278.wav,स धाता स विधर्ता स वायुर्नभ उच्छ्रितम्,4.138 |
| Rigveda_39_0199.wav,नेन्द्रो अस्तीति नेम उ त्व आह क ईं ददर्श कमभि ष्टवाम,7.77 |
| Atharvaveda_Part_020_40252.wav,अहुल कुश वर्त्तक,2.227 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0436.wav,यन्त्यस्यामन्त्रणमामन्त्रणीयो भवति य एवं वेद,5.582 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0044.wav,यथा सुपर्णः प्रपतन् पक्षौ निहन्ति भूम्याम्,4.859 |
| Atharvaveda_Part_014_0372.wav,तास्ते जनित्रमभि ताः परेहि नमस्ते गन्धर्वर्तुना कृणोमि,6.591 |
| RigVeda_Part_018_0041.wav,त्वं महीमवनिं विश्वधेनां तुर्वीतये वय्याय क्षरन्तीम्,8.148 |
| Atharvaveda_Part_020_20104.wav,इन्द्र यद्दस्युहाभवः,2.65 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0215.wav,तिस्रो देवीर्बर्हिरेदं स्योनं सरस्वतीः स्वपसः सदन्ताम्,6.257 |
| RigVeda_51_0265.wav,वर्तते दक्षिणायाः,2.505 |
| Rigvedha_005_0064.wav,आ गच्छन्तीमवसा चित्रभानवः कामं विप्रस्य तर्पयन्त धामभिः,7.418 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0121.wav,सनादग्ने मृणसि यातुधानान् न त्वा रक्षांसि पृतनासु जिग्युः,6.176 |
| Rigvedha_001_0209.wav,त्वामभि प्र णोनुमो जेतारमपराजितम्,5.647 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0769.wav,न्यस्तिका रुरोहिथ सुभगंकरणी मम शतं तव प्रतानास्त्रयस्त्रिंशन् नितानाः,7.685 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0239.wav,मित्रावरुणयोर्भाग स्थ अपां शुक्रमापो देवीर्वर्चो अस्मासु धत्त,8.267 |
| Atharvaveda_Part_020_10059.wav,उद्घेदभि श्रुतामघं वृषभं नर्यापसम्,4.207 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0178.wav,तीर्त्वा तमांसि बहुधा महान्त्यजो नाकमा क्रमतां तृतीयम्,6.913 |
| Rigveda_38_0103.wav,वेति स्तोतव अम्ब्यम्,3.174 |
| RigVeda_47_0356.wav,यत्ते जामित्वमवरं परस्या महन्महत्या,4.606 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0596.wav,कृणोमि विद्वान् भेषजं यदानुन्मदितोऽसति,4.673 |
| RigVeda_43_0227.wav,क्रीळञ्चम्वोरा विश पूयमान इन्द्रं ते रसो मदिरो ममत्तु,9.566 |
| RigVeda_Part_023_0122.wav,नि बर्हिषि सदतां सोमपीतये,4.008 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0541.wav,अन्तर्धेहि जातवेद,2.047 |
| RigVeda_Part_026_0211.wav,मिथस्तुरा विचरन्ती पावके मन्म श्रुतं नक्षत ऋच्यमाने,7.927 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0131.wav,दुष्ट्यै हि त्वा भत्स्यामि दूषयिष्यामि काबवम्,4.556 |
| RigVeda_49_0123.wav,अप हत रक्षसो भङ्गुरावत स्कभायत निरृतिं सेधतामतिम्,6.875 |
| RigVeda_Part_018_0134.wav,ऋतस्य श्लोको बधिरा ततर्द कर्णा बुधानः शुचमान आयोः,7.722 |
| RigVeda_Part_026_0243.wav,यदीमर्भे महति वा हितासो बाधे मरुतो अह्वाम देवान्,8.635 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0313.wav,ततोऽपरूपं जायते तस्मादव्येष्यदेनसः,5.127 |
| RigVeda_Part_015_0105.wav,दाधार यः पृथिवीं द्यामुतेमां जजान सूर्यमुषसं सुदंसाः,7.753 |
| Rigvedha_014_0109.wav,विश्वान्यद्यज्ञाँ अभिपासि मानुष तव क्रत्वा यविष्ठ्य,6.8590625 |
| Atharvaveda_Part_017_0111.wav,त्वमिन्द्रेमं सुहवं स्तोममेरयस्व स नो मृड सुमतौ ते स्याम तवेद्विष्णो बहुधा वीर्याणि,9.976 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0148.wav,तं त्वा सीसेन विध्यामो यथा नोऽसो अवीरहा,5.412 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0288.wav,ओषधीरनु वि क्रमेऽहमोषधीभ्यस्तं निर्भजामो योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः स मा जीवीत्तं प्राणो जहातु विष्णोः क्रमोऽसि सपत्नहाप्सुसंशितो वरुणतेजाः,17.978 |
| RigVeda_Part_021_0272.wav,कथा महे रुद्रियाय ब्रवाम कद्राये चिकितुषे भगाय,6.47 |
| RigVeda_46_0079.wav,यस्यानक्षा दुहिता जात्वास कस्तां विद्वाँ अभि मन्याते अन्धाम्,8.976 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0218.wav,ह्रूडुर्नामासि हरितस्य देव स नः संविद्वान् परि वृङ्ग्धि तक्मन्,6.3 |
| RigVeda_Part_016_0247.wav,तां जुषस्व गिरं मम वाजयन्तीमवा धियम्,5.476 |
| Rigvedha_012_0047.wav,विश्वे ह्यस्मै यजताय धृष्णवे क्रतुं भरन्ति वृषभाय सश्चते,6.822 |
| Rigvedha_010_0284.wav,जिष्णुर्वामन्यः सुमखस्य सूरिर्दिवो अन्यः सुभगः पुत्र ऊहे,6.775 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0153.wav,वि द्यामेषि रजस्पृथ्वहर्मिमानो अक्तुभिः,4.443 |
| Rigveda_33_0549.wav,इह त्या सधमाद्या युजानः सोमपीतये,5.824 |
| RigVeda_Part_024_0065.wav,स मर्त्येष्वमृत प्रचेता राया द्युम्नेन श्रवसा वि भाति,7.274 |
| Rigveda_33_0263.wav,प्रं हवमानम्,1.834 |
| Atharvaveda_Part_015_0146.wav,तद्यस्यैवं विद्वान् व्रात्य एकां रात्रिमतिथिर्गृहे वसति,6.606 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0001.wav,धीती वा ये अनयन् वाचो अग्रं मनसा वा येऽवदन्न् ऋतानि,6.753 |
| Rigvedha_008_0097.wav,वि तद्वोचेरध द्वितान्तः पश्यन्ति रश्मिभिः स घा विदे अन्विन्द्रो गवेषणो बन्धुक्षिद्भ्यो गवेषणः,12.41 |
| Rigveda_37_0416.wav,यः पूर्व्यामनुष्टुतिमीशे कृष्टीनां नृतुः,5.135 |
| RigVeda_Part_023_0175.wav,अश्विनावेह गच्छतं नासत्या मा वि वेनतम्,5.399 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0304.wav,त्रिवृतं स्तोमं त्रिवृत आप आहुस्तास्त्वा रक्षन्तु त्रिवृता त्रिवृद्भिः,7.167 |
| RigVeda_49_0257.wav,आच्छद्विधानैर्गुपितो बार्हतैः सोम रक्षितः,5.552 |
| Rig_veda_45_0074.wav,यद्वाहमभिदुद्रोह यद्वा शेप उतानृतम्,4.956 |
| Rigveda_39_0247.wav,अग्निं समुद्रवाससम्,3.107 |
| Rigvedha_007_0072.wav,अजोहवीदश्विना तौग्र्यो वां प्रोळ्हः समुद्रमव्यथिर्जगन्वान्,7.161 |
| RigVeda_44_0234.wav,विश्वा वसूनि बिभ्रतम्,2.897 |
| RigVeda_Part_023_0198.wav,स तोकमस्य पीपरच्छमीभिरनूर्ध्वभासः सदमित्तुतुर्यात्,6.941 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0285.wav,अन्तर्गर्भश्चरति देवतास्वाभूतो भूतः स उ जायते पुनः,6.487 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0370.wav,तं वै ब्रह्मज्य ते देवा अपां भागमधारयन्,5.466 |
| RigVeda_Part_019_0088.wav,सत्वा भरिषो गविषो दुवन्यसच्छ्रवस्यादिष उषसस्तुरण्यसत्,7.09 |
| Rigveda_35_0003.wav,सनात्सुजाता तनया धृतव्रता,4.625 |
| RigVeda_Part_017_0100.wav,इह त्वा भूर्या चरेदुप त्मन्दोषावस्तर्दीदिवांसमनु द्यून्,7.951 |
| Rigveda_32_0184.wav,प्रति चक्ष्व वि चक्ष्वेन्द्रश्च सोम जागृतम् रक्षोभ्यो वधमस्यतमशनिं यातुमद्भ्यः,10.218 |
| RigVeda_47_0125.wav,गोभिष्टरेमामतिं दुरेवां यवेन क्षुधं पुरुहूत विश्वाम्,6.991 |
| Rigveda_40_0057.wav,सुशिल्पे बृहती मही पवमानो वृषण्यति,5.104 |
| RigVeda_49_0117.wav,आ व ऋञ्जस ऊर्जां व्युष्टिष्विन्द्रं मरुतो रोदसी अनक्तन,6.743 |
| Rigveda_32_0109.wav,त्रयः कोशास उपसेचनासो मध्व श्चोतन्त्यभितो विरप्शम्,6.642 |
| Rigvedha_011_0029.wav,अत्रा चिन्नो मधो पितोऽरं भक्षाय गम्याः,5.1280625 |
| Rigveda_37_0320.wav,तं त्वा वयं हवामहे,3.352 |
| Rigveda_30_0200.wav,उत क्षोदन्ति रोदसी महित्वा नक्षन्ते नाकं निरृतेरवंशात्,7.78 |
| RigVeda_43_0243.wav,स्वादुः पवाते अति वारमव्यमा सीदाति कलशं देवयुर्नः,7.185 |
| Rigvedha_014_0270.wav,तुभ्यं श्चोतन्त्यध्रिगो शचीव स्तोकासो अग्ने मेदसो घृतस्य,7.22 |
| Rigveda_37_0208.wav,त्वं ह्येहि चेरवे विदा भगं वसुत्तये,4.9 |
| Rigveda_40_0330.wav,हरिः सन्योनिमासदत्,2.746 |
| RigVeda_Part_025_0127.wav,त्वं शिरो अमर्मणः पराहन्नतिथिग्वाय शंस्यं करिष्यन्,7.058 |
| RigVeda_44_0392.wav,स्वना न यस्य भामासः पवन्ते रोचमानस्य बृहतः सुदिवः,6.98 |
| RigVeda_42_0314.wav,अप्सु द्रप्सं वावृधानं समुद्र आ सिन्धोरूर्मा मधुमन्तं पवित्र आ,8.437 |
| Rigveda_33_0125.wav,नि शुष्ण इन्द्र धर्णसिं वज्रं जघन्थ दस्यवि,4.917 |
| Rigveda_31_0261.wav,अचेतयदचितो देवो अर्यो गृत्सं राये कवितरो जुनाति,7.234 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0232.wav,वेणोरद्गा इवाभितोऽसमृद्धा अघायवः,4.8 |
| Rigveda_34_0380.wav,इन्द्र यथा ह्यस्ति तेऽपरीतं नृतो शवः,5.0 |
| RigVeda_Part_021_0203.wav,यूने समस्मै क्षितयो नमन्तां श्रुतरथाय मरुतो दुवोया,7.026 |
| RigVeda_43_0138.wav,ये दुःषहासो वनुषा बृहन्तस्ताँस्ते अश्याम पुरुकृत्पुरुक्षो,7.946 |
| Rigveda_32_0112.wav,स रेतोधा वृषभः शश्वतीनां तस्मिन्नात्मा जगतस्तस्थुषश्च,8.733 |
| Rig_veda_45_0373.wav,परि वो विश्वतो दध ऊर्जा घृतेन पयसा,4.987 |
| Rigvedha_013_0173.wav,विषूवृतं मनसा युज्यमानं तं जिन्वथो वृषणा पञ्चरश्मिम्,6.7650625 |
| RigVeda_Part_023_0134.wav,घर्मं यद्वामरेपसं नासत्यास्ना भुरण्यति,5.79 |
| RigVeda_51_0245.wav,महि ज्योतिः पितृभिर्दत्तमागादुरुः पन्था दक्षिणाया अदर्शि उच्चा दिवि दक्षिणावन्तो अस्थुर्ये अश्वदाः सह ते सूर्येण,14.484 |
| RigVeda_44_0244.wav,मः इन्द्रस्य हार्दि सोमधानमा विश समुद्रमिव सिन्धवः,7.013 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0314.wav,स वा अद्भ्योऽजायत तस्मादापोऽजायन्त,4.891 |
| Rigvedha_002_0089.wav,स यामनि प्रति श्रुधि,2.307 |
| RigVeda_51_0269.wav,इन्द्रस्य दूतीरिषिता चरामि मह,4.084 |
| Atharvaveda_Part_015_0176.wav,योऽस्य द्वितीयः प्राणः प्रौढो नामासौ स आदित्यः,8.055 |
| Rigveda_35_0209.wav,पुरं न शूर दर्षसि,2.589 |
| Rig_veda_45_0407.wav,प्रियो यमस्य काम्यो विवक्षसे,3.367 |
| Rigvedha_005_0283.wav,यं भद्रेण शवसा चोदयासि प्रजावता राधसा ते स्याम,8.029 |
| Atharvaveda_Part_014_0195.wav,शुक्रावनड्वाहावास्तां यदयात्सूर्या पतिम्,5.66 |
| RigVeda_43_0106.wav,विष्टम्भो दिवो धरुणः पृथिव्या विश्वा उत क्षितयो हस्ते अस्य,6.622 |
| RigVeda_50_0130.wav,इन्द्राय गिरो अनिशितसर्गा अपः प्रेरयं सगरस्य बुध्नात्,6.579 |
| RigVeda_Part_027_0190.wav,आ यो अर्वाङ्नासत्या ववर्त प्रेष्ठा ह्यसथो अस्य मन्मन्,7.632 |
| Rig_veda_54_0123.wav,तस्मा अर्चाम कृणवाम,3.543 |
| RigVeda_Part_021_0351.wav,ग्ना वसान ओषधीरमृध्रस्त्रिधातुशृङ्गो वृषभो वयोधाः,7.218 |
| Rigvedha_008_0090.wav,त्वया वयं मघवन्पूर्व्ये धन इन्द्रत्वोताः सासह्याम पृतन्यतो वनुयाम वनुष्यतः,9.516 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0487.wav,उत्तिष्ठत सं नह्यध्वं मित्रा देवजना यूयम्,4.568 |
| RigVeda_Part_026_0054.wav,स मन्दस्वा ह्यन्धसो राधसे तन्वा महे,6.484 |
| Rig_veda_54_0108.wav,अङ्गादङ्गाल्लोम्नोलोम्नो जातं पर्वणिपर्वणि,7.093 |
| Rigvedha_010_0025.wav,अनुत्तमा ते मघवन्नकिर्नु न त्वावाँ अस्ति देवता विदानः,6.599 |
| RigVeda_Part_028_0367.wav,युध्मो अनर्वा खजकृत्समद्वा शूरः सत्राषाड्जनुषेमषाळ्हः,7.31 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0287.wav,तन्वं स्वर्गो बहुधा वि चक्रे यथा विद आत्मन्न् अन्यवर्णाम् अपाजैत्कृष्णां रुशतीं पुनानो या लोहिनी तां ते अग्नौ जुहोमि,13.531 |
| Rigvedha_003_0419.wav,वैश्वानरो दस्युमग्निर्जघन्वाँ अधूनोत्काष्ठा अव शम्बरं भेत्,8.547 |
| Atharvaveda_Part_018_1_0171.wav,न वा उ ते तनूं तन्वा सं पिपृच्यां पापमाहुर्यः स्वसारं निगच्छात्,9.665 |
| RigVeda_44_0315.wav,बलं दधान आत्मनि करिष्यन्वीर्यं महदिन्द्रायेन्दो परि स्रव,8.126 |
| Rigvedha_007_0185.wav,त्तु प्र रोच्यस्या उषसो न सूरः,3.735 |
| RigVeda_43_0272.wav,अत्यो न क्रदो हरिरा सृजानो मर्यो देव धन्व पस्त्यावान्,7.768 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0313.wav,उज्जिहीध्वे स्तनयत्यभिक्रन्दत्योषधीः,4.637 |
| Rigveda_30_0116.wav,ते चिद्धि पूर्वे कवयो गृणन्तः पुरो मही दधिरे देवपुत्रे,7.175 |
| RigVeda_48_0312.wav,विभिद्या पुरं शयथेमपाचीं निस्त्रीणि साकमुदधेरकृन्तत्,7.071 |
| RigVeda_47_0305.wav,औक्षन्घृतैरस्तृणन्बर्हिरस्मा आदिद्धोतारं न्यसादयन्त,7.427 |
| Rigvedha_014_0046.wav,इळामग्ने पुरुदंसं सनिं गोः शश्वत्तमं हवमानाय साध,6.784 |
| Atharvaveda_Part_020_20042.wav,स नो वक्षदनिमानः सुवह्नेन्द्रो विश्वान्यति दुर्गहाणि,6.105 |
| RigVeda_Part_024_0170.wav,विश्वं स देव प्रति वारमग्ने धत्ते धान्यं पत्यते वसव्यैः,8.398 |
| RigVeda_Part_023_0193.wav,प्रातर्यजध्वमश्विना हिनोत न सायमस्ति देवया अजुष्टम्,6.185 |
| Atharvaveda_Part_020_40012.wav,व्रतान्यस्य सश्चिरे पुरूणि पूर्वचित्तये वस्वीरनु स्वराज्यम्,6.905 |
| RigVeda_Part_018_0017.wav,ममच्चिदापः शिशवे ममृड्युर्ममच्चिदिन्द्रः सहसोदतिष्ठत्,6.21 |
| Rigvedha_001_0207.wav,रथीतमं रथीनां वाजानां सत्पतिं पतिम्,6.748 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0454.wav,तां द्विमूर्धार्त्व्योऽधोक्तां मायामेवाधोक्,6.252 |
| Atharvaveda_Part_020_10085.wav,इन्द्रं स्तोमेभिर्महयन्त आयवः प्रियमेधासो अस्वरन्,6.353 |
| Rigvedha_002_0092.wav,वसिष्वा हि मियेध्य वस्त्राण्यूर्जां पते,5.279 |
| RigVeda_Part_022_0216.wav,अतीयाम निदस्तिरः स्वस्तिभिर्हित्वावद्यमरातीः,6.384 |
| RigVeda_Part_017_0044.wav,सुकर्माणः सुरुचो देवयन्तोऽयो न देवा जनिमा धमन्तः,7.068 |
| RigVeda_Part_020_0294.wav,ये वयं ये च सूरयः स्वस्ति धामहे सचोतैधि पृत्सु नो वृधे,7.384 |
| Rigvedha_003_0042.wav,वि दुर्गा वि द्विषः पुरो घ्नन्ति राजान एषाम् नयन्ति दुरिता तिरः सुगः पन्था अनृक्षर आदित्यास ऋतं यते,13.12 |
| Rigveda_40_0590.wav,इन्दुमिन्द्राय पीतये,3.227 |
| Rigveda_40_0456.wav,पुनान इन्दुरिन्द्रमा,2.573 |
| Rigvedha_008_0174.wav,ज्योतिष्मतीमदितिं धारयत्क्षितिं स्वर्वतीमा सचेते दिवेदिवे जागृवांसा दिवेदिवे,10.277 |
| RigVeda_Part_019_0232.wav,स सुष्टुभा स ऋक्वता गणेन वलं रुरोज फलिगं रवेण,6.512 |
| RigVeda_44_0138.wav,सहस्रं याहि पथिभिः कनिक्रदत्,2.888 |
| RigVeda_50_0053.wav,तदग्ने चक्षुः प्रति धेहि रेभे शफारुजं येन पश्यसि यातुधानम्,7.177 |
| Rigvedha_001_0094.wav,आ त्वा विशन्त्वाशवः सोमास इन्द्र गिर्वणः,6.523 |
| Atharvaveda_Part_020_20450.wav,इन्द्रो वज्री हिरण्ययः,3.308 |
| Rigvedha_011_0151.wav,त्वमर्यमा सत्पतिर्यस्य सम्भुजं त्वमंशो विदथे देव भाजयुः,6.7590625 |
| Rig_veda_54_0030.wav,द्भिरस्माकं भूत्वविता तनूनाम्,4.599 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0358.wav,यमबध्नाद्बृहस्पतिर्देवेभ्यो असुरक्षितिम्,4.275 |
| RigVeda_Part_016_0181.wav,आ द्योतनिं वहति शुभ्रयामोषस स्तोमो अश्विनावजीगः,7.999 |
| Rigveda_37_0247.wav,यद्धंसि वृत्रमोजसा शचीपते भद्रा इन्द्रस्य रातयः,6.12 |
| RigVeda_44_0262.wav,इन्दुः पविष्ट चारुर्मदायापामुपस्थे कविर्भगाय,6.045 |
| Atharvaveda_Part_014_0387.wav,यं मे दत्तो ब्रह्मभागं वधूयोर्वाधूयं वासो वध्वश्च वस्त्रम्,7.48 |
| Rigveda_35_0141.wav,पत्नीवन्तो वषट्कृताः ते नो गोपा अपाच्यास्त उदक्त इ,8.538 |
| RigVeda_48_0123.wav,नस्त्वं याळाश्वघ्नस्य वावृधे सूनृताभिः,5.199 |
| Rigveda_39_0272.wav,धनमग्निं नक्षन्त नो गिरः,3.605 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0187.wav,ब्रह्मा मा तत्र नयतु ब्रह्मा ब्रह्म दधातु मे,4.903 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0071.wav,अंसौ को अस्य तद्देवः कुसिन्धे अध्या दधौ,4.96 |
| Rigveda_37_0098.wav,शतं श्वेतास उक्षणो दिवि तारो न रोचन्ते,6.552 |
| Atharvaveda_Part_018_1_0159.wav,बृहन् मित्रस्य वरुणस्य धाम कदु ब्रव आहनो वीच्या नॄन्,6.394 |
| Rigveda_38_0038.wav,यो राजा चर्षणीनां याता रथेभिरध्रिगुः,5.742 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0345.wav,तृन्द्धि मे सर्वान् दुर्हार्दो तृन्द्धि मे द्विषतो मणे,5.492 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0406.wav,विष्टारिणमोदनं ये पचन्ति नैनान् यमः परि मुष्णाति रेतः,6.279 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0513.wav,वेदिष्टे चर्म भवतु बर्हिर्लोमानि यानि ते एषा त्वा रशनाग्रभीद्ग्रावा त्वैषोऽधि नृत्यतु,11.2 |
| Rigveda_35_0088.wav,सुतावन्तो वायुं द्युम्ना जनासः,4.906 |
| Atharvaveda_Part_014_0236.wav,युवं भगं सं भरतं समृद्धमृतं वदन्तावृतोद्येषु,5.81 |
| RigVeda_42_0137.wav,नृधूतो अद्रिषुतो बर्हिषि प्रियः पतिर्गवां प्रदिव इन्दुरृत्वियः,7.481 |
| Rigveda_37_0031.wav,स त्विमा विश्वा भुवनानि चिक्रददादिज्जनिष्ट पौंस्यम्,7.785 |
| Rigveda_40_0045.wav,प्रीणन्वृषा कनिक्रदत्,2.518 |
| Rigvedha_013_0052.wav,धेनुर्न शिश्वे स्वसरेषु पिन्वते जनाय रातहविषे महीमिषम्,7.616 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0369.wav,को ददर्श प्रथमं जायमानमस्थन्वन्तं यदनस्था बिभर्ति भूम्या असुरसृगात्मा क्व स्वित्को विद्वांसमुप गात्प्रष्टुमेतत्,14.25 |
| Rigvedha_006_0144.wav,चक्राथे हि सध्र्यङ्नाम भद्रं सध्रीचीना वृत्रहणा उत स्थः,7.725 |
| Rigveda_32_0189.wav,यच्चिद्धि त्वा जना इमे नाना हवन्त ऊतये,6.068 |
| RigVeda_50_0188.wav,नाभ्या आसीदन्तरिक्षं शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत,6.504 |
| RigVeda_Part_019_0163.wav,नरो यद्वामश्विना स्तोममावन्सधस्तुतिमाजमीळ्हासो अग्मन्,8.288 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0133.wav,प्रादेवीर्मायाः सहते दुरेवाः शिशीते शृङ्गे रक्षोभ्यो विनिक्षे,8.431 |
| Rigveda_30_0328.wav,त्रीणि ये येमुर्विदथानि धीतिभिर्विश्वानि परिभूतिभिः,6.307 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0233.wav,वरुणानी ते माता यमः पिताररुर्नामासि,4.765 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0427.wav,यस्तन् न वेद किमृचा करिष्यति य इत्तद्विदुस्ते अमी समासते ऋचः पदं मात्रया कल्पयन्तोऽर्धर्चेन चकॢपुर्विश्वमेजत्,14.081 |
| RigVeda_Part_017_0285.wav,परि त्रिविष्ट्यध्वरं यात्यग्नी रथीरिव,4.798 |
| Rigveda_39_0047.wav,सर्वं तदिन्द्र ते वशे यद्वा प्रवृद्ध सत्पते न मरा इति मन्यसे,9.597 |
| Rigvedha_003_0384.wav,इमे त इन्द्र ते वयं पुरुष्टुत ये त्वारभ्य चरामसि प्रभूवसो,7.061 |
| RigVeda_Part_022_0241.wav,न वोऽश्वाः श्रथयन्ताह सिस्रतः सद्यो अस्याध्वनः पारमश्नुथ,7.347 |
| RigVeda_Part_016_0021.wav,मन्दानः सोमं पपिवाँ ऋजीषिन्समस्मभ्यं पुरुधा गा इषण्य,8.17 |
| RigVeda_Part_025_0041.wav,ये अश्रमास उरवो वहिष्ठास्तेभिर्न इन्द्राभि वक्षि वाजम्,7.271 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0185.wav,पृथिव्योरसा,2.029 |
| Atharvaveda_Part_020_30117.wav,गौराद्वेदीयामवपानमिन्द्रो विश्वाहेद्याति सुतसोममिच्छन्,8.418 |
| Rig_veda_45_0104.wav,आ घा ता गच्छानुत्तरा युगा,3.663 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0086.wav,मोपाराम जिह्वयेयमानम्,3.52 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0009.wav,तस्मै ते द्यावापृथिवी रेवतीभिः कामं दुहातामिह शक्वरीभिः,7.514 |
| Rigveda_40_0447.wav,एष इन्द्राय वायवे स्वर्जित्परि षिच्यते,5.325 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0407.wav,गौरमीमेदभि वत्सं मिषन्तं मूर्धानं हिङ्ङकृणोन् मातवा उ,6.984 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0035.wav,अम्बयो यन्त्यध्वभिर्जामयो अध्वरीयताम्,5.392 |
| Atharvaveda_Part_020_20083.wav,व्यन्तरिक्षमतिरन् मदे सोमस्य रोचना,5.368 |
| RigVeda_43_0281.wav,तक्षद्यदी मनसो वेनतो वाग्ज्येष्ठस्य वा धर्मणि क्षोरनीके,8.382 |
| RigVeda_Part_027_0354.wav,बृहस्पतिः समजयद्वसूनि महो व्रजान्गोमतो देव एषः,7.168 |
| Rigvedha_011_0019.wav,अस्माकमविता भव,2.552 |
| Rigveda_34_0290.wav,आ यातं सोमपीतये पिबतं दाशुषो गृहे,6.219 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0083.wav,देवास्ते चीतिमविदन् ब्रह्माण उत वीरुधः,5.374 |
| Rigvedha_014_0091.wav,हंसा इव श्रेणिशो यतानाः शुक्रा वसानाः स्वरवो न आगुः,7.1280625 |
| Rigvedha_001_0102.wav,युञ्जन्ति ब्रध्नमरुषं चरन्तं परि तस्थुषः,6.314 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0110.wav,शं नो ग्रहाश्चान्द्रमसाः शमादित्यश्च राहुणा शं नो मृत्युर्धूमकेतुः शं रुद्रास्तिग्मतेजसः,11.92 |
| RigVeda_43_0118.wav,तिग्मायुधः क्षिप्रधन्वा समत्स्वषाळ्हः साह्वान्पृतनासु शत्रून्,8.04 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0099.wav,दुर्णाम्नः सर्वांस्तृध्वाव रक्षांस्यक्रमीत्,5.147 |
| Atharvaveda_Part_020_20140.wav,इन्द्रो दीर्घाय चक्षस आ सूर्यं रोहयद्दिवि,5.455 |
| RigVeda_47_0367.wav,पीत्वी सोमस्य दिव आ वृधानः शूरो निर्युधाधमद्दस्यून्,7.143 |
| RigVeda_Part_027_0072.wav,यदिन्द्रो अनयद्रितो महीरपो वृषन्तमः,5.402 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0776.wav,एवा नि शुष्य मां कामेनाथो शुष्कास्या चर यथा नकुलो विछिद्य संदधात्यहिं पुनः,9.495 |
| Rigveda_41_0195.wav,घ्नन्तो विश्वा अप द्विषः पवमाना दिवस्पर्यन्तरिक्षादसृक्षत,7.628 |
| Rigvedha_009_0246.wav,त्रीणि त आहुर्दिवि बन्धनानि त्रीण्यप्सु त्रीण्यन्तः समुद्रे,7.0 |
| Rigvedha_002_0034.wav,उरुं हि राजा वरुणश्चकार सूर्याय पन्थामन्वेतवा उ,6.981 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0345.wav,अस्नस्ते मध्ये कुल्यायाः केशान् खादन्त आसते,5.536 |
| RigVeda_Part_028_0259.wav,स योजते अरुषा विश्वभोजसा स दुद्रवत्स्वाहुतः,6.201 |
| Atharvaveda_Part_014_0432.wav,प्रजयैनौ स्वस्तकौ विश्वमायुर्व्यश्नुताम्,4.856 |
| Atharvaveda_Part_020_40443.wav,उरुष्यतं जरितारं युवं ह श्रितः कामो नासत्या युवद्रिक्,6.18 |
| Rigveda_36_0256.wav,विदा देवा अघानामादित्यासो अपाकृतिम्,5.71 |
| Rigveda_37_0314.wav,रथे वहन्तु बिभ्रतः,2.817 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0390.wav,तेजोऽसि तेजो मयि धेहि,2.971 |
| Rigvedha_001_0221.wav,सहस्रं यस्य रातय उत वा सन्ति भूयसीः,5.637 |
| Rigvedha_003_0325.wav,त्वमस्मै कुत्समतिथिग्वमायुं महे राज्ञे यूने अरन्धनायः,6.829 |
| RigVeda_47_0121.wav,समीचीने धिषणे वि ष्कभायति वृष्णः पीत्वा मद उक्थानि शंसति,6.929 |
| Rigvedha_003_0421.wav,शातवनेये शतिनीभिरग्निः पुरुणीथे जरते सूनृतावान्,6.625 |
| Rigvedha_013_0356.wav,सप्त होत्राणि मनसा वृणाना इन्वन्तो विश्वं प्रति यन्नृतेन,6.7740625 |
| RigVeda_Part_024_0039.wav,शर्धो वा यो मरुतां ततक्ष ऋभुर्न त्वेषो रभसानो अद्यौत्,7.389 |
| Rigvedha_003_0024.wav,त्वामिद्धि सहसस्पुत्र मर्त्य उपब्रूते धने हिते,5.54 |
| Rigveda_36_0198.wav,वधीर्मा शूर भूरिषु,3.712 |
| Rigveda_37_0165.wav,यथा चिद्वृद्धमतसमग्ने संजूर्वसि क्षमि,5.767 |
| Rigveda_41_0314.wav,यः पोता स पुनातु नः,2.833 |
| Atharvaveda_Part_020_40187.wav,य आक्ताक्षः सुभ्यक्तः सुमणिः सुहिरण्यवः,5.36 |
| RigVeda_51_0129.wav,अस्मिन्नाजौ पुरुहूत श्रवाय्ये धनभक्षेषु नोऽव,6.308 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0283.wav,विष्णोः क्रमोऽसि सपत्नहा ऋक्संशितो सामतेजाः,5.442 |
| Rigveda_34_0238.wav,यूयं सखायः सप्तयः याभिः सिन्धुमवथ याभिस्तूर्वथ याभिर्दशस्यथा क्रिविम्,10.51 |
| RigVeda_46_0348.wav,अनागास्त्वेन हरिकेश सूर्याह्नाह्ना नो वस्यसावस्यसोदिहि,7.704 |
| Rigvedha_002_0055.wav,गीर्भिर्वरुण सीमहि,2.866 |
| Rigvedha_001_0399.wav,युवाना पितरा पुनः सत्यमन्त्रा ऋजूयवः,6.687 |
| Rigvedha_003_0362.wav,दानाय मनः सोमपावन्नस्तु तेऽर्वाञ्चा हरी वन्दनश्रुदा कृधि,6.838 |
| Atharvaveda_Kanda_2_0097.wav,तासु त्वान्तर्जरस्या दधामि प्र यक्ष्म एतु निर्ऋतिः पराचैः,6.978 |
| RigVeda_50_0035.wav,उतान्तरिक्षे परि याहि राजञ्जम्भैः सं धेह्यभि यातुधानान्,7.204 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0286.wav,योगेयोगे तवस्तरं वाजेवाजे हवामहे,5.791 |
| RigVeda_51_0237.wav,कीनारेव स्वेदमासिष्विदाना,4.09 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0481.wav,सं वो मनांसि सं व्रता समाकूतीर्नमामसि,4.972 |
| Rigveda_36_0274.wav,त्रिताय तद्विभावर्याप्त्याय परा वहानेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः,10.215 |
| Rigvedha_008_0247.wav,अभि द्विजन्मा त्रिवृदन्नमृज्यते संवत्सरे वावृधे जग्धमी पुनः,7.781 |
| Rigvedha_014_0196.wav,त्वं देहि सहस्रिणं रयिं नोऽद्रोघेण वचसा सत्यमग्ने,6.5 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0276.wav,विष्णोः क्रमोऽसि सपत्नहान्तरिक्षसंशितो वायुतेजाः,6.0 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0136.wav,शं न ऋभवः सुकृतः सुहस्ताः शं नो भवतु पितरो हवेषु,6.081 |
| RigVeda_46_0256.wav,अक्षासो अस्य वि तिरन्ति कामं प्रतिदीव्ने दधत आ कृतानि,6.936 |
| Rigvedha_008_0304.wav,स्तृणानासो यतस्रुचो बर्हिर्यज्ञे स्वध्वरे,5.759 |
| RigVeda_Part_015_0120.wav,न त्वा गभीरः पुरुहूत सिन्धुर्नाद्रयः परि षन्तो वरन्त,6.975 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0183.wav,उप प्रागात्सहस्राक्षो युक्त्वा शपथो रथम्,4.546 |
| RigVeda_Part_018_0165.wav,को नानाम वचसा सोम्याय मनायुर्वा भवति वस्त उस्राः,7.652 |
| Rigveda_30_0137.wav,सस्तु माता सस्तु पिता सस्तु श्वा सस्तु विश्पतिः,5.216 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0264.wav,द्यौश्च म इदं पृथिवी च प्रचेतसौ शुक्रो बृहन् दक्षिणया पिपर्तु,6.119 |
| Rigvedha_011_0051.wav,यज्ञं नो यक्षतामिमम्,2.879 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0287.wav,तस्येमे नव कोशा विष्टम्भा नवधा हिताः स प्रजाभ्यो वि पश्यति यच्च प्राणति यच्च न,9.541 |
| Rigveda_31_0301.wav,प्र वीरया शुचयो दद्रिरे वामध्वर्युभिर्मधुमन्तः सुतासः,6.876 |
| Rigveda_40_0072.wav,अभि त्यं मद्यं मदमिन्दविन्द्र इति क्षर,4.242 |
| Rigveda_34_0181.wav,तव क्रत्वा सनेयं तव रातिभिरग्ने तव प्रशस्तिभिः,6.546 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0043.wav,एवा परि ष्वजस्व मां यथा मां कामिन्यसो यथा मन् नापगा असः,6.733 |
| Rigveda_41_0318.wav,त्रिभिष्ट्वं देव सवितर्वर्षिष्ठैः सोम धामभिः अग्ने दक्षैः पुनीहि नः,8.508 |
| Atharvaveda_Part_014_0288.wav,तामन्वर्तिष्ये सखिभिर्नवग्वैः क इमान् विद्वान् वि चचर्त पाशान्,7.083 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0105.wav,एना व्याघ्रं परिषस्वजानाः सिंहं हिन्वन्ति महते सौभगाय समुद्रं न सुभुवस्तस्थिवांसं मर्मृज्यन्ते द्वीपिनमप्स्वन्तः,16.125 |
| RigVeda_Part_021_0265.wav,उषासानक्ता विदुषीव विश्वमा हा वहतो मर्त्याय यज्ञम्,7.35 |
| Rigvedha_009_0045.wav,कदा चन प्रजिगतो अदेवयोः,4.224 |
| RigVeda_Part_019_0331.wav,मही द्यावापृथिवी इह ज्येष्ठे रुचा भवतां शुचयद्भिरर्कैः,8.481 |
| Rigvedha_009_0275.wav,पाकः पृच्छामि मनसाविजानन्देवानामेना निहिता पदानि,6.68 |
| Rig_veda_45_0088.wav,न यत्पुरा चकृमा कद्ध नूनमृता वदन्तो अनृतं रपेम,5.446 |
| Rigveda_41_0131.wav,विश्वान्यभि सौभगा,2.954 |
| RigVeda_53_0262.wav,प्रथेताम्,1.639 |
| RigVeda_49_0283.wav,ये भूतस्य प्रचेतस इदं तेभ्योऽकरं नमः,5.184 |
| RigVeda_51_0227.wav,सृण्येव जर्भरी तुर्फरीतू नैतोशेव तुर्फरी पर्फ,6.391 |
| RigVeda_42_0149.wav,स्रक्वे द्रप्सस्य धमतः समस्वरन्नृतस्य योना समरन्त नाभयः,7.102 |
| RigVeda_Part_018_0096.wav,अकारि ते हरिवो ब्रह्म नव्यं धिया स्याम रथ्यः सदासाः,7.486 |
| Rig_veda_54_0299.wav,यस्मै पुत्रासो अदितेः प्र जीवसे मर्त्याय,5.861 |
| RigVeda_Part_028_0269.wav,त्वे अग्ने स्वाहुत प्रियासः सन्तु सूरयः,4.84 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0157.wav,पद्भिः सेदिमवक्रामन्न् इरां जङ्घाभिरुत्खिदन्,5.002 |
| Atharvaveda_Part_014_0417.wav,बृहस्पतिनावसृष्टां विश्वे देवा अधारयन्,5.079 |
| Rigvedha_008_0133.wav,तुभ्यमुषासः शुचयः परावति भद्रा,4.083 |
| RigVeda_Part_023_0192.wav,प्रातर्हि यज्ञमश्विना दधाते प्र शंसन्ति कवयः पूर्वभाजः,7.06 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0067.wav,देवा यद्यज्ञं तन्वाना अबध्नन् पुरुषं पशुम्,5.152 |
| RigVeda_Part_026_0049.wav,शचीभिरप नो वरत्,3.251 |
| Atharvaveda_Part_020_30281.wav,तीव्रस्याभिवयसो अस्य पाहि सर्वरथा वि हरी इह मुञ्च,6.171 |
| Rigvedha_011_0344.wav,जातूष्ठिरस्य प्र वयः सहस्वतो या चकर्थ सेन्द्र वि,5.88 |
| Rigvedha_008_0201.wav,प्रप्र पूष्ण,1.899 |
| Rigvedha_003_0128.wav,श्रुत्कर्णं सप्रथस्तमं विप्रा अग्ने दिविष्टिषु,5.24 |
| Rigvedha_013_0130.wav,विश्वस्य हि श्रुष्टये देव ऊर्ध्वः प्र बाहवा पृथुपाणिः सिसर्ति,7.098 |
| RigVeda_49_0013.wav,आ वां देवास उशती उशन्त उरौ सीदन्तु सुभगे उपस्थे,7.326 |
| Rigvedha_005_0078.wav,अवोभिश्चर्षणीनाम्,3.196 |
| Rigveda_30_0109.wav,आदित्यासो अदितयः स्याम पूर्देवत्रा वसवो मर्त्यत्रा,6.866 |
| RigVeda_Part_017_0275.wav,ऊर्ध्वं केतुं सविता देवो अश्रेज्ज्योतिर्विश्वस्मै भुवनाय कृण्वन्,8.231 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0240.wav,अग्ने तपस्तप्यामह उप तप्यामहे तपः,4.523 |
| RigVeda_Part_026_0206.wav,स्तुषे जनं सुव्रतं नव्यसीभिर्गीर्भिर्मित्रावरुणा सुम्नयन्ता,8.708 |
| Rigvedha_013_0027.wav,भूरेर्दातारं सत्पतिं गृणीषे स्तुतस्त्वं भेषजा रास्यस्मे,8.0290625 |
| RigVeda_Part_028_0374.wav,यज्ञैर्य इन्द्रे दधते दुवांसि क्षयत्स राय ऋतपा ऋतेजाः,7.417 |
| Rigvedha_010_0312.wav,तं युञ्जाथां मनसो यो जवीयान्त्रिवन्धुरो वृषणा यस्त्रिचक्रः,7.281 |
| Rigvedha_014_0140.wav,अग्निं सूनुं सनश्रुतं सहसो जातवेदसम्,4.672 |
| RigVeda_Part_020_0212.wav,स क्षेपयत्स पोषयद्भुवद्वाजस्य सातय उतैधि पृत्सु नो वृधे,8.148 |
| RigVeda_Part_027_0084.wav,पूषा सुबन्धुर्दिव आ पृथिव्या इळस्पतिर्मघवा दस्मवर्चाः,7.285 |
| Rigvedha_014_0294.wav,अग्ने सहस्व पृतना अभिमातीरपास्य,4.9570625 |
| RigVeda_47_0034.wav,युवोर्ह मक्षा पर्यश्विना मध्वासा भरत निष्कृतं न योषणा,6.527 |
| Rigveda_31_0200.wav,यस्य देवा गच्छथो वीथो अध्वरं न तं म,4.773 |
| RigVeda_Part_017_0083.wav,निवचना कवये काव्यान्यशंसिषं मतिभिर्विप्र उक्थैः,7.071 |
| RigVeda_49_0074.wav,सनामाना चिद्ध्वसयो न्यस्मा अवाहन्निन्द्र उषसो यथानः,7.141 |
| RigVeda_Part_017_0037.wav,रत्नं भर शशमानाय घृष्वे पृथु श्चन्द्रमवसे चर्षणिप्राः,7.022 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0047.wav,एवा पर्येमि ते मनो यथा मां कामिन्यसो यथा मन् नापगा असः,6.955 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0150.wav,त्वं तान् इन्द्र वृत्रहन् प्रतीचः पुनरा कृधि यथामुं तृणहां जनम्,6.297 |
| Atharvaveda_Part_016_0220.wav,अन्तकोऽसि मृत्युरसि,2.543 |
| RigVeda_Part_018_0382.wav,आ वाजा यातोप न ऋभुक्षा महो नरो द्रविणसो गृणानाः,7.594 |
| RigVeda_Part_016_0210.wav,मित्रो देवेष्वायुषु जनाय वृक्तबर्हिषे,5.535 |
| Rigvedha_010_0178.wav,तीर्थे नाच्छा तातृषाणमोको दीर्घो न सिध्रमा कृणो,6.515 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0589.wav,वशाया दुग्धमपिबन्त्साध्या वसवश्च ये,5.234 |
| RigVeda_46_0126.wav,नि सुद्र्वं दधतो वक्षणासु यत्रा कृपीटमनु तद्दहन्ति,7.182 |
| RigVeda_52_0177.wav,चोदयामि त आयुधा वचोभिः सं ते शिशामि ब्रह्मणा वयांसि,8.182 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0412.wav,त्रयस्त्रिंशेन जगती कथमनुष्टुप्कथमेकविंशः,5.55 |
| Rig_veda_54_0110.wav,अपेहि मनसस्पतेऽप क्राम परश्चर,4.814 |
| Rigvedha_005_0039.wav,त्वमङ्ग प्र शंसिषो देवः शविष्ठ मर्त्यम्,4.93 |
| Rigvedha_012_0027.wav,स धारयत्पृथिवीं पप्रथच्च सोमस्य ता मद इन्द्रश्चकार,5.914 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0042.wav,तावन्तो अस्य महिमानस्ततो ज्यायांश्च पूरुषः,6.139 |
| RigVeda_Part_017_0090.wav,उदग्ने तिष्ठ प्रत्या तनुष्व न्यमित्राँ ओषतात्तिग्महेते,8.111 |
| Atharvaveda_Part_020_40349.wav,महान् वै भद्रो बिल्वो महान् भद्र उदुम्बरः,4.942 |
| Rigvedha_004_0116.wav,अत्यो नाज्मन्सर्गप्रतक्तः सिन्धुर्न क्षोदः क ईं वराते,7.321 |
| Rigveda_39_0111.wav,एतो न्विन्द्रं स्तवाम शुद्धं शुद्धेन साम्ना शुद्धैरुक्थैर्वावृध्वांसं शुद्ध आशीर्वान्ममत्तु,15.162 |
| Rigveda_30_0167.wav,प्रक्रीळिनः पयोधाः,2.577 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0220.wav,भूतो भविष्यत्भुवनस्य यस्पतिः तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति,10.452 |
| Rigvedha_005_0171.wav,सोम रारन्धि नो हृदि गावो न यवसेष्वा,5.544 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0160.wav,अद्या मुरीय यदि यातुधानो अस्मि यदि वायुस्ततप पुरुषस्य,6.529 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0450.wav,यत्तच्छरीरमशयत्संधया संहितं महत्,4.493 |
| Rigveda_37_0358.wav,सोम इद्वः सुतो अस्तु कलयो मा बिभीतन,5.156 |
| Rigveda_29_0024.wav,यस्ते मदो युज्यश्चारुरस्ति येन वृत्राणि हर्यश्व हंसि,5.925 |
| Rigveda_33_0244.wav,समु त्ये महतीरपः सं क्षोणी समु सूर्यम्,5.617 |
| RigVeda_52_0184.wav,एवा महान्बृहद्दिवो अथर्वावोचत्स्वां तन्वमिन्द्रमेव,9.292 |
| Rigvedha_003_0256.wav,त्वं कुत्सं शुष्णहत्येष्वाविथारन्धयोऽतिथिग्वाय शम्बरम्,6.267 |
| RigVeda_47_0319.wav,तिष्मतः पथो रक्ष धिया कृतान्,3.066 |
| RigVeda_Part_028_0011.wav,न यं यावा तरति यातुमावान्,4.14 |
| RigVeda_53_0008.wav,तिरश्चीनो विततो रश्मिरेषामधः स्विदासीदुपरि स्विदासीत्,13.924 |
| RigVeda_53_0002.wav,किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्नम्भः किमासीद्गहनं गभीरम्,7.292 |
| Rigvedha_006_0267.wav,समानबन्धू अमृते अनूची द्यावा वर्णं चरत आमिनाने,7.75 |
| Rigvedha_003_0339.wav,त्वं रथमेतशं कृत्व्ये धने त्वं पुरो नवतिं दम्भयो नव,6.257 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0721.wav,अग्न उन् मादया त्वमसौ मामनु शोचतु,4.046 |
| Rigvedha_010_0335.wav,एष वां स्तोमो अश्विनावकारि मानेभिर्मघवाना सुवृक्ति,6.926 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0345.wav,उदरात्ते क्लोम्नो नाभ्या हृदयादधि,5.031 |
| Rigveda_37_0173.wav,त्वामिद्धि नेदि,1.754 |
| Rig_veda_54_0075.wav,तमा हरामि निरृतेरुपस्थादस्पार्षमेनं शतशारदाय,7.144 |
| Rigveda_33_0385.wav,प्र दक्षाय प्रचेतसा,3.101 |
| Rigveda_31_0133.wav,गवां नेत्री वाजपत्नी न उच्छोषः सुजाते प्रथमा,7.109 |
| Rigveda_39_0064.wav,श्रुतं वो वृत्रहन्तमं प्र शर्धं चर्षणीनाम् आ शुषे राधसे महे अया धिया च गव्यया पुरुणामन्पुरुष्टुत,15.165 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0250.wav,सपत्नीं मे परा णुद पतिं मे केवलं कृधि,4.713 |
| RigVeda_Part_019_0052.wav,तं नो वाजा ऋभुक्षण इन्द्र नासत्या रयिम्,5.255 |
| Rigvedha_002_0404.wav,प्र वः शर्धाय घृष्वये त्वेषद्युम्नाय शुष्मिणे,6.155 |
| Rigvedha_014_0115.wav,औक्षन्घृतैरस्तृणन्बर्हिरस्मा आदिद्धोतारं न्यसादयन्त,7.322 |
| Rigvedha_012_0101.wav,आ यद्रयिं गुहदवद्यमस्मै भरदंशं नैतशो दशस्यन्,5.8490625 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0164.wav,प्रभञ्जंछत्रून् प्रमृणन्न् अमित्रान् अस्माकमेध्यविता तनूनाम्,7.262 |
| Rig_veda_45_0128.wav,सो चिन्नु भद्रा क्षुमती यशस्वत्युषा उवास मनवे स्वर्वती,6.676 |
| Rigveda_32_0308.wav,अयं सहस्रमृषिभिः सहस्कृतः समुद्र इव पप्रथे,5.867 |
| RigVeda_Part_024_0263.wav,स हि विश्वाति पार्थिवा रयिं दाशन्महित्वना,5.106 |
| Rigveda_38_0310.wav,भवा नः सोम शं हृदे,3.359 |
| Rigvedha_005_0117.wav,तद्ग्रावाणः सोमसुतो मयोभुवस्तदश्विना शृणुतं धिष्ण्या युवम्,7.15 |
| RigVeda_Part_015_0384.wav,उत ऋतुभिरृतुपाः पाहि सोममिन्द्र देवेभिः सखिभिः सुतं नः,6.724 |
| Atharvaveda_Part_020_40149.wav,षष्टिं सहस्रा नवतिं च कौरम आ रुशमेषु दद्महे,5.985 |
| RigVeda_43_0089.wav,स्ता दिव्या यथा विट्,2.141 |
| RigVeda_48_0223.wav,उत माता बृहद्दिवा शृणोतु नस्त्वष्टा देवेभिर्जनिभिः पिता वचः,7.577 |
| Rigveda_33_0423.wav,स्वां चाग्ने तन्वं पिप्रयस्वास्मभ्यं च सौभगमा यजस्व,9.127 |
| Rigvedha_011_0059.wav,स्वाहाकृतीषु रोचते,3.0890625 |
| Rigvedha_002_0101.wav,इमा उ षु श्रुधी गिरः,2.924 |
| Rigvedha_013_0019.wav,स्थिरेभिरङ्गैः पुरुरूप उग्रो बभ्रुः शुक्रेभिः,5.1960625 |
| RigVeda_Part_015_0192.wav,शुनं हुवेम मघवानमिन्द्रमस्मिन्भरे नृतमं वाजसातौ,6.44 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0255.wav,तं वधेयं तं स्तृषीयानेन ब्रह्मणानेन कर्मणानया मेन्या,7.405 |
| Rigvedha_007_0173.wav,क्रंसते अध्वरे यजत्रः,2.953 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0476.wav,या अक्षेषु प्रमोदन्ते शुचं क्रोधं च बिभ्रती,5.26 |
| Rigveda_40_0464.wav,क्रदद्दशभिर्जामिभिर्यतः,2.858 |
| Rigveda_41_0311.wav,एष तुन्नो अभिष्टुतः पवित्रमति गाहते रक्षोहा वारमव्ययम्,8.099 |
| Atharvaveda_Part_020_10201.wav,इन्द्रः पुरस्तादुत मध्यतो नः सखा सखिभ्यः वरिवः कृणोतु,5.784 |
| Rigvedha_004_0335.wav,यदिन्द्र वज्रिन्नोजसा वृत्रं मरुत्वाँ अवधीरर्चन्ननु स्वराज्यम्,8.567 |
| RigVeda_44_0241.wav,रावरुणा करामह एन्द्रमवसे महे,4.798 |
| Rigveda_29_0206.wav,शिक्षेयमिन्महयते दिवेदिवे राय आ कुहचिद्विदे,6.076 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0002.wav,पशूणां सर्वेषां स्फातिं गोष्ठे मे सविता करत्,6.282 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0322.wav,यमेन त्वं पितृभिः संविदान उत्तमं नाकमधि रोहयेमम्,5.274 |
| RigVeda_Part_019_0089.wav,सत्यो द्रवो द्रवरः पतंगरो दधिक्रावेषमूर्जं स्वर्जनत्,7.66 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0116.wav,सर्वाणि शं भवन्तु मे शं मे अस्त्वभयं मे अस्तु,5.669 |
| RigVeda_Part_028_0325.wav,अजासश्च शिग्रवो यक्षवश्च बलिं शीर्षाणि जभ्रुरश्व्यानि,6.994 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0403.wav,आ पुष्टमेत्वा वसु,2.387 |
| RigVeda_44_0136.wav,अस्मभ्यं गातुवि,2.01 |
| Rigveda_39_0076.wav,तुभ्यं सोमाः सुता इमे स्तीर्णं बर्हिर्विभावसो स्तोतृभ्य इन्द्रमा वह आ ते दक्षं वि रोचना दधद्रत्ना वि दाशुषे,15.732 |
| Rigvedha_013_0231.wav,उद्गातेव शकुने साम गायसि ब्रह्मपुत्र इव सवनेषु शंससि,6.512 |
| Rigveda_36_0222.wav,य आददिः स्वर्नृभिर्यः पृतनासु दुष्टरः,6.444 |
| Rigveda_38_0061.wav,त्वं न इन्द्रासां हस्ते शविष्ठ दावने,5.318 |
| Rigvedha_009_0311.wav,इनो विश्वस्य भुवनस्य गोपाः स मा,4.206 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0085.wav,सुहवमग्ने स्वस्त्यमर्त्यं गत्वा पुनरायाभिनन्दन्,7.317 |
| Rigveda_40_0260.wav,अव शादेषु गच्छति,2.685 |
| Rigvedha_013_0104.wav,अथा मन्दस्व जुजुषाणो अन्धसस्त्वष्टर्देवेभिर्जनिभिः सुमद्गणः,7.2540625 |
| RigVeda_48_0102.wav,तदिन्न्वस्य परिषद्वानो अग्मन्पुरू सदन्तो नार्षदं बिभित्सन्,7.563 |
| RigVeda_44_0074.wav,क्राणा शिशुर्महीनां हिन्वन्नृतस्य दीधितिम्,5.329 |
| RigVeda_Part_024_0171.wav,ता नृभ्य आ सौश्रवसा सुवीराग्ने सूनो सहसः पुष्यसे धाः,7.682 |
| Rigvedha_014_0199.wav,वि पाजसा पृथुना शोशुचानो बाधस्व द्विषो रक्षसो अमीवाः,6.7650625 |
| RigVeda_50_0009.wav,उक्ष्णो हि मे पञ्चदश साकं पचन्ति विंशतिम्,4.7 |
| Rigveda_40_0460.wav,विश्वा धामान्याविशन्,3.389 |
| Atharvaveda_Part_020_40364.wav,सोमः पती रयीणां सखेन्द्रस्य दिवेदिवे,5.172 |
| Atharvaveda_Part_020_30133.wav,पृषन्तं सृप्रमदब्धमूर्वं बृहस्पते रक्षतादस्य योनिम्,6.481 |
| Rigvedha_006_0202.wav,तक्षन्पितृभ्यामृभवो युवद्वयस्तक्षन्वत्साय मातरं सचाभुवम्,8.308 |
| RigVeda_49_0120.wav,विदद्ध्यर्यो अभिभूति पौंस्यं महो राये चित्तरुते यदर्वतः,7.659 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0226.wav,उच्छ्वञ्चमाना पृथिवी सु तिष्ठतु सहस्रं मित उप हि श्रयन्ताम्,5.919 |
| Rigveda_34_0111.wav,अपामीवामप स्रिधमप सेधत दुर्मतिम्,5.05 |
| Rig_veda_54_0042.wav,सं चेदं वि च पश्येम,3.032 |
| RigVeda_Part_027_0126.wav,य इद्ध आविवासति सुम्नमिन्द्रस्य मर्त्यः,4.851 |
| RigVeda_Part_021_0151.wav,उत त्वचं ददतो वाजसातौ पिप्रीहि मध्वः सुषुतस्य चारोः,6.95 |
| Rigveda_40_0025.wav,सना ज्योतिः सना स्वर्विश्वा च सोम सौभगा,6.71 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0109.wav,चक्षुषो हेते मनसो हेते ब्रह्मणो हेते तपसश्च हेते मेन्या मेनिरस्यमेनयस्ते सन्तु येऽस्मामभ्यघायन्ति,14.077 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0429.wav,इन्द्राग्नी अश्विना तर्हि कं ते ज्येष्ठमुपासत,5.559 |
| Rigveda_37_0429.wav,उप मा षड्द्वाद्वा नरः सोमस्य हर्ष्या,5.052 |
| Rigveda_32_0036.wav,स आ नो योनिं सदतु प्रेष्ठो बृहस्पतिर्विश्ववारो यो अस्ति,7.556 |
| Atharvaveda_Part_018_1_0196.wav,द्यावा ह क्षामा प्रथमे ऋतेनाभिश्रावे भवतः सत्यवाचा,7.422 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0277.wav,परीममिन्द्रमायुषे महे क्षत्राय धत्तन,4.647 |
| Rigveda_38_0169.wav,प्रशंसन्ति प्रशस्तिभिः,2.748 |
| RigVeda_42_0337.wav,इन्द्रस्य सख्यं पवते विवेविदत्सोमः पुनानः कलशेषु सीदति,7.237 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0549.wav,एवा त्वं कासे प्र पत पृथिव्या अनु संवतम्,4.792 |
| RigVeda_44_0128.wav,अयं भराय सानसिरिन्द्राय पवते सुतः,4.767 |
| Rigveda_34_0200.wav,आ गन्ता मा रिषण्यत प्रस्थावानो माप स्थाता समन्यवः,7.706 |
| RigVeda_43_0365.wav,परि ष्य सुवानो अव्ययं रथे न वर्माव्यत,5.003 |
| Rigvedha_002_0205.wav,समुद्रे अश्विनेयते,2.786 |
| Rigvedha_009_0182.wav,सौधन्वना अश्वादश्वमतक्षत युक्त्वा रथमुप देवाँ अयातन,7.865 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0393.wav,ताः प्र यच्छेद्ब्रह्मभ्यः सोऽनाव्रस्कः प्रजापतौ,5.428 |
| RigVeda_51_0207.wav,अव नो वृजिना शिशीह्यृचा वनेमानृचः,4.898 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0149.wav,पूर्णा दर्वे परा पत सुपूर्णा पुनरा पत,5.084 |
| Rigveda_29_0110.wav,त्वा जनिष्ठा अषाळ्हः,2.558 |
| Rigveda_29_0095.wav,य इन्द्र शुष्मो मघवन्ते अस्ति शिक्षा सखिभ्यः पुरुहूत नृभ्यः,6.615 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0374.wav,अप्यस्य पुत्रान् पौत्रांश्च याचयते बृहस्पतिः,5.293 |
| Rigveda_31_0152.wav,उषा याति ज्योतिषा बाधमाना विश्वा तमांसि दुरिताप,7.369 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0416.wav,उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिविश्रितः,4.996 |
| RigVeda_Part_020_0053.wav,पूर्वीर्हि गर्भः शरदो ववर्धापश्यं जातं यदसूत माता,7.478 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0502.wav,अदुष्टे देवाः पुत्रं सोमपा उभयाविनम्,4.792 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0103.wav,अभि त्वा वर्चसासिचन्न् आपो दिव्याः पयस्वतीः,5.241 |
| RigVeda_Part_019_0193.wav,इह वां सोमपीतये,3.313 |
| Rigvedha_011_0323.wav,समानो अध्वा प्रवतामनुष्यदे य,3.761 |
| Rigveda_32_0166.wav,यदि वाहमनृतदेव आस मोघं वा देवाँ अप्यूहे अग्ने किमस्मभ्यं जातवेदो हृणीषे द्रोघवाचस्ते निरृथं सचन्ताम्,15.767 |
| Rigveda_41_0117.wav,गोषा उ अश्वसा असि सम्मिश्लो अरुषो भव सूपस्थाभिर्न धेनुभिः सीदञ्छ्येनो न योनिमा,12.128 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0341.wav,प्रदातोप जीवति पितॄणां लोकेऽक्षितम्,4.524 |
| Rigvedha_010_0033.wav,को न्वत्र मरुतो मामहे वः प्र यातन सखीँरच्छा सखायः,6.762 |
| Rig_veda_54_0145.wav,आ वश्चित्तमा वो व्रतमा वोऽहं समितिं ददे,5.506 |
| Atharvaveda_Part_020_40230.wav,कुहाकं पक्वकं पृच्छ,3.231 |
| RigVeda_42_0346.wav,द्रापिं वसानो यजतो दिविस्पृशमन्तरिक्षप्रा भुवनेष्वर्पितः,7.525 |
| Rigveda_37_0294.wav,क्व स्य वृषभो युवा तुविग्रीवो अनानतः,5.752 |
| RigVeda_Part_028_0143.wav,यो देह्यो अनमयद्वधस्नैर्यो अर्यपत्नीरुषसश्चकार,9.754 |
| RigVeda_52_0090.wav,तमन्धः,1.406 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0156.wav,प्रजां च लोकं चाप्नोति तथा सप्तऋषयो विदुः,5.266 |
| RigVeda_Part_017_0277.wav,आवहन्त्यरुणीर्ज्योतिषागान्मही चित्रा रश्मिभिश्चेकिताना,7.449 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0231.wav,अरायान् अप हन्मः सुनामा स्त्रैणमिच्छताम्,5.061 |
| RigVeda_53_0155.wav,पावकवर्चाः शुक्रवर्चा अनूनवर्चा उदियर्षि भानुना,7.212 |
| RigVeda_Part_022_0211.wav,अनु क्रामेम धीतिभिः,2.816 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0270.wav,परि त्वाग्ने पुरं वयं विप्रं सहस्य धीमहि,4.861 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0211.wav,श्यामा सरूपंकरणी पृथिव्या अध्युद्भृता,4.984 |
| RigVeda_48_0228.wav,तां पीपयत पयसेव धेनुं कुविद्गिरो अधि रथे वहाथ,6.656 |
| Atharvaveda_Part_020_20331.wav,इमा नु कं भुवना सीषधामेन्द्रश्च विश्वे च देवाः,5.979 |
| RigVeda_43_0100.wav,शूरो युत्सु प्रथमः पृ,2.58 |
| RigVeda_Part_021_0214.wav,उरोष्ट इन्द्र राधसो विभ्वी रातिः शतक्रतो,5.648 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0204.wav,नैनं घ्नन्त्यप्सरसो न गन्धर्वा न मर्त्याः,5.16 |
| Rigvedha_014_0260.wav,अग्निर्नेता भग इव क्षितीनां दैवीनां देव ऋतुपा ऋतावा,7.7070625 |
| Rigveda_34_0188.wav,तमागन्म सोभरयः सहस्रमुष्कं स्वभिष्टिमवसे,6.929 |
| Rigvedha_013_0368.wav,क्षो युक्तग्रावा जायते देवकामः,4.9580625 |
| RigVeda_50_0371.wav,मही चिद्धि धिषणाहर्यदोजसा बृहद्वयो दधिषे हर्यतश्चिदा,6.605 |
| RigVeda_46_0270.wav,अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित्कृषस्व वित्ते रमस्व बहु मन्यमानः,6.876 |
| Rigveda_38_0292.wav,सुदात्वपरिह्वृता,2.948 |
| RigVeda_50_0220.wav,यस्मिन्नश्वास ऋषभास उक्षणो वशा मेषा अवसृष्टास आहुताः,7.427 |
| Rigveda_34_0384.wav,नू अन्यत्रा चिदद्रिवस्त्वन्नो जग्मुराशसः,5.859 |
| RigVeda_Part_019_0214.wav,अयं वां परि षिच्यते सोम इन्द्राबृहस्पती,5.584 |
| Rigvedha_001_0293.wav,ताभिर्देवाँ इहा वह,4.196 |
| Atharvaveda_Part_020_10349.wav,ऊतिमिन्द्रा वृणीमहे,2.761 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0409.wav,प्रियं सर्वस्य पश्यत उत शूद्र उतार्ये,4.528 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0242.wav,उतेव प्रभ्वीरुत संमितास उत शुक्राः शुचयश्चामृतासः,5.943 |
| RigVeda_Part_015_0297.wav,इन्द्रेह तत आ गहि,2.687 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0715.wav,देवाः प्र हिणुत स्मरमसौ मामनु शोचतु,4.106 |
| Rigvedha_010_0194.wav,प्र सूरश्चक्रं वृहतादभीकेऽभि स्पृधो यासिषद्वज्रबाहुः,6.352 |
| Rigveda_40_0269.wav,क्रत्वा दक्षस्य र,1.942 |
| Rigveda_32_0365.wav,ऋश्यो न तृष्यन्नवपानमा गहि पिबा सोमं वशाँ अनु,6.878 |
| Atharvaveda_Part_020_30286.wav,य उशता मनसा सोममस्मै सर्वहृदा देवकामः सुनोति,5.931 |
| Atharvaveda_Part_020_40019.wav,यत्सोममिन्द्र विष्णवि यद्वा घ त्रित आप्त्ये यद्वा मरुत्सु मन्दसे समिन्दुभिः,9.407 |
| RigVeda_Part_024_0013.wav,सूरो न हि द्युता त्वं कृपा पावक रोचसे,5.541 |
| RigVeda_51_0138.wav,ष्मा निष्पदो मुद्गलानीम्,3.226 |
| Rigveda_31_0135.wav,दीर्घश्रुतं,2.447 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0262.wav,आशानामाशापालेभ्यश्चतुर्भ्यो अमृतेभ्यः,5.602 |
| RigVeda_43_0117.wav,शूरग्रामः सर्ववीरः सहावाञ्जेता पवस्व सनिता धनानि,8.15 |
| Rigveda_37_0325.wav,दाता मे पृषतीनां राजा हिरण्यवीनाम्,5.738 |
| Rigvedha_001_0214.wav,त्वं वलस्य गोमतोऽपावरद्रिवो बिलम्,5.308 |
| Rigveda_33_0265.wav,कद्ध नूनं कधप्रियो यदिन्द्रमजहातन,4.826 |
| Rigvedha_002_0112.wav,अश्वं न त्वा वारवन्तं वन्दध्या अग्निं नमोभिः,6.016 |
| RigVeda_Part_020_0064.wav,हृणीयमानो अप हि मदैयेः प्र मे देवानां व्रतपा उवाच,7.658 |
| RigVeda_48_0092.wav,सरत्पदा न दक्षिणा परावृङ्न ता नु मे पृशन्यो जगृभ्रे,6.164 |
| Atharvaveda_Part_020_40390.wav,यदन्तरिक्षे यद्दिवि यत्पञ्च मानुषामनु,4.637 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0018.wav,तेना ते तन्वे शं करं पृथिव्यां ते निषेचनं बहिष्टे अस्तु बालिति,10.395 |
| RigVeda_Part_022_0208.wav,तं वः शर्धं रथानां त्वेषं गणं मारुतं नव्यसीनाम्,7.073 |
| RigVeda_52_0055.wav,कश्छन्दसां योगमावेद धीरः को धिष्ण्यां प्रति वाचं पपाद,7.613 |
| RigVeda_Part_015_0182.wav,तवायं सोमस्त्वमेह्यर्वाङ्छश्वत्तमं सुमना अस्य पाहि,7.315 |
| Rigvedha_006_0081.wav,न वो हिरण्यनेमयः पदं विन्दन्ति विद्युतो वित्तं मे अस्य रोदसी,7.582 |
| RigVeda_Part_021_0175.wav,तस्मा आपः संयतः पीपयन्त तस्मिन्क्षत्रममवत्त्वेषमस्तु,6.779 |
| Rigvedha_003_0053.wav,सक्ष्वा देव प्र णस्पुरः,3.011 |
| Rigvedha_009_0219.wav,त्राणि यूष्ण आसेचनानि,3.445 |
| RigVeda_Part_020_0045.wav,आ भन्दिष्ठस्य सुमतिं चिकिद्धि बृहत्ते अग्ने महि शर्म भद्रम्,7.128 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0208.wav,सं वोऽवन्तु सुदानव उत्सा अजगरा उत मरुद्भिः प्रच्युता मेघा वर्षन्तु पृथिवीमनु,9.074 |
| RigVeda_Part_017_0383.wav,त्वं राजा जनुषां धेह्यस्मे अधि श्रवो माहिनं यज्जरित्रे,7.687 |
| Rigveda_36_0027.wav,उतो नु चिद्य ओहत आण्डा शु,3.8 |
| RigVeda_48_0241.wav,अग्निरिन्द्रो वरुणो मित्रो,2.196 |
| RigVeda_44_0229.wav,अभि द्युम्नं बृहद्यश इषस्पते दिदीहि देव देवयुः,5.651 |
| RigVeda_Part_017_0242.wav,विश्वेभिर्यद्वावनः शुक्र देवैस्तन्नो रास्व सुमहो भूरि मन्म,7.72 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0156.wav,संसृष्टजित्सोमपा बाहुशर्ध्युग्रधन्वा प्रतिहिताभिरस्ता,8.189 |
| RigVeda_53_0011.wav,अर्वाग्देवा अस्य विसर्जनेनाथा को वेद यत आबभूव,8.103 |
| Rigvedha_003_0029.wav,तस्मा इळां सुवीरामा यजामहे सुप्रतूर्तिमनेहसम्,6.193 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0435.wav,यथा वृत्र इमा आपस्तस्तम्भ विश्वधा यतीः,5.232 |
| Rigveda_40_0342.wav,स हि ष्मा जरितृभ्य आ वाजं गोमन्तमिन्वति,5.776 |
| Rigvedha_004_0231.wav,एता ते अग्न उचथानि वेधो जुष्टानि सन्तु मनसे हृदे च,7.256 |
| RigVeda_Part_026_0033.wav,पतिर्जज्ञे वृषक्रतुः,2.937 |
| Rigveda_40_0459.wav,एष पवित्रे अक्षरत्सोमो देवेभ्यः सुतः,5.542 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0049.wav,अद्यास्य ब्रह्मणस्पते धनुरिवा तानया पसः,5.325 |
| RigVeda_46_0078.wav,स्त्रीभिर्यो अत्र वृषणं पृतन्यादयुद्धो अस्य वि भजानि वेदः,6.26 |
| Rigvedha_012_0149.wav,गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम्,7.005 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0045.wav,सूर्यस्याश्वा हरयः केतुमन्तः सदा वहन्त्यमृताः सुखं रथम्,6.78 |
| Atharvaveda_Part_020_40422.wav,यदुषो यासि भानुना सं सूर्येण रोचसे,4.942 |
| Atharvaveda_Kanda_9_0290.wav,प्रजानां प्रजननाय गच्छति प्रतिष्ठां प्रियः प्रजानां भवति य एवं विद्वान् उपसिच्योपहरति,10.666 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0415.wav,इत्थं श्रेयो मन्यमानेदमागमं युष्माकं सख्ये अहमस्मि शेवा,7.877 |
| RigVeda_49_0321.wav,पुनः पत्नीमग्निरदादायुषा सह वर्चसा,5.327 |
| RigVeda_Part_021_0355.wav,देवोदेवः सुहवो भूतु मह्यं मा नो माता पृथिवी दुर्मतौ धात्,8.435 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0085.wav,तेनाश्वत्थ त्वया वयं सपत्नान्त्सहिषीमहि,5.072 |
| RigVeda_Part_021_0279.wav,वर्धन्तां द्यावो गिरश्चन्द्राग्रा उदा वर्धन्तामभिषाता अर्णाः,8.658 |
| Rigvedha_010_0232.wav,अयं यज्ञो देवया अयं मियेध इमा ब्रह्माण्ययमिन्द्र सोमः,7.351 |
| Rigvedha_002_0261.wav,नातारीदस्य समृतिं वधानां सं रुजानाः पिपिष इन्द्रशत्रुः,7.317 |
| Rigveda_40_0080.wav,तं गोभिर्वृषणं रसं मदाय देववीतये,5.932 |
| Rigveda_33_0188.wav,उक्थेन वावृधुः,1.767 |
| Rigveda_40_0125.wav,नृचक्षसं त्वा वयमिन्द्रपीतं स्वर्विदम्,5.143 |
| RigVeda_Part_022_0300.wav,ऋष्टयो वो मरुतो अंसयोरधि सह ओजो बाह्वोर्वो बलं हितम्,8.012 |
| Atharvaveda_Part_014_0262.wav,सम्राज्ञ्येधि श्वशुरेषु सम्राज्ञ्युत देवृषु,4.722 |
| Rigveda_33_0393.wav,त्या न्वश्विना हुवे सुदंससा गृभे कृता,6.349 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0218.wav,अश्विनोः पादाभ्याम्,3.005 |
| Rigveda_40_0416.wav,शुचिः पावको अद्भुतः,2.764 |
| RigVeda_48_0264.wav,सूर्यं दिवि रोहयन्तः सुदानव आर्या व्रता विसृजन्तो अधि क्षमि,8.077 |
| Atharvaveda_Part_020_10351.wav,इन्द्रो यदभिनद्वलम्,2.368 |
| Rigvedha_003_0254.wav,त्वं मायाभिरप मायिनोऽधमः स्वधाभिर्ये अधि शुप्तावजुह्वत,6.304 |
| Rig_veda_45_0008.wav,सप्तीवन्त एवैः,2.335 |
| Rigvedha_001_0170.wav,सं चोदय चित्रमर्वाग्राध इन्द्र वरेण्यम्,6.137 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0166.wav,देवसेनानामभिभञ्जतीनां जयन्तीनां मरुतो यन्तु मध्ये,7.815 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0565.wav,संधां महतीं रक्षत ययाग्रे असुरा जिताः,5.468 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0191.wav,अजमनज्मि पयसा घृतेन दिव्यं सुपर्णं पयसं बृहन्तम्,6.156 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0167.wav,व्याकरोमि हविषाहमेतौ तौ ब्रह्मणा व्यहं कल्पयामि,6.951 |
| Rigveda_35_0095.wav,अग्निरुक्थे पुरोहितो ग्रावाणो बर्हिरध्वरे ऋचा यामि मरुतो ब्रह्मणस्पतिं देवाँ अवो वरेण्यम्,14.158 |
| Rigvedha_013_0337.wav,रथीरन्तरीयते साधदिष्टिभिर्जीरो दमूना अभिशस्तिचातनः,6.921 |
| Rigvedha_013_0206.wav,एदं बर्हिर्नि षीदत,2.973 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0240.wav,उद्वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्,6.065 |
| RigVeda_47_0105.wav,आ यात्विन्द्रः स्वपतिर्मदाय यो धर्मणा तूतुजानस्तुविष्मान्,6.304 |
| RigVeda_Part_023_0104.wav,मित्र वंसि वां सुमतिम्,2.946 |
| RigVeda_Part_022_0106.wav,उप यद्वोचे अध्वरस्य होता रायः स्याम पतयो वाजरत्नाः,7.961 |
| Rigveda_41_0155.wav,हरिं हिनोत वाजिनम्,3.351 |
| RigVeda_44_0416.wav,सिषक्त्यूधर्निण्योरुपस्थ उत्सस्य मध्ये निहितं पदं वेः,6.324 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0366.wav,उत्तरं द्विषतो मामयं मणिः कृणोतु देवजाः,4.699 |
| Rigveda_40_0273.wav,नीहीन्द्राय पातवे,3.466 |
| Rigveda_34_0102.wav,ते हि पुत्रासो अदितेर्विदुर्द्वेषांसि योतवे,6.289 |
| Rigvedha_010_0348.wav,अभिजिघ्रन्ती भुवनस्य नाभिं द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात् उर्वी सद्मनी बृहती ऋतेन हुवे देवानामवसा जनित्री,13.492 |
| RigVeda_Part_022_0367.wav,देवत्रा कृणुते मनः,2.961 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0005.wav,आ वो रोहितः शृणवत्सुदानवस्त्रिषप्तासो मरुतः स्वादुसंमुदः,6.526 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0317.wav,वराहो वेद वीरुधं नकुलो वेद भेषजीम्,5.041 |
| Rigvedha_002_0010.wav,अप्सु मे सोमो अब्रवीदन्तर्विश्वानि भेषजा,6.268 |
| Rigveda_33_0329.wav,त्रीणि पदान्यश्विनोराविः सान्ति गुहा परः,5.946 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0179.wav,अजस्रं घर्ममीमहे स विश्वा प्रति चाकॢप ऋतूंरुत्सृजते वशी,7.302 |
| Rigvedha_014_0128.wav,अग्ने यजिष्ठो अध्वरे देवान्देवयते यज,5.1670625 |
| Rigvedha_009_0307.wav,इन्द्रश्च या चक्रथुः सोम तानि धुरा न युक्ता रजसो वहन्ति,5.83 |
| RigVeda_53_0080.wav,दूर्वाया इव तन्तवो व्यस्मदेतु दुर्मतिर्देवी जनित्र्यजीजनद्भद्रा जनि,9.263 |
| Rigvedha_008_0183.wav,उक्थैर्य एनोः परिभूषति व्रतं स्तोमैराभूषति व्रतम्,7.964 |
| Atharvaveda_Part_020_10151.wav,नहि त्वदन्यो गिर्वणो गिरः सधत्क्षोणीरिव प्रति नो हर्य तद्वचः,6.655 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0259.wav,उप स्तृणीहि प्रथय पुरस्ताद्घृतेन पात्रमभि घारयैतत्,5.959 |
| Rigveda_30_0115.wav,प्र द्यावा यज्ञैः पृथिवी नमोभिः सबाध ईळे बृहती यजत्रे,7.422 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0691.wav,अप सेध दुन्दुभे दुछुनामित इन्द्रस्य मुष्टिरसि वीडयस्व,5.578 |
| RigVeda_Part_027_0062.wav,इमं च नो गवेषणं सातये सीषधो गणम्,5.378 |
| Rigveda_29_0397.wav,क्तु यूयं पात स्व,2.102 |
| Rigveda_29_0136.wav,यच्छा सूरिभ्य उपमं वरूथं स्वाभुवो जरणामश्नवन्त,6.917 |
| Rigveda_34_0219.wav,येषामर्णो न सप्रथो नाम त्वेषं शश्वतामेकमिद्भुजे,7.198 |
| RigVeda_Part_023_0077.wav,आ यद्योनिं हिरण्ययं वरुण मित्र सदथः,4.882 |
| Rigvedha_012_0060.wav,स भूतु यो ह प्रथमाय धायस ओजो मिमानो महिमानमातिरत्,6.74 |
| Rigvedha_004_0269.wav,एवा होतः सत्यतर त्वमद्याग्ने मन्द्रया जुह्वा यजस्व,8.025 |
| RigVeda_44_0110.wav,स नो मदानां पत इन्दो देवप्सरा असि,5.279 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0307.wav,मह्यं देवा उत विश्वे तपोजा मह्यं देवः सविता व्यचो धात्,6.77 |
| Rigvedha_002_0008.wav,अप्स्वन्तरमृतमप्सु भेषजमपामुत प्रशस्तये,6.823 |
| RigVeda_42_0177.wav,समीचीनाः सुदानवः प्रीणन्ति तं नरो हितमव मेहन्ति पेरवः,7.548 |
| RigVeda_Part_016_0024.wav,शुनं हुवेम मघवानमिन्द्रमस्मिन्भरे नृतमं वाजसातौ,6.261 |
| Rigveda_32_0303.wav,उत सु त्ये पयोवृधा माकी रणस्य नप्त्या,5.372 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0042.wav,यथा वृक्षं लिबुजा समन्तं परिषस्वजे,4.553 |
| Rigveda_37_0419.wav,त्वोतासस्त्वा युजाप्सु सूर्ये महद्धनम्,5.788 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0050.wav,चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत,5.659 |
| RigVeda_Part_028_0182.wav,चित्रभानुरुषसां भात्यग्रेऽपां गर्भः प्रस्व आ विवेश,7.849 |
| Rigvedha_014_0064.wav,अध्वर्युभिः पञ्चभिः सप्त विप्राः प्रियं रक्षन्ते निहितं पदं वेः,6.772 |
| RigVeda_48_0018.wav,यत्ते सूर्यं यदुषसं मनो जगाम दूरकम्,5.295 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0367.wav,यौवने जीवान् उपपृञ्चती जरा पितृभ्य उपसंपराणयादिमान्,6.963 |
| Rigveda_31_0131.wav,ते देवानां न मिनन्ति व्रतान्यमर्धन्तो,7.375 |
| RigVeda_44_0009.wav,उतो कृपन्त धीतयो देवानां नाम बिभ्रतीः,5.732 |
| Rigvedha_008_0239.wav,तेषां पदेन मह्या नमे गिरेन्द्राग्नी आ नमे गिरा,7.026 |
| Rigveda_39_0147.wav,यमिन्द्र दधिषे त्वमश्वं गां भागमव्ययम्,5.441 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0034.wav,इहैव प्राणः सख्ये नो अस्तु तं त्वा परमेष्ठिन् परि रोहित आयुषा वर्चसा दधातु,8.318 |
| Atharvaveda_Kanda_5_0569.wav,यदस्य हृतं विहृतं यत्पराभृतमात्मनो जग्धं यतमत्पिशाचैः,6.716 |
| Rig_veda_45_0004.wav,तमुस्रामिन्द्रं न रेजमानमग्निं गीर्भिर्नमोभिरा कृणुध्वम्,6.489 |
| Rigveda_38_0065.wav,भूरिभिः समह ऋषिभिर्बर्हिष्मद्भि स्तविष्यसे,5.383 |
| Rig_veda_45_0174.wav,प्रति मिम एतामृतस्य नाभावधि सं पुनामि,4.807 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0120.wav,एतत्त्वा वासः प्रथमं न्वागन्न् अपैतदूह यदिहाबिभः पुरा इष्टापूर्तमनुसंक्राम विद्वान् यत्र ते दत्तं बहुधा विबन्धुषु,13.33 |
| RigVeda_44_0200.wav,रयिं पिशङ्गं बहुलं पुरुस्पृहं पवमानाभ्यर्षसि,5.834 |
| Rigveda_37_0263.wav,स प्रत्नथा कविवृध इन्द्रो वाकस्य वक्षणिः,5.788 |
| RigVeda_Part_022_0271.wav,जुषध्वं नो हव्यदातिं यजत्रा वयं स्याम पतयो रयीणाम्,7.523 |
| Atharvaveda_Part_014_0396.wav,ये भूतस्य प्रचेतसस्तेभ्य इदमकरं नमः,4.818 |
| RigVeda_Part_022_0275.wav,ये ते नेदिष्ठं हवनान्यागमन्तान्वर्ध भीमसंदृशः,6.628 |
| RigVeda_Part_015_0344.wav,आ त्वा बृहन्तो हरयो युजाना अर्वागिन्द्र सधमादो वहन्तु,7.726 |
| RigVeda_43_0338.wav,एष प्रत्नेन वयसा पुनानस्तिरो वर्पांसि दुहितुर्दधानः,5.634 |
| Rigvedha_011_0314.wav,द्यावा चिदस्मै पृथिवी नमेते शुष्माच्चिदस्य पर्वता भयन्ते,6.533 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0048.wav,अधि ब्रूहि मा रभथाः सृजेमं तवैव सन्त्सर्वहायाः इहास्तु,6.501 |
| RigVeda_43_0215.wav,पयो न दुग्धमदितेरिषिरमुर्विव गातुः सुयमो न वोळ्हा,5.925 |
| Rigveda_34_0319.wav,अभिख्या भासा बृहता शुशुक्वनिः,4.283 |
| Rigveda_41_0046.wav,सुनोता मधुमत्तमम्,2.977 |
| Rigveda_40_0375.wav,एते पूता विपश्चितः सोमासो दध्याशिरः,6.009 |
| RigVeda_47_0327.wav,त्वष्टा माया वेदपसामपस्तमो बिभ्रत्पात्रा देवपानानि शंतमा,9.561 |
| Rigveda_37_0132.wav,ज्योतिष्मन्तं केतुमन्तं त्रिचक्रं सुखं रथं सुषदं भूरिवारम्,7.277 |
| RigVeda_Part_016_0020.wav,गोभिर्मिमिक्षुं दधिरे सुपारमिन्द्रं ज्यैष्ठ्याय धायसे गृणानाः,7.557 |
| RigVeda_Part_026_0010.wav,त्वमेकस्य वृत्रहन्नविता द्वयोरसि,4.984 |
| Rigveda_34_0370.wav,मघैर्मघोनो अति शूर दाशसि,3.954 |
| Rigveda_39_0151.wav,अतस्त्वा गीर्भिर्द्युगदिन्द्र केशिभिः सुतावाँ आ विवासति,7.369 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0096.wav,यत्रेदानीं पश्यसि जातवेदस्तिष्ठन्तमग्न उत वा चरन्तम्,6.609 |
| Rigveda_30_0304.wav,ऋतस्य मित्रावरुणा पथा वामपो न नावा दुरिता तरेम,6.672 |
| RigVeda_49_0305.wav,अश्रीरा तनूर्भवति रुशती पापयामुया पतिर्यद्वध्वो वाससा स्वमङ्गमभिधित्सते ये वध्वश्चन्द्रं वहतुं यक्ष्मा यन्ति जनादनु,18.067 |
| Rigveda_38_0305.wav,अर्थिनो यन्ति चेदर्थं गच्छानिद्ददुषो रातिम्,5.491 |
| RigVeda_44_0300.wav,त्वं त्यत्पणीनां विदो वसु सं मातृभिर्मर्जयसि स्व आ दम ऋतस्य धीतिभिर्दमे,8.195 |
| RigVeda_53_0130.wav,वि सूर्यो मध्ये अमुचद्रथं दिवो विदद्दासाय प्रतिमानमार्यः,8.693 |
| RigVeda_52_0078.wav,रा उपस्तुतास ऋषयोऽवोचन्,3.987 |
| RigVeda_53_0114.wav,उत देवा अवहितं देवा उन्नयथा पुनः,5.984 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0134.wav,इमं यज्ञं प्रदिवो मे जुषन्तां संस्राव्येण हविषा जुहोमि,7.384 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0183.wav,पैद्वो रथर्व्याः शिरः सं बिभेद पृदाक्वाः,5.227 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0028.wav,यामाहुतिं प्रथमामथर्वा या जाता या हव्यमकृणोज्जातवेदाः,7.996 |
| RigVeda_Part_016_0130.wav,पुराण्योः सद्मनोः केतुरन्तर्महद्देवानामसुरत्वमेकम्,8.079 |
| Atharvaveda_Part_020_10022.wav,आ ते सिञ्चामि कुक्ष्योरनु गात्रा वि धावतु,5.111 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0019.wav,श्रिया समानान् अति सर्वान्त्स्यामाधस्पदं द्विषतस्पादयामि,6.09 |
| Rigveda_37_0330.wav,श्रवो देवेष्वक्रत,3.163 |
| RigVeda_Part_024_0026.wav,ईजे यज्ञेभिः शशमे शमीभिरृधद्वारायाग्नये ददाश,7.256 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0169.wav,यत्र ब्रह्मविदो यान्ति दीक्षया तपसा सह,4.45 |
| Rigvedha_014_0029.wav,दिवश्चिदग्ने महिना पृथिव्या वच्यन्तां ते वह्नयः सप्तजिह्वाः,7.161 |
| RigVeda_Part_016_0142.wav,अन्तर्मतिश्चरति निष्षिधं गोर्महद्देवानामसुरत्वमेकम् नि वेवेति पलितो दूत आस्वन्तर्महाँश्चरति रोचनेन वपूंषि बिभ्रदभि नो वि चष्टे महद्देवानामसुरत्वमेकम्,21.59 |
| Atharvaveda_Part_014_0211.wav,प्रेतो मुञ्चामि नामुतः सुबद्धाममुतस्करम्,4.578 |
| RigVeda_Part_027_0097.wav,हित्वी शिरो जिह्वया वावदच्चरत्त्रिंशत्पदा न्यक्रमीत्,7.053 |
| Atharvaveda_Part_020_20051.wav,यः शश्वतो अदाशुषो गयस्य प्रयन्तासि सुष्वितराय वेदः,6.543 |
| Rigveda_33_0496.wav,विदे वृधस्य दक्षसो महान्हि षः,4.207 |
| Atharvaveda_Kanda_8_0130.wav,विषेण भङ्गुरावतः प्रति स्म रक्षसो जहि,4.397 |
| Rigveda_35_0317.wav,दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो,5.517 |
| Rigveda_30_0074.wav,यस्मिन्निन्द्रो वसुभिर्मादयाते तमश्याम देवयन्तो वो अद्य,7.279 |
| Rigvedha_013_0256.wav,शिशुं न जातमभ्यारुरश्वा देवासो अग्निं जनिमन्वपुष्यन्,7.3190625 |
| RigVeda_Part_019_0024.wav,तद्वो वाजा ऋभवः सुप्रवाचनं देवेषु विभ्वो अभवन्महित्वनम्,7.681 |
| Rigveda_31_0040.wav,आ विश्ववाराश्विना गतं नः प्र तत्स्थानमवाचि वां,6.902 |
| Rigveda_30_0228.wav,युष्माकोती सुदानवः,3.022 |
| Rig_veda_54_0057.wav,तीव्रस्याभिवयसो अस्य पाहि सर्वरथा वि हरी इह मुञ्च,7.503 |
| Rigvedha_014_0043.wav,पत्नीवतस्त्रिंशतं त्रीँश्च देवाननुष्वधमा वह मादयस्व,6.5880625 |
| Rigvedha_005_0001.wav,ॐ,3.815 |
| RigVeda_Part_017_0313.wav,विश्वानि शक्रो नर्याणि विद्वानपो रिरेच सखिभिर्निकामैः,7.716 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0122.wav,परायतो निवर्तनमायतः प्रतिनन्दनम्,3.953 |
| Rig_veda_54_0031.wav,हत्वाय देवा असुरान्यदायन्देवा देवत्,5.86 |
| Rigvedha_013_0132.wav,आशुभिश्चिद्यान्वि मुचाति नूनमरीरमदतमानं चिदेतोः,6.9960625 |
| RigVeda_Part_016_0174.wav,सद्यश्चिद्या दुदुहे भूरि धासेरिन्द्रस्तदग्निः पनितारो अस्याः इन्द्रः सु पूषा वृषणा सुहस्ता दिवो न प्रीताः शशयं दुदुह्रे,15.829 |
| RigVeda_Part_017_0084.wav,कृणुष्व पाजः प्रसितिं न पृथ्वीं याहि राजेवामवाँ इभेन,7.54 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0344.wav,कालेऽयमङ्गिरा देवोऽथर्वा चाधि तिष्ठतः,5.28 |
| Rigveda_31_0341.wav,वायो अस्मिन्सवने मादयस्व यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः,7.601 |
| RigVeda_46_0075.wav,अत्रा युक्तोऽवसातारमिच्छादथो अयु,4.76 |
| Rigvedha_009_0370.wav,एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः ॐ,12.023 |
| Rigvedha_013_0263.wav,बभ्राणः सूनो सहसो व्यद्यौद्दधानः शुक्रा रभसा वपूंषि,7.8830625 |
| RigVeda_49_0084.wav,वयः सुपर्णा उप सेदुरिन्द्रं प्रियमेधा ऋषयो नाधमानाः,7.392 |
| Rigvedha_010_0319.wav,अयं वां भागो निहित इयं गीर्दस्राविमे वां निधयो मधूनाम्,7.783 |
| Rigvedha_001_0476.wav,सजूर्गणेन तृम्पतु,2.985 |
| Atharvaveda_Part_016_0233.wav,कुम्भीकाः दूषीकाः पीयकान्,4.655 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0564.wav,सर्वे देवा अत्यायन्तु त्रिषन्धेराहुतिः प्रिया,5.819 |
| RigVeda_Part_016_0040.wav,यस्ते अनु स्वधामसत्सुते नि यच्छ तन्वम्,4.853 |
| Atharvaveda_Part_020_20387.wav,तुभ्यं सुतो मघवन् तुभ्यमाभृतस्त्वमस्य ब्राह्मणादा तृपत्पिब,7.042 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0036.wav,पृञ्चतीर्मधुना पयः,3.035 |
| RigVeda_48_0288.wav,अग्निहोतार ऋतसापो अद्रुहोऽपो असृजन्ननु वृत्रतूर्ये,7.214 |
| Rigvedha_001_0435.wav,सखाय आ नि षीदत सविता स्तोम्यो नु नः,6.552 |
| Atharvaveda_Part_018_2_0099.wav,ये अग्रवः शशमानाः परेयुर्हित्वा द्वेषांस्यनपत्यवन्तः,6.624 |
| Atharvaveda_Kanda_4_0331.wav,आशून् इव सुयमान् अह्व ऊतये ते नो मुञ्चन्त्वंहसः,5.804 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0051.wav,यामस्य कण्वो अदुहत्प्रपीनां सहस्रधारां महिषो भगाय,6.414 |
| Atharvaveda_Part_014_0422.wav,अग्निष्ट्वा तस्मादेनसः सविता च प्र मुञ्चताम्,4.936 |
| Rigvedha_010_0068.wav,ष्टिमश्याम्,1.86 |
| RigVeda_Part_016_0152.wav,देवस्त्वष्टा सविता विश्वरूपः पुपोष प्रजाः पुरुधा जजान,7.252 |
| RigVeda_Part_022_0309.wav,मयोभुवो ये अमिता महित्वा वन्दस्व विप्र तुविराधसो नॄन्,6.415 |
| Atharvaveda_Part_019_2_0274.wav,सिंहस्य रात्र्युशती पींषस्य व्याघ्रस्य द्वीपिनो वर्च आ ददे,6.969 |
| RigVeda_Part_027_0170.wav,पुरू वरांस्यमिता मिमानापो धन्वान्यति याथो अज्रान्,7.199 |
| Atharvaveda_Kanda_11_0252.wav,प्र वीयन्ते गर्भान् दधतेऽथो बह्वीर्वि जायन्ते,5.98 |
| Atharvaveda_Kanda_12_0181.wav,यद्रिप्रं शमलं चकृम यच्च दुष्कृतम्,3.795 |
| Rig_veda_45_0245.wav,त्वं देव प्रयता हवींषि,3.188 |
| RigVeda_Part_015_0318.wav,तमिन्द्र मदमा गहि बर्हिष्ठां ग्रावभिः सुतम्,5.41 |
| Rigvedha_002_0094.wav,नि नो होता वरेण्यः सदा यविष्ठ मन्मभिः,5.011 |
| RigVeda_Part_026_0053.wav,अश्वो अश्वायते भव,3.731 |
| RigVeda_44_0249.wav,एवामृताय महे क्षयाय स शुक्रो अर्ष दिव्यः पीयूषः,6.635 |
| Rigvedha_007_0229.wav,विसृष्टरातिर्याति बाळ्हसृत्वा विश्वासु पृत्सु सदमिच्छूरः,6.352 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0291.wav,वाचा वदामि मधुमद्भूयासं मधुसंदृशः,4.902 |
| Atharvaveda_Kanda_10_0002.wav,सारादेत्वप नुदाम एनाम्,3.85 |
| Rigvedha_001_0005.wav,स देवाँ एह वक्षति,4.037 |
| RigVeda_47_0013.wav,न तं राजानावदिते कुतश्चन नांहो अश्नोति दुरितं नकिर्भयम्,7.16 |
| Atharvaveda_Kanda_3_0035.wav,त्वा विश आ पतेमाः,2.654 |
| Atharvaveda_Kanda_13_0292.wav,य एतं देवमेकवृतं वेद,3.277 |
| Rigveda_35_0132.wav,वयं तद्वो वसवो विश्ववेदस उप स्थेयाम मध्य आ,6.513 |
| Rig_veda_54_0209.wav,ध्रुवं ध्रुवेण हविषाभि सोमं मृशामसि,4.316 |
| Atharvaveda_Part_020_30282.wav,इन्द्र मा त्वा यजमानासो अन्ये नि रीरमन्,4.44 |
| RigVeda_Part_015_0249.wav,अपश्यमत्र मनसा जगन्वान्व्रते गन्धर्वाँ अपि वायुकेशान्,8.362 |
| Rigveda_33_0293.wav,पुत्रः कण्वस्य वामृषिर्गीर्भिर्वत्सो अवीवृधत्,5.459 |
| Atharvaveda_Part_020_20358.wav,उदानंश शवसा न भन्दना,4.008 |
| Atharvaveda_Part_020_30195.wav,इन्द्राय गाव आशिरं दुदुह्रे वज्रिणे मधु,4.829 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0671.wav,देवाः पितरः पितरो देवाः,3.821 |
| RigVeda_Part_023_0182.wav,अर्वाञ्चा नूनं रथ्येह यातं पीपिवांसमश्विना घर्ममच्छ,7.557 |
| Atharvaveda_Kanda_1_0248.wav,अभीवर्तो अभिभवः सपत्नक्षयणो मणिः,4.019 |
| Rigveda_41_0298.wav,पवस्व मंहयद्रयिः त्वं सुतो नृमादनो दधन्वान्मत्सरिन्तमः,7.798 |
| RigVeda_Part_020_0347.wav,अग्ने चिकिद्ध्यस्य न इदं वचः सहस्य,5.56 |
| Atharvaveda_Part_019_1_0145.wav,तदस्तु मित्रावरुणा तदग्ने शं योरस्मभ्यमिदमस्तु शस्तम्,5.745 |
| Rigvedha_006_0170.wav,मा च्छेद्म रश्मीँरिति नाधमानाः पितॄणां शक्तीरनुयच्छमानाः,8.985 |
| Atharvaveda_Part_018_1_0178.wav,आपो वाता ओषधयस्तान्येकस्मिन् भुवन आर्पितानि,6.168 |
| Rigveda_35_0440.wav,तत्तदग्निर्वयो दधे यथायथा कृपण्यति ऊर्जाहुतिर्वसूनां शं च योश्च मयो दधे विश्वस्यै देवहूत्यै नभन्तामन्यके समे,17.356 |
| Atharvaveda_Kanda_7_0319.wav,ज्जुजुष्टन,1.494 |
| RigVeda_Part_018_0112.wav,अस्मद्र्यक्छुशुचानस्य यम्या आशुर्न रश्मिं तुव्योजसं गोः,6.922 |
| RigVeda_Part_026_0072.wav,यः सत्राहा विचर्षणिरिन्द्रं तं हूमहे वयम्,6.035 |
| RigVeda_51_0069.wav,स यह्व्योऽवनीर्गोष्वर्वा जुहोति प्रधन्यासु सस्रिः अपादो यत्र युज्यासोऽरथा द्रोण्यश्वास ईरते घृतं वाः,16.404 |
| Atharvaveda_Kanda_6_0168.wav,अभयं मित्रावरुणाविहास्तु नोऽर्चिषात्त्रिणो नुदतं प्रतीचः मा ज्ञातारं मा प्रतिष्ठां विदन्त मिथो विघ्नाना उप यन्तु मृत्युम्,13.296 |
| Rigvedha_005_0116.wav,तन्नो वातो मयोभु वातु भेषजं तन्माता पृथिवी तत्पिता द्यौः,8.321 |
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